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Thursday, 25 June, 2026
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पहचान और नागरिकता: कौन आपको नागरिक बनाता है और वे कौन से दस्तावेज हैं जो कानूनी प्रमाण नहीं हैं

पासपोर्ट के सिर्फ़ एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट होने के बारे में विदेश मंत्रालय (MEA) की सफ़ाई से एक अहम सवाल उठता है: आख़िर भारतीय नागरिकता का कानूनी सबूत क्या है? 'दिप्रिंट' इस बारे में बता रहा है.

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नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय (MEA) के एक स्पष्टीकरण ने बहस और भ्रम पैदा कर दिया है. मंत्रालय ने कहा कि पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का कानूनी प्रमाण नहीं है. यह केवल एक आधिकारिक दस्तावेज है जो अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाने और पहचान की पुष्टि करने के लिए जारी किया जाता है. इसके बाद सबसे बड़ा सवाल सामने आया है: आखिर नागरिकता का कानूनी प्रमाण क्या है?

पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर, जो 24 जून को पासपोर्ट अधिनियम 1967 के लागू होने की याद में मनाया जाता है, मंत्रालय ने आधुनिक चिप-आधारित ई-पासपोर्ट की घोषणा भी की. साथ ही यह भी कहा कि अगले सप्ताह दो दिन का मानव संसाधन गतिशीलता मंच आयोजित किया जाएगा. इसका उद्देश्य कानूनी प्रवासन के रास्तों को उजागर करना और विदेशों में नौकरी तलाश रहे भारतीयों को विदेशी नियोक्ताओं से जोड़ना है.

एमईए का यह बयान तब और अधिक जटिल और विरोधाभासी लगता है जब इसे 20 दिसंबर 2019 को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से जुड़े सवाल पर सरकार की प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की विज्ञप्ति के साथ देखा जाए.

उसमें कहा गया था, “नागरिकता को जन्म तिथि और जन्म स्थान से जुड़े किसी भी दस्तावेज के जरिए साबित किया जा सकता है. हालांकि ऐसे स्वीकार्य दस्तावेज कौन से होंगे, इस पर अभी फैसला नहीं लिया गया है.”

इसके बाद भारतीयों के सामने सवाल खड़ा होता है: कौन सा दस्तावेज भारतीय नागरिकता को अंतिम रूप से साबित कर सकता है? दिप्रिंट इस पर विस्तार से रौशनी डाल रहा है.

भारतीय नागरिकता किसी एक दस्तावेज से नहीं मिलती और न ही किसी एक दस्तावेज से इसकी पूरी गारंटी होती है. इसका जवाब जानने के लिए हमें भारत के संविधान और नागरिकता अधिनियम 1955 की ओर देखना होगा.

महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकता कानून के तहत, जो व्यक्ति 26 जनवरी 1950 या उसके बाद और 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में पैदा हुआ है, वह जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता है.

जो व्यक्ति जुलाई 1987 के बाद पैदा हुआ है, वह भारतीय नागरिकता का दावा कर सकता है अगर उसके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक है या था.

जो व्यक्ति 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद पैदा हुआ है, वह जन्म के आधार पर नागरिकता का दावा तभी कर सकता है जब उसके दोनों माता-पिता भारतीय हों, या एक माता-पिता भारतीय नागरिक हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी न हो.

1955 का अधिनियम स्पष्ट रूप से बताता है कि कोई व्यक्ति पांच अलग-अलग तरीकों से भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकता है या अपना दर्जा साबित कर सकता है. ये तरीके हैं – जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीकरण (नैचुरलाइजेशन) और किसी क्षेत्र का भारत में शामिल होना.

जन्म तिथि के आधार पर कोई व्यक्ति ‘जस सोली’ (भूमि का अधिकार) के सिद्धांत के तहत नागरिकता का दावा कर सकता है. हालांकि अवैध प्रवासन को रोकने के लिए इस नियम को समय-समय पर सख्त किया गया है.

वंश के आधार पर नागरिकता (‘जस सैंग्विनिस’ या रक्त का अधिकार) उन लोगों पर लागू होती है जो भारत के बाहर भारतीय माता-पिता के यहां पैदा हुए हैं.

उदाहरण के लिए, 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद विदेश में जन्मे बच्चे का जन्म एक वर्ष के भीतर भारतीय वाणिज्य दूतावास में दर्ज कराना जरूरी है.

पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) या भारतीय नागरिक से विवाह करने वाले व्यक्तियों को मिल सकती है, यदि वे निर्धारित निवास और आवेदन संबंधी शर्तों को पूरा करते हों.

देशीकरण (नैचुरलाइजेशन) के तहत विदेशी नागरिक, जो निवास संबंधी शर्तें पूरी करते हैं, जैसे भारत में 12 वर्ष तक रहना, और तीसरी अनुसूची में दी गई योग्यताओं को पूरा करते हैं, भारतीय नागरिक बन सकते हैं.

अगर कोई नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है, तो केंद्र सरकार यह तय करती है कि उस क्षेत्र के किन निवासियों को भारतीय नागरिक माना जाएगा.

कौन से दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं?

आधार कार्ड: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने यह भी कहा कि “दावे और आपत्तियां दाखिल करते समय आधार का उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में किया जाएगा, भारतीय नागरिकता के प्रमाण के रूप में नहीं.”

इसके अलावा, जो भी व्यक्ति आवेदन की तारीख से पहले के 12 महीनों में कुल मिलाकर 182 दिन या उससे अधिक समय भारत में रहा हो, वह आधार कार्ड पाने का पात्र है. इसलिए आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

मतदाता पहचान पत्र: मतदाता पहचान पत्र मुख्य रूप से पहचान और निवास का दस्तावेज है. इसका विशेष उद्देश्य मतदान के अधिकार का उपयोग करना है. नागरिकता साबित करने के लिए इसे लंबे समय से पर्याप्त दस्तावेज नहीं माना जाता.

पैन कार्ड: मतदाता पहचान पत्र की तरह स्थायी खाता संख्या (पैन) कार्ड भी एक वित्तीय और कर संबंधी पहचान दस्तावेज है. इसे आयकर विभाग उन सभी व्यक्तियों या संस्थाओं को जारी करता है जो भारत में कर देते हैं, जिनमें विदेशी नागरिक, अनिवासी व्यक्ति और विदेशी कंपनियां भी शामिल हैं.

विभिन्न अदालतों के कई फैसलों में कहा गया है कि केवल मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड या पैन कार्ड होने से कोई व्यक्ति स्वतः भारतीय नागरिक नहीं बन जाता. नागरिकता के मामले में इन दस्तावेजों का कोई कानूनी महत्व नहीं है.

हां, ये सेवाओं का लाभ लेने के लिए पहचान संबंधी दस्तावेज हैं, लेकिन ये नागरिकता अधिनियम 1955 के मूल नियमों को नहीं बदल सकते.

पासपोर्ट क्या करता है?

पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है, लेकिन यह भी भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता. तो फिर पासपोर्ट की क्या भूमिका है?

भारत में पासपोर्ट केवल पुलिस की कड़ी जांच के बाद जारी किया जाता है.

सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने, आवेदक की वास्तविक पहचान और पते की पुष्टि करने तथा किसी आपराधिक रिकॉर्ड की जांच के लिए स्थानीय पुलिस सत्यापन पर काफी हद तक निर्भर करती है.

अब सवाल पहचान और नागरिकता के बीच का है.

पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत, धारा 5 के अनुसार पासपोर्ट प्राधिकरण आवेदन पर विचार करने और आवश्यक जांच करने के बाद ही पासपोर्ट जारी करता है.

धारा 6(2)(a) के अनुसार यदि आवेदक भारतीय नागरिक नहीं है तो पासपोर्ट देने से इनकार किया जाना चाहिए. यानी पासपोर्ट जारी करना इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य आवेदक की नागरिकता से संतुष्ट है या नहीं.

इसलिए यदि किसी व्यक्ति को पासपोर्ट मिला है, तो इसका मतलब है कि भारत सरकार उसकी भारतीय नागरिकता से संतुष्ट है.

लेकिन वही व्यक्ति अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट का उपयोग नहीं कर सकता. यही स्थिति को विरोधाभासी बनाती है.

अब पासपोर्ट नागरिकता का संकेत तो देता है, लेकिन नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता.

अहम बात यह है कि विदेश मंत्रालय (MEA) और उसके अधीन काम करने वाले पासपोर्ट जारी करने वाले प्राधिकरणों (पीआईए) के पास भारतीय पासपोर्ट को रद्द करने, जब्त करने या वापस लेने का कानूनी अधिकार है.

हालांकि वे ऐसा मनमाने ढंग से नहीं कर सकते. यह अधिकार पूरी तरह पासपोर्ट अधिनियम 1967 के नियमों के तहत नियंत्रित होता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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