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Sunday, 10 May, 2026
होमफीचररॉक कैपिटल शिलॉन्ग को मिला म्यूजिक, शोहरत और सपनों का नया रास्ता—स्कूल कॉयर

रॉक कैपिटल शिलॉन्ग को मिला म्यूजिक, शोहरत और सपनों का नया रास्ता—स्कूल कॉयर

सेंट मैरी से लेकर KC लाइट्स तक, स्कूल कॉयर ने शिलॉन्ग में संगीत का नया आंदोलन शुरू किया है. यह करियर, प्रतियोगिता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है.

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शिलॉन्ग: शिलॉन्ग की एक धुंधली दोपहर में सेंट मैरी स्कूल का मैदान किसी बड़े म्यूज़िक शो जैसा लगने लगता है. कीबोर्ड से धुन शुरू होती है, फिर ड्रम्स बजने लगते हैं, वायलिन की आवाज़ गूंजती है और तीन दर्जन से ज्यादा लड़कियां — जो गाती भी हैं और वाद्य यंत्र भी बजाती हैं—एक साथ सुर में गाना शुरू कर देती हैं.

बीच में खड़ी हैं 15 साल की फिडाशिशा एल. मावलॉन्ग, जो Journey के गाने Don’t Stop Believin’ के ऊंचे सुर बेहद आसानी से गाती हैं और एक उभरती हुई रॉकस्टार की तरह पूरे आत्मविश्वास के साथ थिरकती हैं.

कुछ हफ्ते पहले वह कॉयर के एक रिहर्सल वीडियो में भी दिखी थीं, जिसमें वे The Score का गाना Legend गा रही थीं. यह वीडियो इंस्टाग्राम पर तेज़ी से वायरल हो गया. भारत ही नहीं, विदेशों से भी हज़ारों कमेंट आए, जिनमें लड़कियों और पूर्वोत्तर के संगीत टैलेंट की तारीफ की गई.

एक कमेंट में लिखा था, “हमें School of Rock का दूसरा वर्जन चाहिए — Shillong!” लेकिन शिलॉन्ग के युवा कॉयर लंबे समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं.

कुछ ही मिनटों की दूरी पर, एक साधारण घर में, जो रिकॉर्डिंग स्टूडियो का भी काम करता है, Kiddies Corner Secondary School का KC Lights कॉयर रिकॉर्डिंग में बिज़ी है. बच्चे छोटे से साउंड बूथ में आते-जाते हैं, रिकॉर्डिंग करते हैं, फिर रिहर्सल में लौटते हैं और इंतज़ार करते हैं, जबकि एक अकेला साउंड इंजीनियर बार-बार रिकॉर्डिंग और रीवाइंड करता है.

रिकॉर्डिंग के बीच एक छोटा लड़का यूं ही गिटार पर Metallica के गाने Nothing Else Matters की धुन बजाने लगता है.

ऐसे दृश्य अब पूरे शिलॉन्ग में आम हो गए हैं, जहां कॉयर अब सिर्फ एक्स्ट्रा एक्टिविटी नहीं रह गए हैं. कॉन्वेंट स्कूलों से लेकर निजी स्कूलों और मोहल्लों के संस्थानों तक, बच्चे छोटी उम्र से ही हार्मनी, म्यूज़िक अरेंजमेंट, स्टेज परफॉर्मेंस और संगीत अनुशासन सीख रहे हैं. अक्सर उन्हें ऐसे गुरु मिलते हैं, जिनके बारे में वे बेहद सम्मान और प्यार से बात करते हैं.

रिकॉर्डिंग से ब्रेक लेते KC Lights कॉयर के सदस्य, लेकिन म्यूज़िक जारी है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
रिकॉर्डिंग से ब्रेक लेते KC Lights कॉयर के सदस्य, लेकिन म्यूज़िक जारी है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

मेघालय के बाहर शिलॉन्ग को भारत की “रॉक कैपिटल” कहा जाता है, जहां चर्चों, कैफे और कॉन्सर्ट ग्राउंड्स में लाइव म्यूज़िक गूंजता रहता है, लेकिन एक दूसरी परंपरा, जो स्कूल कैंपस और पुराने खासी चर्च म्यूज़िक से जुड़ी है—अब राज्य की पहचान का अहम हिस्सा बन चुकी है.

