scorecardresearch
Saturday, 17 October, 2026
होममत-विमतदिल्ली में दिखने वाली कांग्रेस, यूपी और महाराष्ट्र की कांग्रेस से अलग है

दिल्ली में दिखने वाली कांग्रेस, यूपी और महाराष्ट्र की कांग्रेस से अलग है

एक तरफ बड़े नेताओं की लोकप्रियता है, तो दूसरी तरफ पार्टी के कार्यकर्ता. इन दोनों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है. आज भारत में विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यही है.

Text Size:

दिल्ली में कांग्रेस के जिन कार्यक्रमों ने देश का ध्यान खींचा, खासकर आम लोगों के बीच चर्चा बटोरी, उनसे बिल्कुल अलग तस्वीर उत्तर प्रदेश में पार्टी के मुख्यालय पर देखने को मिली. लखनऊ में पार्टी के कार्यक्रम कांग्रेस के जोशीले और लोकप्रिय नेता की बातों से बिल्कुल अलग नज़र आए. वहां पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सड़क पर होने वाली लड़ाई जैसा हंगामा हुआ. उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों से पहले पार्टी में नेतृत्व बदलने के लिए एक औपचारिक कार्यक्रम रखा गया था, लेकिन वहां पार्टी की हालत खराब दिखी. अलग-अलग गुटों में बंटे कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए और हालात संभालने के लिए वरिष्ठ नेताओं को उनके बीच खड़े होकर उन्हें रोकना पड़ा.

यही आज भारत में विपक्षी राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है. एक तरफ नई दिल्ली में संविधान और लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, तो दूसरी तरफ राज्यों में ज़मीनी स्तर पर पार्टी के अंदर गुटबाजी चलती रहती है. कांग्रेस के लोकप्रिय नेता राहुल गांधी के नाम पर रील्स और टीवी पर बनाई जा रही राष्ट्रीय छवि से प्रभावित होना आसान है, लेकिन ऊपर के स्तर पर नेताओं की लोकप्रियता के बावजूद पार्टी का नेतृत्व राज्यों में अपने कार्यकर्ताओं पर बहुत कम नियंत्रण रखता है. यही स्थानीय कार्यकर्ता जमीन पर चुनाव की तैयारी और उसे संभालने का कठिन काम करते हैं.

एक तरफ बड़े नेताओं की लोकप्रियता है, तो दूसरी तरफ पार्टी के कार्यकर्ता. इन दोनों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है. आज भारत में विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यही है.

यूपी में टकराव: पार्टी के पूरी तरह खत्म हो जाने का डर

लखनऊ में हुई लड़ाई की वजह से पार्टी के अंदर की गहरी असुरक्षा सामने आती है. उत्तर प्रदेश में अचानक ऊपर से नेतृत्व में बदलाव किया गया. एक बदलाव के तहत अजय राय की जगह राज्य की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. दूसरे बदलाव के तहत सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. इन दोनों फैसलों का मकसद पार्टी के पुराने सामाजिक गठबंधन को फिर से मजबूत करना था. इस गठबंधन में ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित शामिल रहे हैं.

मोना तीन बार विधायक रह चुकी हैं और उनके परिवार का लंबे समय से कांग्रेस से जुड़ाव रहा है. इससे पार्टी को उन ऊंची जातियों के बीच दोबारा अपनी जगह बनाने का मौका मिल सकता है, जिनका समर्थन वह पहले खो चुकी है. इसी तरह, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाताओं के बीच इमरान मसूद का काफी प्रभाव है.

लेकिन पार्टी ने सामाजिक समीकरण सुधारने की जो कोशिश की, उससे अंदर के पुराने विवाद फिर सामने आ गए. पद छोड़ रहे प्रदेश अध्यक्ष के समर्थकों और नए नेतृत्व के साथ खड़े लोगों के बीच हुई झड़प पार्टी के अंदर फैली घबराहट को दिखाती है. कांग्रेस के सामने एक मुश्किल स्थिति है. एक तरफ सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की चुनावी मशीनरी है, जिसके पास काफी संसाधन हैं और जो बहुत मजबूत है. दूसरी तरफ उसका सबसे बड़ा गठबंधन सहयोगी समाजवादी पार्टी (सपा) है, जिसका नेतृत्व अखिलेश यादव कर रहे हैं.

कांग्रेस के कार्यकर्ता अच्छी तरह जानते हैं कि सपा लंबे समय से ऐसी सहयोगी पार्टी रही है, जो कांग्रेस के बचे हुए पारंपरिक वोट बैंक को भी अपने साथ मिलाने की कोशिश करती रही है. गठबंधन में बातचीत के दौरान कांग्रेस जितनी सीटें छोड़ती है या जिस भी जिले में सपा के लिए अपनी जगह खाली करती है, वहां कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका कमजोर पड़ जाती है. मॉल एवेन्यू स्थित कांग्रेस मुख्यालय में हुई हिंसक झड़प को इस डर के रूप में देखा जाना चाहिए कि कहीं गठबंधन में शामिल सपा कांग्रेस को पूरी तरह खत्म न कर दे.

यह डर सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र में भी ऐसा ही देखने को मिलता है, जहां कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ अक्सर टकराव होता रहता है. ये सहयोगी महा विकास अघाड़ी (एमवीए) का हिस्सा हैं.

