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Friday, 19 July, 2024
होमदेश'भजन, योग और दिन में दो बार खाना': कैसा है पद्म श्री पाने वाले 125 साल के योग गुरु शिवानंद का जीवन

‘भजन, योग और दिन में दो बार खाना’: कैसा है पद्म श्री पाने वाले 125 साल के योग गुरु शिवानंद का जीवन

पिछले हफ्ते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्म श्री प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में नंगे पैर चल कर आये स्वामी शिवानंद का दावा है कि उनका जन्म अगस्त 1896 में हुआ था.

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वाराणसी: ‘यह एक आदर्श जीवन है. एक अच्छी तरह से नियमित, अच्छी तरह से अनुशासित जीवन, यही कारण है कि हर कोई इसकी ओर आकर्षित होता है.’ यह उन स्वामी शिवानंद का दावा है जिनके द्वारा पिछले सप्ताह राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से अपना पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त करने के लिए पैदल चल कर आने की कवायद ने देश भर में कई लोगों को उनकी ओर आकर्षित किया है.

वह तुरंत ही इंटरनेट पर छा गए और उन्हें पुरस्कार प्राप्त करते हुए दिखाने वाला दूरदर्शन का एक वीडियो यूट्यूब पर छह लाख से अधिक बार देखा जा चुका है. हालांकि, शिवानंद जिस बात का उल्लेख करने में विफल रहते हैं, जिसके वजह से वो लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं, वह कारक है उनकी लंबी उम्र.

स्वयं योग गुरु अपनी उम्र 125 वर्ष से अधिक होने का दावा करते हैं. उनके आधार कार्ड के अनुसार, गुरु शिवानंद का जन्म 8 अगस्त, 1896 को देश के बंटवारे से पहले वाले बांग्लादेश में हुआ था.

एक न्यूनतम जरूरतों और ‘इच्छा मुक्त जीवन’ का समर्थन करने वाले शिवानंद के अनुयायियों का दावा है कि वे दुनिया के सबसे बुजुर्ग जीवित व्यक्ति हो सकते हैं.

गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार, दुनिया में फिलहाल सबसे बुजुर्ग जीवित व्यक्ति होने का रिकॉर्ड जापान के केन तनाका के पास है, जिनकी उम्र 119 साल है.

शिवानंद के कुछ अनुयायियों ने रविवार को दिप्रिंट को बताया कि वे उनकी ओर से इस रिकॉर्ड में उनका नाम डालने के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में हैं.

देश विभाजन से लेकर कोविड तक, शिवानंद यह सब झेलने का दावा करते हैं और इस ‘उपलब्धि’ के लिए वह अपनी आहार संबंधी आदतों और फिटनेस को श्रेय देते हैं.


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जीवन जीने का ‘आदर्श’ तरीका

गुरु शिवानंद पुरस्कारों की दुनिया में नए नहीं हैं. साल 2019 में उन्होंने बेंगलुरू में योग रत्न पुरस्कार जीता था.

लेकिन इन सारी प्रशंसा और आकर्षण के बावजूद, उनके बारे में कुछ-न-कुछ निराला जरूर है. इन स्व-घोषित तपस्वी और योग गुरु का कहना है कि वह पिछले 43 वर्षों से वाराणसी के दुर्गा मंदिर के पास बने एक ही कमरे में रह रहे हैं और उनका दावा है कि यह उनका ‘जीवन का आदर्श तरीका’ ही है जो लोगों को उनकी ओर आकर्षित करता है.

रविवार को दिप्रिंट के साथ बातचीत में उन्होंने बताया, ‘एक साधारण आहार, एक अच्छी तरह से नियमित, अच्छी तरह से अनुशासित और इच्छा रहित जीवन. मैं पैसे के पीछे नहीं भागता. खुशियां अपने आप आती है. भजन मन को शांत रखता है.’

उनकी दिनचर्या सालों से जस-की-तस बनी हुई है. वह हर दिन सुबह 3 बजे उठकर आधे घंटे की सैर पर जाते हैं, इसके बाद एक घंटे योग, धूप सेंकने और शास्त्रों का पाठ करते हैं. वह दिन में केवल दो बार भोजन करते हैं और किसी तरह का नाश्ता नहीं लेते हैं.

