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Thursday, 25 June, 2026
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विदेशी वीजा के लिए आवेदन करते समय भारतीयों में काफी चिंता रहती है, इसके लिए हम खुद भी जिम्मेदार हैं

कॉन्सुलेट और एम्बेसी अब भारतीय एप्लिकेंट्स को लेकर पहले से ज़्यादा शक करते हैं. बहुत से भारतीय टूरिस्ट वीज़ा के लिए आवेदन करते हैं, जबकि असल में उनका मकसद दूसरे देश में बसना होता है.

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विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए यह अच्छा समय नहीं है. मुझे यह दोहराने की ज़रूरत नहीं है कि कई भारतीय पर्यटक विदेशों में कितना खराब व्यवहार करते हैं. हमने इसके काफी सबूत फोटो, वीडियो और इंटरनेट पर शेयर की गई स्टोरीज में देखा है. लेकिन कुछ लोगों के खराब व्यवहार का नतीजा यह हुआ है कि अब बाकी भारतीयों को पहले से ज्यादा शक और तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है.

अगर आप विदेश यात्रा की योजना बना रहे लोगों से बात करें तो माहौल में आया बदलाव महसूस कर सकते हैं. लगभग हर व्यक्ति वीजा आवेदन की प्रक्रिया को डर और चिंता के साथ देखता है. विदेशी हवाई अड्डों पर पहुंचने के बाद पासपोर्ट पर मुहर लगवाने के लिए इमिग्रेशन डेस्क पर जाने से पहले ज्यादातर भारतीयों को कम से कम थोड़ी झिझक या फिर सीधा डर महसूस होता है.

भले ही उनके पास वैध वीजा हो, फिर भी यह चिंता बनी रहती है कि इमिग्रेशन अधिकारी के साथ मुलाकात अप्रिय हो सकती है.

ऐसा नहीं होना चाहिए था. हमें यह विश्वास दिलाया गया था कि दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ गई है कि हर विदेशी हवाई अड्डे पर भारतीय नागरिकों का गर्मजोशी से स्वागत होगा. भले ही इमिग्रेशन अधिकारी खड़े होकर हमारा स्वागत न करे और यह न बताए कि वह हमारे नेता की कितनी प्रशंसा करता है, जैसा कुछ लोगों ने दावा किया था, लेकिन यह शक जरूर खत्म हो जाना चाहिए था कि हम पश्चिमी देशों में घुसने की कोशिश कर रहे संभावित अवैध प्रवासी हैं.

हमें बताया गया था कि दुनिया में बढ़ती हैसियत के कारण विदेशी अधिकारी भारत और उसकी बढ़ी हुई प्रतिष्ठा का सम्मान करने को मजबूर होंगे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स में भारत की रैंक आमतौर पर 75 से 80 के बीच रहती है. यह गैबॉन और मॉरिटानिया जैसे देशों के बराबर है और रवांडा तथा तंजानिया जैसे देशों से भी पीछे है.

भारतीय कई देशों में बिना वीजा जा सकते हैं, लेकिन इस सूची में मुख्य रूप से नेपाल, भूटान, मालदीव, श्रीलंका, सेनेगल और अंगोला जैसे देश शामिल हैं. वे पश्चिमी देश, जहां भारतीय पर्यटक जाना चाहते हैं, इस सूची में नहीं हैं.

स्थिति और खराब हो रही है. कुछ देश अपनी नीतियों पर दोबारा विचार कर रहे हैं. हाल ही में थाई कैबिनेट ने भारतीयों के लिए वीजा-फ्री एंट्री खत्म करने का फैसला किया है.

VFS विवाद

कई भारतीय अब भी समझ नहीं पा रहे कि स्थिति यहां तक कैसे पहुंच गई. वे सोचते हैं कि हम अभी तक महाशक्ति क्यों नहीं बने. उन्हें वीजा के लिए घबराते हुए आवेदन करना और ढेर सारे दस्तावेज जैसे बैंक स्टेटमेंट और टैक्स फॉर्म जमा करना बुरा लगता है.

वे वीजा मिलने या न मिलने की अनिश्चितता से परेशान रहते हैं क्योंकि समय पर वीजा न मिलने पर टिकटों की पुष्टि नहीं हो पाती. उन्हें इस बात से भी नाराजगी होती है कि अगर विदेशी दूतावास वीजा आवेदन खारिज कर दे, तब भी भारी भरकम वीजा फीस वापस नहीं मिलती.

यह नाराजगी समय-समय पर दिखाई भी देती है. हाल ही में VFS को लेकर यूरोपीय संघ के नियमित ऑडिट की एक रिपोर्ट कुछ समय के लिए प्रमुख खबर बन गई थी.

