भारत की पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार और उसके साथ निजी क्षेत्र के लगातार सिमटने से स्वाभाविक रूप से दोनों क्षेत्रों के गुण-दोषों को लेकर विवाद शुरू हो गया है. प्रधानमंत्री ने लगभग पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र का पक्ष लिया है, मानो वह समाजवाद का अनिवार्य अंग हो. यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि दुनिया में समाजवाद के प्रमुख समर्थक रहे ब्रिटिश लेबर पार्टी के भीतर भी अब कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता को लेकर पुनर्विचार हो रहा है. कुछ वर्ष पहले तक राष्ट्रीयकरण को स्वाभाविक और आवश्यक माना जाता था.
भारत में समाजवाद मूलतः ब्रिटिश और यूरोपीय समाजवाद की नकल है. यहां शायद स्वर्गीय आचार्य नरेंद्र देव को छोड़कर कोई ऐसा उल्लेखनीय समाजवादी सामने नहीं आया.
प्रधानमंत्री नेहरू अपने आप में एक अलग श्रेणी के व्यक्ति हैं. वे समाजवाद पर भी अपनी बात अधिकारपूर्वक रख सकते हैं और इस बात पर जोर दे सकते हैं कि उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जाना चाहिए. समाजवादी तब ऐसे आश्चर्य से उनकी बातें सुनते हैं, मानो भारतीय परिस्थितियाँ और समाजवाद दोनों ही उनकी समझ से परे हों.
इन्हीं परिस्थितियों में यह विवाद आगे बढ़ रहा है. लोकतंत्र की मांग है कि देश के सामने मौजूद हर प्रश्न पर लगातार बहस हो और इसमें किसी व्यक्ति के पद या प्रतिष्ठा का लिहाज न किया जाए. हमारा दृढ़ विश्वास है कि आज नहीं तो कल, तर्क और सामान्य बुद्धि, बिना तर्क के दिए गए दावों पर विजय पाएंगे. इसलिए देशहित में हम सबको इस विषय के हर पक्ष पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. संभवतः यह देश के सामने खड़ी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है.
यदि सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार वास्तव में देश के हित में है, तो स्पष्ट है कि उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए और न ही आने दी जानी चाहिए. लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
एक आवश्यक शर्त
सार्वजनिक क्षेत्र की सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उसे चलाने वालों में सार्वजनिक भावना कितनी है. सामान्य बुद्धि रखने वाला व्यक्ति भी यह समझ सकता है. सार्वजनिक भावना यानी जनहित के प्रति निष्ठा क्या हमारे शिक्षित वर्ग में पर्याप्त मात्रा में मौजूद है? आखिर सार्वजनिक क्षेत्र को अपने अस्तित्व के लिए इसी वर्ग पर निर्भर रहना होगा. क्या कोई व्यक्ति हाथ अपने हृदय पर रखकर यह कह सकता है कि हमारे देश में सार्वजनिक भावना का अभाव नहीं है—यहां तक कि उन लोगों में भी नहीं, जो सार्वजनिक कार्यों में निःस्वार्थता की आवश्यकता पर लगातार भाषण देते हैं? इसका प्रमाण कांग्रेस के अध्यक्ष श्री ढेबर से कम महत्वपूर्ण व्यक्ति ने नहीं दिया है. उन्होंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक कार्य के लिए आवश्यक यह बुनियादी गुण कांग्रेस संगठन चलाने वाले लोगों में लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है. यदि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति ऐसी है, तो उन लोगों के बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही अच्छा है जो निःस्वार्थता को अपने आदर्शों में सबसे ऊपर नहीं रखते.
आइए, अपने आसपास एक नज़र डालें. हमें क्या दिखाई देता है?
यहां वनमहोत्सव मनाया जा रहा है. सरकारी कर्मचारियों की पूरी फौज मंत्री के निर्देश पर बड़ी सावधानी से पौधे लगाती है, लेकिन इनमें से कितने पौधे इस देश की गर्मी, घूमते हुए पशुओं और नई पीढ़ी की विनाशकारी शरारतों से बच पाते हैं? जब मैं कभी-कभी ऐसे शरारती लोगों को रोकता हूं, तो उनके समर्थन में भीड़ इकट्ठी हो जाती है और वह व्यक्ति पूछता है, “क्या यह आपका है?” कुछ लोग तो इससे भी आगे बढ़कर पूछते हैं, “आपका क्या नुकसान हो रहा है?” मैंने आज तक शायद ही किसी व्यक्ति को देखा है जो अपने घर के सामने लगे किसी पेड़ के तने के चारों ओर कभी-कभार एक गैलन पानी डालने के लिए स्वयं आगे बढ़े, जबकि वही पेड़ गर्मियों में उसे छाया और ठंडक देने वाला है और पूरे वर्ष वातावरण को शुद्ध करता है. हम सब ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो पेड़ लगाने के अभियान की सफलता से किसी तरह हमें भारी नुकसान होने वाला हो.
