नई दिल्ली: एक अनजान आवाज़ में रेडियो प्रसारण, एक चोरी की गई फिएट कार, दो बच्चों की लाशें, एक तस्वीर और एक उंगली का निशान.
1970 के दशक के आखिर में दो लोगों ने ऐसा क्रूर अपराध किया जिसने देश की राजधानी को झकझोर कर रख दिया था. इस घटना ने ऐसा डर पैदा किया जो सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में फैल गया. यह कोई साधारण मामला नहीं था—न अपराध की गंभीरता के लिहाज़ से और न ही बाद में हुई जांच को मिले ध्यान के कारण.
उस समय के दिल्लीवासियों के लिए रंगा और बिल्ला द्वारा गीता और संजय चोपड़ा के अपहरण और बेरहमी से किए गए कत्ल ने सुरक्षा को लेकर उनकी सोच ही बदल दी.
26 अगस्त 1978 को जसबीर सिंह उर्फ ‘बिल्ला’ और कुलजीत सिंह उर्फ ‘रंगा’ ने किशोर भाई-बहन को लिफ्ट देने के बहाने अगवा कर लिया. उनका मकसद उन्हें लूटना था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि दोनों एक नौसेना अधिकारी के बच्चे हैं, तो उन्होंने उन्हें मारने का फैसला कर लिया.
करीब दो हफ्ते बाद व्यापक तलाश और जांच के बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. इस जांच में आम लोगों और फॉरेंसिक सबूतों ने बेहद अहम भूमिका निभाई. बाद में 1979 की शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने दोनों को फांसी की सज़ा सुनाई. उसी साल नवंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस सज़ा को बरकरार रखा. जनवरी 1982 में दोनों को फांसी दे दी गई.
इंटरनेट और 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनलों से पहले के उस दौर में बहुत कम अपराध ऐसे थे जिन्होंने इस मामले जितना ध्यान खींचा हो. लोगों ने अखबारों और दूरदर्शन (डीडी न्यूज़) के प्रसारणों के ज़रिए इस पूरे मामले को डर और सदमे के साथ सामने आते देखा.
लोगों का गुस्सा और दर्द सड़कों पर भी दिखाई दिया—ठीक वैसे ही जैसे 2012 में हुआ था, जब 22 साल की एक युवती के साथ चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म किया गया था.
उस समय अखबारों की सुर्खियां भी बेहद नाटकीय थीं. 31 अगस्त 1978 को द इंडियन एक्सप्रेस की एक हेडलाइन थी—“दिल्ली हत्याकांड से संसद में हड़कंप”.
इस मामले की गूंज आज भी सुनाई देती है. इसका दर्द सिर्फ अखबारों के पुराने रिकॉर्ड में ही नहीं, बल्कि फिल्मों, ओटीटी सीरीज, किताबों और पॉडकास्ट में भी ज़िंदा है.
हाल ही में रिलीज़ हुई प्राइम वीडियो की वेब सीरीज राख बिल्ला-रंगा मामले से प्रेरित है. इसका ज़िक्र 2025 की ब्लैक वारंट सीरीज़ और क्राइम पेट्रोल के एक एपिसोड में भी किया गया है.
इस मामले पर कई किताबें भी लिखी गई हैं. इनमें Fallen City: A Double Murder, Political Insanity, and Delhi’s Descent from Grace, Black Warrant (जिस पर नेटफ्लिक्स की एक सीरीज़ भी बनी है) और Ranga Billa शामिल हैं.
तत्कालीन तिहाड़ जेल अधीक्षक सुनील गुप्ता बिल्ला और रंगा को फांसी देने के दौरान वहां मौजूद थे.
यह मामला दशकों से स्कूलों, कॉलेजों और पुलिस प्रशिक्षण में एक आपराधिक केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाता रहा है. इस पर कई शोध पत्र और अध्ययन भी किए गए हैं.
बिल्ला और रंगा अब इस दुनिया में नहीं हैं. दोनों के पीछे बस उनकी ब्लैक एंड व्हाईट तस्वीरें रह गई हैं—पुलिस हिरासत में, अदालत से बाहर निकलते हुए, कैमरों की ओर देखते हुए और एक ऐसा डर, जिसने दिल्ली के लोगों को किसी अजनबी से लिफ्ट लेने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर कर दिया.

