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Saturday, 23 May, 2026
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लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सुब्रमणि बतौर CDS—सही व्यक्ति, लेकिन प्रक्रिया गलत

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद पर जनरल अनिल चौहान और ले.जनरल एन.एस. सुब्रमणि की नियुक्तियों को लेकर विवाद सरकार की अपारदर्शी, ‘मेरिट आधारित’ चयन प्रक्रिया की देन है.

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सरकार ने सेना के पूर्व ‘वाइस चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ’ और ‘सेंट्रल आर्मी कमांडर’, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एन.एस. सुब्रमणि को ‘चीफ ऑफ द डिफेंस स्टाफ’ (CDS) के पद पर नियुक्त करने की घोषणा 9 मई को कर दी. वे 31 मई को तीसरे CDS के रूप में पदभार संभालेंगे. फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) में सैन्य सलाहकार के पद पर कार्यरत ले.जनरल सुब्रमणि ऐसी निर्णायक घड़ी में CDS का पदभार संभालने जा रहे हैं जब भारत अपनी सेना में बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है. उन्हें विरासत में मिली है तीनों सेनाओं के एकीकरण की योजना, जिसे दो पूर्व CDS और एक दर्जन सेना अध्यक्षों ने साढ़े छह वर्षों तक विचार-विमर्श करके तैयार किया है. सरकार जब इस योजना को मंजूरी दे देगी उसके बाद इसे को लागू करने की ज़िम्मेदारी ले.जनरल सुब्रमणि पर होगी.

उनका केरियर उन ‘थिएटर्स’ में काम करने का रहा है जिनका निर्माण वे करेंगे. इसके अलावा उन्हें उच्च स्तरों पर निर्णय प्रक्रिया और सरकार के राजनीतिक कामकाज का भी अनुभव रहा है. वे पश्चिमी थिएटर में ‘स्ट्राइक कोर’ के कमांडर रह चुके हैं. उत्तरी थिएटर में वे उत्तर-पूर्व में एक डिवीजन का कमांडर रहे, उत्तरी कमांड में वे चीफ ऑफ स्टाफ की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं, और सेंट्रल कमांड में आर्मी कमांडर रह चुके हैं. वे उत्तर-पूर्व के अलगाववाद विरोधी क्षेत्र में एक यूनिट की कमान संभाल चुके हैं. इसके अलावा वे कज़ाखस्तान में सैन्य सलाहकार रहे, और मिलिटरी इंटेलिजेंस के डिप्टी डाइरेक्टर के रूप में भी वे सेवाएं दे चुके हैं.

ब्रिटेन, जहां CDS लागू है वहां के ‘ज्वाइंट सर्विसेज कमांड ऐंड स्टाफ कॉलेज’ में भी वे जा चुके हैं. शीर्ष पदों में, वे वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रह चुके हैं और तीनों सेनाओं के सफल युद्ध अभियान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान वे निर्णय एवं समन्वय प्रक्रिया में हिस्सा ले चुके हैं. ‘NSCS’ के सैन्य सलाहकार के रूप में उनके कार्यकाल ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के राजनीतिक, कूटनीतिक, और मंत्रालयों के आपसी तालमेल से जुड़े पहलुओं को समझने का मौका दिया. सेवानिवृत्ति के बाद  ‘डीप सेलेक्शन’ के जरिए उनकी नियुक्ति बताती है कि सरकार को उन पर भरोसा है.

मैं आगे बढ़कर कहना चाहूंगा कि CDS के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान भारतीय सेनाओं में परिवर्तन की समन्वित शुरुआत होगी.

लेकिन आश्चर्य नहीं कि ले.जनरल सुब्रमणि की नियुक्ति भी उनके पूर्ववर्ती CDS की तरह समान वजहों से विवादों में घिर गई है. इसके लिए मैं पूरी तरह सरकार को दोषी मानता हूं, क्योंकि वह चयन प्रक्रिया को  निष्पक्ष तथा पारदर्शी बनाकर राजनीतिक तथा सैन्य विवादों से आसानी से बच सकती थी.