शिक्षकों और अधिकारियों का कहना है कि इसी मजबूत आधार ने कॉयर म्यूज़िक को मेघालय की सांस्कृतिक पहचान बना दिया है. इसका असर आज वायरल स्कूल परफॉर्मेंस और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दिख रहा है, जहां नई पीढ़ी म्यूज़िक को एक करियर ऑप्शन की तरह देखने लगी है.

1980 के दशक से लेकर शुरुआती 2000 तक मेघालय में उग्रवाद के दौर ने राज्य की बाहरी छवि को प्रभावित किया था. अब कई लोग मानते हैं कि म्यूज़िक उस छवि को बदलने का ज़रिया बन रहा है.

मैं चाहती हूं कि लोग मेघालय के म्यूज़िक को जानें. मैं दिखाना चाहती हूं कि भारत का कोई व्यक्ति म्यूज़िक के प्रति समर्पण से सफल हो सकता है

—मिया डखार, KC Lights कॉयर की मेंबर

खासी समाज में कॉयर की परंपरा आज की नहीं है. इसकी शुरुआत वेल्श मिशनरियों द्वारा लाए गए चर्च भजनों से हुई थी, जिसे बाद में खासी समाज ने अपनी संस्कृति के अनुसार अपनाया. स्कूल कॉयर लंबे समय से मेघालय की म्यूज़िक पहचान का अहम हिस्सा रहे हैं.

लेकिन बड़ा बदलाव 2001 में आया, जब दिवंगत नील नोंगकिनरिह ने Shillong Chamber Choir की स्थापना की. इस समूह ने खासी कॉयर म्यूज़िक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया और राज्य के युवा गायकों के सपनों को नई उड़ान दी.

स्कूलों में यह सपना अब एक आंदोलन बन चुका है, जिसे राज्य सरकार का भी समर्थन मिल रहा है.

मेघालय सरकार में पर्यटन, वित्त और अन्य विभागों के आयुक्त और सचिव डॉ. विजय कुमार डी ने कहा, “यहां संगीत की जो मजबूत नींव है, वैसी कहीं और नहीं है. राज्य की भूमिका इसे आगे बढ़ाने की रही है — कॉयर प्रतियोगिताओं, अनुदान, फेस्टिवल और जमीनी समर्थन के जरिए — ताकि यह ऊर्जा और आगे बढ़ सके.”

सेंट मैरी में म्यूज़िक, दोस्ती और सपनों का मेल

अगर इस बड़े सांस्कृतिक बदलाव का कोई युवा चेहरा है, तो वह शायद दसवीं क्लास की छात्रा फिडाशिशा एल. मावलॉन्ग हैं, जो कॉयर की अनुशासित दुनिया और किशोर उम्र की ऊर्जा के बीच बेहद सहज दिखती हैं.

उन्होंने इंस्टाग्राम की वह रील देखी है, जिसने सेंट मैरी के कॉयर को मेघालय के बाहर भी मशहूर कर दिया. इतनी चर्चा देखकर वह खुद भी थोड़ा हैरान हैं.

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे बहुत खुशी है कि अब लोग हमें जानते हैं और सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि यह हमारे स्कूल का कॉयर है.”

सेंट मैरी कॉयर के गाने Legend की प्रस्तुति के दौरान माइक पर फिडाशिशा मावलॉन्ग | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
सेंट मैरी कॉयर के गाने Legend की प्रस्तुति के दौरान माइक पर फिडाशिशा मावलॉन्ग | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

लेकिन सेंट मैरी को खास सिर्फ सोशल मीडिया की सफलता नहीं बनाती. असली बात वह माहौल है, जिसमें यह म्यूज़िक तैयार होता है.

30 से 40 लड़कियों वाला यह कॉयर किसी सख्त स्कूल ग्रुप की तरह नहीं, बल्कि एक करीबी कलात्मक परिवार की तरह काम करता है. छात्राएं आसानी से गायन और वाद्य यंत्रों के बीच बदलती रहती हैं, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाती हैं और रिहर्सल को किसी जिम्मेदारी से ज्यादा अपनापन मानती हैं.

