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Thursday, 25 June, 2026
होमफीचरUP के ताहिर ने इतिहास को बिना नुकसान पहुंचाए कैसे की हड़प्पाकालीन कंकालों को निकालने में ASI की मदद

UP के ताहिर ने इतिहास को बिना नुकसान पहुंचाए कैसे की हड़प्पाकालीन कंकालों को निकालने में ASI की मदद

इस महीने जब राखीगढ़ी के कंकालों को निकाला जाना था, तब ASI ने यूपी के सिनौली के औज़ार निर्माता ताहिर हुसैन को बुलाया.

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बागपत: हड़प्पा काल के कंकाल आसानी से अपने राज़ नहीं खोलते. हरियाणा में हड़प्पा सभ्यता के विशाल शहर राखीगढ़ी में पुरातत्वविदों को हाल ही में एक ऐसी समस्या का सामना करना पड़ा जिसे कोई भी मैनुअल आसानी से हल नहीं कर सकता था—हज़ारों साल पुराने कंकालों को सुरक्षित रूप से निकालना.

165 साल पुरानी संस्थागत विरासत के साथ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पास पुरातत्वविदों और संरक्षण विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम और भरपूर अनुभव था. कमी बस इस बात की थी कि कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जिसके पास ज़मीन से इंसानों के हज़ारों साल पुराने अवशेषों को बिना नुकसान पहुंचाए निकालने का अनोखा अनुभव हो.

राखीगढ़ी में खुदाई वाली जगहों के नीचे 4,000 साल पुराने हड़प्पा काल के आठ नाज़ुक कंकाल दबे हुए थे. उन्हें खोदकर निकालना एक चुनौती थी और उन्हें बिना तोड़े-फोड़े सुरक्षित बाहर निकालना दूसरी चुनौती. एएसआई की टीम ने वह किया जो फील्ड आर्कियोलॉजी में शायद ही कभी किया जाता है—उन्होंने इस मुश्किल काम को करने के लिए बाहरी मदद ली.

मई में, उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के सिनौली गांव में रहने वाले 49 साल के ताहिर हुसैन को बुलाया गया. मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएट हुसैन के पास आर्कियोलॉजी की कोई औपचारिक ट्रेनिंग तो नहीं है, लेकिन आर्कियोलॉजिस्ट के बीच वे एक खास वजह से जाने जाते हैं.

राखीगढ़ी खुदाई के डायरेक्टर और आर्कियोलॉजिस्ट मनोज सक्सेना ने कहा, “हमने कंकालों को निकालने के लिए हुसैन और उनकी टीम को बुलाया, ताकि उन्हें एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, कोलकाता भेजा जा सके. उनकी टीम पहले भी इस तरह का काम कर चुकी है और उन्हें पता है कि इसे कैसे करना है.”

एएसआई ने तीन पूरे इंसानी कंकाल और दूसरी कब्रों से मिले कंकालों के टुकड़ों को एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सौंप दिया है.

22 जून को संस्कृति मंत्रालय के बयान में कहा गया, “उम्मीद है कि राखीगढ़ी से मिले अवशेष दुनिया की सबसे शुरुआती शहरी सभ्यताओं में से एक की उत्पत्ति, स्वास्थ्य, लोगों की आवाजाही और जैविक इतिहास को समझने में अहम योगदान देंगे.”

राखीगढ़ी स्थल पर अपने दोस्तों सुनील जानी और समून के साथ ताहिर हुसैन | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
राखीगढ़ी स्थल पर अपने दोस्तों सुनील जानी और समून के साथ ताहिर हुसैन | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

एएसआई के खुदाई के नियमों में यह नहीं सिखाया जाता कि मिट्टी से कंकाल को कैसे निकाला जाए. अपनी संस्थागत ताकत के बावजूद, एएसआई अक्सर ऐसे लोगों की मदद लेती है जो पुरातत्व विभाग के औपचारिक कर्मचारियों का हिस्सा नहीं होते. खुदाई वाली जगहों पर, स्थानीय कारीगर, मैकेनिक, बढ़ई और खुद से सीखने वाले उत्साही लोग चुपचाप ऐसी समस्याओं को हल करते हैं जिनका समाधान किताबों और ट्रेनिंग मैनुअल में नहीं मिलता. यहीं पर ताहिर हुसैन जैसे लोगों की भूमिका अहम हो जाती है—एक टूलमेकर जो नाजुक कब्रों से कंकाल निकालने और खुदाई में मिली प्राचीन वस्तुओं को सुरक्षित निकालने के काम में एएसआई के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक बन गए.

