राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी, जिससे यह कानून बन गया. यह कानून राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के गायन को जानबूझकर रोकने को अपराध बनाता है. हालांकि, यह अलग बात है कि इस कानून में 1971 के मौजूदा नेशनल ऑनर एक्ट (2005) की धारा 3 में सिर्फ एक शब्द, ‘नेशनल सॉन्ग’, जोड़ा गया है.
हालांकि, एक अजीब अंतर या बड़ा विरोधाभास सामने आता है कि एक का सम्मान करते हुए अनजाने में दूसरे को नीचा दिखाया जा रहा है. इसके लिए गृह मंत्री अमित शाह और गृह मंत्रालय के उदाहरण सामने हैं.
वंदे मातरम विधेयक पिछले महीने गृह मंत्री ने पेश किया था. लेकिन उससे छह महीने पहले ही गृह मंत्रालय ने सभी सरकारी संस्थानों को राष्ट्रीय गीत को लेकर एक ‘तत्काल’ और स्थायी आदेश जारी कर दिया था. सभी स्कूलों और एजेंसियों को इसका ‘कड़ाई से पालन’ सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था. इस आदेश में क्या है, यह सोचने वाली बात है.
इस आदेश में केवल राष्ट्र-गीत के सम्मान से जुड़े विस्तृत निर्देश दिए गए हैं. इसके शीर्षक से ही यह स्पष्ट होता है: “भारत के राष्ट्र-गीत के संबंध में आदेश”. इसके अनुसार, इसमें ‘राष्ट्रीय गीत’ का जिक्र करीब 30 बार किया गया है, जबकि ‘राष्ट्रगान’ का जिक्र सिर्फ दो बार है. ये दो जिक्र भी मजबूरी में किए गए लगते हैं, क्योंकि इसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. इससे क्या संदेश जाता है, सिवाय इसके कि राष्ट्रगान वैकल्पिक है? कि केवल राष्ट्रीय गीत का पूरा सम्मान करना जरूरी है और हमेशा करना जरूरी है. अगर यह एक का सम्मान करने के लिए दूसरे को नीचा दिखाना नहीं है, तो फिर यह क्या है?
यह बात आदेश के खंड IV (2) से और साफ हो जाती है: “जहां राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान गाया जाता है, वहां पहले राष्ट्र गीत गाया जाएगा.” यह उस समय लागू राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 (2005) के खिलाफ था, जिसमें राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालना दंडनीय बताया गया था. राष्ट्रगान को पीछे करना, जैसा कि आदेश में राष्ट्रीय गीत को पहले गाने के लिए कहा गया, उसके गायन में बाधा डालना ही था. कोई मंत्रालय किसी मौजूदा कानून के प्रावधान को अपने आदेश से कैसे बदल सकता है?
आखिर, तब मौजूदा राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम में सिर्फ राष्ट्रगान का जिक्र था और उसके गायन में रुकावट डालने को अपराध बताया गया था. उसे राष्ट्रीय गीत के पीछे रखना अनादर के बराबर था.
वास्तव में, नए संशोधित राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम की धारा 3 (a) में भी राष्ट्रगान का नाम पहले और राष्ट्रीय गीत का नाम दूसरे नंबर पर है. इसलिए गृह मंत्रालय का 28 जनवरी का आदेश अभी भी इस कानून से मेल नहीं खाता. इस विरोधाभास को कैसे दूर किया जाए? और यह शर्मनाक स्थिति हमारे शासकों और ‘कानून बनाने वालों’ के बारे में क्या बताती है, जो बिना जरूरत राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रगान के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं?
बिना सोचे-समझे किया गया बचकाना काम
अगर आपको अभी भी संदेह है, तो आदेश के खंड III (5) को देखिए. इसमें निर्देश दिया गया है कि “सभी विद्यालयों में दिन भर के कार्य का आरंभ राष्ट्र गीत से हो” जिस समय यह आदेश जारी हुआ था, उस समय यह राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम के खिलाफ था, जिसके तहत राष्ट्रगान के गायन में रुकावट डालना अपराध था और है. उस आदेश में यह नहीं बताया गया कि देश के लाखों स्कूलों में क्या होना चाहिए, जहां दशकों से दिन की शुरुआत हमेशा राष्ट्रगान से होती रही है. आदेश में सिर्फ साफ तौर पर कहा गया है कि अब से दिन की शुरुआत राष्ट्रीय गीत से होगी. बस.
