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Friday, 16 October, 2026
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हॉस्टल, खाने और वाई-फाई को लेकर प्रदर्शन—IIIT रांची के दलित छात्र की आत्महत्या ने खड़े किए सवाल

छात्रों ने संस्थान के निदेशक प्रो. राजीव श्रीवास्तव के इस्तीफे, चिकित्सा सहायता में कथित देरी के लिए जवाबदेही तय करने और कॉलेज के लिए एक स्थायी इमारत की मांग की है.

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रांची: परीक्षाएं अभी बीच में ही थीं, लेकिन 19 साल के आदित्य कुमार ने बिहार के भागलपुर में अपने घर जाने का टिकट पहले ही बुक कर लिया था. उसे 17 अक्टूबर को निकलना था, यानी पहले साल की परीक्षाएं खत्म होने के अगले दिन. लेकिन 10 अक्टूबर को, अपना तीसरा पेपर देने से पहले ही, आदित्य ने आत्महत्या कर ली.

क्लास 12 की स्टेट बोर्ड परीक्षा के बाद आदित्य ने तीन साल तक एक अच्छे कॉलेज में दाखिले की तैयारी की थी. आखिर में उसे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), रांची में एडमिशन मिल गया.

“आदित्य अपने एग्जाम को लेकर बहुत परेशान था. उसने हमें बताया था कि उसके पहले दो एग्जाम अच्छे नहीं गए. एक में कुल 30 नंबर में से वो सिर्फ 10 नंबर के सवाल कर पाया, और दूसरे में सिर्फ चार नंबर के. हमें पता था कि वो दबाव में है, लेकिन हमें अंदाजा नहीं था कि इसका उस पर इतना असर पड़ रहा है. अगर हमें पता होता, तो हम उसकी मदद के लिए कुछ करते,” ये बात पहले साल के एक छात्र ने कही, जो आदित्य का हॉस्टल मेट था और जिसने उस दिन आदित्य के शरीर को पांच मंजिल नीचे उतारने में मदद की. कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में पहले साल का बी.टेक छात्र आदित्य दलित समुदाय से था.

आदित्य की आत्महत्या से IIIT रांची में सालों से चली आ रही छात्रों की शिकायतें सामने आ गई हैं. इससे छात्रों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है और संस्थान की इमरजेंसी मेडिकल सुविधाओं, हॉस्टल की हालत, पढ़ाई के तनाव और छात्रों की मदद के इंतजाम पर सवाल उठ रहे हैं. छात्रों ने संस्थान के डायरेक्टर प्रो. राजीव श्रीवास्तव के इस्तीफे की मांग की है. उन्होंने मेडिकल मदद में कथित देरी के लिए जवाबदेही और एक स्थायी कॉलेज बिल्डिंग की भी मांग की है. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 12 अक्टूबर को जांच के आदेश दिए और तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई. ये कमेटी आदित्य की मौत तक पहुंचने वाले हालात और छात्रों की भलाई को लेकर संस्थान के रवैये की जांच करेगी.

IIIT रांची का पहले साल का एक छात्र, जिसने आदित्य कुमार के शरीर को पांचवीं मंजिल से ग्राउंड फ्लोर तक लाने में मदद की | नूतन शर्मा/दिप्रिंट

“उसका कमरा पांचवीं मंजिल पर था और बिजली कटी हुई थी, इसलिए लिफ्ट बंद थी. हमें उसे नीचे ग्राउंड फ्लोर तक उठाकर लाना पड़ा. जब हम उसे CPR दे रहे थे, तब केयरटेकर हमें कह रहा था कि शरीर को हाथ मत लगाओ,” ये बात पहले साल के एक छात्र ने कही, जिसने आदित्य को नीचे लाने में मदद की.

आदित्य के दोस्तों के मुताबिक, उसे चिंता थी कि वो 8 CGPA नहीं रख पाएगा. उन्होंने बताया कि उन्होंने आदित्य को समझाने की कोशिश की थी कि ये तो बस पहले साल के एग्जाम हैं और उसे इतना प्रेशर नहीं लेना चाहिए.

लेकिन पढ़ाई के तनाव से जूझ रहे किसी इंसान को मदद के लिए कहां जाना है, इसकी कोई साफ जानकारी नहीं थी. संस्थान का कहना है कि ऐसी चिंताओं को देखने के लिए उसके पास दो सदस्यों की एक कमेटी है, लेकिन छात्रों का कहना है कि उन्हें इसके बारे में बताया ही नहीं गया और उन्हें पता नहीं था कि मदद कैसे मांगें. संस्थान की काउंसलिंग व्यवस्था और शिकायत निवारण के तरीके अब उन मुद्दों में हैं, जिन पर छात्रों के अनुसार सख्त जांच की जरूरत है.