सिनौली के कब्रिस्तान से लेकर राखीगढ़ी की विशाल साइट तक, उनका अनोखा सफर यह दिखाता है कि भारत की कुछ सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजें क्लासरूम के बजाय वर्कशॉप और फील्ड में सीखी गई विशेषज्ञता पर कैसे निर्भर रही हैं.

दशकों से, इंजीनियर, शिक्षक, मछुआरे और स्थानीय ग्रामीण एएसआई के गुमनाम योद्धा रहे हैं, जिन्होंने बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के मुश्किल इलाकों में काम किया है. ताहिर की चार लोगों की टीम में सभी के काम अलग-अलग हैं—टूलमेकर, बढ़ई, मिट्टी उठाने वाला और पुरातत्वविद्. सभी के पास पहले का अनुभव है. इसकी शुरुआत 2005 में सिनौली की खुदाई से हुई और फिर 12 साल के अंतराल के बाद 2018 में दोबारा काम शुरू हुआ.

इस बार राखीगढ़ी में भी काम उतना ही नाजुक था.

हुसैन ने सिनौली की मशहूर साइट से 7 किमी दूर बड़ौत की तंग गलियों में अपनी दुकान, भारत टूल्स में बैठे हुए कहा, “हड़प्पा काल के आठ कंकाल, एक टीला और गलती की कोई गुंजाइश नहीं. एक गलत हरकत से अवशेष टूटकर बिखर सकते थे.”

पुरातत्वविद् संजय मंजुल और वी.एन. प्रभाकर की ओर से टूल बनाने के काम के लिए ताहिर को मिला प्रशंसा पत्र | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
पुरातत्वविद् संजय मंजुल और वी.एन. प्रभाकर की ओर से टूल बनाने के काम के लिए ताहिर को मिला प्रशंसा पत्र | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

एक नाज़ुक काम

मई के आखिरी हफ्ते में, हुसैन बड़ौत में अपनी टूल शॉप पर ग्राहकों से बात कर रहे थे, तभी उनका फोन बजा.

दूसरी तरफ आर्कियोलॉजिस्ट दीपक कुमार थे.

कुमार ने उनसे कहा, “हमें कंकाल निकालने के लिए आपकी ज़रूरत है. जल्दी से आ जाइए.” यह फोन राखीगढ़ी से आया था, जो उनके घर से लगभग 150 किलोमीटर दूर है.

कुछ ही घंटों में, हुसैन ने अपनी टीम इकट्ठा करना शुरू कर दिया. उन्होंने सिनौली के अपने दोस्तों, समून और सुनील जानी को फोन किया, जो अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त थे. आर्कियोलॉजी के लिए उनका जुनून ही उन्हें एक टीम बनाता है. जल्द ही, तीनों राखीगढ़ी के लिए बस में सवार हो गए.

जब वे टीला नंबर 7 पर पहुंचे, तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी. कई कब्रें खोजी गई थीं, लेकिन सिर्फ चार कंकाल ही इतने सही-सलामत थे कि उन्हें निकाला जा सके. बाकी कंकाल ज़मीन के नीचे सदियों में टूट-फूटकर बिखर चुके थे.

एएसआई अधिकारियों ने उन चार पूरे कंकालों को, साथ ही कब्र में रखी चीज़ों को सुरक्षित निकालने का फैसला किया.

लेकिन असली चुनौती उनके पैरों के नीचे थी. सिनौली की सघन मिट्टी के उलट, राखीगढ़ी प्राचीन दृषद्वती नदी के पुराने बहाव-क्षेत्र (पेलियोचैनल) के पास बसा है. यहां की मिट्टी रेतीली और ढीली है, जिससे पूरी कब्र को एक ही टुकड़े में निकालना बहुत मुश्किल हो जाता है.