लगभग हर बातचीत में वे म्यूज़िक के साथ-साथ दोस्ती का भी ज़िक्र करती हैं.

इस पूरे माहौल में शिक्षिका रिसाका पायरबोट की बड़ी भूमिका है. कॉयर को संभाले उन्हें अभी मुश्किल से एक साल हुआ है, लेकिन वह सिर्फ कंडक्टर नहीं, बल्कि नई ऊर्जा देने वाली शख्स बन गई हैं.

उन्होंने म्यूज़िक के लेवल को आगे बढ़ाने के साथ-साथ कॉयर के पुराने कल्चर में नया आत्मविश्वास भी भरा है और उसी मशहूर रील के जरिए, जिसे उन्होंने अपलोड किया था, इस कॉयर को अचानक नई पहचान भी मिली.

शिलॉन्ग में रिहर्सल के बाद शिक्षिका रिसाका पायरबोट के साथ मस्ती करती सेंट मैरी कॉयर की छात्राएं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
शिलॉन्ग में रिहर्सल के बाद शिक्षिका रिसाका पायरबोट के साथ मस्ती करती सेंट मैरी कॉयर की छात्राएं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

फिडाशिशा जब कॉयर की सफलता के बारे में बात करती हैं, तो उसमें पूरे समूह का गर्व साफ दिखाई देता है. यहां तक कि जब वह अपने सपनों की बात करती हैं, तब भी बार-बार “हम सब” कहती हैं — अपने सहपाठियों, साथी गायकों और दोस्तों के बारे में.

उन्होंने कहा, “यह सिर्फ मेरी मेहनत नहीं है. यह हम सबकी मिलकर की गई मेहनत है.”

फिडाशिशा अमेरिकी गायिका ओलिविया डीन के बारे में बात करते हुए बेहद उत्साहित हो जाती हैं. वह कहती हैं कि उनके गाने उनसे गहराई से जुड़ते हैं.

एक समय वह It’s So Easy की कुछ लाइनें गाती हैं और कैमरे की तरफ आंख मारती हैं. मंच पर प्रस्तुति देना इन छात्रों के स्वभाव का हिस्सा लगता है.

जब मैं हार मानने वाली थी, तब भी मेरी मां ने कहा — नहीं, तुम्हें म्यूज़िक को आगे बढ़ाना है

—फिडाशिशा मावलॉन्ग, सेंट मैरी कॉयर की मेंबर

कॉयर में काम करने से फिडाशिशा के भीतर बड़े सपने जागे हैं. वह विदेश में पढ़ाई करना चाहती हैं और म्यूज़िक को आगे बढ़ाना चाहती हैं.

वह कहती हैं कि यह भरोसा उन्हें तब मिला, जब उन्हें महसूस हुआ कि गाना सिर्फ एक टैलेंट नहीं है.

कुछ ऐसे पल भी आए, जब वह सब छोड़ना चाहती थीं, लेकिन उनकी मां ने ऐसा नहीं होने दिया.

उन्होंने कहा, “जब मैं हार मानने वाली थी, तब भी उन्होंने कहा — नहीं, तुम्हें संगीत को आगे बढ़ाना है.”

कई दूसरी छात्राओं ने भी बताया कि उनके माता-पिता उन्हें इसी तरह प्रोत्साहित करते हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि उनके आसपास कुछ बड़ा बदल रहा है — अब सिर्फ बच्चे ही नहीं, घरों में भी संगीत को गंभीरता से लिया जाने लगा है.

अब छात्र म्यूज़िक में करियर की बात उसी तरह करते हैं, जैसे दूसरे शहरों में बच्चे इंजीनियरिंग या मेडिकल की बात करते हैं.

शिलॉन्ग का सेंट मैरी स्कूल | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
शिलॉन्ग का सेंट मैरी स्कूल | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

KC Lights में हार्मनी सिर्फ सुर नहीं, कड़ी मेहनत है

अगर सेंट मैरी का कॉयर दोस्ती और सपनों की कहानी दिखाता है, तो KC Lights उसकी मेहनत और अनुशासन को सामने लाता है.