कुछ आलोचनाएं सही थीं, जैसे अतिरिक्त सेवाएं लेने के लिए दबाव डालना. लेकिन भारत में इस खबर को मिली बड़ी मीडिया कवरेज के पीछे और भी कारण हो सकते हैं. VFS एक अमेरिकी स्वामित्व वाली ग्लोबल कंपनी है जो कई देशों में काम करती है.

VFS एक ऐसी एजेंसी है, जिससे अधिकांश वीजा आवेदकों का सीधा संपर्क होता है। इसलिए पश्चिमी देशों के वीजा पाने की कठिन प्रक्रिया को लेकर जनता की नाराजगी का केंद्र वही बन गई.

असल में VFS और अन्य ऐसी एजेंसियां, जो वीजा आवेदन संभालती हैं, केवल कागजी काम करती हैं. VFS सबसे बड़ी एजेंसी है, लेकिन दूसरी एजेंसियां भी हैं और उनके बीच प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार जानबूझकर जानकारी लीक की जाती है.

ये एजेंसियां सिर्फ आवेदन विदेशी दूतावासों तक पहुंचाती हैं. फैसला दूतावास के अधिकारी लेते हैं.

एक ऐसी प्रक्रिया जो आसान होनी चाहिए, वह इतनी परेशानी क्यों देती है?

सरल जवाब यह है कि दूतावास और वाणिज्य दूतावास पहले की तुलना में भारतीय आवेदकों को ज्यादा शक की नजर से देखते हैं.

बहुत से भारतीय पर्यटक वीजा के लिए आवेदन करते हैं जबकि उनका असली उद्देश्य विदेश में बसना होता है. एक अनुमान के अनुसार, एक साल में हर घंटे 10 भारतीय अमेरिका में अवैध रूप से प्रवेश करने की कोशिश करते हुए पकड़े गए थे.

कुछ साल पहले ग्रीस के दूतावास में वीजा आवेदनों की संख्या अचानक बढ़ गई थी. ज्यादातर लोगों को ग्रीस घूमने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.

वे इसलिए आवेदन कर रहे थे क्योंकि ग्रीस शेंगेन वीजा जारी करता है. यह वीजा यूरोप के कई देशों में ऐंट्री की अनुमति देता है और मेक्सिको में भी मान्य होता है.

योजना यह थी कि ग्रीस से मिला शेंगेन वीजा लेकर लोग मेक्सिको जाएं और वहां से अवैध रूप से अमेरिका चले जाएं.

माल्टा और कई पूर्वी यूरोपीय देशों में भी ऐसे नकली पर्यटकों को लेकर चिंताएं रही हैं.

इन सब वजहों से वीजा अधिकारी और अधिक सतर्क और संदेहपूर्ण हो गए हैं.

वीजा एजेंटों की भूमिका भी इसमें शामिल है. वे जानते हैं कि दूतावास बैंक स्टेटमेंट और यात्रा के सबूत मांगते हैं, इसलिए वे आवेदकों को कुछ समय के लिए उधार पैसे बैंक खाते में जमा करवाने की सलाह देते हैं ताकि बैलेंस ज्यादा दिखे. वे नकली एयरलाइन टिकट और होटल बुकिंग का भी इस्तेमाल करते हैं.

दूतावास के अधिकारी इन चालों से अच्छी तरह परिचित हैं. इसलिए वे दस्तावेजों की बहुत सावधानी से जांच करते हैं, जिससे प्रक्रिया में ज्यादा समय लगता है.

लेकिन सभी देरी और मनमाने फैसले सही नहीं होते.

सच्चाई यह है कि कई देश भारतीयों का स्वागत करने के लिए बहुत उत्साहित नहीं हैं.

कई दूतावासों में वीजा मंजूर करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी ही नहीं हैं. न केवल आवेदकों की तुलना में अधिकारियों की संख्या कम हुई है, बल्कि कुल संख्या भी कोविड से पहले के स्तर तक नहीं पहुंची है.

इस वजह से अनावश्यक देरी होती है. हर दिन कम अपॉइंटमेंट दिए जाते हैं. और कई बार वीजा आवेदन मामूली शक होने पर भी खारिज कर दिए जाते हैं क्योंकि अधिकारी पहले से ही काम के बोझ से दबे होते हैं.

हालांकि सभी पश्चिमी दूतावास इससे इनकार करेंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि पूरे यूरोप में बढ़ती आप्रवासन-विरोधी भावना ने वीजा जारी करने की प्रक्रिया को प्रभावित किया है.

