“जब आपसे केवल झुकने के लिए कहा गया था,” नए सूचना मंत्री श्री आडवाणी ने कहा था, “तब आपने रेंगना शुरू कर दिया.” भारतीय प्रेस को लेकर कही गई यह बात काफी हद तक सही थी. लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि आपातकाल घोषित होते ही प्रेस अचानक टूट गया. इसकी प्रक्रिया तो 1969 से ही धीरे-धीरे शुरू हो गई थी, लेकिन वह इतिहास है. इतना कहना पर्याप्त है कि भारतीय पत्रकारों और भारतीय समाचार-पत्रों की मिलीभगत और समर्थन से श्रीमती गांधी देश में एक कठोर और पूरी तरह निरर्थक सेंसरशिप लागू करने में सफल हुईं.
उन्होंने यह कहने तक की धृष्टता की कि पत्रकारों ने स्वयं एक आचार-संहिता बनाई है और वे, एक अच्छे नागरिक के रूप में, उसे लागू करने की कोशिश कर रही हैं उनके साथ और उनके आसपास ऐसे भारतीय पत्रकार और समाचारकर्मी भी थे, जिन्होंने स्वयं को आपातकाल का “व्याख्याकार” और “रक्षक” बना लिया था. वे हममें से उन लोगों को, जो इसका विरोध कर रहे थे, समझाने की कोशिश करते थे कि विरोध करना व्यर्थ है और हमारे समाचार-पत्रों के हित में है कि हम “व्यावहारिक”, “लचीले” रहें और देश की परिस्थिति को “समझने की कोशिश” करें. डर का माहौल आपातकाल के बाद पैदा नहीं हुआ था. 25 जून 1975 से बहुत पहले ही भारतीय पत्रकारों और समाचारकर्मियों के मन में, अन्य नागरिकों की तरह, डर बैठ चुका था. वास्तव में, अगर यह पहले से मौजूद डर का माहौल न होता, तो शायद श्रीमती गांधी वह सब करने में सफल नहीं होतीं जो उन्होंने किया.
जनता सरकार का आगमन
नई सरकार ने सत्ता में आते ही भारतीय प्रेस पर लगी स्पष्ट पाबंदियों को हटाने की दिशा में तेजी से कदम उठाए. सेंसरशिप समाप्त कर दी गई. अत्यंत आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन की रोकथाम अधिनियम (Prevention of Publication of Objectionable Matters Act), जिसे संवैधानिक संरक्षण दिया गया था, को तुरंत कानून की किताब से हटा दिया गया. समाचार-पत्रों को फिर से संसद की कार्यवाही को स्वतंत्र रूप से और पूरी तरह प्रकाशित करने की अनुमति मिल गई. इन कदमों से देश और विदेश, दोनों जगह प्रेस का सम्मान सरकार के प्रति बढ़ा. नागरिक स्वतंत्रताओं और मूलभूत मानवाधिकारों को बहाल करने के जनादेश पर चुनी गई सरकार को अपने प्रयासों के लिए पूरा श्रेय मिला. इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट ने भी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की खुलकर सराहना की.
नई सरकार को सत्ता में आए, अब 19 महीने हो चुके हैं, जितना समय आपातकाल भी चला था. यह इतना समय जरूर है कि अब स्थिति का आकलन किया जा सके और यह समझा जा सके कि आज भारतीय परिस्थितियों में प्रेस की वास्तविक स्थिति क्या है. श्री आडवाणी ने यह भी कहा था कि प्रेस ने “अपनी जंजीरों को खड़खड़ाने तक की कोशिश नहीं की, उन्हें तोड़ने की बात ही दूर है.” तो क्या आज भी प्रेस को बांधने वाली कोई जंजीरें हैं? बड़े अफसोस के साथ कहना होगा कि ऐसी कई जंजीरें अभी भी मौजूद हैं. और यह भी कम चिंताजनक नहीं है कि इनमें से कुछ सरकार ने बनाई हैं और वह भी स्वयं पत्रकारों और समाचार-पत्रों की मिलीभगत से.
प्रेस पर नियंत्रण
आपातकाल के दौरान एक बहुत समझदार ब्रिटिश टिप्पणीकार ने कहा था: “इसमें कोई गलती न करें. प्रेस पर नियंत्रण श्रीमती गांधी की तानाशाही का केंद्र है.” प्रेस पर नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम समाचार एजेंसियों पर नियंत्रण था. दो प्रमुख समाचार एजेंसियों, पीटीआई (PTI) और यूएनआई (UNI), को जबरन मिलाकर एक कर दिया गया—समाचार. दोनों संस्थाओं के बोर्डों को “स्वैच्छिक विलय” के लिए मजबूर किया गया. पत्रकारों और गैर-पत्रकार कर्मचारियों के ट्रेड यूनियनों ने भी इस विलय और समाचार के गठन के समर्थन में प्रस्ताव पारित किए.