केंद्रीय सचिवालय
अब केंद्रीय सचिवालय में झांकते हैं, जो सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यालयों के लिए एक मॉडल का काम कर सकता है. गोरे साहब के चले जाने के साथ ही क्लर्क के मन से गोरे साहब का डर भी चला गया और उसका स्वाभाविक परिणाम हुआ—काम को जानबूझकर धीमा करना. एक अधिकारी ने मुझे बताया कि पहले कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे काम जल्दी निपटाएं, ताकि अत्यधिक देरी साहब की नज़र में न आ जाए और देरी करने वाले को किसी तरह की सज़ा न भुगतनी पड़े. लेकिन अब किसी को काम पूरा कराने की चिंता नहीं है और परिणामस्वरूप देरी स्वाभाविक हो गई है. यह देरी लगातार क्यों बढ़ रही है, इसके कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि अब सभी मंत्री भारतीय हैं और उनके विभागों में उनके अपने “जात-वाले” यानी उनके समुदाय के लोग, और कभी-कभी उनके रिश्तेदार भी होते हैं. इससे उनके काम को जल्दी कराने के लिए कार्रवाई करने की बात सोचना तो दूर, कार्रवाई करना भी लगभग असंभव हो जाता है. यदि इन लोगों की मंत्री तक सीधी पहुँच हो, तो उनके वरिष्ठ अधिकारी जानते हैं कि समझदारी इसी में है कि उन्हें अधीनस्थों के बजाय मित्रों की तरह माना जाए. इससे उन लोगों के लिए भी रास्ते खुल जाते हैं जो अपना काम जल्दी करवाना चाहते हैं और जिनके लिए हथेली गरम करने की गुंजाइश पैदा हो जाती है. स्वतंत्रता के पहले दस वर्षों में केंद्रीय सचिवालय के कर्मचारियों की संख्या बीस गुना बढ़ गई—लगभग चार हजार से बढ़कर अस्सी हजार हो गई. आगे यह संख्या और बढ़ने की संभावना है, क्योंकि महिला टाइपिस्टों की संख्या बढ़ रही है और उनके रिश्तेदारों को स्वाभाविक रूप से कार्यालय के बॉस को ही कहीं न कहीं समायोजित करना पड़ता है!
सवाल हमेशा यही रहता है: “आपको क्या मिलेगा?” या “आपका क्या नुकसान होगा?”
बॉस की खुशामद करने से लाभ होता है या मेहनत से? अधिकांश मामलों में उत्तर स्पष्ट है. यदि बॉस की खुशामद करने से लाभ मिलता है, तो मेहनत करना मूर्खता है. खुशामद करना कहीं आसान है, जबकि मेहनत करने का परिणाम केवल इतना हो सकता है कि पदोन्नति के समय आपको पीछे छोड़ दिया जाए. सरकारी साप्ताहिक पत्र और निजी तौर पर चलाए जा रहे किसी साप्ताहिक पत्र के कर्मचारियों की संख्या की तुलना भर कर लीजिए. आपको पता चल जाएगा कि किस तरह छोटी-सी वजह पर भी रिश्तेदारों या मित्रों के लिए नए पद बना दिए जाते हैं. सरकारी उपक्रम में कर्मचारी बढ़ाते समय बॉस कहता है, “मेरा क्या नुकसान है?” लेकिन निजी क्षेत्र का बॉस जानता है कि ऐसा करना सरासर पागलपन है, क्योंकि लंबे समय में इसका अर्थ दिवालिया होना होगा. इसीलिए केंद्रीय सचिवालय में कर्मचारियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. अब वे मुश्किल से दिन में एक घंटे भी ईमानदारी से काम करते हैं. दूसरे शब्दों में, निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार आत्मघाती है और इसलिए वहां उसका कोई स्थान नहीं होना चाहिए, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में वह स्वाभाविक बन जाता है. और भ्रष्टाचार का अर्थ, स्वाभाविक रूप से, धन की बर्बादी है.
