नई दिल्ली: 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली, तो वे अपने भरोसेमंद अधिकारियों को गुजरात से साथ लेकर आए. तब से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का नाम बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के एक विश्वसनीय कानून अधिकारी के रूप में उभरकर सामने आया है.
जब बीजेपी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सत्ता में आया, तब 2014 में मेहता को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) नियुक्त किया गया. वे जल्दी ही आगे बढ़े और अक्टूबर 2018 में भारत के दूसरे सबसे वरिष्ठ कानून अधिकारी, यानी सॉलिसिटर जनरल, बना दिए गए. 2023 में उन्हें फिर से तीन साल के लिए नियुक्त किया गया और अब एक बार फिर उन्हें तीन साल के नए कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया है.
इस तरह मेहता सॉलिसिटर जनरल के पद पर कुल 11 साल पूरे कर चुके हैं. यह रिकॉर्ड सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले सी.के. दफ्तरी से सिर्फ दो साल कम है, जो 1950 से 1963 तक 13 साल इस पद पर रहे थे.
लेकिन आखिर ऐसी क्या बातें हैं जो मेहता को मोदी सरकार के लिए इतना जरूरी बनाती हैं?
वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि मेहता की अपने काम के प्रति वफादारी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का उन पर वर्षों से भरोसा, अदालत में सरकार की “सही राजनीतिक लाइन” रखने की क्षमता, और अदालत में “सरकार की आवाज” बनकर बोलने की योग्यता उन्हें खास बनाती है.
एक वरिष्ठ वकील, जिन्होंने मेहता के साथ करीब से काम किया है, नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, “वह भारत के इतिहास के सबसे प्रभावी सॉलिसिटर जनरल हैं. सरकार के लिए उन्होंने जितने बड़े मामलों में सफलता दिलाई है, वह अविश्वसनीय है. सरकार के किसी भी कानून अधिकारी ने इतने लगातार अच्छे नतीजे नहीं दिए.”
2014 के बाद से मेहता ने कई बड़े मामलों में सरकार का पक्ष रखा. इनमें सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 हटाने का मामला, इलेक्टोरल बॉन्ड मामला, विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (पीएमएलए) की धाराओं को चुनौती देने वाला मामला, रामजन्मभूमि भूमि विवाद, कोविड-19 मरीजों के इलाज और अस्पतालों में शवों के सम्मानजनक प्रबंधन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान मामले, रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार भेजने का मामला, ऑनलाइन मनी गेमिंग पर 28 प्रतिशत जीएसटी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सही ठहराने का मामला, वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता, विवाह समानता मामला, आधार मामला, ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामला और हाल ही में टेलीग्राम मैसेजिंग ऐप पर सरकार के प्रतिबंध का मामला शामिल हैं.
उस वरिष्ठ वकील ने दिप्रिंट से कहा, “सरकार की रणनीति में वह सबसे अहम हिस्सा हैं.”
‘अपने काम के प्रति वफादार’
अहमदाबाद के सर एल.ए. शाह लॉ कॉलेज में पढ़ाई करने वाले मेहता ने अपने करियर की शुरुआत वरिष्ठ वकील कृष्णकांत वाखारिया के चैंबर से की थी.
गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील निरुपम नानावटी, जिन्होंने मेहता के साथ काम किया है, उन्हें “मेहनती और पढ़ाई में गंभीर” वकील बताते हैं.
नानावटी के अनुसार, मेहता की सबसे खास बात यह है कि वे “अपने ब्रीफ के प्रति वफादार” रहते हैं.
वे कहते हैं, “वह अपने केस पर पूरी मेहनत करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि मामला उनके मुवक्किल के हित में सबसे अच्छे तरीके से लड़ा जाए.”
उन्होंने याद किया कि वाखारिया गुजरात कांग्रेस के कानूनी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे और भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) से भी जुड़े थे. लेकिन राजनीतिक विचारधारा उनके पेशेवर रिश्ते के बीच नहीं आई. 2021 में मेहता ने वाखारिया का सम्मान करते हुए उन्हें अपना “पिता समान” बताया था और अपनी सभी उपलब्धियों का श्रेय उन्हें दिया था.
2008 में जब मेहता गुजरात के अतिरिक्त महाधिवक्ता बने, तब उन्होंने सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में गुजरात सरकार की ओर से मुख्य वकील की भूमिका निभाई. इस मामले में अमित शाह आरोपी थे.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने उस दौरान गुजरात सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की थी और कहा था कि राज्य सरकार ने मामले में “टकराव वाला रवैया” अपनाया है. 2014 में मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने शाह को इस मामले से बरी कर दिया था.
यह भी माना जाता है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने की योजना बनाने और उसे कानूनी रूप देने में मेहता की अहम भूमिका थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी उन्होंने सरकार का पक्ष रखा.