इसलिए यह स्वाभाविक है कि पिछले जनवरी से हर स्कूल में राष्ट्रीय गीत गाया जा रहा होगा. यही स्पष्ट आदेश था. हो सकता है कि राष्ट्रगान को छोड़ दिया गया हो. दोनों को गाने का कोई मतलब भी नहीं बनता और आदेश में दोनों को गाने के लिए भी नहीं कहा गया है. इसलिए व्यवहार में वह आदेश राष्ट्रगान के गायन में रुकावट डालता है. यानी आज भी मौजूद संशोधित कानून से यह असंगत है.
कोई पूछ सकता है कि यह विरोधाभासी, बिना अधिक सोचे-समझे और बचकाना काम क्यों किया गया? आदेश देकर किसी को सम्मान नहीं दिलाया जा सकता. बल्कि यह स्वाभाविक रूप से किसी को असहज कर देता है. कोई आलोचक सही तौर पर कह सकता है कि सरकार को न तो राष्ट्रगान की चिंता है और न ही राष्ट्रीय गीत की. बल्कि ऐसा लगता है कि वह सिर्फ विपक्षी नेताओं, खासकर कांग्रेस और बेचारे नेहरू को नीचा दिखाने का बहाना ढूंढने में दिलचस्पी रखती है. यह शक इसलिए पैदा होता है क्योंकि पिछले एक साल में सत्तारूढ़ दल के कई नेताओं ने वंदे मातरम की बात करते हुए मुख्य रूप से कांग्रेस के खिलाफ अपने आप एक अभियान चलाया है.
इनमें से कुछ नेता तब निराश हुए होंगे जब वंदे मातरम विधेयक संसद में बिना बहस के पास हो गया. वे चाहते थे कि विपक्ष कुछ कहे, ताकि वे नेहरू के खिलाफ एक बार फिर आरोपों और कीचड़ उछालने की बौछार शुरू कर सकें. लेकिन विपक्ष नजर ही नहीं आया. विधेयक बिना चर्चा के पास हो गया. आखिर, कौन सा भारतीय राष्ट्रीय गीत को उचित सम्मान नहीं देना चाहेगा?
देशभक्ति या पार्टी की सर्वोच्चता?
दुख की बात यह है कि हमारे शासकों के पास उन नेताओं के वर्ग के खिलाफ कहने के लिए कुछ नहीं है, जो 100 साल से ज्यादा समय से खुले तौर पर वंदे मातरम का विरोध करते आए हैं और यहां तक कि इसके खिलाफ फतवे भी जारी कर चुके हैं. दरअसल, इसी वजह से भी वंदे मातरम खुद राष्ट्रगान नहीं बन सका था.
सत्तारूढ़ का कोई भी नेता उन लोगों की आलोचना करता या उन्हें समझाने और बात करने की कोशिश करता नजर नहीं आता, जो वास्तव में वंदे मातरम को ‘कुफ्र’ और मूर्ति पूजा बताते हैं. इसके बजाय वे कांग्रेस को बदनाम करते हैं, जो इन शासकों के पैदा होने से बहुत पहले ही अपने अधिवेशनों और सम्मेलनों में यह गीत गाती रही थी.
तो आखिर एक साल तक चले ‘वंदे मातरम का सम्मान करो’ अभियान का मकसद क्या था? इसका उन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा, जो राष्ट्रीय गीत को ‘कुफ्र’ मानते हैं. वहीं, राष्ट्रीय गीत के लिए अपने जोश में सरकार ने अनजाने में राष्ट्रगान की गरिमा कम कर दी.
यह अफसोस की बात है कि जिन नेताओं के पास वर्षों से लगभग सारी सत्ता रही है, वे इतनी छोटी सोच दिखा रहे हैं. देश के लिए मिलकर काम करने के बजाय, वे दूसरी पार्टियों को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं. मौजूदा मामले में भी यह बिना किसी जरूरत के किया गया. इससे राष्ट्रीय भावना कमजोर होती है और दलीय कटुता को बढ़ावा मिलता है.
उन्हें यह समझ नहीं आया कि ज्यादा देशभक्त दिखने की कोशिश में सभी सरकारी एजेंसियों को दिया गया उनका आदेश आखिरकार राष्ट्रगान को ही नीचा दिखाने वाला बन गया. यह कदम न सिर्फ जल्दबाजी और गलत था, बल्कि मौजूदा कानून के भी खिलाफ था.
यह देशभक्ति नहीं, बल्कि पार्टी की सर्वोच्चता है. चाहे इसके पीछे मंशा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, यह भारतीय समाज, शिक्षा और संस्कृति के लिए नुकसानदायक है.
शंकर शरण एक कॉलमिस्ट और पॉलिटिकल साइंस के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.
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