उनकी शिकायतें सिर्फ पढ़ाई के दबाव तक सीमित नहीं हैं. छात्र कहते हैं कि बार-बार बिजली जाना, मेस में खराब और गंदा खाना, ट्रांसपोर्ट की कमी और स्थायी कैंपस का न होना, इन सबसे जिंदगी मुश्किल हो गई है. उन्होंने गैर-जरूरी जुर्माने की भी शिकायत की. छात्रों का दावा है कि पहले एग्जाम से पहले चार घंटे रोज बिजली नहीं रहती थी.

ये शिकायतें 11 अक्टूबर से IIIT रांची कैंपस में तीन दिन के विरोध प्रदर्शन में बदल गईं. उसी दिन संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) ए.के. भट्ट ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मुलाकात की. छात्र खोखले आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहते थे.

“हमने छात्रों की समस्याएं सुनी हैं और सुधार के कदम उठाए जा रहे हैं. हम उनके संपर्क में हैं. एक काउंसलर तैनात किया जाएगा और छात्रों को हर बात की जानकारी दी जाएगी,” भट्ट ने दिप्रिंट से कहा, जो इस मामले की जांच कर रहे हैं.

आदित्य की मौत के चार दिन बाद, लगातार चल रही अशांति के बीच श्रीवास्तव को 30 दिन की स्वैच्छिक छुट्टी पर भेज दिया गया. इसी बीच कॉलेज प्रशासन ने कथित तौर पर छात्रों से कैंपस छोड़ने और दिवाली के बाद लौटने को कहा.

‘जल्दी आ जाइए’

विष्णु देव कुमार के लिए वो एक आम रात थी. उन्होंने 10 अक्टूबर को रात करीब 10:10 बजे अपने बेटे आदित्य से वीडियो कॉल पर बात की. उन्हें पता था कि उनका बेटा अपने एग्जाम को लेकर थोड़ा परेशान है. उन्होंने आदित्य से पूछा कि सब ठीक है या नहीं, उसे पैसे चाहिए या नहीं, या कोई और बात उसे परेशान तो नहीं कर रही. उन्होंने तो ये भी कहा कि अगर आदित्य चाहे तो वो रांची आ जाएंगे.

विष्णु देव ने याद करके बताया कि वो एक आम बातचीत थी. उनके बेटे ने बताया कि उसके एग्जाम 16 अक्टूबर तक चलेंगे और उसने अगले दिन की ट्रेन का टिकट बुक कर लिया है.

करीब एक घंटे से कुछ ज्यादा बाद, रात लगभग 11.30 बजे, फोन फिर बजा.

“मैं IIIT रांची से बोल रहा हूं, आप जल्दी रांची आ जाइए. मिस-हैपनिंग हो गई है,” फोन के दूसरी तरफ से किसी ने कहा. “मेरे लड़के को कुछ हुआ है क्या?” कुमार ने पूछा. लेकिन जवाब मिलने से पहले ही कॉल कट गई.

कुमार ने तुरंत अपनी बाइक निकाली, दो रिश्तेदारों को फोन किया और भागलपुर से रांची की अगली ट्रेन पकड़ ली. जब विष्णु देव कुमार रांची के मंडिका हॉस्पिटल पहुंचे, तो आखिरकार उन्हें आदित्य दिखा. लेकिन वो नजारा देखकर वो हिल गए. “उसकी बेजान लाश देखकर मेरी पूरी दुनिया बिखर गई,” उन्होंने कहा.

आदित्य कुमार का लैपटॉप, जो उसके बिस्तर पर रखा था | स्पेशल अरेंजमेंट

ये जानने के लिए बेचैन कि उससे आखिरी बार बात करने के बाद उस एक घंटे में उनके बेटे के साथ क्या हुआ, विष्णु देव सीधे अपने बेटे के हॉस्टल रूम गए. आदित्य की नोटबुक उसके बिस्तर पर पड़ी थी और उसका लैपटॉप खुला हुआ था.