2023 में जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को सही ठहराया, तब मेहता ने कहा था, “5 अगस्त 2019 से पहले अनुच्छेद 370 को संवैधानिक और कानूनी तरीके से समाप्त करने की प्रक्रिया में शामिल होने वाला मैं एकमात्र वकील था. संविधान बेंच के सामने इस प्रक्रिया का बचाव करने का अवसर भी मुझे मिला. इसलिए यह मेरे लिए भी एक ऐतिहासिक दिन है.”
‘सरकार की आवाज’
अक्टूबर 2018 में मेहता को सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया. इससे पहले अक्टूबर 2017 में रंजीत कुमार के इस्तीफे के बाद यह पद एक साल तक खाली रहा था.
एक दूसरे वरिष्ठ वकील बताते हैं कि उस समय एएसजी मनींदर सिंह भी इस पद की दौड़ में थे. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “आखिर में फैसला इसलिए मेहता के पक्ष में गया क्योंकि अमित शाह उन्हें चाहते थे.”
मेहता की नियुक्ति वाले दिन ही मनींदर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
अदालत के अंदर वकीलों का कहना है कि जब किसी मामले में मेहता मौजूद होते हैं तो उससे संकेत मिलता है कि वह मामला सरकार के लिए बहुत जरूरी है.
एक वरिष्ठ वकील कहते हैं, “तुषार मेहता अदालत में जजों तक सरकार की बात पहुंचाने में बहुत सक्षम हैं. वे मुझे कांग्रेस सरकार के दौर के के. पारासरण की याद दिलाते हैं. उनकी आवाज भी सरकार की आवाज मानी जाती थी. जज जानते थे कि अगर वे कुछ कह रहे हैं तो वही सरकार की इच्छा है.”
वे आगे कहते हैं, “मेहता की मौजूदगी से मामले की अहमियत समझ में आ जाती है. उन्हें ऐसा व्यक्ति माना जाता है जिसकी सरकार के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच है.”
अमित शाह और मेहता की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है. पिछले महीने नई दिल्ली में मेहता की लिखी दो किताबों के लॉन्च में शाह चीफ गेस्ट थे.

अपने भाषण में शाह ने कहा कि उन्हें चेतावनी दी गई थी कि उनका भाषण “तुषार मेहता के पुराने दोस्त” के रूप में नहीं बल्कि सरकार और अदालत के रिश्ते के रूप में देखा जाएगा.
सॉलिसिटर जनरल की फीस
फरवरी 2026 में केंद्र सरकार द्वारा जारी संशोधित फीस ढांचे के अनुसार, भारत के सॉलिसिटर जनरल को हर महीने 96,000 रुपये रिटेनर फीस मिलती है. इसके अलावा वे सरकार के मामलों में पेशी और काम के आधार पर अलग फीस भी प्राप्त करते हैं.
उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के कानून अधिकारियों को दिल्ली के बाहर पेश होने पर प्रति केस रोजाना 96,000 रुपये मिलते हैं. मुकदमों, रिट याचिकाओं, अपीलों और संदर्भ मामलों में पेशी के लिए प्रति केस प्रतिदिन 38,000 रुपये और विशेष अनुमति याचिकाओं व अन्य आवेदनों के लिए प्रति केस प्रतिदिन 24,000 रुपये दिए जाते हैं.
सितंबर 2022 में जारी एक अधिसूचना के जरिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश मामलों के आवंटन की शक्ति सॉलिसिटर जनरल के हाथों में केंद्रित कर दी गई.
इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में रोज आने वाले मामलों की सूची पहले भारत के अटॉर्नी जनरल के पास जाती है. वे तय करते हैं कि किन मामलों में उनकी उपस्थिति जरूरी है.
इसके बाद सूची सॉलिसिटर जनरल के पास जाती है. फिर वे तय करते हैं कि कौन सा मामला वे खुद लड़ेंगे, कौन सा मामला एएसजी को देंगे, किन मामलों में एएसजी उनके साथ या अटॉर्नी जनरल के साथ पेश होंगे और किन मामलों को अन्य वकीलों को सौंपा जाएगा.
‘सही राजनीतिक लाइन’
उस वरिष्ठ वकील का कहना है कि मेहता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे अपने मामलों में “सही राजनीतिक लाइन” अपनाते हैं और कानून तथा राजनीति का संतुलित मिश्रण पेश करते हैं.
यह राजनीतिक दृष्टिकोण अक्सर उनके अदालत में दिए गए तर्कों में दिखाई देता है.
कोविड-19 के दौरान प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के समय मेहता ने अप्रत्यक्ष रूप से संकट की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की तुलना गिद्धों से की थी. उन्होंने हाई कोर्ट्स पर भी आरोप लगाया था कि वे राज्य सरकारों से सवाल पूछकर “समानांतर सरकारें” चला रहे हैं.
