नई दिल्ली: भारत सरकार ने गुरुवार को साफ किया कि पासपोर्ट को कभी भी नागरिकता (नेशनेलिटी) का सबूत नहीं माना गया है. सरकार ने कहा कि ऐसा कोई फैसला न तो हाल ही में लिया गया है और न ही पिछले 12 साल में. सरकार ने पासपोर्ट एक्ट 1967 की धारा 20 का हवाला दिया, जिसमें गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी करने का प्रावधान है.
सरकार ने इसी के साथ 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया. उस फैसले में साफ कहा गया था कि सिर्फ पासपोर्ट होना किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता साबित नहीं करता.
पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम सबूत न मानने का विवाद तब शुरू हुआ, जब विदेश मंत्रालय (MEA) ने बुधवार को कहा कि पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का कानूनी सबूत नहीं है. यह सिर्फ एक सरकारी दस्तावेज है, जो विदेश यात्रा की सुविधा देने और पहचान साबित करने के लिए जारी किया जाता है.
दिप्रिंट बता रहा है कि इस विवाद के केंद्र में 2013 का बॉम्बे हाई कोर्ट का कौन सा फैसला है.
जुलाई 2013 में जस्टिस केयू चांदीवाल ने यह फैसला दिया था. उन्होंने अनवर हुसैन अब्दुल कादर शेख समेत कुछ लोगों को विदेशी अधिनियम 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 का उल्लंघन करने का दोषी माना. इन लोगों को भारत में अवैध तरीके से आने या रहने के लिए 6 महीने की साधारण जेल और जुर्माने की सजा दी गई.
असल में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही माना, जिसमें चार लोगों को अवैध प्रवासी माना गया था. इन लोगों ने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए पासपोर्ट (जो बाद में रद्द हो चुके थे), आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र पेश किए थे.
इन लोगों का कहना था कि वे जन्म से भारतीय नागरिक हैं. उनके वकील ने इसके समर्थन में कई दस्तावेज पेश किए. इनमें अनवर हुसैन का जन्म प्रमाण पत्र, सभी के आधार कार्ड और दो लोगों के पासपोर्ट शामिल थे.
दो लोगों ने अपने पासपोर्ट दिखाकर कहा कि उनमें उनकी राष्ट्रीयता भारतीय लिखी हुई है. इसलिए वे जन्म से भारतीय नागरिक हैं. बचाव पक्ष ने मांग की कि इन दस्तावेजों के आधार पर मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेजा जाए.
लेकिन अदालत ने इन दस्तावेजों को कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं माना. पासपोर्ट के बारे में जस्टिस केयू चांदीवाल ने कहा कि जो पासपोर्ट पेश किए गए थे, वे पहले ही रद्द किए जा चुके थे. इसलिए अदालत ने कहा कि उन पर भरोसा करके नागरिकता साबित करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता.
अदालत ने यह भी कहा कि ये पासपोर्ट शुरुआती सुनवाई के दौरान मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने सबूत के रूप में पेश नहीं किए गए थे. इसलिए अदालत ने माना कि रद्द किया गया पासपोर्ट भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कानूनी सबूत नहीं माना जा सकता.
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला
विदेश मंत्रालय के इस बयान से पहले से मौजूद भ्रम और बढ़ गया है, क्योंकि अलग-अलग अदालतों के फैसले अलग रहे हैं. 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि पासपोर्ट ऐसा दस्तावेज है जो किसी नागरिक की राष्ट्रीयता (नेशनेलिटी) दिखाता है और सिर्फ शक के आधार पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने याचिकाकर्ता को पासपोर्ट से जुड़ी सेवाएं देने का आदेश दिया और कहा कि उसकी राष्ट्रीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.
यह फैसला प्रभलीन कौर बनाम भारत संघ और अन्य मामले में दिया गया था. अदालत ने कहा कि पासपोर्ट एक्ट 1967 की धारा 6(2) के तहत पासपोर्ट अधिकारी सिर्फ बिना किसी ठोस आधार वाले प्रशासनिक शक के आधार पर पासपोर्ट देने से मना नहीं कर सकते और न ही किसी की राष्ट्रीयता पर सवाल उठा सकते. खासकर तब, जब वह व्यक्ति लंबे समय से भारत में रह रहा हो, यहां पढ़ाई कर चुका हो और पहले भी उसके पास भारतीय पासपोर्ट रहा हो.
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