चंडीगढ़: दो पड़ोसी राज्यों के दो मुख्यमंत्री. विदेश के दो दौरे, लेकिन विदेश सिर्फ एक ही जा सका.
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इस समय स्वीडन में हैं. इससे पहले वह इस महीने की शुरुआत में सिंगापुर गए थे. पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को पेरिस जाना था, लेकिन उन्हें केंद्र सरकार से राजनीतिक मंजूरी नहीं मिली. अब उनकी सरकार ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया है.
शुक्रवार को केंद्र सरकार ने अपना जवाब दिया. विदेश मंत्रालय (MEA) ने हलफनामे में कहा कि मान को सुरक्षा, प्रोटोकॉल और फ्रांस सरकार की ओर से औपचारिक न्योता नहीं मिलने के कारण अनुमति नहीं दी गई. दिप्रिंट से संपर्क किए जाने पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने इसकी पुष्टि की.
सैनी के विदेश दौरे
सैनी 4 से 6 अक्टूबर तक सिंगापुर में थे. वह 14 अक्टूबर को स्वीडन पहुंचे. उनका यह दौरा 17 अक्टूबर को खत्म होगा. सैनी के कार्यालय के मुताबिक, दौरे के एजेंडे में रक्षा क्षेत्र में सामान बनाने, वाहन उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा, रियल एस्टेट और घरों में इस्तेमाल होने वाले सामान से जुड़े विषय शामिल हैं.
इंडिया-स्वीडन इनोवेशन डे में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए सैनी ने कहा कि भारत और स्वीडन के बीच व्यापार 2016 में 2.86 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2025 में 7.75 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया.
हरियाणा सरकार के एक बयान के मुताबिक, सैनी ने हरियाणा में स्वीडन के निवेश का ज़िक्र किया. इनमें गुरुग्राम में IKEA की 3,500 करोड़ रुपये की परियोजना, झज्जर के एमईटी सिटी में बन रही कार्ल-गुस्ताफ की विनिर्माण इकाई और 2013 से गुरुग्राम में चल रहा कुनस्कैप्सकोलन स्कूल शामिल हैं. सैनी ने मेहमानों को 2027 में होने वाले हैपनिंग हरियाणा ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में आने का न्योता भी दिया.
पंजाब का दौरा
मान को 15 से 21 अक्टूबर तक पंजाब के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए पेरिस जाना था. उनके साथ मुख्य सचिव के. ए. पी. सिन्हा और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव रवि भगत भी जाने वाले थे. यह कार्यक्रम SIAL पेरिस 2026 था. यह खाद्य पदार्थों से जुड़ा व्यापार मेला है, जो हर दो साल में एक बार होता है. इस बार यह 17 से 21 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है.
पंजाब की सबसे बड़ी सहकारी विपणन संस्था मार्कफेड (MARKFED) को केंद्र के वाणिज्य मंत्रालय के अधीन आने वाली संस्था एपीडा (APEDA) के इंडिया पवेलियन में 18 वर्ग मीटर की जगह मिली थी. पंजाब सरकार की याचिका के मुताबिक, पूरे दौरे का खर्च मार्कफेड को उठाना था.
दौरे के कार्यक्रम के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल को 15 अक्टूबर को दिल्ली से रवाना होना था और 16 अक्टूबर को पंजाबी प्रवासियों से मिलना था. मेला 17 अक्टूबर को शुरू होना था. व्यापार संगठनों और आयातकों के साथ 18 और 20 अक्टूबर को बैठकें होनी थीं. 20 अक्टूबर को भारतीय राजदूत के साथ भी बैठक तय थी.
अनुमति देने से इनकार
पंजाब ने नौ सितंबर को विदेश मंत्रालय (MEA) के ई-पॉल क्लीयरेंस पोर्टल पर अपना आवेदन जमा किया था. यह रवाना होने की तारीख से 36 दिन पहले की बात थी. इससे पहले, पंजाब के सहकारिता विभाग ने 3 और 8 सितंबर को विदेश मंत्रालय को पत्र भी लिखा था.
पोर्टल से निकली प्रिंट कॉपी में आवेदन की स्थिति “Denied” यानी “अनुमति देने से इनकार” दिखाई गई है. टिप्पणी में सिर्फ इतना लिखा है: “विदेश मंत्रालय ने प्रस्ताव की जांच की है. राजनीतिक आधार पर मंजूरी देने से इनकार किया जाता है.”
याचिका में कहा गया है कि विदेश मंत्रालय ने न तो कोई सवाल पूछा, न किसी कमी की ओर ध्यान दिलाया और न ही राज्य के पत्रों का जवाब दिया.
पंजाब चाहता है कि अनुमति देने से इनकार करने के फैसले को रद्द किया जाए और मंजूरी दी जाए. दूसरा विकल्प यह है कि विदेश मंत्रालय राज्य की बात सुनने के बाद कारण बताते हुए आदेश जारी करे और 24 घंटे के भीतर फैसले पर दोबारा विचार करे. पंजाब ने यह भी मांग की है कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक उसे अंतरिम मंजूरी दी जाए.
