हैदराबाद: फरवरी में, अंतरिक्ष में चुपचाप चक्कर लगा रहे एक भारतीय अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ने अपने सेंसर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तरफ घुमाए और उसकी तस्वीर ली. यह तकनीकी प्रदर्शन कोई साधारण फोटो नहीं था. यह अंतरिक्ष में निगरानी करने की भारत की क्षमता की शुरुआत थी, यानी अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे देशों की संपत्तियों पर नजर रखने की ताकत.
इस उपलब्धि के पीछे हैदराबाद की कंपनी अज़िस्टा एयरोस्पेस है, जो ऐसी टोही क्षमता विकसित करने वाली भारत की इकलौती निजी कंपनी है. दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत अंतरिक्ष क्षेत्र से बहुत दूर हुई थी. यह पहले हेल्थकेयर और फार्मास्युटिकल कंपनी थी. करीब एक दशक पहले कंपनी ने अंतरिक्ष क्षेत्र में कदम रखने का फैसला किया. और यह दांव सफल रहा.
दुनियाभर के देश अब रणनीतिक बढ़त के लिए सैटेलाइट्स पर निर्भर हो रहे हैं. ऐसे में जासूसी सैटेलाइट भविष्य की जरूरत बन चुके हैं और अज़िस्टा एयरोस्पेस यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भारत इस वैश्विक दौड़ में पीछे न रह जाए.
कंपनी के डायरेक्टर सुनील इंदुरती ने हैदराबाद के हाईटेक सिटी स्थित कंपनी मुख्यालय में कहा, “अंतरिक्ष में किया गया यह प्रयोग काफी चुनौतीपूर्ण था. अंतरिक्ष में लगभग 7 किमी प्रति सेकेंड की रफ्तार से चल रही दूसरी वस्तु की साफ तस्वीर लेने के लिए कई तकनीकों में महारत हासिल करनी पड़ती है. और हम भविष्य में इस प्रयोग को आगे बढ़ाएंगे.” कंपनी के हैदराबाद में तीन सेंटर हैं. इसके अलावा, अहमदाबाद में सैटेलाइट निर्माण और टेस्टिंग की सुविधाएं भी हैं.
मुख्यालय में अज़िस्टा की वर्षों की उपलब्धियों की तस्वीरें लगी हैं. इनमें बड़े उद्घाटन, बैठकें और वर्कशॉप्स शामिल हैं.

अब तक भारत इससे मिलती-जुलती उपलब्धि के सबसे करीब पिछले साल इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के SpaDeX मिशन में पहुंचा था, जिसमें एजेंसी के दो सैटेलाइट्स ने डॉकिंग प्रयोग के तहत अंतरिक्ष में एक-दूसरे की तस्वीरें ली थीं.
इंदुरती ने कहा कि रक्षा क्षमता के अलावा इस तकनीक का व्यावसायिक उपयोग भी होगा. इससे भारत अपने सैटेलाइट्स पर नजर रख सकेगा और अंतरिक्ष में मौजूद महत्वपूर्ण संपत्तियों की सर्विसिंग कर सकेगा. इसमें सैटेलाइट की स्थिति की निगरानी और लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के लिए रॉकेट में ईंधन भरने जैसी गतिविधियों की रिकॉर्डिंग शामिल है.
“फार्मास्युटिकल कंपनी की मूल सोच रिसर्च होती है. जितनी ज्यादा रिसर्च करेंगे, उतने ज्यादा प्रोडक्ट बाजार में ला सकेंगे. जब हमने दूसरे क्षेत्र में जाने का फैसला किया, तब भी हमारा ध्यान रिसर्च पर ही रहा.”
— एम श्रीनिवास रेड्डी, मैनेजिंग डायरेक्टर, अज़िस्टा एयरोस्पेस
जासूसी सैटेलाइट अब कोई सीमित तकनीक नहीं रहे. मार्च 2026 में स्फेरिकल इनसाइट्स एंड कंसल्टिंग की एक रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक सैन्य सैटेलाइट बाजार 2035 तक बढ़कर करीब 38.64 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है. 2024 से 2035 के बीच इसकी वार्षिक वृद्धि दर 6.44 प्रतिशत रहने का अनुमान है.
इस निवेश का हालिया इस्तेमाल अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में देखा गया. युद्ध के दौरान ईरान ने कथित तौर पर चीन के जासूसी सैटेलाइट TEE-01B का इस्तेमाल पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया.