9 जून को साइट से लौटने के बाद हुसैन ने दिप्रिंट को बताया, “हमारा पूरा प्रोसेस इस बात पर निर्भर करता है कि मिट्टी कंकाल को कितना सहारा दे सकती है.”

किसी भी कब्र को छूने से पहले, टीम ने मिट्टी की हालत पर घंटों चर्चा की और लकड़ी के उन तख्तों की चौड़ाई तय की जो बाद में प्राचीन अवशेषों को सहारा देंगे.

हुसैन ने कहा, “उसके बाद ही यह मेहनत वाला काम शुरू हुआ.”

हर कंकाल की खुली सतह को पहले बबल शीट से ढका गया और प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की एक परत से सील किया गया. फिर हुसैन की टीम ने सावधानी से आस-पास की तीन-चार फीट मिट्टी हटाई. किनारों को जूट की बोरियों और PoP की अतिरिक्त परतों से मज़बूत किया गया.

जैक का इस्तेमाल करके, पूरे ब्लॉक को धीरे-धीरे ऊपर उठाया गया, जबकि नीचे के हिस्से को और प्लास्टर से स्थिर किया गया. आखिरकार, एक क्रेन ने मज़बूत किए गए स्ट्रक्चर को उठाया, जिससे अंदर के कंकाल को बिना नुकसान पहुंचाए उसे सुरक्षित रूप से ले जाया जा सका.

इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी, उत्तर प्रदेश के सिनौली में अपनी टूल शॉप पर ताहिर हुसैन के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी, उत्तर प्रदेश के सिनौली में अपनी टूल शॉप पर ताहिर हुसैन के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

हुसैन और उनकी टीम के लिए यह काम सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक जुनून है.

सुनील जानी, जो एक बढ़ई हैं और अपने गांव की दुकान पर बैठे थे, उन्होंने कहा, “हमारा कोई पुरातत्व का बैकग्राउंड नहीं है. हम सभी का अपना-अपना काम-धंधा है, लेकिन हम इस काम के लिए पूरी तरह समर्पित हैं. हमारे लिए पुरातत्व एक जुनून है, और अपने जुनून को जीने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता.” उन्होंने यह भी कहा कि यह पूरी टीम की कोशिश है.

पुरातत्वविद् दीपक कुमार के अनुसार, यह काम इसलिए सफल होता है क्योंकि टीम का हर सदस्य अलग-अलग हुनर लेकर आता है.

कुमार ने बताया कि ताहिर मिट्टी के घनत्व को समझते हैं. समून दफन चीज़ों के लिए लोहे के फ्रेम बनाने में माहिर हैं. सुनील एक बढ़ई हैं जो लकड़ी के सपोर्ट बॉक्स बनाते हैं.

एएसआई के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी से पढ़े कुमार ने कहा, “हमारा एकमात्र लक्ष्य किसी पुरानी चीज़ को बिना कोई नुकसान पहुंचाए निकालना है. यह बहुत ही नाज़ुक और मुश्किल काम है.”

पुरातत्व से जुड़ाव

हुसैन का पुरातत्व से जुड़ाव तब शुरू हुआ जब 1993 की फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ के एक सीन ने उन्हें प्रेरित किया. फिल्म में, खुदाई करने वाले ब्रश का इस्तेमाल करके वेलोसिराप्टर (एक तरह का डायनासोर) का कंकाल निकालते हैं.

उन्होंने याद करते हुए कहा, “मैं खुदाई का वह छोटा सा सीन कभी नहीं भूल सकता, जिसने पुरातत्व में मेरी दिलचस्पी जगाई.”

हुसैन का जन्म 1977 में सिनौली गांव में औज़ार बनाने वाले एक परिवार में हुआ था और यह उस समय की बात है जब इस गांव पर दुनिया का ध्यान नहीं गया था. पुरातत्व की पूरी दुनिया सिनौली के नीचे दबी सभ्यता से अनजान थी.

लेकिन हुसैन को मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं के बारे में पढ़ने में दिलचस्पी थी और वे अक्सर दिल्ली के नेशनल म्यूज़ियम जाते थे, जहां उन्होंने पहली बार हड़प्पा सभ्यता की पुरानी चीज़ें देखी थीं.

