नई दिल्ली में हुए जिस विरोध प्रदर्शन के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ, उसे अगर राजनीति के नज़रिए से देखा जाए तो यह समझ में आता है, लेकिन, उस आंदोलन की मांगों, नारों और सरकार के जवाब को लेकर चल रही बहसों से कहीं ज्यादा गहरी बात भी इससे जुड़ी है.
इस आंदोलन को समझने वाले कई लोगों को लगता है कि पूरे मामले में प्रदर्शनकारियों का रवैया सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात थी. वे युवा सत्ता से जिस तरह सवाल पूछ रहे थे, जिस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, इंटरनेट की संस्कृति को सामूहिक आंदोलन में बदलने में जिस तरह माहिर थे और पारंपरिक राजनीतिक सत्ता के ढांचे के प्रति उनकी साफ उदासीनता की तारीफ भी हुई और इसे लेकर चिंता भी जताई गई. इस तरह ज्यादातर सार्वजनिक बहस ‘जेन-जी’ (Gen Z) पर राय जानने जैसी बन गई.
यह गलत होगा. इन विरोध प्रदर्शनों को सिर्फ राजनीतिक घटना के तौर पर नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय घटना के तौर पर भी देखा जाना चाहिए. ये एक ऐसी पीढ़ी को सामने लाते हैं, जिसका सत्ता के साथ संबंध उन सामाजिक परिस्थितियों से बना है जो उन परिस्थितियों से बिल्कुल अलग थीं, जिनसे आज के मैनेजर, नीति बनाने वाले और संस्थानों के नेता प्रभावित हुए थे. यही लोग अब इस पीढ़ी को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
इन दोनों के बीच का अंतर किसी एक विरोध प्रदर्शन की राजनीति से खत्म नहीं होगा. आने वाले दशकों में भारत के कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों की पहचान पर इन अंतरों का असर बना रहेगा.
सत्ता को लेकर अलग-अलग समझ
यह टकराव वर्कप्लेस तक पहले ही पहुंच चुका है. आज भारतीय कंपनियों को चला रहे ज्यादातर वरिष्ठ नेता जेन-जी के लोग हैं या ‘मिलेनियल जेनरेशन’ के उम्रदराज लोग हैं. उन्होंने उस समय काम शुरू किया था, जब संगठन में पदानुक्रम पर शायद ही कोई सवाल उठाया जाता था. सत्ता मुख्य रूप से पद के आधार पर तय होती थी. अनुभव का सम्मान किया जाता था. संगठन में ऊपर से नीचे की ओर जानकारी पहुंचती थी और सभी को बराबर जानकारी नहीं मिलती थी. कर्मचारी यह मानकर चलते थे कि रणनीति से जुड़े फैसले उनके अधिकार से बाहर होंगे, क्योंकि सत्ता की वैधता पर शायद ही सवाल उठाया जाता था. संगठन में काम एक ऐसे समझौते के आसपास चलता था, जिसमें वफादारी और अनुशासन के साथ काम करने के बदले आखिर में मजबूती, तरक्की और लंबे समय की नौकरी की सुरक्षा मिलने की उम्मीद होती थी.
आज, ‘जेन-जी’ ने सत्ता के काम करने के तरीके को लेकर बिल्कुल अलग समझ के साथ कार्यस्थलों में कदम रखा है. इस अंतर को सिर्फ उम्र के आधार पर नहीं समझा जा सकता. इसकी जड़ें उन परिस्थितियों में हैं, जिनमें इस पीढ़ी का सामाजिक विकास हुआ है. पिछली पीढ़ी के उलट जेन-जी ने अपने शुरुआती साल संस्थानों के पदानुक्रम के बीच नहीं, बल्कि डिजिटल नेटवर्क के अंदर बिताए हैं. इन नेटवर्कों के ढांचे ने ज्ञान, सही होने और प्रभाव को लेकर उनकी सोच को बनाया है.
एल्गोरिदम औपचारिक पहचान या पद को खास महत्व नहीं देता. हर विचार एक ही स्क्रीन पर दूसरे विचारों से मुकाबला करता है. चाहे वह प्रोफेसर हो, कैबिनेट मंत्री हो, कोई कंपनी का संस्थापक हो या कोई गुमनाम कंटेंट क्रिएटर, सभी को डिजिटल दुनिया में एक जैसी जगह मिलती है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विशेषज्ञता के बजाय सक्रियता को, सहमति के बजाय असहमति को और आदेश मानने के बजाय अपनी सोच को ज्यादा महत्व देते हैं. प्रभाव पद के नाम से नहीं, बल्कि दूसरों को अपनी बात समझाने की क्षमता से बनता है.
