scorecardresearch
Wednesday, 12 August, 2026
होममत-विमतभारत में पेपर लीक कानूनों का लंबा इतिहास है, धीमी जांच और बेपरवाह मुकदमे का भी यही हाल रहा है

भारत में पेपर लीक कानूनों का लंबा इतिहास है, धीमी जांच और बेपरवाह मुकदमे का भी यही हाल रहा है

सज़ा कितनी बड़ी है, उससे ज्यादा ज़रूरी है कि सज़ा मिलना तय हो.

Text Size:

कॉलेजों में दाखिले और सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं कराने में केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों की नाकामी को लेकर जनता का गुस्सा हाल ही में सड़कों पर दिखाई दिया. केंद्र और झारखंड, दोनों सरकारों ने जेन ज़ी प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों को मान लिया है—केंद्र में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा और झारखंड में जेपीएससी को रद्द करना. अपराध करने वालों को सज़ा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना एक अच्छा पहला कदम है, लेकिन समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी है.

इस सीरीज़ में भर्ती घोटालों के मुद्दे, न्याय व्यवस्था की ओर से इन मामलों को तय समय में निपटाने में नाकामी, फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना और देश में अभियोजन व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत पर बात की जाएगी.

मैं एक निजी घटना से शुरुआत करता हूं. 1988 में जब मैं 27 साल का था और नए सब-डिविजनल ऑफिसर के तौर पर काम कर रहा था, तब न्यायिक पेशकार (हेड क्लर्क) ने मेरा ध्यान 1962 के एक दिलचस्प मामले की ओर दिलाया. इसमें किराया नियंत्रण, किरायेदारी के अधिकार और संपत्ति की सीमा तय करने के मामले एक-दूसरे से जुड़े हुए थे. इस मामले को हर बार आगे के लिए टाल दिया जाता था और मामले की फाइल ही 1,000 से ज्यादा पन्नों की हो गई थी. मैंने इसे जल्दी निपटाने का फैसला किया क्योंकि अगर मेरे रहते इसका फैसला नहीं हुआ तो बहुत संभव था कि यह मामला मेरे उत्तराधिकारी से भी ज्यादा पुराना हो जाता.

एक दिन पश्चिम बंगाल के छोटे शहर घाटाल में काफी हलचल थी. दोनों पक्षों की ओर से रखे गए हाई कोर्ट के वकील अपने लंबे काले गाउन पहनकर पहुंचे थे और उनके साथ सहायकों की एक टीम थी, जिनके हाथों में पुराने मामलों के फैसलों और कानून की मोटी किताबें थीं. जिला और निचली अदालतों के वकीलों से जिस सामान्य ‘योर ऑनर’ संबोधन की आदत थी, उसके उलट वे मुझे ‘माय लॉर्ड’ कहकर संबोधित कर रहे थे! दोनों पक्षों की दलीलें काफी लंबी थीं. मैंने पूरा वीकेंड संबंधित कानूनों और पुराने फैसलों को समझने में लगाया, लेकिन आखिरकार अपना फैसला सुना दिया. जहां तक मुझे याद है और मेरी जानकारी है, विपक्षी पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं की, हालांकि, अदालतों की व्यवस्था में यह मामला ‘पिरामिड के सबसे निचले हिस्से’ में था.

अब 2024 पर आते हैं. मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने चार दशक पुराने Property Owners Association v. State of Maharashtra मामले में अंतिम फैसला सुनाया. 8:1 के बहुमत से पीठ ने यह फैसला दिया कि क्या निजी तौर पर किसी व्यक्ति के पास मौजूद सभी संपत्तियां संविधान के अनुच्छेद 39(b) के तहत ‘समुदाय के भौतिक संसाधन’ मानी जा सकती हैं. यहां ध्यान फैसले पर नहीं, बल्कि इस मामले की लंबी उम्र पर है. यह मामला 1984 का था, यानी धनंजय चंद्रचूड़ के हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टरेट पूरी करने के बाद बॉम्बे लौटने से दो साल पहले का.

