जब किसी नियम का अपवाद ही सामान्य नियम बन जाए, तो समस्या निश्चित रूप से गंभीर है.
फास्ट-ट्रैक कोर्ट अपवाद के तौर पर बनाए जाते हैं. लेकिन जब इनका इस्तेमाल उन मामलों की श्रेणियों में लगातार बढ़ने लगे, जिनसे जनता में गुस्सा पैदा हुआ है, जैसे POCSO मामले और भर्ती या परीक्षा घोटाले, तो यह दिखाता है कि कहीं न कहीं समस्या जरूर है.
इससे जुड़ी एक और बात यह है कि लक्ष्य तभी पूरे किए जा सकते हैं, जब उन्हें तय किया गया हो. चाहे वह NABARD की निगरानी में आने वाले किसान क्रेडिट कार्ड का कवरेज हो या ASER रिपोर्ट के जरिए सीखने के नतीजों को मापना हो, समय-समय पर की जाने वाली समीक्षा से पता चलता है कि प्रगति उम्मीद के मुताबिक हो रही है या बीच में सुधार करने की जरूरत है.
रेप और POCSO मामलों के लिए केंद्र की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के तहत हर कोर्ट से उम्मीद की जाती है कि वह एक साल में कम से कम 165 मामलों का निपटारा करे. लेकिन नियमित कोर्ट व्यवस्था में चल रहे मामलों के लिए न तो कोई समय सीमा है, न कोई तय लक्ष्य और न ही इस बात पर चर्चा होती है कि लंबित मामलों का बोझ आखिर कभी कैसे खत्म किया जाएगा.
आपराधिक न्याय व्यवस्था तीन पैरों पर टिकी है — जांच, अभियोजन और ट्रायल. CBI और पुलिस, जिनमें CID और विजिलेंस निदेशालय जैसी विशेष शाखाएं भी शामिल हैं, जांच का काम करती हैं. आमतौर पर उनके पास संसाधन, बुनियादी ढांचा, प्रभाव और मीडिया का ध्यान होता है. साथ ही, संबंधित DGP और गृह विभाग की ओर से उनकी नियमित समीक्षा भी होती है.
इसी तरह, जिला और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अदालतों के मामले में हाई कोर्ट मामलों के निपटारे की निगरानी करते हैं और फैसलों की गुणवत्ता की जांच के लिए कुछ मामलों की समीक्षा भी करते हैं. हाई कोर्ट के जजों की ओर से हर साल निरीक्षण का रजिस्टर रखा जाता है. वे बार एसोसिएशन के सदस्यों से भी मिलते हैं ताकि पीठासीन अधिकारियों के पेशेवर आचरण के बारे में सामान्य प्रतिक्रिया मिल सके.
हालांकि, जांच और ट्रायल से जुड़े विभागों की तुलना में अभियोजन विभाग को अक्सर अधर में छोड़ दिया जाता है.
अभियोजन व्यवस्था की अनदेखी
न तो मीडिया ने, न ही सिविल सोसाइटी के अधिकारी वर्ग ने, न ही प्रशासन और पुलिस सुधारों से जुड़े थिंक टैंक ने और न ही राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों ने जांच और ट्रायल के बीच की इस महत्वपूर्ण कड़ी पर ध्यान दिया है.
यह सच है कि पुलिस से अभियोजन विभाग को अलग रखने के सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों — एसबी शहाणे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1995) और आर सरला बनाम टी.एस. वेलु (2000) — से और मजबूत किया गया है. इन मामलों में पुलिस यानी जांच और अभियोजन यानी ट्रायल के बीच अलग-अलग भूमिकाओं, स्वतंत्रता और अधिकारों के बंटवारे की बात की गई है.
एसबी शहाणे मामले में कोर्ट ने कहा था कि सरकारी वकील पुलिस विभाग के अधीन अधिकारी या कर्मचारी नहीं हो सकते. निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करने के लिए उन्हें प्रशासनिक और ढांचागत स्वतंत्रता की जरूरत होती है. आर सरला मामले में कोर्ट ने कहा था कि पुलिस को अभियोजन अधिकारियों को सह-जांचकर्ता के तौर पर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. साथ ही, जांच पूरी करने और पुलिस रिपोर्ट जमा करने से पहले पुलिस को अभियोजन अधिकारियों से उसकी जांच की मंजूरी लेने के लिए भी मजबूर नहीं किया जा सकता.