उन्होंने मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश करने वाले पक्षों की मंशा पर भी सवाल उठाए थे. उन्होंने उन्हें “निराशा फैलाने वाले भविष्यवक्ता” कहा था और आरोप लगाया था कि वे सिर्फ “नकारात्मकता, नकारात्मकता और नकारात्मकता” फैला रहे हैं.
2019 में अयोध्या फैसले का स्वागत करते हुए मेहता ने इसे “बौद्धिक परिपक्वता का दुर्लभ उदाहरण” बताया था. उन्होंने कहा था, “यह ऐतिहासिक फैसला और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई विस्तृत प्रक्रिया आम लोगों के इस विश्वास को और मजबूत करती है कि उनके अधिकार इस महान न्यायिक संस्था के हाथों में पूरी तरह सुरक्षित हैं.”
हाल ही में ईडी की ओर से पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ आई-पैक पर हुई छापेमारी से जुड़े मामले में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान मेहता और वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली.

गुरुस्वामी ने आरोप लगाया कि अदालत की कार्यवाही का इस्तेमाल एक “बड़ी राजनीतिक पार्टी” अपने सोशल मीडिया अभियान में कर रही है. द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जब मेहता ईडी की ओर से दलील रखने के लिए खड़े हुए तो गुरुस्वामी ने कहा, “मेरे मित्र अदालत की कार्यवाही को राजनीतिक अभियान के लिए सोशल मीडिया हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. माननीय न्यायाधीश यह जानते हैं.”
सिंघल के भतीजे और शाह के बेटे के मामले
सरकारी कानून अधिकारी – अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और एएसजी – आम तौर पर निजी मामलों में पेश नहीं हो सकते. इसके लिए कानून मंत्रालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है और मजबूत कारण होने चाहिए.
हालांकि मेहता की टीम का कहना है कि सॉलिसिटर जनरल बनने के बाद उन्होंने लगातार निजी मामले लेने से इनकार किया है, लेकिन कुछ निजी मामलों में उनका नाम दर्ज है, जिनमें संबंधित व्यक्तियों के नाम चर्चा में रहे हैं.
उदाहरण के लिए, उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल के भतीजे रवि सिंघल का उनकी पत्नी मनाली के साथ चल रहे तलाक मामले में प्रतिनिधित्व किया था.
यह मामला 1998 से चल रहा था और फैमिली कोर्ट तथा दिल्ली हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां मेहता इसमें शामिल हुए. सुप्रीम कोर्ट में कम से कम दो याचिकाएं दाखिल हुईं, एक 2018 में और दूसरी 2019 में, जिनमें कुछ समय तक मेहता ने रवि की ओर से पैरवी की.
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, दिसंबर 2021 तक मेहता रवि का प्रतिनिधित्व करते रहे. इसके बाद दस्तावेजों में उनका नाम नहीं दिखता. पिछले साल जनवरी में दोनों पक्षों ने संयुक्त आवेदन देकर अदालत को बताया कि वे अलग होने और मामले का आपसी समझौते से निपटारा करने पर सहमत हो गए हैं.
एएसजी रहते हुए 2017 में मेहता ने अमित शाह के बेटे जय शाह की ओर से भी पैरवी की थी. यह मामला समाचार पोर्टल द वायर के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि का था.
जब कांग्रेस ने सरकारी कानून अधिकारियों के निजी मामले में पेश होने की उपयुक्तता पर सवाल उठाया था, तब खबरों के अनुसार तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मेहता को इस मामले में पेश होने की अनुमति दी थी.
‘मुश्किल हालात से निकलना जानते हैं’
अदालत के बाहर मेहता को उर्दू और गुजराती साहित्य तथा शायरी का शौक है.
वरिष्ठ वकील जल उनवाला ने दिप्रिंट से कहा, “तुषार भाई की उर्दू पर शानदार पकड़ है. उन्हें उर्दू शायरी, गुजराती कविताएं और अंग्रेजी कविताओं में व्यक्तिगत रुचि है. अगर कहा जाए कि एक वकील को कानून और साहित्य दोनों का ज्ञान होना चाहिए, तो वे दोनों में अच्छे हैं.”
वे आगे कहते हैं, “उन्हें भारतीय इतिहास, विश्व इतिहास और मंदिरों के धार्मिक इतिहास की भी असाधारण जानकारी है. आप मोहम्मद अली जिन्ना, सरदार पटेल या महात्मा गांधी की बात करें, तो वे ऐसे चर्चा करेंगे जैसे उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते हों.”
उनवाला के अनुसार, मेहता की सफलता का रहस्य यह है कि उनके पास “कूटनीतिक सोच और तेज दिमाग” है.
वे कहते हैं, “उन्हें परिस्थितियों को संभालना आता है. और वे मुश्किल हालात से निकलकर साफ-सुथरे तरीके से बाहर आना भी जानते हैं.”
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