2004 में, जब उनके चचेरे भाई समून खेत में काम कर रहे थे, तो उन्हें उस जगह से कुछ पुरानी चीज़ें (आर्टिफैक्ट्स) मिलीं. शाम को हुसैन को इस बारे में पता चला और वे समून से मिलने गए.

हुसैन ने कहा, “जब मैंने मिट्टी के बर्तन देखे, तो वे बिल्कुल वैसे ही थे जैसे मैंने नेशनल म्यूज़ियम में देखे थे. मेरे अलावा गांव में किसी को भी उनकी अहमियत का पता नहीं था. मैंने अपनी पत्नी से कहा—देखना, अब इस गांव में कुछ बड़ा होने वाला है.” उन्होंने आगे कहा कि उस रात वे सो भी नहीं पाए थे.

अगली सुबह, वे जल्दी से ‘दैनिक जागरण’ के ऑफिस पहुंचे और जल्द ही स्थानीय अखबार में सिनौली से मिट्टी के बर्तनों और इंसानी कंकालों के अचानक मिलने की खबर छपी.

इतिहासकार नयनजोत लाहिड़ी, उत्तर प्रदेश के सिनौली में अपनी टूल शॉप पर ताहिर हुसैन के साथ | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

हुसैन यहीं नहीं रुके. वे दिल्ली गए और पुरातत्वविद् डी.वी. शर्मा से मिले, जिन्होंने बाद में पहली बार उस जगह की खुदाई की.

डी.वी. शर्मा ने सिनौली में खुदाई 2005-06: ऊपरी गंगा-यमुना दोआब में हड़प्पाकालीन कब्रिस्तान नाम के एक पेपर में लिखा, “इस (खबर) ने हमें उस जगह का मुआयना करने के लिए प्रेरित किया.”

खबर आने के एक साल बाद, अगस्त 2005 में खुदाई शुरू हुई और हुसैन ने एएसआई के लिए मज़दूर के तौर पर काम किया. वहां उनकी मुलाकात जूनियर पुरातत्वविद् मिलन चावले से हुई, जिन्होंने उनसे एक ऐसा तेज़ चाकू मांगा जिसकी धार कभी कम न हो.

हुसैन ने कहा, “क्योंकि मेरा बैकग्राउंड औज़ार बनाने का रहा है, इसलिए मैंने पहली बार चावले के लिए कार्बाइड मेटल का चाकू बनाया और फिर डीवी शर्मा के लिए गैती बनाई, जिसका इस्तेमाल पहली बार सिनौली की खुदाई में किया गया था.”

एक साल तक चली इस खुदाई में 116 कब्रें मिलीं और उनमें से ज़्यादातर कब्रों में शव पूरी तरह से सीधे लेटे हुए थे और उनके कंकाल भी पूरे थे.

कंकालों से हुसैन का यह पहला अनुभव था.

लंबा इंतज़ार

कंकालों के दोबारा मिलने के लिए हुसैन को 12 साल तक इंतज़ार करना पड़ा. इस बीच, उन्होंने एएसआई के हेडक्वार्टर जाकर अधिकारियों से सिनौली में खुदाई शुरू करने की गुज़ारिश की. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

हुसैन ने कहा, “2005 में यह साबित हो गया था कि सिनौली कोई आम जगह नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जगह है. लेकिन एएसआई ने लंबे समय तक इस पर ध्यान नहीं दिया.”

डीवी शर्मा ने अपने पेपर में बताया कि भारत में सिनौली जैसी जगह न तो पहले कभी मिली थी और न ही उसकी खुदाई हुई थी.

पेपर में कहा गया, “सिनौली में मिले पुरातात्विक सबूतों के आधार पर ऐसा लगता है कि सिनौली की भौतिक संस्कृति, ऊपरी गंगा-यमुना दोआब में हड़प्पा सभ्यता का पूर्वी क्षेत्रीय रूप थी.”

2018 में, संजय मंजुल और पुरातत्वविद् अरविंद मंजुल ने सिनौली से 26 किमी दूर बरनावा में खुदाई शुरू की. हुसैन का दावा है कि वे बार-बार बरनावा गए और मंजुल से सिनौली में खुदाई करने का अनुरोध किया.

