बामाको में जुम्मा मस्जिद के पीछे के बाज़ार से, जहां तसबीह के मनकों से लेकर कुरान और स्थानीय मजहब के अलावा दवाओं में इस्तेमाल की जाने वाली जंगली जानवरों की सींग, खोपड़ी, साही के कांटे और फ्रांस में होने वाली घुड़दौड़ में सट्टेबाजी की पर्चियां बेचने वाली दुकानों की भरमार है—गुज़रने वाली गली नेशनल असेंबली और 107.4 एफएम चैनल के सरकारी ‘रेडियो इस्लामिक डि बामाको’ के दफ्तर तक जाती है. 1991 में, लेफ्टिनेंट कर्नल अमादौ टौरे के नेतृत्व में हुई तख्तापलट ने तानाशाही शासन और निष्क्रिय समाजवाद, दोनों का खात्मा कर दिया, जिन्होंने पश्चिम अफ्रीका में चारों तरफ से ज़मीन से घिरे माली को दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार कर रखा था.
कुछ वक्त के लिए यह मार्केट यह पुष्टि करता नज़र आता था कि वहां कई आस्थाएं और प्रथाएं साथ-साथ फल-फूल सकती हैं.
लेकिन पिछले हफ्ते साहेल से अपनी गतिविधियां चलाने वाले, अल-कायदा के नेतृत्व वाले गठजोड़ ‘जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन (जेएनआईएम) के जिहादियों ने उत्तरी शहर किडल में माली की छोटी-सी सेना और उसके रूसी लड़ाकों को परास्त कर दिया. बामाको भी कई महीनों से घेरेबंदी में था.
जिहादी जब राजधानी पर अपनी जकड़ मजबूत कर रहे थे, इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने 2012 में जेएनआईएम के पूर्ववर्ती गुटों की हिंसा के शिकार हुए 65,000 लोगों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 84 लाख डॉलर के मुआवजे की घोषणा की. सबसे बर्बर अत्याचारों का शिकार हुआ शहर टिंबकटू 2023 से घेरेबंदी में था, जहां से हज़ारों लोग शरणार्थी बनकर पलायन कर गए थे. पिछले हफ्ते इस शहर से विमान सेवाएं स्थगित कर दी गईं.
मुद्दे से भटकाव
दुनिया की नज़रें फारस की खाड़ी पर टिकी हैं, लेकिन माली का संकट तुरंत ध्यान दिए जाने की मांग कर रहा है. 2021 में काबुल के पतन के बाद पहली बार एक जिहादी गुट एक राष्ट्र-राज्य को कब्ज़े में लेने के कगार पर है. फ्रांस ने 2012 में अपने सैनिक माली भेजे और दस महीने की लड़ाई के बाद टिंबकटू को जिहादियों के कब्ज़े से मुक्त कराया. जेएनआईएम रेगिस्तान की ओर चला गया और वहां इंतज़ार करता रहा. 2021 में एक और तख्तापलट के बाद फ्रांसीसी सेना माली से निकल गई. उनकी जगह लेने वाले भाड़े के रूसी सैनिक क्रूर और निष्प्रभावी साबित हुए.
उभरती समस्या के संकेत दशकों से मिल रहे थे.
चेतावनी के संकेत दशकों से दिख रहे थे. 1992 के आसपास शोधार्थी बेंजामिन सोरेस ने इस्लामी दबाव की शुरुआती अभिव्यक्ति दर्ज की थी: एक हस्तलिखित संदेश में कहा गया था कि ‘रहमदिल, मेहरबान अल्लाह के नाम पर हम मैनेजमेंट से अपील करते हैं कि वह अश्लील फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगाए, नहीं तो हम, या खुदा, सिनेमाघरों को नेस्तनाबूद कर देंगे’.
रेडियो इस्लामिक के उपदेशक हर शुक्रवार को उन नए कसीनों पर अपना गुस्सा उतारते जिनमें मर्द-औरत के जोड़ों को किराये पर कमरे दिए जाते थे और रमज़ान के महीने में शराबखानों और रेस्तारां को खुले रखने की इज़ाज़त दी जाती थी.
इसके बाद, पाकिस्तान की तबलीगी जमात के उपदेशकों से प्रेरित टुयारेग रॉक बैंड ‘तिनरिवेन’ के एक सदस्य ने कलाश्निकोव राइफल की खातिर अपनी सूट, रोलेक्स घड़ी और वाद्ययंत्र त्याग दिए. इयाद अग घाली नाम का यह शख्स अब सहेल के इस्लामी तहरीक का नेता है और अपनी जीत दर्ज करने वाला है.
