तिरुवनंतपुरम: फ्रांस में दंगों के पीछे बड़ी साजिश होने और इसके तार भारत से जुड़ने की खबरों के बीच कांग्रेस ने भारत के हालात की तुलना बांग्लादेश और फ्रांस से किए जाने को खारिज कर दिया है.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोमवार को कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस. उन्होंने कहा कि विपक्ष शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में विश्वास करता है और चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर जारी विवाद के बीच स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग कर रहा है.
उन्होंने कहा कि विपक्ष हिंसा का समर्थन नहीं करता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन में विश्वास रखता है.
थरूर ने कहा, “मुझे लगता है कि भारत न बांग्लादेश है और न फ्रांस. मुझे नहीं लगता कि इन दोनों जगहों से भारत की तुलना करना सही है. हम फ्रांस में हुई हिंसा, बसों और पुलिस थानों में आग लगाने जैसी घटनाओं का कभी समर्थन नहीं करेंगे. हम सिर्फ शांतिपूर्ण प्रदर्शन में विश्वास करते हैं. मैंने खुद भी इसी तरह के प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है और मेरा मानना है कि विपक्ष भी आम तौर पर ऐसे ही प्रदर्शनों का समर्थन करता है.”
सत्ता बदलने की साजिश के आरोपों को खारिज करते हुए थरूर ने कहा कि विपक्ष की मांग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है. उन्होंने SIR अभियान के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जाने पर चिंता जताई.
कांग्रेस सांसद ने कहा, “जहां तक बड़े मुद्दों की बात है, ‘सत्ता बदलने’ जैसे शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का कोई मतलब नहीं है. हम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग कर रहे हैं. आज चिंता की बात यह है कि एक ऐसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जो बेहद समस्याग्रस्त, अनियमित और कुछ हद तक गैरकानूनी है. इसलिए हम इस प्रक्रिया को पलटने की मांग कर रहे हैं. यह संविधान से जुड़ा मुद्दा है. इसका किसी सरकार को गिराने या सत्ता बदलने की कोशिश से कोई लेना-देना नहीं है.”
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने भी भारत में हो रहे प्रदर्शनों की तुलना यूरोप के प्रदर्शनों से किए जाने पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, “भारत और यूरोप की तुलना करना सेब और संतरे की तुलना करने जैसा है. वे एक बार फिर पुरानी और खतरनाक सोच को दोहरा रहे हैं. इसमें मुसलमानों को स्वभाव से ही हिंसक, उग्रवादी, बर्बर और असभ्य बताकर यूरोप के प्रदर्शनों को सिर्फ ‘मुस्लिम समस्या’ के तौर पर पेश किया जा रहा है. इसका साफ मतलब यह है कि भारत को भी अपनी ‘मुस्लिम समस्या’ से सावधान रहना चाहिए.”
खेड़ा ने कहा कि यह सिर्फ यूरोप को चेतावनी के तौर पर पेश करने का मामला नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में भी कई बार इसी तरह की रणनीति अपनाई गई है.
उन्होंने कहा, “दिल्ली में हाल के प्रदर्शनों के दौरान भी संघ से जुड़े कुछ लोगों को मुसलमान बनकर पेश आते और सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश करते देखा गया. इसका मकसद क्या है? शिक्षा, चुनाव की निष्पक्षता, पारदर्शिता और न्याय के लिए चल रहे शांतिपूर्ण और जायज आंदोलनों को बदनाम करना और उन्हें ‘अब्दुल’ के कथित ‘भारत विरोधी एजेंडे’ का हिस्सा बताना. इसके साथ ही भारतीय मुसलमानों को खलनायक की तरह पेश करना.”
खेड़ा ने कहा कि इस कहानी में जिस बुनियादी अंतर को जानबूझकर छिपाया जा रहा है, वह यह है कि यूरोप में प्रदर्शन करने वाले ही दंगों में शामिल हैं, जबकि भारत में राज्य और राज्य समर्थित गैर-सरकारी समूह हिंसा करते हैं.
उन्होंने आरोप लगाया, “मोदी-शाह की पुलिस ने बार-बार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया है. दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने भी पुलिस बनकर ऐसा किया है.”
कांग्रेस का यह बयान केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के उस आरोप के बीच आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में भी फ्रांस और बांग्लादेश जैसी साजिश रची गई थी.
रिजिजू ने कहा, “बांग्लादेश में हुई हिंसक घटनाओं और फ्रांस में हुए दंगों, आगजनी और लूटपाट जैसी घटनाओं की तरह भारत के लिए भी ऐसी ही साजिश रची गई थी. भारत विरोधी गिरोहों और कुछ नेताओं ने युवाओं को भड़काने और सड़कों पर हिंसा फैलाने के लिए आपस में हाथ मिलाया था. लेकिन इस खतरनाक साजिश को रचने वाले यह भूल गए कि भारत न बांग्लादेश है और न फ्रांस. भारत में सत्ता बदलना बिल्कुल संभव है, लेकिन सिर्फ चुनाव के जरिए, सोरोस के जरिए नहीं.”
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