“मैं वो सब कुछ अपने साथ ले जाना चाहता था जिसे आदित्य ने आखिरी बार छुआ था, जो बातें उसने की थीं और जो भी उसने महसूस किया था,” विष्णु देव ने कहा. उन्होंने उस गमछे को भी छुआ, जिसका इस्तेमाल आदित्य ने अपनी जान लेने के लिए किया था.

आदित्य की स्टडी टेबल और नोटबुक उसके रूममेट के बिस्तर पर रखी थीं | विशेष व्यवस्था

वो पल

खेलगांव हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के हॉस्टल में, जहां IIIT रांची के छात्रों को अस्थायी तौर पर रखा गया है, वो एक आम रात थी. कुछ छात्र अगले दिन के एग्जाम की तैयारी कर रहे थे, तो कुछ बस मोबाइल पर गेम खेल रहे थे. रात के 10 बजे के बाद बिजली चली गई, और हॉस्टल के छात्रों ने एक साथ शोर मचाया, जो हॉस्टलों की एक आम रस्म है. ठीक 10:48 बजे, छोटू नाम के 20 साल के एक छात्र ने चीखें सुनीं. लोग आदित्य के कमरे का दरवाजा तोड़ने के लिए मदद के लिए पुकार रहे थे. 10:55 बजे, जब छात्रों ने दरवाजा तोड़ा, तो उन्होंने देखा कि आदित्य अपनी जान ले चुका था.

छह छात्रों ने आदित्य के शरीर को उठाया. “हम लिफ्ट के पास रुके, लेकिन बिजली नहीं थी, इसलिए हमें उसे पांच मंजिल नीचे उतारकर लाना पड़ा,” छोटू ने कहा.

जब आदित्य का शरीर फर्श पर पड़ा था और छात्र उसे CPR दे रहे थे, तब वहां मौजूद हॉस्टल केयरटेकर ने कथित तौर पर उनसे शरीर को हाथ न लगाने को कहा. फिर छात्र एम्बुलेंस ढूंढने के लिए दौड़े, जिसे हॉस्टल परिसर में खड़ा होना चाहिए था. जब वो आखिरकार मिली, तो ड्राइवर वहां नहीं था.

“हमें ड्राइवर को ढूंढने जाना पड़ा, और जब वो मिला तो गाड़ी की चाबी नहीं थी. हमें चाबी ढूंढनी पड़ी. इस सब में हमारे करीब 10-12 जरूरी मिनट बर्बाद हो गए, जिससे इलाज में देरी हुई,” शव को नीचे लाने वाले एक छात्र ने आरोप लगाया. उसने आगे आरोप लगाया कि एम्बुलेंस की हालत खराब थी, उसमें ऑक्सीजन नहीं थी और स्ट्रेचर भी बाहर नहीं निकल रहा था.

IIIT रांची में आने से पहले आदित्य ने भागलपुर में आकाश इंस्टीट्यूट से दो साल तैयारी की थी, और एक साल फिजिक्स वाला से. उसे 18 अगस्त को एडमिशन मिला था और वो पिछले दो महीने से हॉस्टल में रह रहा था.

“वो अकेलेपन या उदासी की वजह से ऐसा नहीं था. आदित्य पिछले तीन साल से घर से दूर रह रहा था. उसने संस्थान के मैनेजमेंट और खाने की क्वालिटी की शिकायत की थी. वो कहता था कि जितनी फीस हम दे रहे हैं, उसके हिसाब से सुविधाएं नहीं हैं. उसने अपने एग्जाम के बारे में भी बात की थी. वो सिर्फ 19 साल का था. उसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी,” विष्णु देव ने कहा.

खेलगांव पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का केस दर्ज किया है, और कहा है कि अगर जांच में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो इसे FIR में बदला जा सकता है.

“हमें कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है. हम मामले की जांच कर रहे हैं और उसी के हिसाब से कार्रवाई करेंगे,” मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा.

लेकिन विष्णु देव चाहते हैं कि आदित्य की मौत के हालात की स्वतंत्र जांच हो, और वो IIIT रांची के मैनेजमेंट के खिलाफ कोर्ट जाने के बारे में भी सोच रहे हैं.

“हम चाहते हैं कि निष्पक्ष जांच हो. पुलिस से भरोसा उठ गया है, अब कोर्ट से उम्मीद है,” उन्होंने कहा.

एक कैंपस, जो अब भी पहुंच से दूर है

IIIT रांची के छात्रों के लिए, समस्याएं अपने ही घर के पास से शुरू हो जाती हैं.