रेडियो प्रसारण
26 अगस्त 1978 को भारतीय नौसेना के कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 साल की बेटी गीता को रात 8 बजे ऑल इंडिया रेडियो के ‘युवा वाणी’ कार्यक्रम में हिस्सा लेना था. वह और उनका 14 साल का भाई संजय शाम 6:15 बजे दिल्ली के धौला कुआं स्थित सर्विसेज ऑफिसर्स एन्क्लेव में अपने घर से निकले थे, ताकि शाम 7 बजे तक संसद मार्ग स्थित रेडियो स्टेशन पहुंच सकें. प्रसारण खत्म होने के बाद रात 9 बजे उनके पिता को रेडियो स्टेशन के गेट से उन्हें लेने आना था.
गीता जीसस एंड मैरी कॉलेज में सेकंड ईयर की स्टूडेंट थीं, जबकि संजय मॉडर्न स्कूल में 10वीं क्लास में पढ़ते थे.
रात 8 बजे जब उनके माता-पिता ने रेडियो लगाया, तो उन्हें गीता की आवाज़ की जगह किसी दूसरी महिला की आवाज़ सुनाई दी. हैरान होकर उन्होंने सोचा कि या तो कार्यक्रम का समय बदल गया होगा या फिर उन्होंने गलत स्टेशन लगा लिया होगा.
रात 8:45 बजे कैप्टन चोपड़ा अपने स्कूटर से बच्चों को घर लाने के लिए निकले, लेकिन उन्हें रेडियो स्टेशन के गेट पर बच्चे नहीं मिले. पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि गीता और संजय उस शाम रेडियो स्टेशन पहुंचे ही नहीं थे. वे घर भी वापस नहीं आए थे.
नौसेना अधिकारी ने तुरंत पुलिस से संपर्क किया. रात 10:15 बजे उन्होंने पीसीआर को फोन कर बच्चों का हुलिया बताया. वह विलिंगडन अस्पताल, जिसे अब डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के नाम से जाना जाता है और संसद मार्ग थाने भी गए, ताकि पता चल सके कि कहीं बच्चों का कोई एक्सीडेंट तो नहीं हुआ. इसके बाद वह रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए धौला कुआं पुलिस चौकी पहुंचे.
लेकिन कैप्टन चोपड़ा और उनकी पत्नी को यह पता चलने से पहले ही कि उनके बच्चे खतरे में हैं, उन्हें बचाने की एक बेताब कोशिश दिल्ली की सड़कों पर शुरू हो चुकी थी.
शाम 6:30 बजे भगवान दास नाम के एक व्यक्ति बंगला साहिब गुरुद्वारे से अपने स्कूटर पर गोल डाकखाना के पास से गुज़र रहे थे. तभी उनकी नजर योग आश्रम के पास खड़ी सरसों रंग की एक फिएट कार पर पड़ी. कार के अंदर से मदद के लिए चीखें सुनकर वह तुरंत उसकी ओर दौड़े.
उन्होंने देखा कि एक लड़की ड्राइवर के बाल खींच रही थी, जबकि एक लड़का उसके बगल में बैठे व्यक्ति से संघर्ष कर रहा था, लेकिन इससे पहले कि दास कार तक पहुंच पाते, कार तेज़ी से वहां से निकल गई.
शाम 6:44 बजे दास की पीसीआर रिपोर्ट मंदिर मार्ग थाने भेजी गई और 7:05 बजे एक सब-इंस्पेक्टर को सौंप दी गई, लेकिन जब तक सब-इंस्पेक्टर एक कांस्टेबल के साथ मौके पर पहुंचे, वहां कोई नहीं था.
दास की रिपोर्ट में कहा गया था कि एक फिएट कार के अंदर एक महिला मदद के लिए पुकार रही थी, जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर “MRK 8930” था. बाद में उन्होंने अदालत में बयान दिया कि उन्होंने वास्तव में नंबर “HRK 8930” बताया था, न कि “MRK 8930”. कार का असली रजिस्ट्रेशन नंबर भी HRK 8930 ही था.
और उस शाम इस घटना को देखने वाले भगवान दास अकेले व्यक्ति नहीं थे.
उस समय दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) में जूनियर इंजीनियर रहे इंदरजीत सिंह नोआटा अपने घर लौट रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि कार की पिछली सीट पर बैठे एक लड़का और एक लड़की ड्राइवर और उसके बगल में बैठे व्यक्ति से संघर्ष कर रहे हैं.
वह कार के करीब पहुंचने के लिए अपना स्कूटर तेज़ चलाने लगे. उन्होंने आवाज़ लगाई, “क्या हो गया है?” लड़के ने पीछे के शीशे से उनकी ओर देखा और अपना खून से लथपथ दायां कंधा दिखाया. वह हाथ हिलाकर मदद मांग रहा था. सिंह ने कार का पीछा करने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार उनकी नज़रों से कार ओझल हो गई.