एक बादलों भरी गुरुवार सुबह, कक्षा 8 से 12 तक के छात्र एक पुराने छोटे से घर में The World Will Be A Better Place की प्रैक्टिस और रिकॉर्डिंग कर रहे हैं. यह घर पहाड़ी पर स्थित है और स्टूडियो, रिहर्सल रूम और सपनों की फैक्ट्री — तीनों का काम करता है.

कुछ छात्र बाहर घास पर बैठकर आराम से Lori Lieberman का गाना Killing Me Softly गा रहे हैं. उनकी हार्मनी बिल्कुल सहज लगती है. ब्रेक के दौरान वे अपने पसंदीदा कलाकारों — Lewis Capaldi, Frank Ocean, Ed Sheeran और Billie Eilish — के बारे में बात करते हैं.

शिलॉन्ग के एक छोटे स्टूडियो में रिकॉर्डिंग करते KC Lights के छात्र, अगली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की तैयारी में जुटा कॉयर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
शिलॉन्ग के एक छोटे स्टूडियो में रिकॉर्डिंग करते KC Lights के छात्र, अगली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की तैयारी में जुटा कॉयर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

स्कूल के प्रिंसिपल और कॉयर डायरेक्टर ब्रायन वालांग लगातार व्यस्त रहते हैं — कभी गाने की लाइनें ठीक कराते हैं, कभी एंट्री बताते हैं, कभी यात्रा की योजना पर चर्चा करते हैं, कभी फंडिंग की चिंता करते हैं और कभी अगली प्रतियोगिता की रणनीति बनाते हैं.

KC Lights की शुरुआत लगभग संयोग से 2013 में हुई थी. एक स्कूल म्यूजिकल खत्म होने के बाद छात्रों ने और कुछ करने की इच्छा जताई.

वालांग बताते हैं कि बच्चे उनसे कहते थे कि प्रोडक्शन खत्म होने के बाद वे “बहुत बोर” हो रहे हैं और पूछते थे कि अब आगे क्या होगा. उनका जवाब सीधा था — एक कॉयर बनाते हैं.

स्कूल के बाद गाने और डांस की प्रैक्टिस करने के लिए इकट्ठा होने वाले बच्चों का यह छोटा समूह धीरे-धीरे भारत के सबसे सम्मानित बच्चों के कॉयर में बदल गया.

120 आवाज़ों वाले कॉयर के सामने सिर्फ 25 आवाज़ों के साथ मुकाबला करना और फिर गोल्ड जीतकर लौटना — यह बहुत बड़ी बात है

— ब्रायन वालांग, KC Lights के डायरेक्टर

रिकॉर्डिंग के दौरान कमरे का सबसे ज्यादा ध्यान 15 साल की मिया डखार पर जाता है, जिनके सपने बहुत बड़े हैं लेकिन उन्हें वह बेहद सामान्य तरीके से बताती हैं.

वह “वन-वुमन शो” बनना चाहती हैं. यानी एक साथ सब कुछ — प्रोड्यूसर, कंपोजर, सिंगर, गीतकार और DJ.

उन्होंने कहा, “जब मैं किसी को परफॉर्म करते हुए देखती हूं और भीड़ को इतना खुश पाती हूं, तो सोचती हूं — क्या मैं भी अपने म्यूज़िक पर लोगों को झूमने पर मजबूर कर सकती हूं?”

वह ऑडियो इंजीनियरिंग पढ़ना चाहती हैं, DJing करना चाहती हैं और अपना ओरिजिनल म्यूज़िक रिलीज़ करना चाहती हैं. वह अब तक करीब 40 गाने लिख चुकी हैं.

मिया कहती हैं कि संगीत उनके लिए सिर्फ एक अतिरिक्त गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को समझने और व्यक्त करने का तरीका है.

उन्होंने कहा, “जब भी मैं दुखी होती हूं या किसी बात को लेकर परेशान होती हूं, तो पियानो के पास जाकर गाने लिखती हूं.”

