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Friday, 2 October, 2026
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भारत के युवा सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं रह सकते, उन्हें राजनीतिक ताकत बनानी होगी

आज भारत के लिए 'आइडियोलॉजी' कोई एकेडमिक लग्ज़री नहीं है. यह वह ग्रामर है जो मौजूदा हालात से मोहभंग होने पर एक स्थायी संस्थागत विकल्प बनाने के लिए ज़रूरी है.

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गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में ‘जेल भरो आंदोलन’ के लिए जुटने की बड़ी अपील, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी ने शुरू किया है, कोई थोड़े समय के लिए होने वाली घटना भर नहीं है. भारत के एक युवा के तौर पर मैं संविधान की भावना से प्रेरित हूं. इसकी बुनियाद डॉ. आंबेडकर के ‘संवैधानिक नैतिकता’ के विचार में है. मुझे यह घोषणा भारत के युवाओं के बीच इस समय बढ़ रहे भरोसे के संकट की साफ अभिव्यक्ति लगती है.

जब देश के युवा बुनियादी संस्थाओं की स्वायत्तता कम होने को लेकर अपनी गहरी चिंताएं बताने के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो यह उन लोकतांत्रिक सिद्धांतों में गिरावट की ओर इशारा करता है, जो संवैधानिक नैतिकता का आधार हैं. मौजूदा मामले में इन चिंताओं में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की कानूनी स्वतंत्रता में कथित कमी से लेकर देश की परीक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर हो रही व्यवस्थागत नाकामियों तक की बातें शामिल हैं.

दुनिया के राजनीतिक विचारों के इतिहास से इस बारे में कुछ दिलचस्प सबक मिलते हैं. बार-बार यह देखा गया है कि सड़कों पर होने वाले आंदोलन कुछ समय के लिए ही सुरक्षा देते हैं. ज्यादा से ज्यादा वे किसी समस्या या घाव को सामने ला सकते हैं, लेकिन उनके पास उसे ठीक करने या इलाज की प्रक्रिया शुरू करने के लिए कानून बनाने और प्रशासन चलाने के जरूरी साधन नहीं होते.

जो युवा देश को नए तरीके से बदलना चाहते हैं, उनके लिए आज के विरोध प्रदर्शनों में दिखाई देने वाली यह तेज और व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा एक जरूरी, लेकिन रचनात्मक और स्थायी बदलाव से गुजरनी चाहिए. संस्थाओं में हो रही इस गिरावट को रोकने के लिए कभी-कभार होने वाला जनता का गुस्सा लंबे समय तक चलने वाली औपचारिक पार्टी बनाने और शासन चलाने की मेहनत में बदलना होगा.

मौजूदा अशांति के पीछे जो कारण है, वह दिखाता है कि एक मजबूत संस्थागत जवाब कितना जरूरी हो गया है. CJP की घोषित आंदोलन की जड़ एक गंभीर संस्थागत टूटन में है. द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, ने 10 महीनों में 14 बार मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर औपचारिक आपत्ति जताई. आरोप है कि इसकी वजह से लाखों मतदाताओं के नाम हटा दिए गए.

संवैधानिक संस्था ECI के सबसे ऊंचे स्तर पर यह मतभेद दिखाता है कि सिर्फ बाद में प्रतिक्रिया देने वाले तरीकों पर निर्भर रहने में कितना खतरा है. जब देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले अधिकारी ही नियमों की ईमानदारी और सही तरीके से लागू होने को लेकर आपस में बंटे हों, तो नागरिक दबाव का सामान्य तरीका नौकरशाही में बदलाव लाने के लिए पर्याप्त नहीं होता. इसके लिए कुछ और चाहिए. एक स्थायी आंतरिक संतुलन, लेकिन ऐसा संतुलन जो संवैधानिक लोकतंत्र की भावना पर आधारित हो.

जन आंदोलनों को वैचारिक आधार की जरूरत है

AI और पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में आज के डिजिटल आंदोलनों की कमजोरी यह है कि वे अक्सर वैचारिक आधार की कमी के साथ काम करते हैं. उनकी नाकामियों को पहचानने की क्षमता बहुत अच्छी है, इस बात से ज्यादातर लोग सहमत होंगे. लेकिन ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था बताने में वे कमजोर पड़ जाते हैं, जो पूरे ढांचे में बदलाव ला सके.

हाल ही में आंबेडकरवादी कलाकार और लेखक सिद्धेश गौतम ने दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में इन सीमाओं को लेकर मेरे संदेह को सामने रखा. डिजिटल मीडिया और लोगों को आंदोलन के लिए जोड़ने की उसकी रणनीतियों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े स्तर पर जनता का प्रदर्शन “विरोध जताने का अच्छा तरीका” हो सकता है, लेकिन किसी भी विरोध प्रदर्शन में गहरी और लगातार होने वाली वैचारिक चर्चा और एक तय सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्धता न हो, तो वह मूल रूप से अधूरा रहता है.

उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया में कुछ समय के लिए मिलने वाला बड़ा ध्यान कभी भी किसी जन आंदोलन की असली सफलता को नहीं माप सकता. डॉ. आंबेडकर की बात को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि असली सफलता तब आती है, “जब आप भविष्य के लिए नेता तैयार करते हैं.”

मैं गौतम की बात से पूरी तरह सहमत हूं, खासकर जब वह कहते हैं कि “वैचारिक स्पष्टता” किसी आंदोलन का मूल हिस्सा होती है और उसे मजबूत आधार देती है. इस आधार के बिना बड़े जन आंदोलन सिर्फ घटनाएं बनकर रह जाने का खतरा रखते हैं. वे थोड़े समय तक चलने वाले प्रदर्शन बन सकते हैं. लंबे समय में वे लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं की भावना को मजबूत करने के बजाय ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं.

राजनीतिक समाजशास्त्री सिडनी टैरो ने ऐसे बड़े और प्रभावशाली आयोजनों की घटना का विस्तार से अध्ययन किया है. उनका तर्क है कि जो विकेंद्रीकृत और व्यवस्था को बाधित करने वाले नेटवर्क केवल साझा गुस्से पर निर्भर रहते हैं, वे नैतिक आक्रोश की शुरुआती ऊर्जा खत्म होने के बाद अक्सर अंदरूनी गुटबाजी या जनता की उदासीनता में बदल जाते हैं.

आज के भारत के लिए “विचारधारा” सिर्फ अकादमिक चर्चा की कोई लग्जरी चीज नहीं है. यह समय की सबसे जरूरी जरूरत है. मौजूदा व्यवस्था से लोगों में पैदा हो रही निराशा के लिए लंबे समय तक चलने वाला संस्थागत विकल्प तैयार करने के लिए यही वह भाषा और ढांचा है, जिसकी जरूरत है.

गांधी और आंबेडकर से सीख

संगठन को लंबे समय तक चलाने का रास्ता हमें भारत की आजादी की लड़ाई में मिलता है, खासकर महात्मा गांधी के तरीके में.

1922 में गांधी ने अचानक असहयोग आंदोलन रोक दिया था. इससे राष्ट्रीय आंदोलन एक गंभीर संकट में आ गया. इसका मुख्य कारण यह था कि आंदोलन में शामिल लोगों की रफ्तार टूट गई और उनका हौसला भी कम हुआ. लेकिन गांधी एक बहुत समझदार रणनीतिकार और राजनेता थे. वह अचानक उठने वाले जोश की सीमाओं को जानते थे. वह समझते थे कि यह जोश कितना भी मजबूत क्यों न हो, लेकिन इससे एक गहरी जड़ें जमा चुकी और बहुत ज्यादा सरकारी तंत्र वाली साम्राज्यवादी व्यवस्था को खत्म नहीं किया जा सकता.

इसीलिए उन्होंने अपना ध्यान “रचनात्मक कार्यक्रम” की ओर मोड़ा. यह जमीन से जुड़े संगठन बनाने, सामाजिक सुधार करने और गांव के स्तर पर नागरिक अनुशासन कायम करने की एक लंबे समय तक चलने वाली कोशिश थी, जो करीब एक दशक तक चली. गांधी सत्ता के बारे में एक बुनियादी सच भी समझते थे. प्रभावी विरोध के लिए ऐसी मजबूत और टिकाऊ व्यवस्था जरूरी होती है, जो देखने में साधारण हो, लेकिन राजनीतिक शांति के लंबे दौर में भी काम करती रहे.

आज के युवा आंदोलनों को गांधी के इस तरीके को अपनाना चाहिए और इंटरनेट पर तेजी से वायरल होने वाले मीम से आगे बढ़कर बूथ स्तर पर मजबूत जमीनी संगठन तैयार करना चाहिए. ऐसा लगता है कि इसी तरह थोड़े समय के मीडिया ध्यान को लंबे समय तक चलने वाले कानून बनाने और सरकार चलाने के प्रभाव में बदला जा सकता है.

यह समझना भी जरूरी है कि आज की संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खुद को किस तरह सुरक्षित रखती हैं. असली और व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए राज्य की व्यवस्था के अंदर से ही लोकतांत्रिक नियमों की रक्षा करने वाला एक संस्थागत संतुलन जरूरी होता है.

यही सिद्धांत डॉ. बी. आर. आंबेडकर के जीवन और उनकी विरासत में दिखाई देता है. उनके राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों ने दिखाया कि गहरे भेदभाव और संस्थाओं में आई गिरावट के खिलाफ सबसे लंबे समय तक टिकने वाली जीत तब मिलती है, जब हाशिए पर रहने वाले लोग सत्ता की औपचारिक व्यवस्था में प्रवेश करते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं. वे कानून बनाने, उसकी रक्षा करने और उसे लागू करने में भाग लेते हैं.