खुलने के दस साल बाद भी, इंस्टीट्यूट का कोई फंक्शनल परमानेंट कैंपस नहीं है. क्लास गेटलाटू में टेम्पररी BSNL ARTTC कैंपस में होती हैं. वहां जाने से पहले, क्लासें रांची की झारखंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (JUT) में लगती थीं. रहने के लिए संस्थान ने अपने छात्रों को खेलगांव हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में रखा है, जहां सैकड़ों सरकारी अधिकारी रहते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर 2023 को IIIT रांची की नई एकेडमिक और एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग की नींव रखी थी. नया कैंपस, जो 80 प्रतिशत पूरा हो चुका है, रांची के कांके के सांगा गांव में बन रहा है. 55 एकड़ में फैले इस स्थायी कैंपस को बनाने की अनुमानित लागत 128 करोड़ रुपये थी. इसमें एकेडमिक और एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग, हॉस्टल, फैकल्टी के लिए घर और दूसरी सुविधाएं होनी थीं.

लेकिन छात्रों का दावा है कि जब उन्होंने ऑनलाइन संस्थान को देखा, तो उसकी वेबसाइट ने बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाई थी.

“मैंने एक बड़ी बिल्डिंग की तस्वीरें देखी थीं, जो नई-नई पीच और ऑरेंज रंग में पेंट की हुई थी. लेकिन हर दिन हम BSNL की बिल्डिंग में जाते हैं, जहां ज्यादा सुविधाएं नहीं हैं. हमें अपना कैंपस चाहिए. अगर वो होता, तो शायद इनमें से कई समस्याएं पहले ही नहीं होतीं,” दूसरे साल के एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा.

संस्थान के जुलाई 2025 के न्यूजलेटर में प्रस्तावित कैंपस को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, खास रिसर्च सुविधाओं, एकेडमिक ब्लॉक, छात्रों के हॉस्टल और मनोरंजन की जगहों वाला बताया गया है. इसके प्लेसमेंट पेज पर भी लिखा है कि स्थायी कैंपस 2025 तक चालू हो जाएगा. वो समय सीमा निकल चुकी है, लेकिन संस्थान अब भी निर्माण को जारी बता रहा है. इससे छात्र अपने अस्थायी हॉस्टल और कम सुविधाओं वाली जुगाड़ की क्लासों के बीच चक्कर काटते रह जाते हैं.

“मामला कोर्ट में है. ठेकेदार भाग गया, कोई कुछ नहीं कर सकता. इसे 2024 में पूरा होना था,” ए.के. भट्ट ने कहा.

लेकिन छात्रों की परेशानियां यहीं खत्म नहीं होतीं. असल में, मामला इसका उल्टा है. हॉस्टल में छात्रों के पास खाने की दो जगहें हैं, मेस और एक कैंटीन, और दोनों कथित तौर पर एक ही ठेकेदार चलाता है. छात्रों का दावा है कि कैंटीन का खाना बेहतर है और जगह साफ है, जबकि मेस में परोसा जाने वाला खाना अक्सर गंदा और खराब क्वालिटी का होता है. उन्होंने इस फर्क की वजह ये बताई कि कैंटीन के खाने के लिए वो अलग से पैसे देते हैं, जबकि मेस एक ठेके के तहत चलता है.

“सई हॉस्पिटैलिटी कंपनी को IIT धनबाद और ISM जमशेदपुर में ब्लैकलिस्ट किया जा चुका है, लेकिन हमें मजबूरी में उसी का दिया खाना खाना पड़ता है. जिन हालात में हम खाना खाते हैं, उन्हें देखकर आप हैरान रह जाएंगे,” छोटू ने आरोप लगाया.

आना-जाना एक और चिंता है. छात्रों का आरोप है कि हॉस्टल से BSNL ARTC कैंपस तक छात्रों को ले जाने वाली बसें पुरानी हैं, जिससे उनकी सुरक्षा पर सवाल उठते हैं.

“एक दिन चलती बस का एक टायर निकल गया था,” प्रदर्शन में शामिल एक और छात्र ने आरोप लगाया.

छात्रों का ये भी कहना है कि वो प्रशासन से शिकायत करने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें निशाना बनाया जाएगा. तीसरे साल के एक छात्र ने याद किया कि उसने Wi-Fi कनेक्टिविटी की समस्या के बारे में डायरेक्टर को लिखा था, लेकिन उलटा फैकल्टी ने उससे सवाल किए कि उसने ऊपर तक जाने का क्रम क्यों तोड़ा.