इसके बाद वह शाम 6:45 बजे रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए राजेंद्र नगर थाने पहुंचे, लेकिन वहां किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. पुलिस अधिकारियों ने यह कहकर बहस शुरू कर दी कि यह मामला उनके थाने के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता.
बाद का नतीजा
गुस्सा तुरंत फैल गया, घटना के बाद महीनों तक नेशनल कैपिटल में गुस्से की लहर दौड़ गई.
जब अगली सुबह बच्चों के किडनैप होने की खबर अखबारों में छपी, तो लोग डर गए. हर घंटे सख्त और जल्दी एक्शन लेने की मांग तेज़ होती गई.
28 अगस्त को द इंडियन एक्सप्रेस में एक हेडलाइन थी: “भाई-बहन की बरामदगी का सुराग देने वाले को इनाम”. उस समय के पुलिस कमिश्नर, जे.एन. चतुर्वेदी जिनका 2018 में निधन हो गया – ने जानकारी देने वाले को 2,000 रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी.
28 अगस्त, 1978 की आधी रात को, मवेशी चराने वाले धनी राम ने अपर रिज के घने जंगल में दो लाशें देखकर पेट्रोलिंग कर रहे एक हेड कांस्टेबल को अलर्ट किया. सुबह होते-होते, कैप्टन चोपड़ा और उनकी पत्नी झाड़ियों के बीच खड़े होकर गीता और संजय के बुरी तरह सड़ चुके शरीर को पहचानने से बहुत दुखी थे.
द इंडियन एक्सप्रेस (30 अगस्त, 1978) के पहले पेज की रिपोर्ट, जिसकी हेडलाइन थी “किडनैप हुए बच्चों की हत्या हुई”, में रिज का हाथ से बनाया गया मैप था, जिसमें लाशें कहां मिलीं, इसकी डिटेल दी गई थी.

बाद में हुई पोस्टमॉर्टम जांच में गीता की मौत का कारण गर्दन के ऊपरी हिस्से में चार इंच का एक बड़ा चीरा बताया गया, जिससे उनका निचला जबड़ा पूरी तरह से टूट गया था और सभी बड़ी खून की नसें कट गई थीं. उनकी कलाई और उंगलियों पर भी बचाव के लिए गहरे कट थे. संजय के शरीर पर 21 अलग-अलग कट के निशान थे.
लेकिन बाद में फोरेंसिक जांच से पता चला कि बच्चों ने जवाबी हमला किया था. लड़ाई के दौरान, संजय ने शायद हमलावरों में से एक के माथे पर किसी कुंद चीज़ से वार किया था.
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील और पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल राजू रामचंद्रन, जिन्होंने 1976 में वकालत शुरू की थी, के लिए अखबारों की रिपोर्टों के ज़रिए कहानी को सामने आते देखना एक गहरा अनुभव था.
उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “उन दिनों, अखबार सुबह आते थे और कुछ शाम को, या AIR या DD न्यूज़ पर खबरें आती थीं. जब केस सामने आया, तो हमें जो भी फोन कॉल आता था, हम उसके बारे में बात करते थे. दिल्ली बदल गई थी…हम सबके लिए…सभी वर्गों के लोगों के लिए.”
रामचंद्रन बुद्ध जयंती पार्क के पास बड़े हुए, जहां लाशें मिली थीं. उनके पिता रेलवे कर्मचारी थे. वह याद करते हैं, “मैं यहीं बड़ा हुआ था. यह अक्सर स्कूल पिकनिक स्पॉट हुआ करता था. यहां कॉन्सर्ट होते थे. यह एक ऐसी जगह थी जहां मैं जाता था, जो अचानक राष्ट्रीय शर्म की निशानी बन गई. यह असुरक्षित था.”
इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर राजू संथानम, जो उस समय केस को करीब से ट्रैक कर रहे थे, रामचंद्रन के सबसे करीबी दोस्तों में से एक थे. “राजू मेरा क्लासमेट था. उसने आरोपियों की तस्वीरें लीं, जिससे वे गिरफ्तार हुए और उसने इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म में अपनी पहचान बनाई. राजू इस केस से करीब से जुड़ा था.”
वे कहते हैं कि उस समय कवरेज में गंभीरता होती थी.
रामचंद्रन ने खुद 1993 के मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन और 2008 के मुंबई टेरर अटैक के दोषी अजमल कसाब का कोर्ट में केस लड़ा था, दोनों को आखिरकार फांसी दे दी गई.
