एक सार्वजनिक मामलों के विद्यार्थी के रूप में, न कि एक अर्थशास्त्री के रूप में, मुझे भारतीय योजना व्यवस्था में तीन अच्छी बातें दिखाई देती हैं. पहली, इसकी पद्धति और विषय-वस्तु पर मतभेद हो सकते हैं, फिर भी इसका उद्देश्य उन गरीब लोगों के जीवन स्तर को उठाना है जो अत्यन्त गरीबी में जी रहे हैं. दूसरी, इसने देश में आर्थिक परिस्थितियों को सुधारने और औद्योगीकरण को बढ़ाने के प्रति एक जागरूकता पैदा की है, चाहे इस जागरूकता की सीमा पर बहस होती रही हो. तीसरी, योजनाओं ने कुल मिलाकर लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान किया है, यद्यपि निजी संपत्ति जैसी संस्थाओं को राष्ट्रीयकरण और संविधान के अनुच्छेद 31 में संशोधन के माध्यम से आघात पहुँचा है, जिसके कारण राज्य द्वारा अधिग्रहित संपत्ति के मुआवज़े को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.
भारत में योजना की आवश्यकता को लगभग सभी स्वीकार करते हैं. मतभेद योजनाओं की तकनीक, उनकी विषय-वस्तु और उनके क्रियान्वयन को लेकर हैं. वर्तमान योजनाओं का उद्देश्य एक मजबूत औद्योगिक आधार तैयार करना और अंततः अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को राज्य के हाथों में सौंपकर समाजवादी ढाँचा स्थापित करना है. लेकिन एक दूसरा विचारधारा समूह इस बात से सहमत नहीं है. उसका मानना है कि कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि एक समृद्ध कृषि क्षेत्र के आधार पर मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्था विकसित हो सके. साथ ही, आर्थिक गतिविधियों को समग्र योजना, दिशा और नियंत्रण के अधीन रखते हुए निजी नागरिकों द्वारा संचालित होने दिया जाना चाहिए, और राज्य की भागीदारी केवल उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित रहनी चाहिए जहाँ निजी क्षेत्र कार्य करने में असमर्थ हो या जोखिम लेने को तैयार न हो. यह लेख इन दोनों विचारों के गुण-दोषों की चर्चा नहीं करेगा, बल्कि भारतीय योजना व्यवस्था में आर्थिक और राजनीतिक विचारों के संतुलन की समस्या पर ध्यान देगा.
योजना का मुख्य उद्देश्य सीमित संसाधनों को एकत्रित करके उनका सर्वोत्तम उपयोग करना है ताकि कम-से-कम समय में राष्ट्रीय संपत्ति को बढ़ाया जा सके और तीव्र आर्थिक विकास हो सके. लेखक के अनुसार भारत इस दिशा में कई तरह से असफल रहा है और इसका मुख्य कारण आर्थिक विचारों पर राजनीतिक विचारों का हावी हो जाना है. उदाहरण के रूप में वह राज्य-उद्यमों का उल्लेख करता है.
सबसे पहला मुद्दा राज्य-उद्यमों में निवेश पर मिलने वाले प्रतिफल का है. यह याद रखना चाहिए कि इन उद्यमों में लगाया गया धन जनता की बचत से आता है, जिसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से एकत्र किया जाता है. इसलिए इन दुर्लभ संसाधनों का उपयोग राष्ट्रीय संपत्ति बढ़ाने के लिए सबसे अच्छे तरीके से होना चाहिए. अन्यथा यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बन जाता है, क्योंकि यही बचत यदि निजी हाथों में रहती तो उससे कहीं अधिक लाभ उत्पन्न कर सकती थी. वित्त मंत्री के एक बयान के अनुसार 73 सरकारी उपक्रमों में 709 करोड़ रुपये के निवेश पर 1961-62 में केवल 0.3 प्रतिशत लाभ हुआ. अगले वर्ष भी स्थिति सुधरने की आशा नहीं थी. लेखक का कहना है कि इनमें से कई उद्यम केवल राजनीतिक कारणों से स्थापित किए गए थे और इस कारण आर्थिक उद्देश्यों की उपेक्षा हुई.