न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई की और केंद्र सरकार से शुक्रवार तक जवाब देने को कहा. केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन अदालत में पेश हुए.
पंजाब की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता चंचल सिंघला ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार राज्य के साथ भेदभाव कर रही है.
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है. उन्होंने कहा कि भाजपा से जुड़े हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी हाल ही में विदेश जाने की अनुमति मांगी थी और उन्हें इसकी मंजूरी दे दी गई.
पंजाब ने क्या दलीलें दीं
‘कोई कारण नहीं बताया’
राज्य का कहना है कि किसी पक्ष को प्रभावित करने वाले फैसले में उसके कारण बताना ज़रूरी है. इसके लिए याचिका में सुप्रीम कोर्ट के मोहिंदर सिंह गिल और क्रांति एसोसिएट्स मामलों का हवाला दिया गया है.
‘इसके पीछे कोई कानून नहीं’
याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक मंजूरी देने की प्रक्रिया सिर्फ कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय के कार्यालयी ज्ञापनों पर आधारित है. इनमें न तो कोई तय मानदंड हैं, न समय सीमा और न ही अपील करने का कोई रास्ता. पंजाब ने सतवंत सिंह सावनी मामले और संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया है.
‘यह हमारा अपना क्षेत्र है’
याचिका में कहा गया है कि खेती के उत्पादों और सहकारी संस्था को बढ़ावा देना संविधान के अनुच्छेद 162 और राज्य सूची के तहत आता है. इसमें कहा गया है कि संघ सूची में विदेश मामलों और विदेशी व्यापार से जुड़ी प्रविष्टियां इस मामले पर लागू नहीं होतीं, क्योंकि पंजाब कोई संधि नहीं करता है.
‘संघीय व्यवस्था’
राज्य ने 25 नवंबर 1949 को डॉ. बी. आर. आंबेडकर के भाषण, एस. आर. बोम्मई मामले और 2023 के दिल्ली में सेवाओं से जुड़े फैसले का हवाला दिया है.
‘मनमाना फैसला’
पंजाब का कहना है कि उसने करीब छह हफ्ते पहले ही केंद्र से संपर्क किया था. याचिका में कहा गया है कि वित्त मंत्रालय के 2019 और 2023 के निर्देशों के मुताबिक, ऐसे प्रस्ताव तीन हफ्ते पहले भेजे जाने चाहिए. भारतीय मिशन से भी सलाह ली गई थी.
‘पहले भी अनुमति देने से इनकार’
याचिका में कहा गया है कि अगस्त 2024 में भी मान को पेरिस जाने की मंजूरी नहीं दी गई थी. उस समय बताई गई वजह यह थी कि कम समय में उनकी जेड-प्लस सुरक्षा के इंतज़ाम नहीं किए जा सकते थे. याचिका में कहा गया है कि अब ऐसी कोई वजह नहीं हो सकती.
इसमें पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष (अगस्त 2024), दिल्ली के मुख्यमंत्री (2019 में कोपेनहेगन और 2022 में सिंगापुर) और केरल के स्वास्थ्य मंत्री (जून 2024) को अनुमति देने से इनकार किए जाने के मामलों का भी ज़िक्र है.
याचिका में कहा गया है कि दिल्ली के मंत्री गोपाल राय और मेयर शैली ओबेरॉय को दिल्ली हाई कोर्ट जाने के तुरंत बाद मंजूरी मिल गई थी. पंजाब का मानना है कि इन मामलों से पता चलता है कि अनुमति देने से इनकार करने के फैसले विदेश नीति के आधार पर नहीं लिए जा रहे हैं.
केंद्र का जवाब
भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की ओर से विदेश मंत्रालय में अवर सचिव (यूरोप पश्चिम) आयुष गुप्ता ने हलफनामा दाखिल किया है. इसमें निम्नलिखित बातें कही गई हैं.
‘यह विदेश मंत्रालय का काम है’
हलफनामे में कहा गया है कि कामकाज के बंटवारे से जुड़े नियमों के तहत राजनीतिक मंजूरी देना विदेश मंत्रालय का काम है. विदेश जाने वाला कोई भी बड़ा पदाधिकारी भारत का प्रतिनिधित्व करता है और विदेशी सरकारें राज्य तथा केंद्र के अधिकारियों के बीच कोई अंतर नहीं करतीं.
हलफनामे के मुताबिक, यह प्रक्रिया कैबिनेट सचिवालय के दिशा-निर्देशों पर आधारित है, जिन्हें पहली बार 1982 में जारी किया गया था और 26 अगस्त 2010 को अपडेट किया गया. 2016 से मंजूरी देने का काम विदेश मंत्रालय के पोर्टल के जरिए किया जा रहा है.