भारत सरकार ने भी अंतरिक्ष में निगरानी क्षमता बढ़ाने की जरूरत को समझा है. पिछले जून में सरकार ने स्पेस-बेस्ड सर्विलांस-III (SBS-III) कार्यक्रम के तहत 52 विशेष निगरानी सैटेलाइट्स के निर्माण में तेजी लाने का आदेश दिया था. यह 27,000 करोड़ रुपये की योजना है, जिसके तहत अगले दशक में नई पीढ़ी के सैन्य सैटेलाइट तैयार किए जाएंगे.
केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा अंतरिक्ष मंत्री जितेंद्र सिंह ने दिप्रिंट से कहा, “यह अब भविष्य की बात नहीं रह गई है. मैंने पहले भी कहा है कि आगे की सारी लड़ाइयां अंतरिक्ष से लड़ी जाएंगी और हमारे आसपास ठीक वही हो रहा है.”
निर्णायक पल
यह अज़िस्टा एयरोस्पेस के लिए सबसे अहम दिन था. कई साल की रिसर्च और लगातार टेस्ट के बाद, कंपनी का 80 किलो का अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट AFR 3 फरवरी 2026 को अपनी क्षमता साबित करने वाला था.
टीम कई महीनों से इस दिन की तैयारी कर रही थी, लेकिन जैसे ही प्रदर्शन शुरू हुआ, अज़िस्टा के मुख्यालय का माहौल तनावपूर्ण हो गया.
इंजीनियर अपनी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए AFR की हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे. कमांड सही समय पर देनी थी, हर मूवमेंट बिल्कुल सटीक होना था और हर कैमरा एंगल को बहुत सावधानी से तय करना था. ये 15 मिनट बहुत लंबे लग रहे थे. जब सब खत्म हुआ, तो सन्नाटा राहत की सामूहिक सांस में बदल गया. इसके बाद तालियां और खुशी की आवाजें गूंज उठीं.
अज़िस्टा के एक इंजीनियर ने कहा, “यह इतिहास का हिस्सा बनने जैसा था.” कंपनी अपने इंजीनियरों की पहचान सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं देती.
दो अलग-अलग प्रयोगों में एयरोस्पेस कंपनी ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तस्वीरें लेने में सफलता हासिल की. हालांकि ISS अंतरिक्ष में एक बड़ा और आसानी से दिखाई देने वाला ऑब्जेक्ट है, लेकिन इस उपलब्धि ने यह दिखाया कि कंपनी अंतरिक्ष में मौजूद संपत्तियों को पहचानने, उनकी तस्वीर लेने और उन्हें भेजने की क्षमता रखती है.
इंदुरती ने बताया, “हमें पहले लक्ष्य की सही स्थिति पकड़नी थी, जो इस प्रदर्शन में ISS था. इसके बाद हमें सैटेलाइट को सही दिशा में घुमाकर उसकी तस्वीर लेनी थी. इसके लिए काफी योजना और फ्लाइट डायनेमिक्स पर बड़ा काम करना पड़ा.”
“सामान्य कॉरपोरेट माहौल के उलट, यहां लोग एक नया उद्योग खड़ा करने के लिए काम कर रहे हैं. हम ऐसी चीजें कर रहे हैं जो भारत में पहले कभी नहीं हुईं.”
— अज़िस्टा के एक इंजीनियर
पहली तस्वीर ISS से करीब 300 किलोमीटर की दूरी से ली गई थी और दूसरी लगभग 245 किलोमीटर की दूरी से. दोनों प्रयोगों में अज़िस्टा के AFR सैटेलाइट सेंसर ने पहले ISS को ट्रैक किया और फिर 15 अलग-अलग एंगल से उसकी तस्वीरें लीं. यह लगभग 2.2 मीटर की इमेजिंग सैंपलिंग के साथ किया गया. इन टेस्ट्स ने सैटेलाइट के एल्गोरिद्म और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल इमेजिंग की सटीकता को सफलतापूर्वक साबित किया. ये सारी तकनीकें भारत में ही विकसित की गईं.
जून 2023 में SpaceX के शक्तिशाली रॉकेट Falcon 9 के जरिए Transporter-8 मिशन के तहत लॉन्च किए गए AFR की अनुमानित मिशन अवधि पांच साल है. इसमें नेवल इमेजिंग, नाइट इमेजिंग और वीडियो इमेजिंग मोड मौजूद हैं, जिनका सीधा इस्तेमाल रक्षा क्षेत्र में हो सकता है.
अब कंपनी अपने अंतरिक्ष इमेजिंग सिस्टम की रिजॉल्यूशन बेहतर बनाने पर काम कर रही है ताकि अंतरिक्ष में मौजूद लक्ष्यों की और नजदीक से तस्वीर ली जा सके. यह नया सिस्टम गुजरात के अहमदाबाद स्थित अज़िस्टा की इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड निर्माण सुविधा में पहले से विकसित किया जा रहा है.

