जैसे भारत 79वे साल का हो रहा है, उसकी विदेश नीति में एक मज़बूत रणनीतिक और उल्लेखनीय बदलाव दिखाई दे रहा है. जिसकी वजह से उसे चुनौती का सामना करना पड़ता है, तो उसके साझेदार कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? क्या वे भारत के साथ संवेदनशील तकनीक साझा करेंगे और क्या वे भारत के विकल्प बढ़ाएंगे या नई निर्भरता पैदा करेंगे?
आजादी के बाद किसी भी समय की तुलना में भारत के पास अब ज्यादा साझेदार, ज्यादा मंच और ज्यादा विकल्प हैं. भारत की कूटनीति का दायरा कभी इतना बड़ा नहीं रहा. साथ ही, इन विकल्पों को प्रभाव में बदलने की चुनौती भी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है.
फिर भी, भारतीय विदेश नीति के पीछे की सोच साफ है. ऐसी दुनिया में अपनी पसंद और फैसले की आजादी बनाए रखना, जहां ताकतवर देश हमेशा अपने हिसाब से दूसरे देशों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं. इसलिए भारत ऐसे साझेदार चाहता है, जिनके साथ कोई स्थायी बंधन न हो, साथ मिलकर काम करना चाहता है लेकिन अपनी सोच छोड़े बिना, और सहयोग करना चाहता है लेकिन अपने फैसले लेने की आजादी से समझौता किए बिना.
79 साल की उम्र में असली परीक्षा यह है कि क्या साझेदारियों और विकल्पों का यह बढ़ता दायरा ज्यादा महत्वपूर्ण नतीजों में बदला जा सकता है. यानी क्षेत्र में ज्यादा प्रभाव और दुनिया में भारत की ज्यादा मजबूत आवाज.
गुटनिरपेक्षता के लिए अब दुनिया नहीं रही
गुटनिरपेक्षता भारतीय विदेश नीति के काम करने के एक तरीके के तौर पर उस खास ऐतिहासिक दौर में सामने आई थी, जब आजाद भारत के पास सीमित संसाधन और ताकत थी और दुनिया दो एक-दूसरे के विरोधी गुटों में बंटी हुई थी. औपचारिक गठबंधनों से बाहर रहना किसी आदर्शवादी सोच का नतीजा नहीं था, बल्कि व्यावहारिक सोच पर आधारित था. इसका मकसद कूटनीति के लिए जगह बनाए रखना, अलग-अलग ताकतवर देशों से जरूरी मदद हासिल करना और किसी एक गुट का हिस्सा बनने से बचना था.
इससे भारत को अपनी सीमित ताकत और दुनिया में बड़ी भूमिका निभाने की अपनी महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए एक रणनीतिक रास्ता मिला. लेकिन शीत युद्ध की वास्तविक परिस्थितियों में गुटनिरपेक्षता के जरिए रणनीतिक स्वतंत्रता की भी कई सीमाएं थीं. इससे न तो निर्भरता खत्म हुई, न संघर्ष रुके और न ही संकट के समय अंतरराष्ट्रीय समर्थन की गारंटी मिली.
वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब खत्म हो चुकी है और भारत ने अपनी विदेश नीति के तरीके और उसकी तस्वीर, दोनों में बदलाव किया है. परमाणु हथियारों से लैस देश, बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति के रूप में भारत अब अलग-अलग मंचों पर एक साथ काम करता है. इनमें क्वाड और BRICS से लेकर SCO और G20 तक शामिल हैं. रणनीतिक स्वतंत्रता का मतलब अब सभी देशों से बराबर दूरी बनाए रखना नहीं है, बल्कि अलग-अलग देशों के साथ जरूरत के हिसाब से अलग-अलग स्तर की नजदीकी रखना है.
भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को आकार देने की कोशिश करता है. फ्रांस के साथ रक्षा और तकनीक के संबंधों को मजबूत कर रहा है और रूस को अब भी एक महत्वपूर्ण रक्षा और ऊर्जा साझेदार मानता है. BRICS और SCO में भारत की भागीदारी चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने में मदद करती है. साथ ही, इससे भारत को ग्लोबल साउथ और विकसित देशों के बीच पुल की भूमिका निभाने का दावा मजबूत करने में मदद मिलती है.
