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Thursday, 2 July, 2026
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मॉब लिंचिंग केस में आजीवन कारावास: वह फैसला जिसके बाद एक MP जज को सांप्रदायिक धमकियां मिलने लगीं

एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज तबस्सुम खान ने मॉब लिंचिंग के एक मामले में 14 लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई. तब से उन्हें सोशल मीडिया पर धमकियां मिल रही हैं और अपशब्द कहे जा रहे हैं.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने बुधवार को मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान के खिलाफ धमकियों और “टारगेटेड सोशल मीडिया कैंपेन” की निंदा करते हुए एक बयान जारी किया, क्योंकि उन्होंने 14 लोगों को एक मुस्लिम व्यक्ति की लिंचिंग के मामले में दोषी ठहराया था.

12 जून को दिए गए दो अलग-अलग फैसलों में जज ने 14 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. इसके बाद से उन्हें सोशल मीडिया पर धमकाया और अपमानित किया जा रहा है. पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की है.

यह मामला अगस्त 2022 में एक भीड़ द्वारा नजीर अहमद की हत्या और दो अन्य लोगों को घायल करने से जुड़ा था, जो कथित रूप से गौ तस्करी के शक पर हुआ था.

इस मामले में दोषी ठहराए गए 14 लोग हैं दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रखर कौशल, पवन बाथव, अमर उर्फ भोला बाथव, कन्हैया बाथव, बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी, राजू उर्फ राजेंद्र कौशल, आकाश उर्फ पिंटोला बाथव, गौरव यादव, आकाश सराठे, चेतन मराठा, देवेंद्र उर्फ छोरू कोरी, और संदीप उर्फ राजा कौशल.

फैसले में जज ने कहा कि मोब लिंचिंग का अपराध आरोपियों के खिलाफ साबित हो चुका है, और आरोपियों ने पीड़ितों पर “बुरी तरह” हमला किया, जिससे एक व्यक्ति की मौत हो गई. मौत की सजा पर कानून पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि सभी बढ़ाने वाले और घटाने वाले हालात को देखते हुए यह नहीं लगता कि आरोपियों के सुधार की कोई संभावना नहीं है.

हालांकि, मोब लिंचिंग मामले के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो में जज को उनके फैसले को लेकर निशाना बनाया गया. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने जज के समर्थन में एक्स पर लिखा, “सभी दोषी वास्तव में हिंदू पुरुष हैं. लेकिन उन्हें उनके धर्म के कारण दोषी नहीं ठहराया गया था. उन्हें दंगे, हत्या के प्रयास और हत्या के लिए जांच में दोषी पाए जाने के कारण दोषी ठहराया गया था.”

SCAORA द्वारा जारी बयान में कहा गया कि “न्यायिक आदेशों को अपीलीय अदालतों में चुनौती दी जानी चाहिए, न कि जजों को धमकी, बदनामी या डराने के जरिए.” वकीलों के इस संगठन ने जज के साथ एकजुटता जताई और यह उम्मीद भी जताई कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे और हर न्यायिक अधिकारी की स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहेगी.

धमकियों के बाद, सिवनी मालवा पुलिस ने रिपोर्ट के अनुसार अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है.

दिप्रिंट तफ्सील से बता रहा है कि मुकदमे के दौरान क्या हुआ और जज ने अपने फैसले में क्या कुछ कहा है.

शिकायत

एक घायल व्यक्ति शेख लाला ने अपनी शिकायत में पुलिस को बताया कि उसे एक व्यक्ति सेठी ने ट्रक लोड करने के लिए बुलाया था.

जब वह नंदरवाड़ा पहुंचा, तो सेठी ने अपने ट्रक में जानवर, जिनमें गायें भी शामिल थीं, लोड करवाए और उसे महाराष्ट्र के अमरावती तक ले जाने को कहा.

लेकिन आरोप था कि 3 अगस्त 2022 को लगभग 12:30 बजे रात में कई लोगों ने शेख लाला द्वारा चलाए जा रहे ट्रक को, जिसमें नजीर अहमद और शेख मुश्ताक भी थे, रोक लिया. फिर उन लोगों ने तीनों पर लाठियों और डंडों से हमला किया, जिससे अहमद की मौत हो गई और बाकी दो गंभीर रूप से घायल हो गए.

जज ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 148 (घातक हथियारों से दंगा करना), 307 (हत्या का प्रयास)/149 (अवैध सभा का हर सदस्य उस अपराध के लिए जिम्मेदार जो साझा उद्देश्य में किया गया हो), 302 (हत्या)/149 के तहत दोषी ठहराया और सभी को आजीवन कारावास दिया.

“शिकायतकर्ताओं के बयान और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर यह साबित होता है कि भीड़ ने शिकायतकर्ताओं और मृतक के खिलाफ बल और हिंसा का इस्तेमाल किया. ऊपर के साक्ष्य यह भी स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि हमला लाठियों, डंडों आदि से किया गया था, जिन्हें जब्त किया गया,” अदालत ने कहा.