ब्रायन वालांग के साथ KC Lights का समूह | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
ब्रायन वालांग के साथ KC Lights का समूह | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

इन स्कूल कॉयर में युवाओं की ऊर्जा के पीछे एक भावनात्मक गंभीरता भी है और एक बड़ा मकसद भी.

मिया के सपने सिर्फ अपनी सफलता तक सीमित नहीं हैं. वह बार-बार मेघालय के म्यूज़िक को दुनिया तक पहुंचाने की बात करती हैं.

उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूं कि लोग मेघालय के म्यूज़िक को जानें. मैं दिखाना चाहती हूं कि भारत का कोई व्यक्ति म्यूज़िक के प्रति जुनून से सफल हो सकता है.”

उनके कई गाने अंग्रेज़ी में हैं और कुछ खासी भाषा में भी. वह कहती हैं कि कई बार अंग्रेज़ी में खुद को ज्यादा अच्छे से व्यक्त कर पाती हैं.

मिया जिस सहजता से अपने संगीत भरे भविष्य की बात करती हैं, वैसी बातें भारत के कई स्कूलों में असंभव जैसी लग सकती हैं.

वह म्यूज़िक को ऐसा सपना नहीं मानतीं जिसे “असली ज़िंदगी” शुरू होने तक टाल दिया जाए. म्यूज़िक अभी से उनकी लाइफ का हब है.

शिलॉन्ग के इसी साधारण घर में KC Lights रिकॉर्डिंग और रिहर्सल करते हैं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
शिलॉन्ग के इसी साधारण घर में KC Lights रिकॉर्डिंग और रिहर्सल करते हैं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

मिया ने एक साल Shillong Chamber Choir के स्कूल में म्यूज़िक सीखा था. वह आज भी हैरान होती हैं कि वहां के गायक कितनी आसानी से हार्मनी बना लेते हैं.

उन्होंने कहा, “मैं सच में चाहती हूं कि हमारा कॉयर भी ऐसा कर सके.” फिर तुरंत खुद को सुधारते हुए बोलीं, “लेकिन समय और प्रैक्टिस के साथ हम भी उस स्तर तक ज़रूर पहुंचेंगे.”

यह जलन नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की चाह है.

यही आगे बढ़ने की भावना KC Lights में भी दिखाई देती है.

यह कॉयर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सात मेडल जीत चुका है, जिनमें 2023 में मलेशिया और 2020 में इंडोनेशिया की प्रतियोगिताएं शामिल हैं.

2017 में कोलंबो में हुए Asia Pacific Choir Games में मिले Silver Diploma एक्स पर समूह को खास गर्व है.

अब KC Lights अगस्त में थाईलैंड जाने की तैयारी कर रहा है, जहां वह दूसरी बार International Choral Festival में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा.

वालांग बड़े कॉयर समूहों से मुकाबला करने पर गर्व भी महसूस करते हैं और परेशान भी होते हैं, क्योंकि कई बार उन्हें अपने छात्रों के लिए संसाधन जुटाने में संघर्ष करना पड़ता है.

लेकिन वह बार-बार इसी बात पर लौटते हैं कि शिलॉन्ग की सिर्फ 25 आवाज़ें अपने से चार गुना बड़े कॉयर के सामने भी मजबूती से खड़ी हो जाती हैं.

उन्हें याद है कि उन्होंने थाईलैंड में एक खासी गाना पेश किया था और बाद में एक मलेशियाई कॉयर को वही गाना गाते सुना. उनके लिए यह इस बात का सबूत था कि लोकल म्यूज़िक भी दुनिया तक पहुंच सकता है.

वालांग ने कहा, “कितनी शानदार बात है — एक मलेशियाई कॉयर खासी गाने गा रहा था. हम यहां इसी लिए हैं, ताकि अपने म्यूज़िक को दुनिया तक पहुंचा सकें और उनसे भी सीख सकें. अब हम थाई गाने सीख रहे हैं.”

म्यूज़िक के पीछे खड़े गुरु

कॉयर की हर आवाज़ के पीछे एक ऐसा शिक्षक होता है, जिसने उस हार्मनी को जीवंत बनाया.