वाणिज्य दूतावास के अधिकारी पर्यटन बढ़ाने का काम नहीं करते. उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि पर्यटकों की संख्या कम हो जाए. उनके लिए अवैध प्रवासियों को अंदर आने देने का आरोप झेलना बेहतर है.

हवाई अड्डों का अनुभव

मुझे नहीं लगता कि भारत में पश्चिमी देशों के दूतावासों के अधिकारी नस्लवादी हैं. लेकिन पश्चिमी देशों के हवाई अड्डों पर तैनात इमिग्रेशन अधिकारियों के बारे में मैं इतना निश्चित नहीं हूं.

दिलचस्प बात यह है कि अब ब्रिटेन में शायद नस्लवादी हवाई अड्डा अधिकारियों की संख्या सबसे कम है. हालांकि 1968 में कुछ इमिग्रेशन अधिकारियों ने खुले तौर पर नस्लवादी राजनेता इनोक पॉवेल और उनकी नीतियों का समर्थन किया था.

अमेरिका में हवाई अड्डे के अधिकारी सभी के साथ एक जैसा कठोर व्यवहार करते हैं.

दोनों देशों में मुख्य समस्या कर्मचारियों की कमी है.

चाहे हीथ्रो हो या जेएफके, इमिग्रेशन की कतारें बहुत लंबी होती हैं क्योंकि कई काउंटरों पर कोई कर्मचारी नहीं होता.

यह बजट कटौती की वजह से हो सकता है, लेकिन यह शर्म की बात है कि इतने विकसित देश यात्रियों को ऐसा अनुभव देते हैं जो ढाका या काहिरा जैसे शहरों के हवाई अड्डों से अलग नहीं लगता.

यूरोपीय हवाई अड्डों पर नस्लवाद की बात करें तो मैं पूरी तरह निश्चित नहीं हूं.

फ्रांस और इटली में मेरा अनुभव हमेशा बहुत अच्छा रहा है. बाकी देशों में सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि आपको कौन सा अधिकारी मिलता है.

एम्स्टर्डम में मेरा अनुभव बहुत खराब रहा, लेकिन शायद इसलिए कि जिस अधिकारी से मेरा सामना हुआ वह युवा और अनुभवहीन था.

मुझे यह भी बताया गया कि फ्रैंकफर्ट में मेरा खराब अनुभव कोई असामान्य बात नहीं थी क्योंकि वहां अधिकारियों को यात्रियों से सख्ती से पूछताछ करने के निर्देश दिए जाते हैं.

इसलिए शायद यह नस्लवाद नहीं था. वे सिर्फ आदेशों का पालन कर रहे थे.

निष्कर्ष यह है कि भारतीयों को विदेशी हवाई अड्डों पर आसान अनुभव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

इसमें कुछ गलती हमारी भी है. बहुत से भारतीयों ने इस व्यवस्था का गलत फायदा उठाया है.

कुछ कारण यह भी हैं कि पश्चिमी देशों के पास पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं और वे भारतीय यात्रियों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाने को ज्यादा महत्व नहीं देते.

और कुछ मामलों में मुझे हमेशा लगता है कि नस्लवाद भी एक कारण हो सकता है.

लेकिन इसे दूसरे नजरिए से भी देखें.

जब मैंने पहली बार विदेश यात्रा शुरू की थी, तब शेंगेन क्षेत्र जैसा एकल वीजा सिस्टम नहीं था और वीएफएस जैसे सुविधाजनक प्लेटफॉर्म भी नहीं थे.

मुझे वीजा के लिए एक दूतावास से दूसरे दूतावास जाना पड़ता था. यह बहुत थकाऊ और समय लेने वाली प्रक्रिया थी.

कम से कम अब व्यवस्था काफी आसान हो गई है.

समस्या कई देशों की भारतीय यात्रियों के प्रति उदासीनता और हमारी अपनी छवि की है, जहां हमें संभावित धोखेबाज के रूप में देखा जाता है.

वैसे भी, जिस तरह रुपये की कीमत गिरी है, उसे देखते हुए आने वाले समय में हममें से ज्यादातर लोग विदेश यात्रा ज्यादा नहीं कर पाएंगे.

2014 में एक डॉलर की कीमत लगभग 60 रुपये थी और अब यह लगभग 95 रुपये है.

हो सकता है कि भविष्य में हमें वीजा के लिए आवेदन ही न करना पड़े.

हम बस भारत में ही छुट्टियां मनाएंगे. बिना वीजा के.

वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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