द इंडियन एक्सप्रेस मुंबई ब्यूरो में एक युवा क्राइम रिपोर्टर के तौर पर, संथानम वहां से एसटीडी कॉल और रोज़ाना पुलिस स्टेशन जाकर बिल्ला रंगा केस को ट्रैक कर रहे थे. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “उस समय कोई प्रेस रिलीज़ नहीं होती थी, कोई व्हाट्सएप मैसेज नहीं होते थे. रिपोर्टिंग अलग थी. जब मुझे बिल्ला और रंगा की फोटो मिली, जब वे मुंबई में क्राइम करके भाग गए थे, तो मैंने उसे दिल्ली में एक्सप्रेस टीम को भेज दिया. दिल्ली के रिपोर्टर और दिल्ली पुलिस दोनों को कुछ पता नहीं था. क्राइम और वे कौन थे, यह धीरे-धीरे समय के साथ सामने आया. इसने देश को चौंका दिया.”
उन्हें याद है कि कैसे ज़्यादातर लोगों के लिए न्यूज़पेपर जानकारी का मुख्य सोर्स थे और जब भी डीडी न्यूज़ का ब्रॉडकास्ट आता था, लोग स्क्रीन से चिपक जाते थे. “हर कोई जानना चाहता था कि बिल्ला और रंगा क्या कर रहे थे.”

चोपड़ा भाई-बहनों की हत्या के बाद, लोग सड़कों पर उतर आए. राजपथ और इंडिया गेट कभी लोगों के विरोध प्रदर्शन के लिए खुले थे. यह सितंबर 1978 की बात है.
जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, यह विरोध दिल्ली यूनिवर्सिटी के गलियारों तक पहुंच गया. रिटायर्ड आईपीएस ऑफिसर राजन भगत सिर्फ 17 साल के थे, जब जिस स्टूडेंट यूनियन के वे सदस्य थे, उसने विरोध प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला किया.
उन्होंने याद किया, “यह हमारा Gen Z प्रोटेस्ट था. यह 2012 में निर्भया केस के दौरान हुए प्रोटेस्ट जैसा ही था. हम जवान और गुस्से में थे. इस प्रोटेस्ट में उस समय लगभग सभी 30-40 डीयू कॉलेजों से लोग इकट्ठा हुए थे. लोग बड़ी संख्या में आए थे. हम बिना किसी डर के वहां खड़े रहे.”
भगत को उस समय नहीं पता था कि कुछ साल बाद, वह प्रोटेस्ट के दूसरे छोर पर होंगे, खाकी वर्दी पहने होंगे और प्रोटेस्टर्स को संभालेंगे.
वह याद करते हैं, “उस समय, हमारे पास मोबाइल नहीं थे. प्रोटेस्ट ऑर्गनाइज़ करने का एकमात्र तरीका कॉलेज पहुंचना था. फिर हम सड़कों पर डीटीसी बसों को रोकते थे, स्टूडेंट्स भरे होते थे, और हम नारे लगाते हुए मौके पर पहुंचते थे.”
ऐसे ही एक प्रोटेस्ट के बारे में बताते हुए, भगत कहते हैं, “आंदोलन को शांत करने के लिए, SHO बलजीत सिंह जो बाद में मेरे फोर्स में शामिल होने पर मेरे सुपीरियर बने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ, भीड़ को एड्रेस करने के लिए अपनी जिप्सी पर खड़े हुए. उन्होंने युवाओं से वादा किया कि सरकार गुनहगारों को अरेस्ट करेगी और इंसाफ मिलेगा. बात इतनी सीरियस हो गई कि उन्हें पत्थर मारे गए और माथे पर चोट लगी, जिससे बहुत खून बहने लगा.” वाजपेयी, जो उस समय मोरारजी देसाई कैबिनेट में विदेश मंत्री थे, प्रोटेस्ट वाली जगह पर मौजूद थे.
भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया गया. भगत और उनके दोस्तों ने नेशनल म्यूजियम में पनाह ली. उन्होंने अपने पिता, जो खुद भी एक पुलिस ऑफिसर थे, को इस घटना के बारे में नहीं बताया क्योंकि वह एक सख्त पेरेंट थे.
लेकिन भगत के आंदोलन ने उन्हें केस के इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर वी.पी. गुप्ता तक पहुंचाया. “मैं भी बाद में क्राइम ब्रांच में शामिल हो गया, जहां वी.पी. गुप्ता पोस्टेड थे.”
अब 66 साल के भगत कहते हैं कि दिल्ली पुलिस एकेडमी में, जहां युवा ऑफिसर ट्रेनिंग के लिए आते हैं, सबसे पहले वे दिल्ली पुलिस द्वारा सुलझाए गए ज़रूरी केस देखते हैं और इंदिरा गांधी और महात्मा गांधी की हत्या की केस फाइलों के ठीक बगल में बिल्ला-रंगा केस भी है.