रिसाका पायरबोट और ब्रायन वालांग अलग-अलग पीढ़ियों से आते हैं और उनकी दुनिया भी काफी अलग है.

रिसाका 28 साल की हैं. वह सेंट मैरी में पिछले एक साल से कॉयर डायरेक्टर हैं और साथ ही दीमापुर के एक कॉलेज में म्यूज़िक भी पढ़ाती हैं.

वहीं 61 साल के ब्रायन वालांग अनुभवी कंडक्टर हैं, जिन्होंने कई सालों तक KC Lights को तैयार किया है.

लेकिन दोनों को एक ही बात प्रेरित करती है — म्यूज़िक बच्चों के सपनों और संभावनाओं को बड़ा बना सकता है.

वे सिर्फ शिक्षक नहीं हैं. वे मेंटर, आयोजक, टैलेंट खोजने वाले और सबसे ज़रूरी, इस म्यूज़िक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लोग हैं.

स्कूल कॉयर लगातार बदलते रहते हैं. बड़े छात्र स्कूल छोड़ देते हैं और उनकी जगह छोटे बच्चे लेते हैं. अगर कोई मजबूत हाथ बार-बार इस समूह को नए सिरे से तैयार न करे, तो यह संस्कृति धीरे-धीरे टूटने लगती है.

शिलॉन्ग के सेंट मैरी स्कूल में रखी ट्रॉफियां | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
शिलॉन्ग के सेंट मैरी स्कूल में रखी ट्रॉफियां | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

इन कॉयर की एक खास बात यह भी है कि छात्र अपने कंडक्टर्स के बारे में जिस तरह बात करते हैं, वह अलग है.

वे अपने शिक्षकों को ऐसे लोगों की तरह देखते हैं, जिनसे वे गलत सुरों के साथ-साथ अपनी निजी परेशानियां भी साझा कर सकते हैं.

वे थोड़ा अनुशासन सिखाने वाले, थोड़ा मार्गदर्शक और थोड़ा भरोसेमंद दोस्त जैसे हैं.

इतनी परफॉर्मेंस वाली दुनिया होने के बावजूद यहां प्रतिस्पर्धा या ऊंच-नीच का भाव बहुत कम दिखता है. इसके बजाय दोस्ती और अपनापन दिखाई देता है. कई छात्रों में अपने शिक्षकों को सबसे अच्छा देने की गहरी इच्छा भी दिखती है.

वे बहुत आगे जा सकते हैं. पहले राष्ट्रीय स्तर पर, फिर शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर

—रिसाका पायरबोट, सेंट मैरी कॉयर शिक्षिका

पायरबोट के लिए मेंटरशिप की शुरुआत बच्चों को बड़े सपने दिखाने से होती है.

सेंट मैरी की रिहर्सल का वीडियो रिकॉर्ड कर इंस्टाग्राम पर डालने वाली वही थीं, जो बाद में वायरल हो गया, लेकिन उनके लिए यह सोशल मीडिया की सफलता से ज्यादा म्यूज़िक को मिली पहचान का पल था.

उनका मानना है कि अगर माता-पिता बच्चों का टैलेंट पहचान लें, तो उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए.

उन्होंने अपने छात्रों के बारे में कहा, “वे बहुत आगे जा सकते हैं. पहले राष्ट्रीय स्तर पर, फिर शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर.”

प्रस्तुति देते सेंट मैरी कॉयर के सदस्य | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
प्रस्तुति देते सेंट मैरी कॉयर के सदस्य | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

उनकी अपनी कहानी भी इसी सोच को समझाती है.

वह ऐसे परिवार से आती हैं, जहां कोई म्यूजिशियन नहीं था. इसलिए वह समझती हैं कि किसी टैलेंट को पहचान मिलना और उसे प्रोत्साहन मिलना कितना ज़रूरी होता है.

इसी वजह से वह अक्सर माता-पिता की भूमिका की बात करती हैं.

वह कहती हैं कि फिडाशिशा की मां, जिन्होंने अपनी बेटी को म्यूज़िक छोड़ने नहीं दिया, दूसरे माता-पिता के लिए एक मिसाल हैं.