भारत का संविधान लागू होने और अपनाए जाने के बाद आंबेडकर ने संविधान से बाहर के तरीकों पर आंख बंद करके निर्भर रहने के खिलाफ चेतावनी दी थी, खासकर तब जब कानून और व्यवस्था के जरिए काम करने के तय रास्ते मौजूद हों.

संस्थाओं में आई गिरावट को पलटने के लिए कानून की व्यवस्था, नीतियां बनाने और रोजमर्रा के संगठनात्मक काम में लंबे समय तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है. लोकतंत्र और राजनीति के एक छात्र के रूप में मुझे लगता है कि बदलाव को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए एक मजबूत और एकजुट राष्ट्रीय पार्टी के मंच की जरूरत है. संविधान की रक्षा करने के लिए उसे लागू करने के लिए जरूरी संस्थागत साधन भी होने चाहिए.

डैरोन ऐसमोग्लू और जेम्स ए. रॉबिन्सन के संस्थागत अर्थशास्त्र पर किए गए काम से भी यह पता चलता है कि आजादी, आर्थिक समृद्धि और कानून के प्रति जवाबदेही को लंबे समय तक बनाए रखना मजबूत और सभी को साथ लेकर चलने वाली संस्थाओं पर निर्भर करता है. यह शासकों की धार्मिकता या जनता की कभी-कभार उठने वाली बाहरी मांगों पर निर्भर नहीं करता. उनका यह भी कहना है कि जब नागरिक अपनी रचनात्मक ऊर्जा को ऐसी राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं बनाने में लगाते हैं, जिनमें सभी को शामिल किया जाता है, तो वे लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक ऐसा चक्र बना सकते हैं, जो खुद को लगातार मजबूत करता रहता है.

जो आंदोलन खुद को स्थायी संस्थाओं में नहीं बदल पाते, वे समाज की व्यवस्था को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं को ऐसे छोटे लेकिन अपने फायदे के लिए व्यवस्था का इस्तेमाल करने वाले प्रभावशाली लोगों के कब्जे के लिए बहुत कमजोर छोड़ देते हैं. फ्रांस के राजनीतिक दार्शनिक एलेक्सिस डी टॉकविल ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के अपने अध्ययन में बताया था कि राजनीतिक समूहों के जरिए स्थिर, व्यवस्थित और लंबे समय तक चलने वाली राजनीतिक ताकत बनाने की इच्छा ही संगठन बनाने की कला है. यही वे सुरक्षा उपाय हैं, जो तानाशाही जैसी प्रवृत्तियों से निपट सकते हैं और लोकतंत्र में अस्थिरता को दूर कर सकते हैं.

प्रदर्शनकारियों से राजनीतिक भागीदार बनने तक

भारत में युवाओं के बीच इस समय जो बड़े स्तर पर विरोध हो रहा है, उसे ऐसे समय में विरोध की सोच और तरीके में एक बड़े मोड़ के रूप में समझना चाहिए, जब संस्थाओं में लगातार गिरावट आ रही है. एक युवा के रूप में मेरी चिंता और डर यह है कि विरोध की यह तेज और व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा सिर्फ इतिहास की एक छोटी सी घटना या इंटरनेट पर वायरल हुई याद बनकर खत्म नहीं होनी चाहिए.

इस ऊर्जा को सोच-समझकर आगे की ऐसी योजना में बदलना चाहिए, जिसमें थोड़े समय के दिखावे के बजाय संस्थागत रूप से पार्टी बनाने को प्राथमिकता दी जाए. सिद्धेश गौतम जैसे आज के आलोचकों द्वारा बताए गए वैचारिक अनुशासन को महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की बारीकी से की गई जमीनी संगठन की मेहनत और उससे भी ज्यादा डॉ. बी. आर. आंबेडकर के मजबूत संवैधानिक विचारों के साथ जोड़कर युवा बाहरी प्रदर्शनकारियों से व्यवस्था के अंदर के भागीदार बन सकते हैं.

यह सोच कि औपचारिक राजनीतिक पार्टियों में शामिल होना, उन्हें बनाना और लंबे समय तक चलाना व्यवस्था के साथ समझौता करना है, इसका विरोध करना होगा. वास्तव में, यह लोकतंत्र को वापस अपने हाथ में लेने का सबसे बड़ा कदम है. भारत के युवा तभी अपने भविष्य की रक्षा कर सकते हैं, कानून और उससे जुड़ी संस्थाओं की स्वतंत्रता को फिर से मजबूत कर सकते हैं और लंबे समय तक चलने वाले गणराज्य को दोबारा मजबूत बना सकते हैं, जब वे सरकार चलाने की स्थायी संस्थागत व्यवस्था में प्रवेश करेंगे. ऐसा गणराज्य संवैधानिक नैतिकता की भावना, भावनाओं और तर्क पर आधारित होगा.

निखिल संजय-रेखा अडसूले एक वकील हैं. वे TISS के पूर्व छात्र, USA के क्रेटन पेडन स्कॉलर और IIT-दिल्ली में सीनियर स्कॉलर हैं. वे @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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