‘विनोद’ और ‘हरभजन’
जब शहर में हंगामा हो रहा था—चोपड़ा भाई-बहनों की घबराहट भरी तलाश से लेकर उनकी मौत का पता चलने के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों तक—बिल्ला और रंगा इंसाफ से बचने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे.
सरसों के रंग की फिएट छोड़ने के बाद, दोनों छिप गए. वे दिल्ली और आगरा में सस्ते लॉज और गेस्ट हाउस में घूमते रहे. उन्हें कुछ बार पुलिस ने रोका भी, लेकिन हर बार वे भागने में कामयाब रहे. जैसे ही लोकल मकान मालिकों, डॉक्टरों या पुलिस को शक होता, वे बार-बार अपनी जगह बदल लेते थे.
लेकिन, जिन सुरागों से आखिरकार उनकी गिरफ्तारी हुई, वे क्राइम वाली रात से ही बनने लगे थे.
26 अगस्त की रात करीब 10:15 बजे, बिल्ला—बच्चों के साथ झड़प में घायल—अपने माथे पर पांच इंच के साफ घाव के लिए इमरजेंसी केयर लेने के लिए, अपना नाम ‘विनोद’ बताते हुए विलिंगडन हॉस्पिटल गया. रंगा उसके साथ था. उसने अपना नाम ‘हरभजन सिंह’ बताया.
क्योंकि यह एक मेडिको-लीगल केस था, इसलिए हॉस्पिटल में ड्यूटी पर मौजूद कांस्टेबल रणबीर सिंह ने उससे चोट के बारे में पूछा. ‘विनोद’ ने उसे बताया कि बंगला साहेब मार्ग पर काली मंदिर के पास दो-तीन लोगों ने उसकी घड़ी छीन ली थी और उसे घायल कर दिया था. कांस्टेबल ने ‘हरभजन’ से भी पूछताछ की, जिसने दावा किया कि वह ‘विनोद’ को अपनी कार में लाया था, जिसका नंबर “DHT 280” था, जो घटनास्थल से आई थी.
कांस्टेबल ने मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन को इन्फॉर्म किया. ‘विनोद’ और ‘हरभजन’ को पुलिस को उस जगह पर ले जाने के लिए कहा गया. जांच करने पर, पुलिस को संघर्ष के कोई निशान या खून के धब्बे नहीं मिले. दोनों लोगों को पुलिस स्टेशन आने के लिए कहा गया, लेकिन वे कभी नहीं आए. उन्होंने जो पते दिए थे, वे भी गलत पाए गए.
हालांकि, बिल्ला का हॉस्पिटल जाना बाद में बहुत ज़रूरी साबित हुआ. उसकी जांच करते समय, असिस्टेंट कैजुअल्टी मेडिकल ऑफिसर डॉ. यास्मीन इमाम ने खोपड़ी का एक्स-रे ऑर्डर किया और एक्स-रे ऑथराइजेशन पर ‘विनोद’ के बाएं अंगूठे का निशान लिया. यह अंगूठा और एक्स-रे आगे चलकर केस में एक कनेक्टिंग लिंक बन गए.

अखबार में छपी एक तस्वीर
8 सितंबर, 1978 की रात को, लांस नायक गुरतेज सिंह और ए. वी. शेट्टी, दूसरे मिलिट्री वालों के साथ कालका मेल के एक रेलवे डिब्बे में सफर कर रहे थे जिसे अब नेताजी एक्सप्रेस के नाम से जाना जाता है. जैसे ही ट्रेन आगरा सिटी रेलवे स्टेशन पर पहुंचने से पहले जमुना ब्रिज के पास पहुंची और थोड़ी धीमी हुई, दो आम लोग अंदर आ गए.
दिल्ली हाई कोर्ट के ऑर्डर में बताई गई केस डायरी में लिखा था, “उन्हें डिब्बे में अंदर न जाने के लिए कहा गया क्योंकि वह सिर्फ मिलिट्री वालों के लिए था. एक आम आदमी ने लांस नायक से कहा कि वे भी मिलिट्री से हैं. उनसे अपने आइडेंटिटी कार्ड दिखाने को कहा गया.”
