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Friday, 26 June, 2026
होममत-विमतCM विजय ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की शुरुआत तो की है, देखें वे कितनी दूर तक जाते हैं

CM विजय ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की शुरुआत तो की है, देखें वे कितनी दूर तक जाते हैं

विजय ने इस बात को दूसरों के मुक़ाबले ज्यादा अच्छी तरह समझ लिया है कि छोटे स्तर के भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीतिक तार में ज्यादा कंपन पैदा करता है. मीडिया इस बात को समझ नहीं पाया था इसलिए भी उसने विजय के चुनावी प्रदर्शन को कमतर आंका.

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हाल में ‘दि न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ में सिंगल कॉलम में प्रकाशित दो खबरों ने मेरा ध्यान खींचा और मेरी दिलचस्पी जगा दी. तमिलनाडु के स्कूली शिक्षा मंत्री ए.राजमोहन ने पिछले सप्ताह घोषणा की कि प्राइवेट स्कूलों को अब रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (जिसे ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट कहा जाता है) के लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा. मतलब, जिसे शिष्ट भाषा में ‘भुगतान’ कहा जाता है उस व्यापक चलन को बंद किया जा रहा है.

नीलगिरि की पहाड़ियों में एक छोटा आवासीय स्कूल चलाने के कारण मुझे इस मसले का कुछ निजी अनुभव है. राज्य के कानून के तहत मान्यता प्राप्त करने का सर्टिफिकेट हासिल करने की कोशिश, फिर से शिष्ट भाषा में कहें तो, ‘डिमांड’ की वजह से और किसी कृपालु तथा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हस्ती की गंभीर कोशिशों के बावजूद एक संघर्ष साबित हुई. मैं नहीं बता सकता कि समस्या क्या थी, लेकिन जाहिर है कि यह स्थानीय या नौकरशाही के स्तर से परे की बात थी.

राज्य की नई, टीवीके सरकार ने भ्रष्टाचार को रोकने के अपने इरादे के तहत जिन कई कदमों की घोषणा की है उनमें यह कदम भी शामिल है. दूसरे कदमों में, बिजली विभाग में टेंडरों और प्रक्रियाओं से संबंधित कदम, शराब के ठेकों में सरकारी एकाधिकार (TASMAC) और भूमि पंजीकरण विभाग से संबंधित कदम भी शामिल हैं. विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान जोसेफ विजय भ्रष्टाचार के मुद्दे को निरंतर उठा रहे थे और सरकार बनाने पर ज्यादा साफ-सुथरा प्रशासन देने का वादा किया था.

मुझे लगता है कि उन्हें सत्ता जिन वजह से मिली उनमें यह भी एक प्रमुख कारण था. भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा एक जोरदार चुनावी मुद्दा होता है, छोटे स्तर के भ्रष्टाचार से त्रस्त भारत ऐसे वादों को कई बार सुन चुका है. मसलन, 1984 में राजीव गांधी की रिकॉर्ड-तोड़ चुनावी जीत के लिए सिर्फ उनकी मां इंदिरा गांधी की हत्या से उभरी सहानुभूति लहर को श्रेय देना राजीव की साफ-सुथरी और राजनीति से बाहर के भ्रष्टाचार से मुक्त व्यक्ति की उनकी छवि की भूमिका को नकारना होगा. दिल्ली विधानसभा के 2015 के चुनाव में ’आप’ को जो अप्रत्याशित भारी जीत मिली और 2020 में भी उसे दोबारा जो जनादेश मिला उसके पीछे लोगों की यह धारणा ही थी कि अरविंद केजरीवाल सिस्टम के राजनीतिक सड़ांध की सफाई के प्रति प्रतिबद्ध दिखते थे.

विजय के लिए सबसे बड़ी चुनौती

चुनावों का इतिहास यह भी बताता है कि राजनीतिक स्वच्छता, चाहे वास्तविक हो या कल्पित, जितनी तेजी से धूमिल होती है उतनी तेजी से और कुछ शायद ही धूमिल होता है. हमने देखा कि राजीव गांधी की ‘मिस्टर क्लीन’ वाली छवि किस तरह तोप के गोले की गति से ध्वस्त हो गई थी (बावजूद इसके कि बोफोर्स घोटाले का मुकदमा दिल्ली हाइकोर्ट में फुस्स साबित हो गया). और 2022 के बाद, ‘आप’ की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने ‘शीशमहल’ के लिए केजरीवाल की कमजोरी को कई गुना बढ़ा दिया.

इस लिहाज से, विजय के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार के मोर्चे पर राजनीतिक अपेक्षाओं को पूरा करने की होगी. देखना यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी कदमों की शुरुआती हलचल आगे भी कायम रहती है या नहीं. काफी हल्के से भी कहा जाए तो उनकी सरकार में हर किसी की कमीज का रंग चमकदार सफ़ेद नहीं है. दूसरी पार्टियों के दलबदलुओं से राजनीतिक समर्थन जुटाना पुराने खांचे में कदम रखने का जोखिम उठाना ही है.