महाराष्ट्र में हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए हर्षवर्धन वसंतराव सपकाल को पार्टी के कई चुने हुए विधायकों और अपने-अपने इलाकों में दबदबा रखने वाले ताकतवर नेताओं की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. सपकाल कांग्रेस को फिर से मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के दम पर संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. कभी कांग्रेस की पहचान ऐसा ही संगठन हुआ करती थी. लेकिन उनकी कोशिशों का कड़ा विरोध हो रहा है. पारंपरिक जाति आधारित नेताओं ने पार्टी के कामों के लिए पैसे देना रोक दिया है और उनकी पहलों में दिलचस्पी नहीं दिखाई है. उन्हें डर है कि गांधीवादी सोच और कांग्रेस के सिद्धांतों में विश्वास रखने वाले प्रदेश अध्यक्ष के आने से उनके अधिकार और दबदबा कमजोर हो सकते हैं.

दोनों राज्यों में पार्टी के पास साफ योजना की कमी दिखाई देती है. साथ ही, केंद्रीय नेतृत्व राज्य इकाइयों की समस्याओं को हल करने में भी नाकाम रहा है. इसका नतीजा यह है कि क्षेत्रीय नेता आपस में बहुत कम बची हुई ताकत और संसाधनों के लिए लड़ रहे हैं. उन्हें यह डर भी है कि उनके बड़े गठबंधन सहयोगी जमीनी स्तर पर उनके संगठन पर हमेशा के लिए कब्जा कर लेंगे.

हकीकत की जांच: अदालत का दफ्तर बनाम मतदान केंद्र

इस दूरी का नुकसान पार्टी के कामकाज में भी दिखाई देता है. दिल्ली में इंडिया गठबंधन के नेताओं के मार्च के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, वहीं उनकी कानूनी रणनीति को सरकारी कामकाज से जुड़ी अड़चनों का सामना करना पड़ा. याचिका वकीलों के जरिए दाखिल की जानी थी. मार्च के कारण हुई देरी के बीच समय कम पड़ता गया और सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री यानी याचिका जमा करने वाले कार्यालय के बंद होने का समय करीब आ गया. रजिस्ट्री ने याचिका में 14 तकनीकी कमियां बताईं. ये कमियां कागज़ी काम से जुड़ी थीं, लेकिन यह घटना विपक्ष की बड़ी कमजोरियों को अच्छी तरह दिखाती है.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करना और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाकर बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस करना प्राइम टाइम टीवी पर अच्छी खबर बन सकता है. ऐसे कदम ज़रूरी भी हो सकते हैं, लेकिन अगर पार्टी के पास बुनियादी संगठनात्मक अनुशासन नहीं है, तो उसकी रणनीति नाकाम हो जाएगी. सड़कों पर लोगों के गुस्से को मतदान केंद्रों पर अच्छे चुनावी प्रबंधन में बदलने के लिए भी इसी तरह की मेहनत और लगन की जरूरत है. भारत में चुनाव जीतने के लिए यह ज़रूरी है.

हमें याद रखना चाहिए कि भारत में चुनाव मतदान केंद्रों पर होने वाले छोटे-छोटे लेकिन बेहद जरूरी कामों से जीते जाते हैं. मौजूदा व्यवस्था में, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है, चुनाव जीतने के लिए अनुशासित बूथ समितियों की एक बड़ी टीम चाहिए. इन समितियों को कई हफ्तों तक मतदाता सूची के शुरुआती मसौदे पर काम करना पड़ता है.

उन्हें नामों का मिलान करना होता है, पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 भरना होता है और मतदाता सूची से हटाए जा रहे नामों पर लगातार नज़र रखनी होती है. इसके लिए सही तरीके से, मिलकर और पूरी तैयारी के साथ ट्रेनिंग देनी ज़रूरी है.

अगर किसी पार्टी की राज्य इकाई अपने ही मुख्यालय में नेतृत्व बदलने की प्रक्रिया शांतिपूर्वक नहीं संभाल सकती, तो यह समझना मुश्किल है कि वह राज्य सरकार की विरोधी मशीनरी का मुकाबला करने के लिए जरूरी जमीनी अनुशासन कैसे बनाएगी. राज्य की यह मशीनरी हजारों मतदान केंद्रों पर शेषनाग की तरह बैठी है.

उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले जैसे-जैसे राजनीतिक मुकाबला तेज़ हो रहा है, लखनऊ की झड़प से मिलने वाला सबक साफ है. विपक्ष सिर्फ बड़े नेताओं की छवि, भाषणों और मुश्किल राजनीतिक शब्दों के सहारे चुनाव नहीं जीत सकता. इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पार्टी की किस्मत बदलने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. लेकिन दिखावे से जनता के बीच बहस शुरू हो सकती है और संविधान से जुड़े तर्कों से शहरों के पढ़े-लिखे लोगों को साथ लाया जा सकता है. फिर भी, ये दोनों ही अस्थायी उपाय हैं.

राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की राज्य इकाइयों के अंदर और उनके बीच के मतभेद दूर करना और संगठन में अनुशासन लाना है. अगर संगठन की इन बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ किया गया, तो बड़े से बड़ा गठबंधन भी ताश के पत्तों से बने घर की तरह ढह सकता है.

विपक्ष को अपने भीतर झांकना होगा, अपनी कमियों पर विचार करना होगा और पार्टी के अंदर काम करने के तरीके को सुधारना होगा. आखिर में उसे यह बात याद रखनी चाहिए कि जैसा कहा जाता है, जो सेना अपनी ही छावनी में एक-दूसरे पर जूते फेंकती है, वह देश और उसके लोकतंत्र की लड़ाई जीतने की उम्मीद नहीं कर सकती.

निखिल संजय-रेखा अडसुले एक वकील हैं. वे TISS के पूर्व छात्र, USA के क्रेटन पेडन स्कॉलर और आईआईटी-दिल्ली में सीनियर स्कॉलर हैं. उनका एक्स हैंडल @Surajya_Raje_ है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: भारत के युवा सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं रह सकते, उन्हें राजनीतिक ताकत बनानी होगी


 

share & View comments