वे बताते हैं, ‘भजन के बाद, मैं योग करता हूं, उसके बाद गीता-पाठ और चंडी-पाठ करता हूं. कुछ समय धूप में बिताने के बाद दोपहर 12 बजे मैं अपना दोपहर का भोजन लेता हूं. इसमें दो चपाती (रोटियां), आलू का चोखा या थोड़ी सी दाल शामिल होती है.’ रात के खाने में फिर से दाल या सब्जियों के साथ चपाती ही होती है.

प्रति दिन तीन लीटर पानी पीने के नियम का सख्ती से पालन करने के साथ-साथ शिवानंद समुद्री नमक और तेल की कम-से-कम खपत के नियम पर भी कायम रहते हैं.

वे कहते हैं, ‘समुद्री नमक बहुत हानिकारक होता है. काला नमक या सेंधा नमक इससे बेहतर है. तेल के सेवन से गॉल ब्लैडर में पथरी हो जाती है- यही इसका मूल कारण है.’

वह फल और दूध के सेवन से भी परहेज करते है लेकिन यह स्वास्थ्य संबंधी कारणों से जुड़ा न होकर दार्शनिक नज़रिए से अधिक है. शिवानंद कहते हैं कि उन्हें लगता है कि जब गरीब लोग इन्हें खाने का खर्च वहन नहीं कर सकते तो उन्हें भी ऐसी विलासिता वाली चीजों का आनंद नहीं लेना चाहिए. वे फल सिर्फ तभी लेते है जब कोई उन्हें इसके लिए मजबूर करता है.

हालांकि वह खुद नाश्ता नहीं करते, मगर शिवानंद यह सुझाव नहीं देते कि युवा लोग भी इस आचरण का पालन करें.

वे कहते हैं, ‘युवाओं को नाश्ता जरूर करना चाहिए. खाली पेट रहने से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाएगी.’

अपने स्वयं के दावे के अनुसार 125 वर्षों की आयु के बावजूद एक प्रशिक्षित योग और प्राणायाम विशेषज्ञ के रूप में वह अभी भी शीर्षासन कर सकते हैं.

एक लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए योग गुरु सभी उम्र के लोगों को शीतली मुद्रा- एक श्वास संबंधी व्यायाम जो मन को शांत करता है- सहित नियमित श्वास व्यायाम का सुझाव देते हैं.

शिवानंद का यह भी दावा है कि वह अपनी नियमित जांच के अलावा किसी अन्य इलाज के लिए कभी अस्पताल नहीं गए.


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गरीब घर में जन्म से लेकर पुरस्कार विजेता परोपकारी व्यक्ति तक का सफर

शिवानंद को अपने शुरुआती जीवन के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ खास याद नहीं हैं और वे बताते हैं कि वह उन सालों के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह सब उन्होंने उनके गुरु स्वामी ओंकारानंद गोस्वामी से सुना है. इसके अनुसार उनके माता-पिता ने उन्हें एक बालक के रूप में दान में दे दिया था.

वे कहते हैं, ‘चार साल की उम्र में मुझे एक साधु के हवाले कर दिया गया था और उन्हीं के मार्गदर्शन में मैंने चावल, दाल, सब्जी वाला आहार खाना शुरू किया. मेरी मां के घर में, मुझे सिर्फ केवल उबलते हुए चावल का पानी (मांड) ही मिलता था. जब मैं छह साल का था, तो मेरे माता-पिता दोनों की मृत्यु एक ही दिन में हो गई थी- मां की मृत्यु सूर्योदय से पहले और पिता की मृत्यु सूर्योदय के बाद हुई थी. उनके पास न पैसा था, न खाना.’

शिवानंद कहते हैं कि छह साल की उम्र में अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद, वह अपने गुरु के साथ एक जगह से दूसरी जगह तक भटकने लगे.

उन्होंने कहा, ‘मैंने कुछ समय नवद्वीप (बंगाल में) और फिर लगभग दो साल वृंदावन में बिताया, जिसके बाद मैं वाराणसी आ गया.’