विवाद की वजह

आलोचकों का आरोप है कि CDS की नियुक्ति का रास्ता ‘NSCS’/’NSA’ से होकर गुजरता है जिसमें ले.जनरल सुब्रमणि और उनके पूर्ववर्ती जनरल अनिल चौहान भी सैन्य सलाहकार थे. कहा जा रहा है कि रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरलों की ओर, जो सेवारत सेना अध्यक्षों के संस्थागत अधिकारों से वंचित रहते हैं, सरकार का झुकाव बताता है कि राजनीतिक आज्ञाकारिता, और सेना को ‘तख्तापलट-रोधी‘ (कूप-प्रूफिंग) बनाने को तरजीह दी जाती है.

सरकार ने जो योग्यता आधारित चयन प्रक्रिया बनाई है वह अपारदर्शी है, जिसमें विश्वसनीयता का अभाव है. सेवारत सेना अध्यक्षों से न केवल दर्जे में बल्कि अक्सर (जैसा कि इस मामले में भी हुआ है) मूल सीनियरिटी में भी जूनियर किसी रिटायर्ड ले.जनरल का चयन न केवल सेना अध्यक्षों को छोटा साबित करता है बल्कि उन संस्थागत मूल्यों को ध्वस्त करता है जिनमें ऊंचे ओहदों के लिए चयन को बहुत पवित्र माना जाता है. इसके अलावा यह भी गौरतलब है कि जिस रिटायर्ड ले.जनरल की पहचान करके चुना गया और ‘NSCS’ में भेजकर तैयार किया गया, राजनीतिक छन्ने से छाना गया और ‘CDS’ नियुक्त किया गया उसी को सरकार की उसी योग्यता आधारित ‘डीप सेलेक्शन’ प्रक्रिया ने उसकी सेवा अवधि के दौरान उसे सेना अध्यक्ष के पद के लिए नहीं चुना.

CDS का मुख्य मिशन तीनों सेनाओं का एकीकरण करने के साथ-साथ एकीकृत थिएटर कमांडों का गठन करना भी है. लगातार तीसरी बार CDS का चयन थलसेना से किया गया है. यह वायुसेना और नौसेना का आत्मविश्वास नहीं बढ़ाता, क्योंकि यह थलसेना के वर्चस्व वाली एकीकृत व्यवस्था को आगे बढ़ाता है.

वैसे, साफ कहा जाए तो पारदर्शिता की कमी के बावजूद सरकार पेशेगत लिहाज से सक्षम अफसरों को CDS और सेना अध्यक्षों के पदों पर नियुक्त करती रही है. इसलिए चिंता की बात यह है कि साढ़े छह साल के बाद भी तीनों सेनाओं के एकीकरण और थिएटर कमांडों के गठन की दिशा में बहुत प्रगति नहीं हुई है. सनद रहे, जनरल अनिल चौहान ने थिएटर कमांडों के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया था उस पर सरकार विचार कर रही है.

चयन प्रक्रिया की खामियां

राजनीतिक नेतृत्व ऊंचे कमांडरों से संपर्क नहीं करती और उसे उनके बारे में काम ही जानकारी रहती है. सरकार को रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों द्वारा तैयार की गई सेना की आकलन सिस्टम पर आधारित डॉसियारों , इंटेलिजेंस ब्यूरो की सूचनाओं, और सुनी गई तारीफ़ों की भ्रामक तुलनाओं पर भरोसा करना पड़ता है. इसे ध्यान में रखते हुए सभी सरकारें ‘सीनियरिटी-कम-मेरिट’ के सिद्धांत पर चलती रही हैं, यानी जब सीनियरिटी को प्राथमिकता दी जाती है तब बहुत वरिष्ठ अफसरों के मामले में मेरिट को समान/सापेक्ष माना जाता है. जब तक ‘मेरिट-कम-सीनियरिटी’ के सिद्धांत पर आधारित पारदर्शी एवं नैतिक चयन व्यवस्था के तहत मेरिट को प्राथमिकता, और दावेदारों के बीच वरिष्ठता को सापेक्ष नहीं माना जाता तब तक ‘मेरिट-कम-सीनियरिटी’ के सिद्धांत में छेड़छाड़ राजनीतिक रूप से विवादास्पद बना रहेगा.

योग्यता आधारित ‘डीप सेलेक्शन’ प्रक्रिया की तलाश में वर्तमान और पिछली सरकारों ने ‘सीनियरिटी-कम-मेरिट’ व्यवस्था का आठ बार उल्लंघन किया है—दो बार CDS के चयन में और छह बार सेना अध्यक्षों की नियुक्ति में, जिसके कारण राजनीतिक पक्षपात के आरोप उछाले जाते रहे हैं.