हालांकि, मामलों को निपटाने के मामले में उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड अच्छा था, लेकिन जिस व्यवस्था की उन्होंने अध्यक्षता की, वह बढ़ते लंबित मामलों के बोझ से दब गई थी. हर साल देश की सभी अदालतों में दाखिल होने वाले नए मामलों की कुल संख्या, निपटाए गए मामलों से ज्यादा रही. डेटा फॉर इंडिया के एक विश्लेषण के अनुसार, 2025 के अंत तक कुल 5.4 करोड़ मामले लंबित थे, जो एक दशक पहले की तुलना में 80 प्रतिशत ज्यादा हैं. जिला और निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में सबसे बड़ा बदलाव आया—यह 2.6 करोड़ से बढ़कर 4.8 करोड़ हो गई, यानी 85 प्रतिशत की बढ़ोतरी. इसी अवधि में सभी हाई कोर्ट और भारत के सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या में भी करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

यह हैरान करने वाली बात नहीं थी. देशभर की जिला और अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 30,868 पद मंजूर हैं, लेकिन फिलहाल केवल 23,558 जज ही अपने पदों पर हैं. यानी करीब एक चौथाई, 7,310 पद खाली हैं.

पेपर लीक कानूनों का लंबा इतिहास

लंबित मामलों की बढ़ती संख्या शायद जुलाई 2026 में पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 में किए गए बदलावों में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट पर जोर देने की वजह बताती है. पेपर लीक रोकने के लिए बनाए गए नए नियमों के तहत पुलिस या तय की गई एजेंसियों को दो महीने के अंदर जांच पूरी करनी होगी, जबकि स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के अंदर अंतिम फैसला देना होगा.

इस बदलाव के बाद नकल और धोखाधड़ी के सभी मामलों को शामिल करते हुए सज़ा को और सख्त किया गया है. गलत तरीके अपनाने वालों को पांच से 10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. संगठित अपराध के मामले में सात से 10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है. ऐसे अपराधों में शामिल सर्विस प्रोवाइडर पर 5 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और उन्हें सार्वजनिक परीक्षाएं कराने से आठ साल के लिए रोक दिया जाएगा.

यह कानून संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए), रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंकिंग भर्ती संस्थाओं की ओर से कराई जाने वाली परीक्षाओं पर लागू होता है. हालांकि, कई राज्यों ने भी इस समस्या से निपटने के लिए अपने कानूनों को सख्त किया है और विशेष अदालतें बनाई हैं.

हालांकि, यह भी दर्ज करना ज़रूरी है कि न तो यह समस्या नई है और न ही इससे निपटने के लिए बनाए गए कानून नए हैं.

औपनिवेशिक दौर में कई विश्वविद्यालयों और स्कूल शिक्षा विभागों ने आईपीसी की धाराओं 420, 120B, 406, 465, 468 और 471 का इस्तेमाल किया था. इनके बराबर की धाराएं अब बीएनएस में 318, 61, 316 और 336 की उपधारा 2/3 हैं. लेकिन दूसरे राज्यों के लिए कानून का एक नमूना तैयार करने वाला पहला राज्य-विशेष कानून 1935 के बर्मा पब्लिक एग्जामिनेशन बिल से आया था. बर्मा बिल में बिना अनुमति प्रश्नपत्र रखने और प्रश्नपत्र लीक करने को अपराध बनाया गया था.

इसके बाद सेंट्रल प्रोविंसेज रिकग्नाइज्ड एग्जामिनेशन एक्ट, 1937 आया, जो बाद में मध्य प्रदेश रिकग्नाइज्ड एग्जामिनेशन एक्ट बन गया. आजादी के बाद इस समस्या से निपटने वाले शुरुआती कानूनों में से एक पंजाब यूनिवर्सिटीज एंड बोर्ड्स ऑफ इंटरमीडिएट एंड सेकेंडरी एजुकेशन मालप्रैक्टिसेज एक्ट, 1950 था. इसके कुछ समय बाद कई राज्यों ने विश्वविद्यालयों की सीनेट और सिंडिकेट को जरूरी कार्रवाई करने का अधिकार दिया. 1960 और 1970 के दशक में ‘फ्लाइंग स्क्वॉड’ भी बनाए गए, जो अचानक जांच करते थे. वे न सिर्फ परीक्षा में गलत काम करते पकड़े गए लोगों को परीक्षा से बाहर करते थे, बल्कि परीक्षा केंद्रों को भी रद्द कर देते थे.