राजनीति पर नजर रखने वाले अधिकतर लोग संशयवादी भले लगते हों, मगर वे जानते हैं कि ‘सिस्टम’ अच्छे-से-अच्छा इरादा रखने वालों को किस तरह अपने खांचे में फिट कर लेती है. ऐसे लोग भ्रष्टाचार पर जितना तेज हमला करते हैं उतनी ही तेजी से प्रायः उनका पतन भी होता है.

फिर भी, ऐसा लगता है कि विजय ने इस बात को दूसरों के मुक़ाबले ज्यादा अच्छी तरह समझ लिया है कि छोटे स्तर के भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीतिक तार में ज्यादा कंपन पैदा करता है. मीडिया इस बात को समझ नहीं पाया था इसलिए भी उसने विजय के चुनावी प्रदर्शन को कमतर आंका.

आंखों पर लगी राजनीतिक पूर्वाग्रह की पट्टी ही इसकी वजह नहीं है. हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब ऐसा लग रहा है कि वामपंथी और उदारपंथी समेत सभी रंग के टिप्पणीकारों ने तर्कों के मामले में अनुचित छलांग लगा ली है. यह तो पहचान लिया गया है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार, चाहे वह छोटे स्तर का हो या अत्याधुनिक किस्म का, व्यापक रूप से फैला हुआ है, लेकिन यह धारणा भी बन गई है कि इससे बचना मुश्किल है इसलिए इस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है.

मुझे कोई दूसरा कारण नहीं नजर आता कि तमिलनाडु में जो एक व्यापक चुनावी परिघटना बन गई उस पर लगभग कोई रिपोर्ट या टिप्पणी क्यों नहीं की गई. कई साल बीत चुके हैं और चुनावों में रिश्वतख़ोरी को व्यावसायिक किस्म के नजरिए से देखा जाने लगा है, जिनमें राजनीतिक दल छुटभैये पार्टी पदाधिकारियों के जरिए पूरे राज्य में चुनींदा बस्तियों में वोटरों को नकदी बांटते रहे हैं. ये भुगतान व्यापक रूप से होते रहे हैं, इनमें कोई गोपनीयता नहीं बरती जाती है, और इस रिश्वतख़ोरी को बहुत आसानी से साबित किया जा सकता है. गांवों-कस्बों के आम लोग बेहिचक बताते हैं कि उन्हें किस पार्टी से कितना मिला, आप उनसे पूछ कर तो देखिए.

विरोधाभास

टीवीके सबसे अलग इसलिए दिखी क्योंकि केवल वही एक राजनीतिक समूह था जिसने वोटरों को रिश्वत नहीं दी, शायद उसे इसकी जरूरत भी नहीं थी. मैं यह नहीं कह रहा कि इसे या किसी दूसरी पार्टी का समर्थन करने के लिए यह एक पर्याप्त वजह है, बिलकुल नहीं. लेकिन यह एक विडंबना ही है कि इस तरह के भुगतानों— जिसे लोकतंत्र को विकृत करने की सीधी कोशिश ही कहा जा सकता है—के बारे में एक इंच की खबर तक नहीं छापी जाती और न टीवी पर कुछ दिखाया जाता है.

भ्रष्टाचार के बड़े मामलों (बड़े पैमाने के वित्तीय घोटाले, जिनमें बैंकों के साथ धोखाधड़ी, कॉर्पोरेट-सरकार मिलीभगत, और प्राकृतिक संसाधनों का बेकाबू दोहन शामिल हैं) पर ध्यान देना जरूरी भी है और उचित भी. लेकिन इसके बदले छोटे, नये किस्म के भ्रष्टाचारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये भी आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं.

सामान्य किस्म के भ्रष्टाचार का किसी धर्म, जाति, भाषा, या क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं है. इसके पीछे कोई पंथ, कोई दर्शन नहीं है, और इसका तंत्र द्विपक्षीय संदर्भों में भी मजबूत होता रहता है. इसका जो विचारधारा-हीन स्वरूप है, शायद उसी के चलते चर्चाओं में उलझी रहने वाली जमातों ने इसके प्रति इस तरह का थका हुआ, उदासीन रुख अपना रखा है.

गनीमत है कि उम्मीद और नाउम्मीदी के चक्र में उलझे लोगों में अभी भी इसकी मजबूत चुनावी प्रतिध्वनि सुनी जा रही है और ऐसे लोगों ने इस सबके बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी है. और जहां तक मेरी बात है, मुझे उम्मीद है कि मेरे स्कूल को मान्यता प्रदान करने वाला सर्टिफिकेट अंततः हमारे पास आ जाएगा.

मुकुंद पद्मनाभन क्रिया यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर और ‘द हिंदू’ के पूर्व एडिटर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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