मसीहाई प्रेरणा
सभी साम्राज्यों की तरह इस साम्राज्य ने भी एक सपने को लेकर आगे कदम बढ़ाया था. मौलाना अल-हाजी उम्र इब्न सईद अल-फुटी अल-तुरी को एक रात पैगंबर मुहम्मद की जीवनी पढ़ते हुए इलाहम हुआ कि वे ‘सूडान के मुहम्मद’ बनेंगे और फुला लोगों को एक महान राष्ट्र के रूप में संगठित कर देंगे और इस्लाम की पवित्रता बहाल करेंगे. उनका मानना था कि सहेल के फुला इस्लाम से पहले के दौर के अरबों जैसे थे, जिनकी आस्था मजाहिर परस्त प्रथाओं, कबीले की अंदरूनी कलहों के कारण डगमगाती थी और वे बंट गए थे. जिहाद उनको उसी तरह फिर से मजबूत करेगा, जिस तरह उसने अरबों को मजबूत किया था.
उम्र ने 1849 से 1864 में अपनी मौत तक जिस खिलाफत का गठन किया था वह पश्चिम में डिंगुइरे से लेकर उत्तर में टिंबकटू और दक्षिण में नाइगर नदी के किनारे बसे सेगौ तक ढाई लाख वर्गकिमी में फैला हुआ था.
सहेल का इतिहास बताता है कि वह बड़े साम्राज्यों के अंतर्गत एकजुट रहा. इस क्षेत्र में इस्लाम ने करीब 800 ई. में उन व्यापारियों के साथ कदम रखा था जो हाथी दांत, शुतुरमुर्ग के पंख, गुलामों और सोने की खान की खोज में आए थे, जो मध्ययुग में दुनिया की इसकी दो तिहाई ज़रूरत को पूरी करती थी. बाद की सदियों में यह आस्था समाज के तानेबाने में समाहित हो गई और इसने यूरोप से अफ्रीका तक व्यापार तथा कर्ज के नेटवर्क के लिए रास्ता तैयार किया.
मानसा मूसा के राज में माली की इस्लामी पहचान अपने शिखर पर पहुंची. उसने 1324 में मक्का की बहुचर्चित तीर्थयात्रा की, जिससे यह साम्राज्य व्यापक विश्व की नज़रों में आ गया. माली के नए शासकों ने दावा किया कि वे कुरान के बिलाल इब्न रहबह के वंशज हैं, जिन्हें बिलाल अल-हबशी भी कहा जाता है. हबशी एक पूर्व गुलाम था जिस पर मुहम्मद बहुत भरोसा करते थे.
मध्ययुग के मशहूर यात्री इब्न बतूता ने 1351 में माली की यात्रा की थी और इसकी समृद्धि और इस कठोर अनुशासन की तारीफ की थी, जो कुरान को न याद करने वाले बच्चों को दंड देता था, लेकिन वे औरत-मर्द को अलल्ग-अलग न रखने, उन अदालती रिवाज़ों को देखकर हैरान थे जिन्हें वे गैर-इस्लामी मानते थे. मसलन, महिला सेविकाओं का अदालत में निर्वस्त्र आना, सुल्तान के सामने नागरिकों का धूल और राख में लेट कर सिजदा करना और शाही शायरों का चिड़ियों के पंख से बने मुखौटे पहनकर शायरी सुनाना. बेरबरों और मोरक्को के सुल्तान के साथ लड़ाइयों के कारण कमजोर पड़ा माली साम्राज्य अंततः ढह गया और उसे सोंघाई साम्राज्य ने अपने कब्जे में ले लिया.
17वीं सदी के बाद से जिहाद राजनीतिक परिवर्तन के आंदोलनों के नियमित लक्षण के रूप में स्थापित हो गया. नासिर अल-दीन के नाम से जाने गए अव्बेक अशफागा ने सेनेगांबिया क्षेत्र में धर्मतंत्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया जिसका लक्ष्य इस्लाम की पवित्रता बहाल करना और गुलामों के व्यापार का विरोध करना था. बाद में, मौलाना उस्मान दान फोडिओ ने हौसा साम्राज्य के खिलाफ किसानों, गुलामों और चरवाहों को आंदोलित किया. उनके जिहाद की जीत से सोकोटो खिलाफत को जन्म दिया, जो 1903 में अंग्रेज़ों से हार गया. अंततः उमर साम्राज्य उभरा, जिसे फ्रांस के साम्राज्यवादी विस्तार के आगे समर्पण करना पड़ा.