हालांकि, अब हमारे सामने ऐसी स्थिति है जिसमें ज्यादातर राज्यों में अभियोजन व्यवस्था के पास राजनीतिक दिशा, प्रशासनिक निगरानी, अधिकारियों के कैडर का प्रबंधन, करियर में आगे बढ़ने की व्यवस्था, जरूरी बुनियादी ढांचा और आर्थिक जरूरतों के लिए आकस्मिक फंड तक नहीं है.
मैं यहां मध्यकाल की एक कहावत याद करना चाहूंगा:
‘समझदार लोग कहते हैं कि एक कील जूते को संभालती है, जूता घोड़े को संभालता है, घोड़ा एक योद्धा को संभालता है और एक ऐसा योद्धा, जो लड़ सकता है, किले को संभालता है.’
इसका मतलब है कि सिर्फ शानदार दिखने वाला योद्धा और बहादुर घुड़सवार ही युद्ध का नतीजा तय नहीं करते, बल्कि वह साधारण लोहार भी नतीजे को प्रभावित करता है, जो घोड़े की नाल को सही आकार में रखता है. दूसरे शब्दों में, पूरी व्यवस्था के हर हिस्से का मजबूत और ठीक हालत में होना जरूरी है, क्योंकि बिना कवच और सही रणनीति के बहादुरी भी अक्सर कमजोर नतीजों तक ही सीमित रह जाती है.
यहां न्यायपालिका शानदार योद्धा है, पुलिस घुड़सवार है और सरकारी वकील वह लोहार है, जिसे सबसे कम वेतन मिलता है और अक्सर तब तक नजरअंदाज किया जाता है, जब तक घोड़ा लंगड़ाने न लगे. और कई बार तब भी उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है.
संविधान में भी हमें अभियोजन विभाग की इसी अनदेखी की झलक मिलती है.
अनुच्छेद 214 से 231 तक हाई कोर्ट से जुड़े हैं, जबकि निचली अदालतों की व्यवस्था और कामकाज अनुच्छेद 233 से 237 के तहत आते हैं. ऑल इंडिया सर्विसेज, जिनमें IPS राज्य की पुलिस और CBI को नेतृत्व देता है, अनुच्छेद 312 के तहत आती हैं. न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के मुद्दे पर संविधान सभा में काफी चर्चा हुई थी और आखिरकार इसका उल्लेख अनुच्छेद 50 में किया गया, जो राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है.
हालांकि, सरकारी वकीलों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधान सिर्फ CrPC, जिसे अब BNSS कहा जाता है, में मिलते हैं.
पहले प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने इस मुद्दे पर सामान्य बातों के अलावा कोई खास टिप्पणी नहीं की थी. हालांकि, कई लॉ कमीशन की रिपोर्ट, नेशनल पुलिस कमीशन और खास तौर पर दूसरे ARC ने इस मुद्दे की जांच की थी. करीब दो दशक पहले दूसरे ARC ने अभियोजन व्यवस्था को मजबूत करने और जांच और अभियोजन के बीच तालमेल बेहतर करने के लिए जिला अटॉर्नी व्यवस्था की सिफारिश की थी.
इसके अलावा, 2005 में CrPC में किए गए संशोधन में राज्य के गृह विभाग के तहत अभियोजन निदेशालय बनाने का प्रावधान किया गया था.
सरकारी वकीलों की समस्याएं
आज की स्थिति यह है कि ज्यादातर राज्यों ने अभियोजन निदेशालय बना रखा है. लेकिन जिला स्तर पर काम करने वाले सहायक सरकारी वकील (APP) और सरकारी वकील (PP) का जटिल गृह विभाग से कोई वास्तविक जुड़ाव महसूस नहीं होता. गृह विभाग इतना ज्यादा तुरंत जरूरी कामों पर ध्यान देता है कि महत्वपूर्ण मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं.