लेकिन जल्द ही सैनिकों को यह साफ हो गया कि दोनों झूठ बोल रहे थे. उन्हें लगा कि वे चोर या लुटेरे हैं, इसलिए दोनों लांस नायक ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया. इत्तेफाक से, लांस नायक शेट्टी के पास हिंदी अखबार नवयुग था, जिसमें बिल्ला की तस्वीरें थीं. फोटो देखते ही वह समझ गए कि वे कौन हैं. कुछ ही सेकंड में उन्होंने मान लिया. बिल्ला और रंगा आखिरकार पकड़े गए.
जब ट्रेन कुछ घंटों बाद दिल्ली पहुंची, तो मिलिट्री वालों ने उन्हें पुलिस को सौंप दिया. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जिसे आज भी एक ऐतिहासिक तलाशी के तौर पर देखा जाता है.
पूरी जांच में फोरेंसिक अहम था. गिरफ्तारी के बाद एक फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने एक्स-रे स्लिप पर अंगूठे के निशान का मिलान बिल्ला के स्पेसिमेन प्रिंट से किया. उसे खोपड़ी का एक्स-रे भी करवाया गया, जिससे साबित हुआ कि बिल्ला और ‘विनोद’ एक ही व्यक्ति थे.

सीबीआई की सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के पूर्व डायरेक्टर डॉ. वी.एन. सहगल ही थे, जो सभी अहम सबूतों को एक साथ जोड़ने में कामयाब रहे. सहगल 2022 में गुज़र गए. परिवार के एक सदस्य ने दिप्रिंट को बताया, “मैं बचपन से ही ये कहानियां सुनता आया हूं कि कैसे फिंगरप्रिंट जैसे ज़रूरी सबूत इकट्ठा किए जाते थे और उनका मिलान किया जाता था, उस समय जब साइंटिफिक सबूतों का पता लगाना मुश्किल था.”
सहगल इंटरपोल का भी हिस्सा थे और अपनी फोरेंसिक रिसर्च के लिए दुनिया भर में घूमते थे. वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या और 1993 के बॉम्बे ब्लास्ट जैसे मामलों की जांच में शामिल थे.
एसीपी वेद प्रकाश ने 1984 में दिल्ली पुलिस ट्रेनिंग एकेडमी में एक युवा असर के तौर पर इस केस के आईओ वी.पी. गुप्ता से ट्रेनिंग ली थी.
प्रकाश याद करते हैं, “गुप्ता सर ने इस केस के बारे में विस्तार से बात की थी. उस समय, कोई सीसीटीवी, कॉल डिटेल या डिजिटल फुटप्रिंट नहीं थे. साइंटिफिक सबूत इतने ज़्यादा रिकॉर्ड नहीं किए जा रहे थे, लेकिन इस केस में, जब पुलिस ने फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड किया, तो इससे उन्हें सज़ा हुई.”
उन्हें सालों बाद गुप्ता के साथ उनकी ट्रेनिंग के दौरान क्राइम स्पॉट पर जाना भी याद है. “रिज बहुत बदल गया है. एक पुलिस पोस्ट बन गई है. वहां सीसीटीवी हैं, ऐसी दीवारें हैं जिन पर चढ़ा नहीं जा सकता. हर बार जब मैं रिज पार करता हूं, तो यह डरावनी यादें वापस ले आता है. यह पूरी ज़िंदगी ताज़ा रहता है.”
एसीपी प्रकाश ने 2012 के निर्भया रेप केस की जांच में मदद की थी.

कबूलनामा
रंगा और बिल्ला के कबूलनामों ने यह दिखाया कि वे मजबूरी में चोरी करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि पुराने और शातिर अपराधी थे.
अदालत ने कहा था कि बिल्ला “कारें चुराने में काफी माहिर था”. अदालत ने यह भी कहा कि वह दो अरब नागरिकों की हत्या के मामले में बॉम्बे पुलिस को वांछित था. दोनों पांच मामलों में संयुक्त रूप से बॉम्बे पुलिस को वांछित थे. अदालत के अनुसार, वे “डकैती करने के इरादे” से दिल्ली आए थे. उन्होंने अपने साथ किरपानें रखी थीं और कारों के लिए नकली नंबर प्लेट भी तैयार कर रखी थीं.
बिल्ला ने पुलिस के सामने कबूल किया था, “…26 अगस्त को कनॉट प्लेस में घूमते समय मेरी रंगा से बात हुई. मैंने उससे कहा कि हम यहां भी घरों में उसी तरह डकैती करना शुरू करेंगे, जैसे बॉम्बे में करते थे. मैंने उससे कहा कि अब हम अपनी कार में किसी को लिफ्ट देंगे और फिर उसे लूटेंगे.”
दिल्ली हाई कोर्ट ने 1979 के अपने फैसले में कहा था कि दोनों “ऐसे खतरनाक अपराधी थे जिन्हें हत्या करने में कोई हिचक नहीं थी.”