बिहार कंडक्ट ऑफ एग्जामिनेशन एक्ट, 1981 और महाराष्ट्र प्रिवेंशन ऑफ मालप्रैक्टिसेज एट यूनिवर्सिटी, बोर्ड एंड अदर स्पेसिफाइड एग्जामिनेशन एक्ट, 1982 ने भी परीक्षा केंद्रों पर किसी दूसरे व्यक्ति से परीक्षा दिलाने, प्रश्नपत्र लीक करने और बड़े पैमाने पर नकल को अपराध बनाने के लिए नियम बनाए. हालांकि, जांच में देरी और अभियोजन की उदासीनता का इस समस्या पर कोई अच्छा असर नहीं पड़ा. अगले दशक में आंध्र प्रदेश ने पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ मालप्रैक्टिसेज) एक्ट, 1997 लागू किया. वहीं उत्तर प्रदेश ने इस समस्या को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 1998 लागू किया.

व्यापम घोटाला और इंजन-बोगी वाला तरीका

इन सभी कानूनों के बावजूद, 1990 के दशक के मध्य तक मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (मध्य प्रदेश प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड) में देश के सबसे बड़े और सबसे व्यापक भर्ती और दाखिला घोटालों में से एक की नींव पड़ने लगी थी.

बाद में इसे व्यापम घोटाले के नाम से जाना गया. इसका नाम बोर्ड के हिंदी नाम के शुरुआती अक्षरों से बना था. इसमें नेताओं, अधिकारियों, बोर्ड के कर्मचारियों, बिचौलियों और कोचिंग नेटवर्क के बीच मिलीभगत के जरिए बड़े पैमाने पर परीक्षाओं में गड़बड़ी की जाती थी. इस पूरे घोटाले का पता 2013 में ही चल पाया.

इसमें ‘इंजन-बोगी’ तरीका भी इस्तेमाल किया जाता था. इसमें ज्यादा नंबर लाने वाले किसी दूसरे उम्मीदवार या होशियार उम्मीदवार (इंजन) को पैसे देने वाले दो उम्मीदवारों (बोगी) के बीच बैठाया जाता था. इससे वे एक-दूसरे की नकल कर सकते थे या OMR शीट बदल सकते थे. परीक्षा केंद्रों के प्रमुख भी इसमें शामिल थे. वे बोर्ड के अधिकारियों की मिलीभगत से जांच केंद्रों के अंदर खाली या थोड़ी भरी हुई OMR शीट को बदल देते थे. 3,100 से ज्यादा लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और 150 से ज्यादा अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज किए गए. करीब 2,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें बड़ी संख्या में मेडिकल छात्र और वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे. घोटाला इतना बड़ा था कि सुप्रीम कोर्ट ने CBI को जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दिया.

कई वर्षों तक चली स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की सुनवाई में CBI ने 100 से ज्यादा लोगों को दोषी साबित कराया. इस दौरान दर्जनों गवाहों, आरोपियों और घोटाले का खुलासा करने वालों की रहस्यमय मौतें भी हुईं. अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार, 23 से लेकर 40 से ज्यादा लोगों की असामान्य या अचानक मौत हुई. हालांकि, CBI ने बाद में कहा कि जिन मौतों की उसने जांच की, उनमें उसे किसी साजिश या गलत काम का कोई सबूत नहीं मिला. पहला फैसला दिसंबर 2015 में ही सुनाया गया. यह फैसला एक स्पेशल कोर्ट ने दिया था, जिसकी अध्यक्षता स्पेशल एडिशनल सेशन जज कर रहे थे. यह कोर्ट खास तौर पर व्यापम मामलों को जल्दी निपटाने के लिए बनाई गई थी.

जब मामलों की जांच CBI को दी गई, तब व्यापम से जुड़े मामलों के बड़े नेटवर्क की सुनवाई के लिए खास तौर पर केंद्रीय फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट बनाए गए. लेकिन इन फास्ट ट्रैक अदालतों के होने के बावजूद व्यापम के कुछ मामले आज भी लंबित हैं.

आखिर में, सज़ा कितनी बड़ी है, उससे ज्यादा ज़रूरी यह है कि सज़ा मिलना तय हो.

(टू बी कन्टीन्यूड)

यह भर्ती घोटालों पर सीरीज़ का पहला लेख है और क्यों कानून और विशेष अदालतें उन पर अंकुश लगाने में विफल रही हैं.

संजीव चोपड़ा नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML) में सीनियर फेलो हैं. उनके फेलोशिप का विषय ‘भारत की सीमाएं, सरहदें और ब्लूवाटर्स’ है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मोदी सरकार उस पेपर लीक कानून को और सख्त बना रही है, जिसका अब तक किसी पर असर नहीं हुआ


 

share & View comments