फार्मा से पेलोड तक
बाहर से देखने पर हैदराबाद में अज़िस्टा एयरोस्पेस का कांच से बना रिसर्च सेंटर आसपास की आईटी इमारतों जैसा ही दिखता है. लेकिन अंदर इस तीन मंजिला जगह की सफेद दीवारें और साफ-सुथरे गलियारे किसी एडवांस्ड लैब्स में खुलते हैं.
पाइप, टैंक और लगातार चल रही मशीनों का जाल बड़े कंप्यूटर स्क्रीन से जुड़ा हुआ है. यहीं वैज्ञानिक उन कंपोजिट मटेरियल्स का परीक्षण करते हैं, जो मजबूत और हल्के मिश्रण होते हैं और जिन्हें धातु की जगह अंतरिक्ष यान और ऑप्टिकल पेलोड की संरचना में इस्तेमाल किया जाता है.
करीब एक दर्जन इंजीनियर बड़े कंट्रोल रूम में अपने सिस्टम पर नजरें टिकाए बैठे हैं. लगभग 15 मिनट तक कमरे में सिर्फ क्लिक और टाइपिंग की आवाज सुनाई देती है, क्योंकि वे सैटेलाइट की गतिविधियों पर नजर रखते हैं.

चेन्नई के कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग, गिंडी से इंजीनियरिंग करने वाले सुनील इंदुरती खुद कंपनी के तकनीकी विकास और मिशनों की निगरानी करते हैं. वह हर काम में सीधे जुड़े रहते हैं. हर सुबह वह अपने ऑफिस के व्हाइटबोर्ड से दिन की शुरुआत करते हैं, जिस पर नोट्स लिखे रहते हैं — क्या करना है, किससे मिलना है और कौन से लक्ष्य हासिल करने हैं.
उन्होंने जो टीम बनाई है, उसमें युवा इंजीनियर, इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के रिटायर्ड वैज्ञानिक और अमेरिका की पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी से लेकर भारत के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया तक के ग्रेजुएट शामिल हैं.
“हम खुद को एक गंभीर प्रतिस्पर्धी के रूप में तैयार करना चाहते हैं, जो शुरू से अंत तक अंतरिक्ष से जुड़ी सेवाएं दे सके. रिसर्च से लेकर पेलोड निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने तक, हम भारत और विदेशों में अपने ग्राहकों के लिए भरोसेमंद साझेदार बनना चाहते हैं.”
— सुनील इंदुरती, डायरेक्टर, अज़िस्टा एयरोस्पेस
अज़िस्टा की टीम के एक युवा वैज्ञानिक ने मुस्कुराते हुए कहा, “सामान्य कॉरपोरेट माहौल के उलट, यहां लोग एक नया उद्योग खड़ा करने के लिए काम कर रहे हैं. हम ऐसी चीजें कर रहे हैं जो भारत में पहले कभी नहीं हुईं.”
लेकिन अज़िस्टा एयरोस्पेस की शुरुआत की कहानी बेहद अलग है.
भारत के ज्यादातर स्पेस स्टार्टअप्स पूर्व ISRO इंजीनियरों या विज्ञान प्रेमियों द्वारा चलाए जाते हैं. अज़िस्टा अलग है. यह अज़िस्टा इंडस्ट्रीज़ प्राइवेट लिमिटेड की सहयोगी कंपनी है, जो हेल्थकेयर और न्यूट्रिशन क्षेत्र की कंपनी है और जिसके पास ऑर्गेनिक फूड और दवाइयों के कई उत्पाद हैं.

हालांकि सूखे टमाटर और दवाइयों जैसे उत्पादों से जासूसी सैटेलाइट तक का सफर अजीब लग सकता है, लेकिन मैनेजिंग डायरेक्टर एम श्रीनिवास रेड्डी के लिए इसकी सोच एक जैसी है.
उन्होंने कहा, “फार्मास्युटिकल कंपनी की मूल सोच रिसर्च होती है. जितनी ज्यादा रिसर्च करेंगे, उतने ज्यादा प्रोडक्ट बाजार में ला सकेंगे. जब हमने दूसरे क्षेत्र में जाने का फैसला किया, तब भी हमारा ध्यान रिसर्च पर ही रहा.”