चरित्र का अभाव
अंततः यही सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच का अंतर है. सार्वजनिक क्षेत्र में बॉस एक ट्रस्टी होता है. धन उस जनता का होता है, जो बहुत कुछ नहीं जानती और जिसके प्रतिनिधियों को भी आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है—यदि वे स्वयं चल रहे भ्रष्टाचार में शामिल न हों. आखिर उनका क्या नुकसान है? जब सर तेज बहादुर सप्रू जीवित थे, उनका घर शहर के बुद्धिमान लोगों के लिए सार्वजनिक मामलों पर चर्चा का एक मंच था. लगभग हर चर्चा अंततः हमारे देशवासियों में चरित्र के अभाव पर आकर रुकती थी, भले ही चर्चा का विषय सामान्यतः देश के नेता होते थे. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए चरित्र का उच्च स्तर आवश्यक है. इसके बिना वह स्वाभाविक रूप से एक सफेद हाथी बन जाएगा. और देश में उस चरित्र का अभी तक कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता.
प्रधानमंत्री यह कहने में उचित हो सकते हैं कि वे देश के उद्योगपतियों से बहुत प्रभावित नहीं हुए हैं, ठीक उसी तरह जैसे बुद्धिजीवी वर्ग भी देश के समाजवादी नेताओं की गुणवत्ता से बहुत प्रभावित नहीं हुआ है. लेकिन यह उद्योगपतियों के हाथ से उनके क्षेत्र छीनकर उन लोगों को सौंपने का कोई औचित्य नहीं है जो उन्हें अपने निजी व्यवसाय की तरह नहीं चला सकते. निजी व्यवसाय में सफलता और असफलता जीवन-मरण का प्रश्न होती है. क्या किसी ने कभी किसी सरकारी अधिकारी को किसी ऐसे उद्योग का प्रमुख बनकर रातों की नींद खोते देखा है क्योंकि उत्पादन की लागत बढ़ रही है? जबकि निजी क्षेत्र में ऐसी बेचैन रातें क्या आम बात नहीं हैं? सार्वजनिक क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से अपव्यय की प्रवृत्ति पैदा होती है—जैसा कि सरकारी रिपोर्टें लगातार दिखाती हैं. दूसरी ओर, निजी क्षेत्र में प्रवृत्ति अधिक से अधिक बचत करने की होती है.
कहा जाएगा कि जिसे हम अपव्यय कहते हैं, उसका परिणाम केवल यह होता है कि अधिक लोगों को रोजगार मिलता है और इस तरह सार्वजनिक धन जनता के ही हाथों में जाता है—मानो पीटर की जेब से निकालकर पॉल की जेब में डाल दिया गया हो. तो इसमें नुकसान क्या है? बात सही है, लेकिन इसका परिणाम उत्पादन लागत में वृद्धि के रूप में सामने आता है. और जब कीमतें लगातार बढ़ती रहें, तो निर्यात का क्या होगा—देश के भीतर बढ़ती महँगाई की बात छोड़ भी दें? निर्यात रुक जाता है. देश में अब यही होना शुरू हो गया है. और हम जानते हैं कि ऐसे देश के लिए इसका क्या अर्थ है जो अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं में आत्मनिर्भर नहीं है और जिसे वस्तुओं का निर्यात रोकना पड़े.
लाभ कमाने की प्रेरणा एक स्वाभाविक प्रेरणा है. इसके असामाजिक पक्ष को भी लगातार बढ़ते कानूनों के माध्यम से सीमित किया जा रहा है. इन कानूनों का उद्देश्य लाभ को उत्पादकों के बीच बांटना है, जबकि करों के माध्यम से उस लाभ का लगातार बढ़ता हिस्सा भी सरकार ले लेती है. मानवीय उद्देश्य वाले कानून बनाए जाने पर किसी को आपत्ति नहीं है. लेकिन निजी क्षेत्र की कीमत पर सार्वजनिक क्षेत्र का लगातार विस्तार करते जाना उत्पादन लागत को बढ़ाता रहेगा, जिससे महँगाई बढ़ेगी. साथ ही सरकारी कर्मचारियों की एक विशाल फौज भी बढ़ती जाएगी, जिनसे स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे सत्ता में मौजूद दल का समर्थन करेंगे और इस तरह हर चुनाव में उसके पक्ष में संतुलन झुका देंगे.
यह लोकतंत्र नहीं है.
यह न्यायसंगत भी नहीं है.
और इन दोनों आधारों पर लोकतांत्रिक देश में इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “इंडियन लिबर्टेरियन” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से जुलाई 1959 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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