जून 2022 में, ‘डीप सेलेक्शन’ का हवाला देते हुए सरकार ने यह अधिसूचना जारी की कि लेफ्टिनेंट जनरल या जनरल रैंक के 62 से कम उम्र के सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारी ‘CDS’ के पद पर नियुक्त किए जाने के योग्य माने जाएंगे. यह तब किया गया जब तीन सेनाध्यक्षों, और जरूरत हो तो 23 लेफ्टिनेंट जनरल (आर्मी कमांडरों या समान रैंक के अफसरों) का समूह उपलब्ध था जिनका चयन खुद सरकार ने किया था. अगर ‘डीप सेलेक्शन’ का प्रयोग किया जाता तो लेफ्टिनेंट जनरल सुब्रमणि को ही 2024 में ‘चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ’ (COAS) नियुक्त किया जा सकता था. इसके बावजूद उन्हें तभी CDS नियुक्त किया जा सकता है जैसे अब किया गया है.

जल्दी ही यह जाहिर हो गया कि यह अधिसूचना एक खास रिटायर्ड अफसर, जनरल अनिल चौहान को ‘CDS’ बनाने के मकसद से जारी की गई थी. यही प्रक्रिया ले.जनरल सुब्रमणि के चयन में भी अपनाई गई है. समस्या इसलिए गहरी हो जाती है कि ‘CDS’ बनाए जाने से पहले ये दोनों अफसर ‘NSCS’/’NSA’ के सैन्य सलाहकार थे. यह ‘राजनीतिक प्रशिक्षण’ के आरोप को मजबूत करता है. सरकार के कामकाज के व्यापक अनुभव की जरूरत को जायज ठहराना सिविल-मिलिटरी रिश्ते से जुड़े व्यापक मसले के मामले में अनुपयुक्त लगता है और यह सरकार और सेना के बीच अलगाव का संकेत देता है. व्यापक अनुभव की जरूरत सेवारत अफसरों को ‘NSCS’ और दूसरे मंत्रालयों में डेपुटेशन पर भेजकर पूरी की जा सकती है.

सेना अध्यक्षों और CDS की नियुक्तियों के लिए फिलहाल कोई विशेष शर्त, क्षमता, या योग्यता निर्धारित नहीं है. आर्मी कमांडरों (और उनके समकक्षों) की नियुक्ति के लिए सेनाओं के अंदर कोई विस्तृत ‘एप्रेजल’ नहीं किया जाता, न ही सेना अध्यक्षों के चयन के लिए रक्षा मंत्री द्वारा कोई मूल्यांकन किया जाता है. कहने की जरूरत नहीं कि सेना अध्यक्षों और CDS का चयन अगर वर्तमान स्थितियों के तहत ‘मेरिट’ के आधार पर किया जाता है तो वह व्यक्तिनिष्ठ ही होगा.

सेनाओं के अंदर जिस ‘एप्रेजल सिस्टम’ के तहत ले.जनरल रैंक के जिन अफसरों का चयन किया जाता है, जिनमें आर्मी कमांडर/उनके समकक्ष शामिल हैं और जो CDS पद के दावेदार माने जा सकते हैं, उस सिस्टम में सुधार करने की जरूरत है. मौजूदा सिस्टम व्यक्तिनिष्ठता से, मूल्यांकन करने वालों के स्वरूप में खामियों से ग्रस्त है. यह नैतिक साहस को प्रभावित करता है; और रेजिमेंट, सेना, तथा एसोसिएशन से जुड़ी संकीर्णता से ग्रस्त है. इसका परिणाम यह है कि वार्षिक ‘कनफिडेंशियल रिपोर्टों और ऐसे ‘सुयोग्य अफसरों की बाढ़ आ जाती है जो सीमित संख्या में उपलब्ध सीनियर रैंकों के दावेदार बन जाते हैं. इसलिए, सेनाओं के अंदर ही सच्ची योग्यता पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है.