इस सदी के समापन के साथ फ्रांस की सेना ने तुआरेग बागियों के कलम किए गए सिरों को टिंबकटू की गलियों में टांग दिया.
एक राष्ट्र का विघटन
इस्लाम के रूप में सहेल को एक आस्था तो मिली, लेकिन दूसरे जख्म हरे रहे. इब्न बतूता ने उस क्षेत्र के लोगों के तीन वर्ग बताए : अश्वेत अफ्रीकी, साफ चमड़ी वाले बेर्बर और उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व के उनके जैसे ‘श्वेत’. उन्होंने जिन लोगों में यह भेद बताया वह उनके लिए विदेशी भेद था और बेर्बर तो माली साम्राज्य के गुलाम थे, लेकिन इन लोगों को इस सामाजिक ताने-बाने में खुद को समाहित करना था. स्कॉट अन्वेषक मुंगो पार्क ने 1790 वाले दशक में इस क्षेत्र की यात्रा की थी और पाया था कि मूर लोग हौसा को एक दीन-हीन नस्ल मानते थे. अश्वेत अफ्रीकियों में ज़्यादातर सुन्नी मुसलमान थे और वे बेर्बरों को गुलाम, आलसी और असभ्य व्यापारी मानते थे.
फ्रांसीसी उपनिवेशवाद ने इन विभाजनों को और तीखा किया. माली के प्रथम राष्ट्रपति मोदिबो केईता ने याद किया था कि उन्हें एक बैठक में ज़मीन पर बैठाया गया था जबकि कुर्सियां यूरोप वालों के लिए थीं. आज़ादी के बाद नस्लीय आधार पर बसाहट और उग्र हो गई: अश्वेतों को गुलाम माना गया, श्वेतों को परभक्षी लूटेरों से जोड़ा गया, लेकिन हकीकत ज्यादा जटिल थी. कुछ बेर्बरों ने गुलामों का व्यापार किया था, लेकिन ज़्यादातर वे दूसरे मलियानों से गरीब थे.
उत्तर के तुआरेग को निरंतर उपेक्षा सहनी पड़ी. 2002 में, टिंबकटू की तीन चौथाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही थी, जो कि इसके राष्ट्रीय औसत से 7 प्रतिशत अंक से ज्यादा थी. 80 फीसदी लोग बेरोज़गार थे.
इस स्थिति में, तस्करी खूब फल-फूल रही थी और हजारों तुआरेग लोग लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी के भाड़े के सैनिक के रूप में काम कर रहे थे. बागी तुआरेगों ने तीन अलगाववादी लड़ाइयां लड़ीं—1963-64, 1990-96, और 2006-09 में और 2012 में उन्होंने अल-कायदा से मेल कर लिया. गद्दाफी के पतन के बाद घर लौटे भाड़े के लड़ाकों ने पाया कि जेएनआईएम के पास खूब पैसा और हथियार हैं. अग घाली ने जिहाद में राष्ट्रवाद को शामिल कर दिया: माली को पहले कई बार अपनी चपेट में ले चुके आंदोलन का यह सबसे नया रूप है.
जिहादियों के कब्ज़े में 10 महीने तक रहे टिंबकटू ने संभावित भावी की झलक दिखा दी. निवासियों को चौराहों पर चोरों के हाथ काटे जाने के दृश्य देखने को मजबूर होना पड़ा. महिलाओं को कोड़े मारे गए, उनका बलात्कार किया गया, जबरन शादी कारवाई गई; प्राचीन पाण्डुलिपियों के लाइब्रेरी को जलाया गया, मकबरों और पूजास्थलों को तोड़ा गया.
कर्नल अस्सिगोईता ने 2020 और 2021 में तख्तापलट करके सत्ता हथिया ली और संप्रभु माली की फिर से नींव डालने की कसम खाई. उनके शासन के लोकलुभावन राष्ट्रवाद ने देश की समस्याओं का कोई समाधान नहीं दिया. सुरक्षा की स्थिति बिगड़ती गई और अर्थव्यवस्था चरमरा गई.
जेएनआईएम के कायम रहने के सबक साफ हैं: राजनीतिक परिवर्तन के हालात तैयार करने के लिए ताकत चाहिए लेकिन जिहादवाद से लड़ने के लिए भी राजनीतिक प्रयास और व्यवस्था की ज़रूरत है. इराक से लेकर अफगानिस्तान, सीरिया और अब माली तक दुनिया की बड़ी ताकतों ने दिखा दिया है कि इनमें से कुछ भी करने की इच्छाशक्ति उनमें नहीं है.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @praveenswami है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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