हमेशा मुस्कुराने वाली पायरबोट जहां युवा ऊर्जा और प्रेरणा का चेहरा हैं, वहीं वालांग एक अनुभवी और व्यावहारिक सोच लेकर आते हैं.

म्यूज़िक को अपना जीवन बनाने से पहले उन्होंने मुंबई में नौ महीने तक फ्लाइट अटेंडेंट के तौर पर काम किया था.

फिर उनकी मां ने उन्हें घर वापस बुला लिया. मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में मां की बात काफी होती है. वह लौट आए.

उनके भाई कीथ पहले से संगीतकार थे. म्यूज़िक ने उन्हें अपनी तरफ खींचा और फिर बच्चों ने.

रिकॉर्डिंग स्टूडियो में KC Lights के डायरेक्टर ब्रायन वालांग. थाईलैंड यात्रा को लेकर उन्होंने कहा, “हम ग्रैंड चैंपियन बनकर लौटना चाहते हैं.” | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
रिकॉर्डिंग स्टूडियो में KC Lights के डायरेक्टर ब्रायन वालांग. थाईलैंड यात्रा को लेकर उन्होंने कहा, “हम ग्रैंड चैंपियन बनकर लौटना चाहते हैं.” | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

वालांग कहते हैं कि हर साल नए बच्चों को तैयार करना और पुराने छात्रों के जाने के बाद फिर से आवाज़ों को ट्रेन करना उनके काम का हिस्सा है.

उन्होंने कहा, “यह चुनौती है, लेकिन मुझे चुनौतियां पसंद हैं.”

यही सोच उनकी उस बड़ी सोच में भी दिखती है, जिसमें वह कॉयर की भूमिका को देखते हैं.

उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं बच्चों को उनकी अपनी दुनिया से बाहर की दुनिया दिखाती हैं.

उन्होंने कहा, “यही असली शिक्षा है. आप इतनी जगहों पर जाते हैं, भूगोल सीखते हैं, संस्कृति सीखते हैं, भाषा सीखते हैं — सब कुछ.”

लेकिन इस आदर्श सोच के साथ लगातार संघर्ष भी जुड़ा हुआ है.

फंडिंग की समस्या वालांग की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है.

उन्होंने 2023 में कॉयर की अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए राज्य सरकार से आर्थिक मदद मांगी थी, लेकिन अब तक पैसा नहीं मिला है.

उन्होंने कहा, “उन्होंने कहा था कि मदद करेंगे, इसलिए हम इंतज़ार कर रहे हैं. उम्मीद है कि इस साल मदद मिल जाएगी.”

फिलहाल, ज्यादातर खर्च वालांग अपनी जेब से उठाते हैं.

इंडोनेशिया के बाली में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान KC Lights कॉयर | फोटो: फेसबुक
इंडोनेशिया के बाली में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान KC Lights कॉयर | फोटो: फेसबुक

KC Lights अक्सर सिर्फ 25 गायकों के साथ यात्रा करता है, जबकि चीन, दक्षिण कोरिया या दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के कॉयर कई बार 100 से ज्यादा सदस्यों के साथ आते हैं और उन्हें संस्थागत समर्थन भी मिलता है.

वालांग मुस्कुराते हुए कहते हैं, “120 आवाज़ों वाले कॉयर के सामने सिर्फ 25 आवाज़ों के साथ मुकाबला करना और फिर गोल्ड जीतकर लौटना — यह बहुत बड़ी बात है.”

वालांग मानते हैं कि विदेश में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले बच्चों के कॉयर को समर्थन के लिए इतना संघर्ष नहीं करना चाहिए.

लेकिन फंडिंग की परेशानी की बात करते हुए भी वह अगले बड़े लक्ष्य की तैयारी की बात करते हैं.

वह कहते हैं कि इस साल उनका मकसद सिर्फ एक और गोल्ड मेडल जीतना नहीं है.

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हम ग्रैंड चैंपियन बनकर लौटना चाहते हैं.”

म्यूज़िक को सहारा देता एक राज्य

अगर इन स्कूल कॉयर को आगे बढ़ाने में व्यक्तिगत गुरु और मेंटर्स की बड़ी भूमिका है, तो दूसरी तरफ एक ऐसा राज्य भी है, जिसने संस्कृति को नीति की तरह अपनाने की कोशिश की है.