बहुगुटीय नीति न तो तटस्थता है और न ही सभी देशों से बराबर दूरी रखना. इसका मकसद साझेदारियों की संख्या बढ़ाना है, लेकिन किसी एक रिश्ते को भारत के फैसलों को तय करने की अनुमति नहीं देना है. हालांकि, ज्यादा विकल्प होने का मतलब अपने आप में ज्यादा प्रभाव होना नहीं है. असली पैमाना यह है कि जब भारत के हितों की परीक्षा हो, तब ये साझेदारियां उसके लिए कितने अच्छे नतीजे ला पाती हैं.
नई दुनिया के लिए नई साझेदारियां
भारत-अमेरिका संबंध इस रणनीति की संभावनाओं और मुश्किलों दोनों को दिखाते हैं. पिछले दो दशकों में दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध और सैन्य सहयोग काफी मजबूत हुए हैं. साथ ही, महत्वपूर्ण और नई तकनीकों के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा है. इसके पीछे रणनीतिक कारण साफ हैं. नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों चीन की बढ़ती ताकत और दबाव बनाने की उसकी नीति को लेकर चिंतित हैं. दोनों में से किसी के लिए भी ऐसा एशिया फायदेमंद नहीं है, जिस पर बीजिंग का दबदबा हो. हालांकि, दोनों देशों के लिए खतरे की समझ पूरी तरह एक जैसी नहीं है.
अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा पूरी दुनिया में चल रही है और काफी हद तक नई दिल्ली के नियंत्रण से बाहर है. भारत के लिए चीन पूरी दुनिया में फैली व्यवस्था को चुनौती देने वाली ताकत नहीं, बल्कि एक करीबी और सीधी चुनौती है. दोनों के बीच विवादित सीमा है, आर्थिक संबंधों में असमानता है और क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने की होड़ तेज हो रही है.
रूस और ईरान के साथ भारत के संबंध भी अमेरिकी रणनीतिक सोच के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाते. रूस अब भी भारत के रक्षा और ऊर्जा हितों के लिए महत्वपूर्ण है, हालांकि मॉस्को की बीजिंग के साथ बढ़ती नजदीकी भारत के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रही है. ईरान भारत के लिए जमीन के रास्ते कनेक्टिविटी और यूरेशिया तक पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण है. भारत के अपने हितों से अलग फैसले लेने के लिए वॉशिंगटन का दबाव दोनों देशों के बीच सहयोग की सीमा की परीक्षा लेगा. चीन भारत के सामने इससे भी बड़ी और स्थायी चुनौती है.
भारत-चीन सीमा विवाद का हल न निकलना, सैन्य दबाव, आर्थिक असमानता, पाकिस्तान के साथ चीन की साझेदारी और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी दोनों देशों के बीच लंबे समय तक स्थिरता की राह में रुकावट हैं. बातचीत जरूरी है क्योंकि भौगोलिक स्थिति को बदला नहीं जा सकता. लेकिन चीन के साथ नजदीकी को संभालने का मतलब असमानता को नजरअंदाज करना नहीं हो सकता. थोड़े समय के लिए किया गया समझौता रणनीतिक तैयारी का विकल्प नहीं है.
इसलिए बहुगुटीय नीति सिर्फ कूटनीतिक दिखावा बनकर नहीं रहनी चाहिए. फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मजबूत समुद्री साझेदारियां और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा यूरोप के साथ गहरा जुड़ाव भारत की बाहरी स्थिति को मजबूत करना चाहिए. साथ ही, बीजिंग के साथ बातचीत भी जरूरी है.
हालांकि, यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संकटों ने दिखाया है कि बड़ी ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत के लिए फैसले लेने की गुंजाइश को कम करती है. बहु-गुटीय नीति जोखिमों को बांट सकती है, विकल्प बढ़ा सकती है और भारत को दबाव बनाने की ताकत दे सकती है, लेकिन मुश्किल फैसलों से पूरी तरह बचा नहीं सकती. अस्थिर दुनिया में भारत को ज्यादा साफ तौर पर तय करना होगा कि कौन सी साझेदारियां महत्वपूर्ण हैं, किन मुद्दों पर महत्वपूर्ण हैं और उनकी कीमत क्या है.
विदेश नीति के फैसलों की कीमत
क्या रणनीतिक स्वतंत्रता से भारत को अपने फैसले लेने की असली ताकत भी मिलती है? ऐसी दुनिया में भारतीय विदेश नीति के लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है, जहां कई शक्तियों वाले विश्व में न तो बराबरी की गारंटी है और न ही संतुलन की. रणनीतिक स्वतंत्रता फैसले लेने की आजादी देती है, लेकिन असली ताकत उन फैसलों को प्रभावी बनाने की क्षमता देती है. आखिरकार, भारत का प्रभाव उसकी आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षमताओं पर निर्भर करेगा, जो उसकी कूटनीति को मजबूती देती हैं.