समाचार की स्थापना को लेकर सरकार के सामने जो समस्या थी, उसमें भी समाचार-पत्रों से जुड़े लोगों ने मदद की. उन्होंने सुझाव दिया कि एक सहकारी संस्था बनाई जाए और वह पीटीआई (PTI) और यूएनआई (UNI) की ओर से केवल उन्हें मिली शक्तियों के आधार पर काम करे. इसके बाद समाचार को तत्कालीन प्रधानमंत्री के विशेष दूत को सौंप दिया गया और इसमें समाचारकर्मियों की भी मिलीभगत थी. परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका थी. समाचार ने धीरे-धीरे अपनी पूरी विश्वसनीयता खो दी. नवंबर 1976 में उसने एक लंबी खबर जारी की, जिसका उद्देश्य यह बताना था कि चुनाव अनावश्यक हैं और जनता चुनाव नहीं चाहती. खबर में कहा गया कि समाचार के संवाददाताओं ने कश्मीर से केरल तक, शिलांग से बीकानेर तक, देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों लोगों से बातचीत की और एक “राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण” किया. निष्कर्ष यह था कि “देश चुनाव नहीं चाहता और आपातकाल की उपलब्धियों को मजबूत करना चाहता है. लेकिन इसके कुछ ही समय बाद समाचार द्वारा खोजा गया भारतीय जनता का यह “सर्वसम्मत मत” किनारे कर दिया गया और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का आदेश दे दिया. इसी तरह के आचरण ने शायद न्यायमूर्ति तुलजापुरकर को बंबई हाई कोर्ट के एक यादगार फैसले में यह सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया कि क्या “स्वतंत्रताएँ केवल डरपोक और दब्बू लोगों के लिए सुरक्षित रखी जा रही थीं.”
प्रेस और विश्वसनीयता
विश्वसनीयता प्रेस की सबसे बड़ी क्षतियों में से एक थी. अकेली समाचार एजेंसी समाचार की कोई विश्वसनीयता नहीं रह गई थी. ऑल इंडिया रेडियो ने भी अपनी थोड़ी-बहुत बची विश्वसनीयता खो दी थी. सितंबर 1975 में ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशकों की बैठक को संबोधित करते हुए श्रीमती गांधी ने विश्वसनीयता के सवाल को बहुत आसानी से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, “ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं पता कि इसका मतलब क्या है. विश्वसनीयता किसकी है? उन समाचार-पत्रों की, जो दिन-रात झूठ छापते हैं?”
दोहरी भाषा और दोहरे मापदंड लगातार बढ़ते गए. नई दिल्ली में हुए गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में तत्कालीन सरकार ने प्रतिभागियों के लिए प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह तक कहा कि भारत सरकार प्रेस के कामकाज से पूरी तरह दूर रहती है और प्रेस की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त है.
तब तक श्रीमती गांधी “द स्टेट्समैन” और “इंडियन एक्सप्रेस” को दबाने और अपने सामने न झुकने वाले कई प्रकाशनों को नष्ट करने की असफल कोशिश कर चुकी थीं. इनमें राज मोहन गांधी का “हिम्मत”, एन. जी. गोरे का “जनता”, थत्ते का “साधना”, ए. डी. गोरवाला का “ओपिनियन” और मीनू मसानी का “फ्रीडम फर्स्ट” शामिल थे.
आर्थिक दबाव
आर्थिक रूप से मजबूत समाचार-पत्र जरूरी नहीं कि अच्छा और स्वतंत्र समाचार-पत्र भी हो, लेकिन इसका उलटा ज़रूर सही है. मजबूत विचार रखने वाला अच्छा और स्वतंत्र समाचार-पत्र तभी संभव है जब वह आर्थिक रूप से टिकाऊ हो.
श्रीमती गांधी यह बात अच्छी तरह समझती थीं. आपातकाल के दौरान उन्होंने निर्देश दिया था कि केवल सरकारी विभाग ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में सार्वजनिक क्षेत्र के निगम और स्वायत्त संस्थाएं भी “द स्टेट्समैन” और “इंडियन एक्सप्रेस” में विज्ञापन न दें. इस संबंध में तीन गुप्त परिपत्र जारी किए गए थे.
“द स्टेट्समैन” द्वारा अदालत में चुनौती दिए जाने पर सरकार ने एक मूल ज्ञापन सामने रखा, जिससे ये तीनों परिपत्र निकले थे. इस ज्ञापन में सरकार को समाचार-पत्रों की विज्ञापन दरें तय करने, यह तय करने कि किस विज्ञापन अभियान के लिए कौन-सा समाचार-पत्र इस्तेमाल किया जाए और प्रत्येक समाचार-पत्र को कितना विज्ञापन दिया जाए, जैसी शक्तियां देने की कोशिश की गई थी. सूचना मंत्रालय में वी. सी. शुक्ला के “खास आदमी” के. एन. प्रसाद द्वारा हस्ताक्षरित यह ज्ञापन सरकार के लिए उन समाचार-पत्रों को आर्थिक रूप से कमजोर करने का साधन बन गया था जो उसके लिए “असुविधाजनक” थे. आपातकाल खत्म होने के बाद श्री प्रसाद चले गए, लेकिन उनका ज्ञापन बना रहा.