डॉ. विजय कुमार का कहना है कि मेघालय ने पहले से मौजूद म्यूज़िक कल्चर को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया है. इसके लिए हर साल होने वाली कॉयर प्रतियोगिताएं, फंडिंग, ज़मीनी स्तर पर बसकिंग कार्यक्रम और सरकार की योजनाओं के तहत कैफे में होने वाले म्यूजिक गिग्स जैसे कई कदम उठाए गए हैं.

उनके मुताबिक, यह सिर्फ बड़े आयोजनों को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं है, बल्कि छोटे कलाकारों और सामुदायिक म्यूज़िक को भी सहारा देने की कोशिश है.

उन्होंने कहा, “हमें इस पूरे सिस्टम की ऊर्जा को सक्रिय करना है.”

अधिकारियों का मानना है कि इसी सोच ने शिलॉन्ग को लाइव म्यूजिक की राजधानी बना दिया है, जिसकी महत्वाकांक्षा अब बड़े महानगरों के बराबर हो गई है.

कुमार फरवरी 2025 में एड शीरन के कॉन्सर्ट और हाल ही में रद्द हुए Scorpions कॉन्सर्ट का उदाहरण देते हैं.

उन्होंने कहा, “ये बड़े कलाकार बेंगलुरु, मुंबई और फिर शिलॉन्ग में परफॉर्म कर रहे हैं. हमने इस शहर को दूसरे बड़े महानगरों की तरह एक कॉन्सर्ट कैपिटल बना दिया है.”

इस मॉडल की खास बात यह है कि सरकारी मदद सिर्फ बड़े कलाकारों तक सीमित नहीं है.

उनके मुताबिक, पर्यटन स्थलों पर स्थानीय म्यूजिक प्रोग्राम के लिए सरकार संगीतकारों को फंड देती है, जैसा बहुत कम सरकारें करती हैं. स्थानीय परफॉर्मेंस के लिए कलाकारों को 25,000 रुपये तक दिए जाते हैं.

कॉयर भी इसी सोच का हिस्सा हैं — चाहे वह पर्यटन से जुड़ी प्रतियोगिताएं हों या अनुदान की योजनाएं. कुमार का कहना है कि ये योजनाएं स्कूल कॉयर जैसे छोटे समूहों के लिए भी आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि उन्हें मंच मिल सके.

उन्होंने ब्रायन वालांग की फंडिंग में देरी वाली चिंता पर भी जवाब दिया.

कुमार मानते हैं कि कई बार सरकारी प्रक्रियाएं धीमी हो सकती हैं, लेकिन उन्हें बेहतर और तेज़ बनाने की कोशिश की जा रही है.

उन्होंने कहा, “सरकार का काम हर सक्षम व्यक्ति की मदद करना है. मैं खुद ब्रायन को फोन करूंगा और इस मामले को देखूंगा.”

गाने की ताकत

वापस सेंट मैरी स्कूल में, कक्षा 12 की छात्रा बाट्टी मेकी खोंगस्नी भविष्य में डिप्लोमेसी के क्षेत्र में करियर बनाना चाहती हैं, लेकिन वह म्यूजिक को सिर्फ एक शौक मानने को तैयार नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “भारत में लोग अक्सर सोचते हैं कि दूसरे करियर बेहतर भविष्य देते हैं, लेकिन अगर आपके अंदर म्यूजिक के लिए जुनून है, तो आप इसे जारी रख सकते हैं.”

बाट्टी के लिए उनके स्कूल कॉयर का वायरल होना इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे शिलॉन्ग के युवा संगीतकारों के सपनों की दुनिया और बड़ी हुई.

उन्होंने कहा, “जैसा लोग कहते हैं, जहां चाह होती है, वहां रास्ता भी होता है.”

ब्रायन वालांग के पास आगे बढ़ते रहने की एक और वजह है.

उन्होंने कहा, “जब हम साथ गाते हैं, तो लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं. यही कॉयर म्यूजिक की असली ताकत है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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