2014 में स्थापित इस कंपनी ने 2016 में अंतरिक्ष और कंपोजिट क्षेत्र में कदम रखा. स्पेस इंडस्ट्री के नए खिलाड़ियों से मुकाबला करने से पहले इसने ISRO के साथ मिलकर कई कार्यक्रमों के लिए सैटेलाइट और रॉकेट के हिस्से विकसित किए.
रेड्डी ने कहा, “अंतरिक्ष हमारे लिए नया क्षेत्र था. इसलिए जब हमने ISRO के साथ साझेदारी की, तो यह हमारे लिए सीखने का दौर था. भारत की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी के साथ काम करके हमारी टीमों ने जरूरी ट्रेनिंग हासिल की. हमें इस क्षेत्र की चुनौतियों की भी समझ मिली.”
अगला मिशन
अज़िस्टा एयरोस्पेस अब अपने अगले मिशन पर तेजी से काम कर रही है. यह एक सैटेलाइट समूह होगा, जिसे 2027 तक लॉन्च किए जाने की उम्मीद है.
इन सैटेलाइट्स का लक्ष्य 500 किलोमीटर का स्वाथ देना है, यानी जमीन पर कवर होने वाले इलाके की चौड़ाई, और वह भी 4 मीटर रिजॉल्यूशन के साथ. बड़े इलाके की कवरेज और बेहद बारीक डिटेल का यह मेल बहुत कम देखने को मिलता है.
यह मिशन करीब 20 मिनट तक लगातार इमेजिंग करने में भी सक्षम होगा. यह सुविधा अभी भारतीय बाजार में उपलब्ध नहीं है. एक बार यह तकनीक पूरी तरह सफल हो गई, तो इसका इस्तेमाल खेती, इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी और रक्षा निगरानी जैसे कई क्षेत्रों में किया जा सकेगा.
इंदुरती ने कहा, “बहुत बड़ी मात्रा में डेटा तैयार होगा. हमारे पास एक ऑनबोर्ड एज कंप्यूटर भी होगा, जो इकट्ठा किए गए डेटा को वहीं प्रोसेस कर सकेगा और एनालिटिक्स तैयार करेगा. इसका मतलब है कि आपको सारा डेटा नीचे भेजने की जरूरत नहीं पड़ेगी.”

कंपनी एक हाई-रिजॉल्यूशन ऑप्टिकल पेलोड भी विकसित कर रही है और अपनी रिसर्च क्षमता के मुताबिक निर्माण सुविधाओं को भी बढ़ा रही है. अहमदाबाद में उसकी इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड सुविधा अब चालू हो चुकी है और हैदराबाद में नई असेंबली, इंटीग्रेशन और टेस्टिंग सुविधा बनाई जा रही है.
इंदुरती ने कहा कि अज़िस्टा अपने “मेड इन इंडिया” टैग को बहुत गंभीरता से लेती है और वैश्विक अंतरिक्ष दौड़ में अपनी जगह बनाना चाहती है. भारतीय ग्राहकों के अलावा कंपनी ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी मौजूदगी बनाई है. उसके ग्राहकों में ब्रिटेन की एयरोस्पेस और रक्षा कंपनी कोबहम लिमिटेड और रोमानिया की सीगल यूएवी शामिल हैं.
उन्होंने कहा, “हम खुद को एक गंभीर प्रतिस्पर्धी के रूप में तैयार करना चाहते हैं, जो शुरू से अंत तक अंतरिक्ष से जुड़ी सेवाएं दे सके. रिसर्च से लेकर पेलोड निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने तक, हम भारत और विदेशों में अपने ग्राहकों के लिए भरोसेमंद साझेदार बनना चाहते हैं.”
ISS की सफल इमेजिंग सिर्फ एक शुरुआती प्रदर्शन थी. अज़िस्टा के लिए अंतरिक्ष से ली गई वे पहली तस्वीरें बहुत बड़े भविष्य की झलक हैं. भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र भी इसे लेकर उत्साहित है.
इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा कि अज़िस्टा का काम भारतीय निजी क्षेत्र के लिए एक मिसाल है.
अधिकारी ने कहा, “यह सिर्फ अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि हमारी रक्षा क्षमताओं के लिए भी बड़ी उपलब्धि है. यह भारत के लिए एक नए और उम्मीद भरे दौर की शुरुआत है. लंबे समय तक भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में था और यह प्रभावशाली है कि जब निजी कंपनियों को आखिरकार इस क्षेत्र में आने का मौका मिला, तो उन्होंने पूरी ताकत के साथ शुरुआत की.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: EV से लेकर ड्रोन तक: हैदराबाद का ARCI बना आत्मनिर्भर भारत की साइंस लैब