बाद में, मंजुल ने सिनौली में एक ट्रेंच लगाया और वहां कई कब्रें और एक रथ खोज निकाला. खुदाई के दौरान, हुसैन की मुलाकात पुरातत्वविद् विनय कुमार रॉय से हुई, जिन्होंने उन्हें एएसआई के लिए पुरातात्विक उपकरण बनाने का सुझाव दिया.

हुसैन ने दावा किया, “रॉय ने मुझे उपकरण बनाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने मुझे उपकरणों के आकार और साइज़ के बारे में सुझाव दिया. यह मेरी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.” हालांकि, रॉय ने इन दावों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

बागपत में अपनी दुकान पर ताहिर हुसैन | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
बागपत में अपनी दुकान पर ताहिर हुसैन | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

मंजुल की टीम को दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व (BCE) के ताबूत, तांबे की ढालें और रथ मिले. उनके अनुसार, सिनौली का समुदाय हड़प्पा सभ्यता से अलग था.

मंजुल ने 2023 में दिल्ली के नेशनल म्यूज़ियम में कहा था, “यमुना बेल्ट की संस्कृति अलग तरह की है और सिनौली में 90 प्रतिशत चीज़ें स्थानीय हैं. सिनौली की संस्कृति पर हड़प्पा का प्रभाव केवल 10 प्रतिशत के आसपास है.”

कब्रों को हटाने के लिए फिर से हुसैन की टीम को बुलाया गया. सिनौली में यह काम थोड़ा आसान था क्योंकि वहां की मिट्टी काफी सघन है. दो दशकों से ज़्यादा समय में, हुसैन पुरातत्व में दिलचस्पी रखने वाले एक आम ग्रामीण से बदलकर एएसआई के लिए सबसे मुश्किल और नाज़ुक कामों को करने वाले खास व्यक्ति बन गए हैं. वे भारत के प्राचीन मृत लोगों और उन्हें समझने की कोशिश कर रहे वैज्ञानिकों के बीच एक अनोखी कड़ी बन गए हैं.

मंजुल ने 2021 में ‘सीक्रेट्स ऑफ सिनौली’ नाम की डिस्कवरी डॉक्यूमेंट्री में कहा, “दफनाने की वह जगह अनोखी थी, इसलिए हम उसे नष्ट नहीं करना चाहते थे, इसके बजाय, हमने उसे सुरक्षित उठाने की योजना बनाई. खुदाई वाली जगह पर इस तरह का प्रयोग पहले कभी नहीं किया गया था. वह जगह बहुत नाज़ुक हालत में थी, जिससे उसे उठाना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण काम था.”

मंजुल ने बताया कि चीज़ों को उठाने की प्रक्रिया के दौरान हमने नए और अनोखे तरीके अपनाए.

मंजुल ने कहा, “मिट्टी को एक साथ बनाए रखने के लिए हमने दफनाने की उस जगह को चारों तरफ से पट्टियों (बैंडेज) में लपेट दिया.”

ASI के लिए औज़ार बनाने वाले

गर्मी के एक दिन बड़ौत में अपनी दुकान में बैठे हुसैन औज़ारों की एक लिस्ट देख रहे थे. यह ऑर्डर एएसआई के औरंगाबाद सर्कल से आया था—इसमें खुदाई के 16 औज़ार थे, जिनमें स्क्रैपर, खुदाई के स्केल और खास तरह की कीलें शामिल थीं.

पिछले कुछ सालों में, वे एएसआई के लिए ऐसे उपकरणों के सप्लायर बन गए हैं. खुदाई के हर सीज़न में, पुरातत्वविदों के काम शुरू करने से पहले, हुसैन को देश भर के अलग-अलग एएसआई सर्कलों से फोन आते हैं और हर बार अलग-अलग मांग होती है.

हुसैन ने कहा, “2018 से मैं एएसआई को खुदाई के लिए औज़ार सप्लाई कर रहा हूं. खुदाई करने वालों को जिस चीज़ की भी ज़रूरत होती है, मैं उसे बनाने की कोशिश करता हूं. आज, मेरे बनाए औज़ारों का इस्तेमाल भारत के अतीत को खोजने में किया जा रहा है.”