अदालत ने यह भी कहा कि अवैध सभा के हर सदस्य के व्यक्तिगत कार्यों को साबित करना जरूरी नहीं है. अदालत ने कहा, “इस प्रकार, हालांकि ऊपर का साक्ष्य हर आरोपी के विशेष कार्य को स्थापित नहीं करता, लेकिन यह स्पष्ट है कि आरोपी लाठियों, डंडों आदि से लैस होकर पांच से अधिक लोगों की संख्या में इकट्ठा हुए थे और उन्होंने बल और हिंसा का इस्तेमाल किया. इन परिस्थितियों से यह साबित होता है कि आरोपियों ने अवैध सभा बनाई और दंगा किया तथा अपने साझा उद्देश्य के तहत मृतक नजीर अहमद की लाठियों से पिटाई करके हत्या की.”

पीड़ितों का मुकर जाना

इस मामले में पीड़ित शेख लाला और शेख मुश्ताक ट्रायल के दौरान अपने बयान से मुकर गए.

उन्होंने अदालत को बताया कि वे उन लोगों की पहचान नहीं कर पाए जिन्होंने उन पर हमला किया था. हालांकि, अभियोजन पक्ष ने कहा कि घायल लोगों से आरोपियों की पहचान करवाई गई थी और उन्होंने उनकी पहचान की थी. यह बात उस इंस्पेक्टर के बयान से भी समर्थित थी जिसने पहचान प्रक्रिया करवाई थी और उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट के बयान से भी, जिसकी मौजूदगी में 2022 में पहचान करवाई गई थी.

अदालत ने कहा, “यह ध्यान देने योग्य है कि हालांकि शिकायतकर्ताओं ने पहचान प्रक्रिया का समर्थन नहीं किया, जिससे यह संभव लगता है कि उन्होंने अदालत में दबाव में बयान दिए हैं, फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि यह पहचान प्रक्रिया तहसीलदार ललित सोनी द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के तहत की गई थी, जिससे यह माना जा सकता है कि यह कार्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 119 (c) के तहत नियमित रूप से किया गया.”

जज ने यह भी कहा कि आरोपियों के घरों से लाठियां, डंडे और खून से सने कपड़े बरामद हुए थे.

“आरोपियों ने जिरह के दौरान जांच अधिकारी जितेंद्र यादव के सामने यह नहीं कहा कि कपड़े उनके नहीं थे. रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विरोधाभास नहीं दिया गया जिससे यह निष्कर्ष निकले कि आरोपियों की पुलिस से पुरानी दुश्मनी थी और उन्हें झूठा फंसाया गया है. इसलिए जांच अधिकारी जितेंद्र सिंह यादव द्वारा की गई बरामदगी की प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है,” अदालत ने कहा.

मकसद

जबकि आरोपियों ने कहा था कि अपराध का मकसद साबित नहीं हुआ है, अदालत ने कहा कि “जहां अभियोजन पक्ष का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित होता है, वहां इस आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता कि अपराध का मकसद अभियोजन द्वारा उजागर नहीं किया गया है.”

आरोपियों ने यह भी तर्क दिया था कि भले ही लिंचिंग केस के शिकायतकर्ताओं ने कहा था कि वे सेठी और राजा नाम के एक अन्य व्यक्ति के निर्देश पर ट्रक चला रहे थे, लेकिन न तो इन दोनों से और न ही ट्रक के पंजीकृत मालिक से पूछताछ की गई. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि ट्रक में मौजूद जानवरों की प्रजाति की जांच नहीं की गई, और यह भी नहीं पता लगाया गया कि जानवर कहां ले जाए गए या किसे सौंपे गए.

उन्होंने यह भी बताया कि शिकायत में कहा गया था कि ट्रक में जानवर थे, लेकिन शेख लाला और शेख मुश्ताक ने अदालत में कहा कि वे ट्रक में सब्जियां ले जा रहे थे.

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा, “यह ध्यान देने योग्य है कि यदि जानवर बिना लाइसेंस के ट्रक में ले जाए जा रहे थे, तो ट्रक मालिक और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ अलग से कार्रवाई का आधार था. हालांकि, सिर्फ इसलिए कि उनके खिलाफ अलग से सही कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोपी इस घटना में शामिल नहीं थे. यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह मामला हमला, हत्या और हत्या के प्रयास से जुड़ा है, और ऊपर के साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की भूमिका साबित होती है.”

अदालत ने यह भी कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि मृतक नजीर अहमद के कितने आश्रित या कानूनी प्रतिनिधि थे, लेकिन उसने निर्देश दिया कि उसकी पत्नी, बच्चों और माता-पिता को मुआवजा दिया जाए. फैसले की एक प्रति नर्मदापुरम की लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को भेजने का निर्देश दिया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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