वे काफी परेशान हैं, क्योंकि कैडर में शामिल सरकारी वकील CJM स्तर तक के मामलों में पैरवी करते हैं, जबकि जिला अदालतों के लिए सरकारी वकील कॉन्ट्रैक्ट पर बनाए गए पैनल से लिए जाते हैं. कई राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में, कहा जाता है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े वकीलों को ही प्राथमिकता दी जाती है. नियमित कैडर बनाने का प्रस्ताव इसी वजह से दिया गया था. जिन राज्यों ने इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए हैं, उनमें हिमाचल प्रदेश, केरल और दिल्ली शामिल हैं.
राज्य के गृह सचिवों को जिला सरकारी वकीलों के कामकाज की समीक्षा करनी चाहिए और उनसे बातचीत करनी चाहिए, ताकि जमीनी स्थिति को समझा जा सके.
इस लेख को लिखने के दौरान मैंने कई APP और PP से बात की. उनकी बातों ने उस चीज की पुष्टि की, जो मुझे पहले से ही अनुभव के आधार पर पता थी. वे लगभग हर चीज के लिए पुलिस थाने के SHO पर निर्भर हैं. इसमें ऑफिस की स्टेशनरी, फोटो कॉपी, यात्रा और गवाहों से बातचीत पर होने वाले दूसरे खर्च शामिल हैं. सरकारी वकीलों को आकस्मिक खर्च के लिए एक फंड दिया जाना चाहिए और सरकारी कार्यक्रमों में बुलाए जाने वाले लोगों की सूची में अभियोजन निदेशक का नाम भी शामिल किया जाना चाहिए.
CBI से सीख
इस सीरीज को खत्म करने से पहले, मैं CBI, उसके मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालतों और उसकी अपनी अभियोजन शाखा की तारीफ करना चाहूंगा, जिनका रिकॉर्ड काफी बेहतर रहा है. हमें यह पूछना होगा कि CBI में ऐसी क्या खास बात है, जो राज्य पुलिस में नहीं है?
एक वजह यह है कि CBI सिर्फ जांच का काम करती है और उसकी अपनी अभियोजन शाखा है. दूसरी ओर, एक सामान्य पुलिस थाने में जांच अधिकारी कई तरह के काम करता है. इनमें VVIP दौरे, प्रोटोकॉल की ड्यूटी, कानून-व्यवस्था, वेरिफिकेशन और निश्चित रूप से अपराधों की जांच शामिल है.
2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थाने के स्तर पर कानून-व्यवस्था और जांच के काम को अलग करने के निर्देश दिए थे. इन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया है.
जांच की गुणवत्ता सुधारने के लिए पुलिस अधिकारियों की ट्रेनिंग में शारीरिक प्रशिक्षण से ज्यादा दिमागी और बौद्धिक प्रशिक्षण पर ध्यान देना बेहतर हो सकता है. आखिरी लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस में कानून के ग्रेजुएट्स की भर्ती क्यों न बढ़ाई जाए, ताकि केस डायरी, फॉरेंसिक रिपोर्ट और रिकॉर्ड में मौजूद सबूत आपस में मेल खाते हों और सरकारी वकील के पास कोर्ट में पेश करने के लिए पर्याप्त सामग्री हो? आखिरकार, जज को सबूत, जिरह और कानून की संबंधित धाराओं के आधार पर ही मामले का फैसला करना होता है.
उम्मीद है कि भर्ती घोटालों के संदर्भ में फास्ट-ट्रैक कोर्ट को लेकर पैदा हुई दिलचस्पी हमारे देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में लंबे समय से जरूरी संरचनात्मक सुधारों की ओर ले जाएगी. क्योंकि जैसा कहा जाता है, हर काले बादल के पीछे चांदी की एक परत होती है.
यह भर्ती घोटाले और उन्हें रोकने में कानूनों और विशेष अदालतों के नाकाम रहने पर बनी सीरीज़ की आखिरी कड़ी है. बाकी लेख यहां पढ़ें.
संजीव चोपड़ा नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय (PMML) के सेंटर फॉर कंटेंपरेरी स्टडीज़ में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का विषय ‘भारत की सीमाएं, सरहदें और नीले जलक्षेत्र’ है. विचार निजी हैं.
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