लेखक एक सरकारी साइकिल कारखाने का उदाहरण देता है. लगभग ढाई वर्षों में इस कारखाने ने केवल 18 साइकिलें बनाईं जबकि उसकी क्षमता प्रतिवर्ष 72,000 साइकिलें बनाने की थी. प्रत्येक साइकिल की लागत लगभग 16,000 रुपये पड़ी. जिन संसाधनों से लाखों साइकिलें बन सकती थीं, उनसे केवल 18 साइकिलें बनाई गईं. लेखक के अनुसार ऐसे आंकड़ों के सामने आर्थिक प्रगति की योजनाओं की बातें शर्मनाक प्रतीत होती हैं.
इसके बाद लेखक सरकारी एकाधिकार की समस्या उठाता है. वह भारतीय जीवन बीमा निगम और इंडियन एयरलाइंस कॉरपोरेशन जैसी संस्थाओं का उदाहरण देता है. 1961 के पर्यटन मौसम में लोगों को हवाई टिकट पाने के लिए कई-कई सप्ताह प्रतीक्षा करनी पड़ी. इससे न केवल उपभोक्ताओं को कठिनाई हुई बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचा क्योंकि लोगों को एक आवश्यक सेवा आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकी. लेखक का मानना है कि एकाधिकार व्यवस्था कार्यकुशलता को नष्ट कर देती है क्योंकि उसकी तुलना करने के लिए कोई मानदंड नहीं होता. यदि राजनीतिक विचार इतने प्रभावशाली न होते तो इन सेवाओं को एकाधिकार के आधार पर स्थापित नहीं किया जाता.
तीसरा पहलू, जो पहले दो से उत्पन्न होता है, उतना ही महत्वपूर्ण है. किसी भी उद्यम के किफायती संचालन में,
जवाबदेही तय करना एक प्रमुख सिद्धांत है. स्पष्ट रूप से, इस सिद्धांत की राज्य उद्यमों के साथ-साथ योजना के अन्य क्षेत्रों में भी पूरी तरह से अनदेखी की जाती है. यहां तक कि जहां घोर कुप्रबंधन और राष्ट्रीय खजाने को नुकसान होता है, वहां चूक और कुकर्मों के लिए कोई जिम्मेदारी तय नहीं की जाती है, और परिणामस्वरूप दोषियों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाती है. संसद की लोक लेखा समिति की 42वीं रिपोर्ट इस बिंदु पर जोर देती है और कहती है कि “अनुशासनात्मक कार्रवाई पर बार-बार जोर देने के बावजूद, स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है.” इस कमी को तत्काल दूर करने की आवश्यकता है, इससे पहले कि जनता में निराशा की भावना पैदा हो जाए और वह इस विचार को स्वीकार कर ले कि सरकार में क्या किया जाता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कैसे किया जाता है.
चौथा पहलू राजनीतिक नियुक्तियों का है. दुर्भाग्यवश, सरकारी उद्यमों के अध्यक्ष पदों का उपयोग उन राजनेताओं को पद प्रदान करने के लिए किया जाता है भले ही उनके पास आवश्यक अनुभव या योग्यता न हो. ये व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कितने भी अच्छे क्यों न हों, उन्हें वाणिज्यिक उद्यमों का प्रभार देना न केवल आर्थिक हितों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय के भी विरुद्ध है. सार्वजनिक क्षेत्र में स्थान सुरक्षित करने के लिए प्रतिभा के बजाय राजनीतिक प्रभाव को प्राथमिकता दी जाती है, जो सामाजिक न्याय के विरुद्ध है.
अंत में लेखक कहता है कि उसने केवल कुछ उदाहरण दिए हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि भारतीय योजनाओं में राजनीतिक विचार आर्थिक विचारों पर हावी हो गए हैं. इससे योजना का मूल उद्देश्य — सीमित संसाधनों का सही उपयोग करके तीव्र और व्यापक आर्थिक विकास करना — कमजोर पड़ गया है. इसलिए जितनी जल्दी इस विकृति को दूर किया जाएगा, उतना ही देश के लिए बेहतर होगा.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “आर्थिक पहलू की प्रधानता” था जो सितंबर 1962 में प्रकाशित हुई थी. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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