अदालत ने कहा, “जब उन्हें लगा कि अगवा किए गए बच्चों के पिता, जो नौसेना अधिकारी थे, को लूटना जोखिम भरा होगा और वह अपनी रिवॉल्वर का प्रभावी इस्तेमाल कर सकते हैं, तो अपीलकर्ताओं ने पहचान से बचने के लिए बच्चों को खत्म करने का फैसला कर लिया.”
दोनों ने संजय की किरपानों से हमला कर हत्या कर दी. उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर 21 चोटें थीं. इसके बाद उन्होंने गीता के साथ बलात्कार किया, उसकी हत्या कर दी और उसका शव झाड़ियों में फेंक दिया.
अदालत ने आगे कहा, “स्पष्ट है कि अपराध करते समय अपीलकर्ताओं को एक क्रूर और विकृत आनंद मिल रहा था.”
हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि “अगर पुलिस ने समय पर कार्रवाई की होती तो दोनों बच्चों की जान बचाई जा सकती थी.”
ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फांसी की सज़ा को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने कहा, “वास्तव में, मौत की सज़ा के अलावा कोई दूसरी सज़ा देना न्याय की पूरी तरह विफलता होगी.”
फांसी
“बिल्ला-रंगा को फांसी होगी” — हिंदुस्तान टाइम्स ने 9 दिसंबर 1980 को यह खबर पहले पन्ने पर प्रकाशित की थी.
बिल्ला और रंगा से जुड़ी खबरें लगभग हमेशा पहले पन्ने पर छपती थीं. 27 जनवरी 1982 को द इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर की हेडलाइन दी थी—“रंगा की नई दया याचिका”. इसमें बताया गया था कि रंगा ने राष्ट्रपति को नई याचिका भेजकर जेल में कड़ी मेहनत वाला काम करने की इच्छा जताई थी और अपना मामला बिल्ला से अलग करने की मांग की थी.
पत्रकार प्रकाश पात्रा ने हाल ही में दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पढ़ाई पूरी की थी और 1980 में जब वह नेशनल हेराल्ड से जुड़े, तब उनकी उम्र सिर्फ 22 साल थी. भुवनेश्वर के रहने वाले पात्रा ने देखा था कि बिल्ला-रंगा मामला किस तरह सामने आया.
हालांकि, पात्रा ने खुद इस मामले की रिपोर्टिंग नहीं की थी, लेकिन उन्होंने उपराज्यपाल कार्यालय और गृह सचिव से अनुमति लेकर दोषियों का इंटरव्यू करने की कोशिश की. रंगा ने मना कर दिया, लेकिन बिल्ला मीडिया इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो गया. हिंदुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर प्रभा दत्त पहले ही सुप्रीम कोर्ट से इंटरव्यू की अनुमति मांग चुकी थीं.
फांसी की तारीख मीडिया को नहीं बताई गई थी, लेकिन पत्रकारों को तिहाड़ जेल के अपने सूत्रों से जानकारी मिल गई थी.
पात्रा ने दिप्रिंट को बताया, “मैं उत्सुक भी था और घबराया हुआ भी. बिल्ला कौन है? वह कैसा दिखता है? उसकी आवाज़ कैसी है? मैं यह सब जानना चाहता था.”
वह अकेले नहीं थे. 30 जनवरी 1982 को वह प्रभा दत्त, उषा राय और विनोद शर्मा जैसे अन्य पत्रकारों के साथ एक लोहे की जाली के सामने खड़े होकर बिल्ला का इंटरव्यू कर रहे थे.
पात्रा याद करते हैं, “कई महीनों के इंतज़ार के बाद हमने बिल्ला को देखा. वह सो रहा था और अभी-अभी उठा था. वह दुबला-पतला था. जब हमने उससे बात शुरू की, तो वह सिर्फ इतना कहता रहा—‘मैंने कुछ नहीं किया.’ यह किसी एकालाप जैसा लग रहा था. उसने पंजाबी में कहा, ‘रब (भगवान) जानता है कि मैं हत्यारा नहीं हूं.’ इंटरव्यू में प्रभा दत्त का दबदबा था. उस समय कई लोगों को शक था कि उन्हें फंसाया गया है, क्योंकि किसी न किसी को दोषी ठहराना ज़रूरी था.”
जब तक पात्रा की इंटरव्यू वाली रिपोर्ट छपी, तब तक बिल्ला और रंगा को फांसी दी जा चुकी थी.
तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील गुप्ता उस समय सिर्फ 23 साल के थे. 31 जनवरी 1982 की आधी रात को रंगा और बिल्ला लगभग 20 जेल अधिकारियों की मौजूदगी में पूरी खामोशी के साथ फांसीघर तक पहुंचे.
जनवरी की ठंड के बावजूद गुप्ता को याद है कि उन्हें पसीना आ रहा था और वह बहुत घबराए हुए थे. एक युवा अधीक्षक के रूप में यह पहली बार था जब वह किसी फांसी को अपनी आंखों से देख रहे थे.
दशकों बाद भी वह दृश्य उनकी यादों में ताज़ा है.
गुप्ता बताते हैं, “रंगा ने जोर से नारा लगाया, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल.’ बिल्ला शांत था. जब उनके चेहरों पर काले कपड़े डाले गए तो वह रो पड़ा.”
जब जल्लादों ने लीवर खींचा, तो दोनों नीचे बने 15 फुट गहरे कुएं में गिर गए.
मध्यम कद-काठी वाला बिल्ला तुरंत मर गया, लेकिन दुबले-पतले रंगा की फांसी के दो घंटे बाद भी नब्ज़ चल रही थी. आखिरकार जेल के एक कर्मचारी ने नीचे से उसके पैर खींचे और उसकी गर्दन में फंदा और कस दिया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई.
गुप्ता 1981 में जेल सेवा में आए थे. उन्होंने अखबारों में बिल्ला-रंगा मामले के बारे में पढ़ा था और उनसे मिलने को लेकर डरे हुए थे.
वह बताते हैं, “मैं खुद से कहता था कि शांत रहो. जब मैं बिल्ला से मिला, तो वह मज़ाकिया था. लोगों को हंसाने के लिए वह कहता था, ‘बिल्ला खुश.’”
गुप्ता ने बताया कि बिल्ला अक्सर रंगा को चिढ़ाता था, जबकि रंगा ज्यादा बात नहीं करता था.
“कई बार दोनों को साथ रखा जाता था. कभी-कभी वे आपस में झगड़ भी पड़ते थे. बिल्ला अक्सर रंगा को दोष देता था कि वे जेल में कैसे पहुंचे. वह हमें बताता था कि उनकी योजना लोगों से पैसे ऐंठने की थी, लेकिन महिला को निशाना बनाने का काम रंगा ने किया था.”
सदमा आज भी ज़िंदा है
सालों बाद, 2006 में, जब वकील रामचंद्रन की पत्नी जो अब नहीं रहीं मदन मोहन चोपड़ा से मिलीं. रामचंद्रन कहते हैं, “मेरी पत्नी और मिस्टर चोपड़ा डीपीएस में बोर्ड ऑफ एजुकेशन में थे. जब वह पहली बार उनसे मिलीं, तो वह इस बात से बहुत प्रभावित हुईं कि वह एक शांत इंसान थे. इतनी बड़ी त्रासदी के सामने उनका धैर्य और उन्होंने अपनी ज़िंदगी अच्छे और सामाजिक कामों के लिए कैसे समर्पित कर दी थी, यह सब देखकर वह बहुत प्रभावित हुईं. मिस्टर चोपड़ा के साथ उन मुलाकातों ने मेरी गुज़र चुकी पत्नी पर बहुत असर डाला…”
क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट रजत मित्रा उस समय स्टूडेंट थे और बाद में उन्होंने चोपड़ा परिवार के साथ एक विक्टिमोलॉजी प्रोजेक्ट पर काम किया. वह कहते हैं, “चोपड़ा किडनैपिंग ने रातों-रात दिल्ली की मासूमियत को तोड़ दिया, जिससे शहर का पब्लिक सेफ्टी के साथ रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया.” रहने वालों की एक पीढ़ी के लिए, “लिफ्ट लेने” का आम कल्चर तुरंत गायब हो गया क्योंकि डर ने उन पर कब्ज़ा कर लिया था.
मित्रा की बहन गीता के कॉलेज में प्रोफेसर थीं. वह याद करते हैं कि ट्रॉमा की वजह से कैंपस में सन्नाटा छा गया था. “दिन के उजाले में भी, स्टूडेंट्स को चलने में डर लगता था. परमानेंट पुलिस पिकेट तैनात रहती थीं.”
कई साल बाद, 2001 में, जब वह एक विक्टिमोलॉजी प्रोजेक्ट शुरू कर रहे थे, तो उनकी मुलाकात मदन मोहन चोपड़ा से हुई. “वह दुख में डूबे रहे…एक ऐसे समाज से मानसिक रूप से थक चुके थे जिसने शुरू में दया के बजाय जांच-पड़ताल की.”
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