समय के साथ इसने लोगों के सोचने के तरीके को बदल दिया है. अब सत्ता को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता कि किसी व्यक्ति के पास पद है. उसे लगातार यह साबित करना पड़ता है कि वह सही है. इस बात को अनुभव से मिले आंकड़ों का भी समर्थन मिला है. डिलॉइट के 2025 के ‘Gen Z and Millennial’ सर्वे में पाया गया कि 86 फीसदी जेन-जी कर्मचारियों ने उद्देश्य को नौकरी से संतुष्टि के लिए जरूरी बताया. वहीं, 66 फीसदी ने ऐसे संभावित नियोक्ताओं को मना कर दिया, जिनके मूल्य उनके मूल्यों से अलग थे. ये नतीजे जेन-जी को ऐसी पीढ़ी बताने की सोच को चुनौती देते हैं, जो किसी बंधन में नहीं रहना चाहती या काम से बचती है. समस्या काम के प्रति प्रतिबद्धता की नहीं है. समस्या ऐसे संस्थान के प्रति प्रतिबद्धता की है, जो अपनी सही होने की वजह साबित करने में नाकाम रहता है.
नई सामाजिक व्यवस्था को अपनाना
इस अंतर को ध्यान से समझने की ज़रूरत है क्योंकि इससे ऐसे कई व्यवहारों को समझा जा सकता है, जिन्हें संगठन अक्सर गलत तरीके से समझते हैं. जो पीढ़ी संगठन के फैसलों पर आसानी से सवाल उठाती है, उसे अक्सर अनुशासनहीन माना जाता है. जो पीढ़ी लगातार फीडबैक चाहती है, उसे बेसब्र कहा जाता है. संगठन के प्रति कम निष्ठा को प्रतिबद्धता की कमी माना जाता है.
लेकिन इस तरह का व्यवहार एक साफ सोच से पैदा होता है. अगर सत्ता पद के बजाय योग्यता से आती है, तो सवाल पूछना अवहेलना नहीं बल्कि जुड़ाव दिखाने का तरीका बन जाता है. अगर ज्ञान लगातार बदल रहा है, तो फीडबैक सिर्फ एक तरफ से नहीं हो सकता. अगर करियर संगठन के बजाय व्यक्ति का है, तो निष्ठा हमेशा के लिए नहीं बल्कि कुछ शर्तों पर आधारित हो जाती है.
इससे पैदा होने वाला तनाव ढांचे से जुड़ा हुआ है. संगठन पदानुक्रम के आधार पर काम करते रहेंगे, क्योंकि जटिल व्यवस्थाओं में यह साफ होना जरूरी है कि किसकी जिम्मेदारी क्या है. फैसलों को हमेशा लोकतांत्रिक नहीं बनाया जा सकता, अगर ऐसा करने से काम की गति, एकरूपता और जिम्मेदारी प्रभावित होती हो. हर प्रभावी संस्थान आखिर में ऐसे अधिकारों पर निर्भर करता है, जिन्हें फैसले लेने के लिए मान्यता मिली हुई है.
इसके साथ ही, युवा कर्मचारी चाहते हैं कि फैसले लेने का अधिकार सिर्फ दिखाया न जाए, बल्कि लगातार समझाया भी जाए. मैनेजमेंट की यह पुरानी आदत कि वह पद या सीनियरिटी का हवाला देकर अपनी बात मनवाए, उन कर्मचारियों के बीच उसकी बात मनवाने की ताकत कम कर देती है, जो सत्ता के हर दावे पर सवाल उठाने के आदी हैं.
इससे आज के मैनेजरों पर एक नई तरह की जिम्मेदारी आती है. चुनौती यह नहीं है कि पदानुक्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए और न ही यह है कि कर्मचारियों से बिना सवाल किए आदेश मानने की मांग की जाए. दोनों कोशिशें बदलाव की प्रकृति को गलत समझने का नतीजा होंगी. संस्थानों के प्रभावी तरीके से काम करने के लिए पदानुक्रम ज़रूरी रहेगा. बदलाव यह हो रहा है कि पदानुक्रम को सही मानने का आधार बदल रहा है.
पद के साथ पहले जो सत्ता अपने आप मिल जाती थी
पद के साथ पहले जो सत्ता अपने आप जुड़ जाती थी, अब वह योग्यता, पारदर्शिता, एकरूपता और अपनी बात की विश्वसनीयता के आधार पर मिल रही है. जो मैनेजर मुश्किल फैसलों को बिना अपना प्रभाव खोए अच्छी तरह समझा सकेगा, वह उस मैनेजर से ज्यादा प्रभावशाली माना जाएगा जो सिर्फ अपने पद के सहारे अपनी बात मनवाने की कोशिश करेगा.
व्यवसायों का इतिहास बार-बार यह दिखाता रहा है कि संगठन अक्सर इसलिए नाकाम होते हैं क्योंकि उनके मैनेजमेंट की सोच समाज में आए बदलाव के साथ नहीं बदल पाती. जेन-जी का उभार बताता है कि अब ऐसा ही एक दौर सामने है. कार्यस्थलों पर सिर्फ युवा कर्मचारी नहीं आ रहे हैं. वे सत्ता को लेकर पूरी तरह अलग समाजशास्त्र के साथ आ रहे हैं. इसलिए जेन-जी को संभालना सिर्फ नए कर्मचारियों के हिसाब से खुद को बदलने का मामला नहीं है. यह नई सामाजिक व्यवस्था को समझने का मामला है.
सुरेश प्रभु पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद हैं. शोभित माथुर ऋषिहुड यूनिवर्सिटी के को-फाउंडर और वाइस-चांसलर हैं. यह लेखकों के निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)