इसलिए जरूरी रक्षा प्रणालियों, आधुनिक तकनीक, ऊर्जा और जरूरी सामान के लिए बाहरी देशों पर निर्भरता कम करना, रणनीतिक स्वतंत्रता को असली ताकत में बदलने के लिए जरूरी है.
भारतीय विदेश नीति के अगले चरण में विदेशी साझेदारियों और देश के अंदर होने वाले बदलावों के बीच मजबूत संबंध बनाना जरूरी है. तकनीक से जुड़े समझौतों से नई तकनीक बनाने और उत्पादन की क्षमता बढ़नी चाहिए. रक्षा साझेदारियां सिर्फ हथियार खरीदने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि साथ मिलकर तकनीक विकसित करने और देश में अपनी क्षमता बढ़ाने तक जानी चाहिए. सप्लाई चेन से जुड़ी पहलों से प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम तैयार होना चाहिए. और ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ाव से सिर्फ राजनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि विकास के नतीजे भी मिलने चाहिए.
आखिरकार, भारत की असली ताकत सिर्फ अपने विकल्पों को बचाए रखने पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि ऐसे संसाधन और क्षमताएं हासिल करने पर निर्भर करेगी, जिनसे वह नतीजों को प्रभावित कर सके और क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक सुविधाएं और मदद देने वाला भरोसेमंद देश बन सके.
इसके लिए रणनीतिक साझेदारियों का बिना किसी भावुकता के आकलन करना जरूरी है. जब भारत को सीमा पर दबाव, आतंकवाद या आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है, तो उसके साझेदार कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? वे भारत के साथ कितनी संवेदनशील तकनीक साझा करेंगे और क्या वे भारत के विकल्प बढ़ाते हैं या नई निर्भरता पैदा करते हैं?
बहुगुटीय नीति के जरिए रणनीतिक स्वतंत्रता का मतलब किसी एक पक्ष का विरोध करके अपनी स्वतंत्रता साबित करना नहीं है. इसका मतलब यह तय करना है कि भारत के हितों के लिए क्या सही है. अगर अमेरिका, यूरोप, जापान या ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत संबंध भारत की रणनीतिक कमजोरियों को कम करते हैं, तकनीकी क्षमता बढ़ाने में तेजी लाते हैं या उनके साथ समुद्री सुरक्षा मजबूत करते हैं, तो इससे रणनीतिक स्वतंत्रता कम नहीं बल्कि और मजबूत होगी. न तो पुरानी यादें और न ही विचारधारा यह तय करनी चाहिए कि भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे करता है या उसे प्रभावी बनाने की ताकत कैसे हासिल करता है.
79 साल की उम्र में भारत एक साथ संतुलन बनाने वाली शक्ति, एक पुल, साझेदार और भविष्य की बड़ी शक्ति बनने की कोशिश करने वाला देश है. इससे उसकी पहुंच बढ़ती है, लेकिन अलग-अलग देशों की अलग-अलग उम्मीदों का दबाव भी बढ़ता है. जैसे-जैसे भारत का महत्व बढ़ेगा, रणनीतिक अस्पष्टता को बनाए रखना मुश्किल होता जाएगा. इसलिए रणनीतिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल सिर्फ अपने विकल्प बचाने के लिए नहीं, बल्कि नतीजों को प्रभावित करने के लिए होना चाहिए. ज्यादा साझेदार और ज्यादा विकल्प तभी मायने रखते हैं, जब उनके पीछे कार्रवाई करने की वास्तविक क्षमता हो.
भारत का गुटनिरपेक्षता से बहुगुटीय नीति तक का सफर उसकी मूल सोच को नहीं बदल पाया है. वह अपने फैसलों पर बाहरी देशों की पाबंदी का विरोध करता रहा है. अगली चुनौती यह है कि अपने लिए फैसले लेने की जगह बनाए रखने से आगे बढ़कर ऐसी ताकत हासिल की जाए, जिससे रणनीतिक माहौल को प्रभावित किया जा सके. यही तय करेगा कि भारत सिर्फ बंटी हुई दुनिया में अपना रास्ता निकालता है या आने वाले समय की दिशा को भी प्रभावित करता है.
मोनीष तौरंगबाम, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फेलो हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: राष्ट्रगान को अपमानित कर सरकार राष्ट्रगीत का सम्मान कर रही है