पूरे एक वर्ष तक मैंने व्यक्तिगत रूप से नई सरकार को समझाने की कोशिश की कि यह ज्ञापन उसकी घोषित नीतियों के अनुरूप नहीं था और इसे समाप्त कर देना चाहिए. आश्वासन तो मिलते रहे, लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने श्रीमती गांधी से भी आगे बढ़ते हुए अलग-अलग समाचार-पत्रों के लिए विज्ञापन दरें तय करने की दिशा में काम किया.
श्री आडवाणी को यह विशेष “सम्मान” प्राप्त है कि वे ऐसे पहले सूचना मंत्री बने जिन्होंने सरकार की विज्ञापन नीति में ही विज्ञापन के लिए एक दर-व्यवस्था का उल्लेख किया. इस तथाकथित दर-व्यवस्था को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया और किसी को पता नहीं कि वह वास्तव में मौजूद है भी या नहीं. लेकिन उसके परिणामों का सामना सबको करना पड़ रहा है.
“द स्टेट्समैन” के मामले में सरकार द्वारा तय की गई मानी जाने वाली दर पिछले दो वर्षों में बाजार में तय दर की लगभग दो-तिहाई थी. दूसरी ओर, सरकार के प्रोत्साहन से सभी खर्च, विशेषकर श्रम लागत, तेजी से बढ़े. गैर-जिम्मेदाराना लोकप्रियतावाद के रूप में इससे आज कुछ वोट मिल सकते हैं, लेकिन किसी को विश्वास नहीं है कि यह स्वतंत्र प्रेस के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
अंततः, एक वर्ष के प्रयासों के बाद “द स्टेट्समैन” और “आनंद बाजार पत्रिका” इस मामले को अदालत में ले गए. बिना सुनवाई के प्रसाद ज्ञापन वापस ले लिया गया, लेकिन मामला अभी विचाराधीन है. “द स्टेट्समैन” के आग्रह पर अदालत ने इस मामले को ठीक से तय करने के लिए सरकार द्वारा संसद की अनुमान समिति के सामने दिए गए साक्ष्य भी मंगाए हैं. “द स्टेट्समैन” का कहना है कि जब ये साक्ष्य सामने आएंगे तो वे अदालत में सरकार की ओर से दिए गए शपथपत्र में कही गई बातों से सीधे विपरीत होंगे.
यह कहना पर्याप्त उत्तर नहीं है कि हर जगह नौकरशाह उन शक्तियों को अपने पास बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें उन्होंने हासिल कर लिया है, चाहे वे शक्तियां सही तरीके से हासिल की गई हों या नहीं. आखिरकार, यहीं पर राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता होती है, वरना मंत्रियों की ज़रूरत ही क्या है?
निष्कर्ष
जब इसमें स्वामित्व के ढांचे को लेकर असंतोष और अखबारों के प्रसार तथा स्वामित्व को अलग करने जैसी अतीत की और भी प्रतिध्वनियां जोड़ दें, तो यह सवाल उठता है कि वर्तमान सरकार और उसकी पूर्ववर्ती सरकार के रवैये में अंतर केवल तरीकों का है या उद्देश्यों का भी.
निष्पक्षता से यह मानना होगा कि दुनिया में किसी भी कार्यकारी सरकार से यह उम्मीद करना अवास्तविक है कि वह प्रेस को पसंद करेगी. यदि प्रेस अपना कर्तव्य निभा रहा है, तो वह राजनेताओं और नौकरशाहों को सवालों के घेरे में लाएगा, उन्हें परेशान करेगा और जब वे अपनी सीमा से बाहर जाएंगे तो उन्हें उनकी जगह दिखाएगा. किसी भी सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि समाचार-पत्रों में अपनी आलोचना देखकर वह खुशी से झूम उठेगी.
इसलिए, हमें यह मानकर चलना चाहिए कि हर जगह सरकारें प्रेस पर प्रभाव के साधनों, और कभी-कभी सीधे नियंत्रण, को अपने हाथ में बनाए रखने की कोशिश करती रहेंगी. प्रेस का कर्तव्य है कि वह मजबूती से खड़ा रहे और लालच तथा धमकियों—दोनों का विरोध करे.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “क्या भारत में प्रेस वास्तव में स्वतंत्र है” था और इसका प्रकाशन मूलरूप से जनवरी 1979 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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