“हमें शिकायत करने से डर लगता है क्योंकि हमें लगता है कि हमें टारगेट किया जाएगा. जब हमने Wi-Fi की समस्या के बारे में डायरेक्टर को लिखा, तो कुछ फैकल्टी मेंबर्स ने सवाल उठाया कि हम उनके ऊपर क्यों गए,” छात्र ने आरोप लगाया.

हॉस्टल के कमरों में मामूली नुकसान को लेकर भी झगड़े हुए हैं. पिछले साल, 14 छात्रों पर कथित तौर पर अपने कमरों के नुकसान के लिए 5,000-5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया. माता-पिता ने ये मुद्दा संस्थान के सामने उठाने की कोशिश की, लेकिन आखिर में छात्रों को पैसे देने ही पड़े.

पिछले साल का एक फाइन नोटिस, जिसमें छात्रों से हॉस्टल के कमरों के नुकसान के लिए 5,000 रुपये लिए गए | नूतन शर्मा/दिप्रिंट

“प्लाईवुड की दीवार में एक छेद था. उसे पुट्टी से ठीक कर दिया गया था, फिर भी हमसे 5,000 रुपये लिए गए. अगर कोई स्विच या ताला भी टूट जाए, तो हमसे कहा जाता है कि पहले नया सामान खरीदकर लाओ, तभी वो ठीक करेंगे,” तीसरे साल के एक छात्र ने दावा किया.

हालांकि भट्ट ने कहा कि संस्थान छात्रों पर जानबूझकर जुर्माना नहीं लगाता और उन्होंने आरोपों की जांच करने का वादा किया.

“ये पिछले साल हुआ था. केयरटेकर बदल दिया गया है, और इस साल छात्रों से ऐसा कुछ नहीं लिया गया है. लेकिन अगर ऐसी कोई घटना हुई है, तो हम उसकी जांच करेंगे,” उन्होंने कहा.

मदद मांगने का कोई साफ रास्ता नहीं

छात्रों ने सीमित मेडिकल सुविधाओं का मुद्दा भी उठाया, जहां डॉक्टर सिर्फ शाम 6 बजे से 8 बजे के बीच मिलता है.

जहां तक छात्रों की मानसिक सेहत की बात है, छात्रों का दावा है कि उन्हें ये नहीं बताया गया कि अगर वो तनाव, अकेलापन या घबराहट महसूस करें तो किसके पास जाएं. कई ने कहा कि उन्हें संस्थान के SC/ST सेल के बारे में भी नहीं बताया गया था.

“मुझे पता ही नहीं था कि मेरे कॉलेज में SC/ST सेल है. डायरेक्टर ने हमें इसके बारे में तभी बताया जब वो दो दिन पहले प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मिलने आए,” पहले साल के एक छात्र ने दावा किया. “ये जानकारी हमें पहले ही दी जानी चाहिए थी,” उसने आगे कहा.

रजिस्ट्रार-इन-चार्ज मुनुरेन सैमसन चंपिया ने कहा कि SC/ST सेल सक्रिय है और संस्थान को जातिगत भेदभाव की कोई शिकायत नहीं मिली है.

“हमें जातिवाद या किसी भी तरह के भेदभाव की कोई शिकायत नहीं मिली है. इसकी जानकारी हमारी वेबसाइट पर दी गई है,” उन्होंने कहा.

हालांकि चंपिया ने माना कि मानसिक सेहत को लेकर बातचीत और जानकारी देने का तरीका बेहतर हो सकता है.

“हमारे पास दो प्रोफेसरों की एक कमेटी है, लेकिन लगता है कि छात्रों को इसके बारे में पता नहीं है. हम जानकारी देने का तरीका सुधारेंगे और ये पक्का करेंगे कि तनाव में रहने वाले छात्र मदद ले सकें. हम एक काउंसलर भी नियुक्त कर रहे हैं,” उन्होंने कहा.

आदित्य के पिता विष्णु देव कुमार के लिए ये शिकायतें कोई हवा-हवाई बातें नहीं थीं.

“आदित्य हमेशा कहता था कि वहां बिजली की समस्या है और उसे अच्छा खाना नहीं मिलता. वो कहता था कि इन समस्याओं की वजह से उसका पढ़ाई से ध्यान भटकता है,” विष्णु देव कुमार ने दावा किया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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