हुसैन ने कभी पुरातत्व के लिए औज़ार बनाने की ट्रेनिंग नहीं ली थी. उन्होंने पुरातत्वविदों की बातें सुनकर, उनकी समस्याओं को समझकर और फिर अपनी वर्कशॉप में प्रयोग करके यह काम सीखा.

हुसैन ने कहा, “मुझे पुरातत्व से जुड़े औज़ार बनाने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन एएसआई के निर्देशों और मांगों के अनुसार मैंने उन्हें बनाने की कोशिश की है.”

जल्द ही, उनके औज़ार पश्चिमी उत्तर प्रदेश से दूर-दूर तक पहुंचने लगे. हैदराबाद, नागपुर और कोलकाता में एएसआई सर्कलों से ऑर्डर आने लगे. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और डेक्कन कॉलेज जैसे संस्थानों ने भी उनसे संपर्क किया. उनसे मदद लेने वालों में अंडरवॉटर आर्कियोलॉजिस्ट (पानी के नीचे काम करने वाले पुरातत्वविद) आलोक त्रिपाठी भी शामिल थे, जिनके लिए हुसैन ने द्वारका से जुड़ी खोजबीन में इस्तेमाल होने वाले औज़ार सप्लाई किए.

ताहिर हुसैन एएसआई के अलग-अलग सर्कलों के लिए खुदाई के औज़ार बनाते हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
ताहिर हुसैन एएसआई के अलग-अलग सर्कलों के लिए खुदाई के औज़ार बनाते हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

औज़ार बनाने के उनके काम के लिए, पुरातत्वविद संजय मंजुल और वी.एन. प्रभाकर ने 2018 में उन्हें तारीफ का एक पत्र दिया.

अप्रैल 2018 के तारीफ वाले पत्र में, जिस पर मंजुल के हस्ताक्षर हैं, लिखा है, “पुरातत्व जगत में उनकी इस महारत को अच्छी तरह से जाना जाता है. उनके द्वारा खुदाई के बेहतरीन औज़ार तैयार करने और खुदाई की ज़रूरतों के हिसाब से औज़ारों में बदलाव करने के लिए नए-नए आइडिया लाने की तारीफ की जाती है.” दिप्रिंट के पास यह पत्र मौजूद है.

इतिहासकार भी हुसैन की वर्कशॉप देखने के लिए उनसे मिलने आए हैं. नयनजोत लाहिड़ी और उपिंदर सिंह बड़ौत में उनसे मिल चुके हैं.

सिंह का नाम याद न आने पर हुसैन ने कहा, “मनमोहन सिंह जी की बेटी का फोन आया था.” उन्होंने मुझसे सिनौली की कहानी के बारे में पूछा और यह भी कि मुझे यह जगह अचानक कैसे मिली.

उनके काम को बॉलीवुड में भी पहचान मिली है. उनकी वर्कशॉप में बनाए गए कुछ औज़ारों का इस्तेमाल अक्षय कुमार की 2022 में आई फ़िल्म ‘राम सेतु’ को बनाने के दौरान किया गया था.

हुसैन सिनौली पर बनी डिस्कवरी की डॉक्यूमेंट्री में भी कुछ सेकंड के लिए दिखे थे, जिसमें उन्होंने खुदाई वाली जगह दिखाई थी.

और उन्हें लगातार काम मिल रहा है. राखीगढ़ी से सिनौली लौटने से पहले, उन्हें एएसआई से एक नया काम मिला, जो अब एक और हड़प्पा कालीन साइट पर था.

जब एएसआई के डायरेक्टर जनरल यदुबीर सिंह रावत ने उस साइट का दौरा किया, तो खुदाई के डायरेक्टर मनोज सक्सेना ने ताहिर हुसैन को उनसे मिलवाया.

सक्सेना ने डीजी से कहा, “इन्हें कंकालों को निकालने के लिए सिनौली से बुलाया गया है.” और हुसैन का परिचय रावत से कराया.

हुसैन ने बताया कि रावत ने कहा, “बहुत बढ़िया,” और साथ ही अपने एएसआई साथियों से कहा कि आने वाले महीनों में धोलावीरा जैसी अहम साइट पर मेरी सेवाओं का इस्तेमाल करें.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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