सिस्टम को सुधारो

मुझे इस सवाल का कोई जवाब नहीं सूझता कि सरकार रक्षा महकमे के उच्च पदों के राजनीतिकरण के आरोप को क्यों आमंत्रित करती है, जबकि योग्यता और व्यापक अनुभव से संबंधित सभी जायज जरूरतों को सेनाओं के अंदर और सरकार के स्तर पर मूल्यांकन और चयन की व्यवस्थाओं में सुधार करके पूरा किया जा सकता है.

तीनों सेनाओं के एकीकरण के मद्देनजर एक साझा एप्रेजल सिस्टम की जरूरत है, जो ब्रिगेडियर और उसके बराबर के रैंक से लेकर ऊपर के रैंकों पर लागू हो. इसमें सेना-आधारित मूल्यांकन समाहित हो. कमांड और स्टाफ की सभी नियुक्तियों के लिए कसौटियों और क्षमताओं की भी समीक्षा करने और उनका सुधार करने की जरूरत है, खासकर ले.जनरल और इससे ऊपर CDS तक के पदों के लिए.

इसके साथ ही, ऊंचे रैंक के अफसरों की पहचान और प्रशिक्षण के लिए ‘डीप सेलेक्शन’ की सिस्टम तैयार करने की जरूरत है. इसके लिए बेहतर यह होगा कि हरेक उच्च रैंक के लिए तीन साल की अवधि तय की जाए. चयन के हर स्तर पर योग्यता के मूल्यांकन के लिए तीनों सेनाओं के लिए साझा सिस्टम बनाना बहुत जरूरी है. मेजर जनरल या उसके समान रैंक के योग्य अफसरों को ‘NSCS’ और दूसरे मंत्रालयों में तैनात करके उन्हें व्यापक अनुभव हासिल करने दिया जाना चाहिए.

‘CDS’ और तीनों सेनाओं के अध्यक्षों को लेकर एक ‘सीनियर अफसर्स मैनेजमेंट कमिटी’ गठित की जानी चाहिए, जिसकी सहायता के लिए स्टाफ उपलब्ध हो. यह कमेटी आर्मी कमांडर और इसके बराबर के पदों पर नियुक्ति के लिए सभी ले.जनरलों और इस पद के बराबर के अफसरों की क्षमताओं का मूल्यांकन करें. बाद में इन्हें विशिष्ट क्षमताओं और योग्यताओं के आधार पर थिएटर कमांडर के पदों पर नियुक्त किया जा सकता है. उनका औपचारिक इंटरव्यू भी आयोजित किया जाना चाहिए.

सेनाओं का अध्यक्षों और CDS के चयन के लिए भी सरकार स्वतंत्र रूप से ऐसी प्रक्रिया अपनाए. वह CDS की नियुक्ति के लिए योग्यता शर्तों की भी समीक्षा करे. यह आर्मी कमांडरों और उनके बराबर के पदों तक, और आगे चलकर थिएटर कमांडरों तथा तीनों सेनाओं के अध्यक्षों के पदों तक ही सीमित रहे. सेवानिवृत्त अफसरों की ‘रीकमीशनिंग’ (फिर सेवा में लेने) की प्रथा बिलकुल बंद होनी चाहिए.

भविष्य में सेना अध्यक्षों और CDS का चयन करने के लिए रक्षा मंत्री के अधीन एनएसए, कैबिनेट सेक्रेटरी, और CDS को मिलाकर एक कमिटी गठित की जाए. यह कमिटी डॉशियरों की जांच करे, कथित तारीफ़ों की जांच करे, प्राथमिकता के क्रम से तीन नामों की सूची बनाने के लिए अफसरों के इंटरव्यू करे. अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली नियुक्ति कमिटी के जिम्मे छोड़ दिया जाए.

इस बात में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि एक लोकतांत्रिक देश में CDS और सेनाओं के अध्यक्षों की नियुक्ति राजनीतिक स्वरूप वाली सरकार का विशेषाधिकार है.

यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि सैन्य नेतृत्व में ‘बराबर वालों में अग्रणी’ कोई-न-कोई हमेशा रहेगा. जैसा कि युद्ध में होता है, सेनाओं में परिवर्तन के तहत गिनती ‘सबसे सीनियर’ की नहीं बल्कि ‘सबसे योग्य’ जनरल की ही होगी. एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए चुनौती निष्पक्ष, पारदर्शी और नैतिक प्रक्रिया के तहत ‘असली शख्स’ को खोज निकालने की है.

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC-IN-C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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