शिवानंद कहते हैं कि स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं होने के कारण, उन्होंने ओंकारानंद गोस्वामी के तहत ही योग और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रशिक्षण लिया और इसके बाद उन्होंने पुरी, ओडिशा में कुष्ठ प्रभावित व्यक्तियों की देखरेख का जिम्मा उठाया, जिनकी वे आज भी भोजन और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मदद करना जारी रखे हुए हैं.

उन्होंने बताया कि उन्होंने कुष्ठ रोगियों की मदद का काम करना 55 साल पहले शुरू किया था.

वे कहते हैं, ‘उनके (कुष्ठ रोगियों) पास न तो भोजन है और न ही कपड़े. मैं उनके लिए दर्द महसूस करता हूं, उनसे प्यार करता हूं, वे भगवान के भरोसे ही हैं. मैं उन्हें केवल खाना देता हूं और वे खुश रहते हैं. मेरे अनुयायी ही सब कुछ इकट्ठा करते हैं और हम तो बस उन्हें वितरित करते हैं.’

योग गुरु के अनुयायियों का कहना है कि उनके अनुयायी देश-विदेश में फैले हैं जो हर साल दिसंबर में पुरी में होने वाले एक वार्षिक कार्यक्रम के लिए पैसा इकट्ठा करते हैं. राष्ट्रपति भवन की एक विज्ञप्ति में इन रोगियों को उनके द्वारा दान के रूप में दिए गए भोजन, कपड़े, कंबल, मच्छरदानी, खाना पकाने के बर्तन और अन्य आवश्यक वस्तुओं का ब्यौरा दिया गया है.

उनके एक सहयोगी राम विश्वास कहते हैं, ‘स्वामीजी के पास कोई ट्रस्ट नहीं है. भारत भर में तथा इंग्लैंड, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे विदेशी देशों में भी स्वामीजी के सैकड़ों अनुयायी हैं. उनमें से कुछ ने उन्हें आश्रम चलाने, योग सिखाने और उनके अनुयायियों से मिलने के लिए घर भी दान में दिए हैं. वाराणसी स्थित शिवानंद आश्रम का भवन भी उन्हें दान में ही दिया गया था. वह जिस घर में रहते हैं उसका भी यही हाल है. उनके पास अपना कोई बैंक बैलेंस नहीं है.’


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‘मुक्ति’ पर टिकी है नज़र’

शिवानंद के जीवन के मिशन का सारा वृतांत ‘रोग आरोग्य’ नामक पुस्तक में बताया गया है. योग गुरु की शिक्षाओं के आधार पर इसे उनके एक अनुयायी आशिम के. पाइन ने लिखा है. इस पुस्तक में अच्छे स्वास्थ्य, योग की तकनीकों, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक मंत्रों के लिए सुझाव शामिल किये गए हैं.

उनका कहना है कि उनके अनुयायी अक्सर उन्हें उपहार और पैसे भेंट करते हैं लेकिन वह पैसे लेने से साफ मना कर देते हैं.

वह एक अनुयायी, जो दिप्रिंट की उपस्थिति में उन्हें पैसे देने की कोशिश करता है, से कहते हैं, ‘मैं इसे कैसे ले सकता हूं? यह अवैध और अशोभनीय है. ‘

उनके सहयोगियों का कहना है कि केवल कुष्ठ रोगियों के लिए किये गए दान का ही स्वागत किया जाता है.

शिवानंद के लिए, उनका अंतिम लक्ष्य ‘मुक्ति’ है और वह अपने अच्छे स्वास्थ्य और ‘सात्विक’ जीवन शैली के लिए अपने गुरु को श्रेय देते हैं.

वे कहते हैं, ‘भगवान कुछ खास चीजें करने में सक्षम हो सकते हैं लेकिन गुरु तो भगवान से भी बड़ा है, क्योंकि भगवान को आपको ‘मुक्ति’ देने के लिए गुरु की ही राह लेनी होती है. कई सारे ऐसे लोग हैं जो अपने शरीर के बारे में नहीं सोचते हैं, बल्कि जन्म और मृत्यु के चक्र से ‘मुक्ति’ के बारे में ही सोचते हैं.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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