‘पोर्टल पर कारण क्यों नहीं बताया गया’
जवाब में कहा गया है कि पोर्टल पर फैसले का कारण नहीं बताने की परंपरा है. कई बार किसी दौरे को “राजनीतिक आधार पर” इसलिए मंजूरी नहीं दी जाती क्योंकि उससे जुड़े “संवेदनशील मामले” दोनों देशों के संबंधों पर असर डाल सकते हैं और उनके बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती.
‘औपचारिक न्योता नहीं मिला’
हलफनामे में कहा गया है कि कैबिनेट सचिवालय के निर्देशों के मुताबिक, मंत्रियों के विदेश दौरे मेजबान देश की सरकार से मिले औपचारिक न्योते के जवाब में होने चाहिए. इसमें कहा गया है कि फ्रांस सरकार की ओर से ऐसा कोई न्योता विदेश मंत्रालय के ध्यान में नहीं लाया गया.
हालांकि, पंजाब की याचिका में कहा गया है कि आवेदन के साथ “न्योता” और “कार्यक्रम” नाम के दस्तावेज अपलोड किए गए थे.
‘सुरक्षा’
केंद्र का कहना है कि इस कार्यक्रम की प्रकृति और स्तर को देखते हुए मुख्यमंत्री की मौजूदगी “उचित नहीं” है. उसने SIAL को भीड़भाड़ वाला मेला बताया है, जहां भारतीय दूतावास सुरक्षा और प्रोटोकॉल के इंतजामों को नियंत्रित नहीं कर सकता.
हलफनामे के मुताबिक, मेजबान देश की सरकारें आम तौर पर सुरक्षा और प्रोटोकॉल की व्यवस्था सिर्फ उन आधिकारिक दौरों के लिए करती हैं, जिनके लिए न्योता दिया गया हो. भारतीय दूतावास उन्हें ऐसा करने का आदेश नहीं दे सकता.
हलफनामे में आगे कहा गया है कि पंजाब ने खुद विदेश मंत्रालय को बताया था कि मान की जान को गंभीर खतरा है. इसमें बब्बर खालसा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों के साथ-साथ कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे देशों में मौजूद कट्टरपंथी तत्वों का नाम लिया गया है.
पंजाब ने पेरिस दौरे के लिए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम करने की मांग की थी. जवाब में कहा गया है कि उचित न्योते के बिना ऐसे इंतजाम “उपलब्ध ही नहीं हैं” और दौरे पर जाने से मुख्यमंत्री “गंभीर खतरे” में पड़ सकते हैं.
‘मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं’
केंद्र का कहना है कि मेले में मान की कोई कामकाजी भूमिका नहीं होती. उसने बताया कि पंजाब के दो प्रतिनिधिमंडलों को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है.
पहला तीन सदस्यों वाला मार्कफेड दल है. इसमें सहकारिता विभाग के प्रशासनिक सचिव अजीत बालाजी जोशी, मार्कफेड के प्रबंध निदेशक विशेष सारंगल और अतिरिक्त प्रमुख सचिव सिमरनदीप सिंह शामिल हैं.
दूसरा निवेश को बढ़ावा देने वाला दल है. इसमें प्रशासनिक सचिव बसंत गर्ग, इन्वेस्ट पंजाब के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित ढाका और उद्योग विभाग के निदेशक जसप्रीत सिंह शामिल हैं.
जवाब में कहा गया है कि कृषि और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े पंजाब के हितों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, क्योंकि इन कामों के लिए संबंधित अधिकारी मौजूद हैं.
‘कोई भेदभाव नहीं’
केंद्र का कहना है कि पंजाब को पहले भी विदेश दौरों के लिए मंजूरी मिल चुकी है. इससे भेदभाव के आरोप “खारिज हो जाने चाहिए”.
केंद्र ने मान के फिनलैंड, नीदरलैंड, चेक गणराज्य, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी के दौरों को मिली मंजूरी का जिक्र किया है. इनमें सबसे हाल के दौरे अप्रैल 2026 में फिनलैंड और नीदरलैंड के थे.
‘मंजूरी देने से इनकार करने का अधिकार’
हलफनामे में कहा गया है कि मंजूरी के प्रस्ताव की जांच करने के विदेश मंत्रालय के अधिकार में उसे खारिज करने का अधिकार भी शामिल है. ऐसा न होने पर पूरी प्रक्रिया सिर्फ “कागज़ी औपचारिकता” बनकर रह जाएगी.
केंद्र का कहना है कि उचित परिस्थितियों के बिना दौरे की अनुमति देने से गलत परंपरा शुरू होगी. उसका तर्क है कि विदेश मंत्रालय ने मान की सुरक्षा और देश की गरिमा की रक्षा के लिए सोच-समझकर फैसला लिया.
केंद्र ने अदालत से याचिका को शुरुआत में ही खारिज करने की मांग की है. उसने यह भी कहा है कि अनुमति देने से इनकार करने के फैसले को विदेश मामलों और राजनयिक प्रोटोकॉल पर केंद्र की कार्यकारी शक्तियों का वैध और गैर-मनमाना इस्तेमाल माना जाए.
अब आगे क्या?
न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं. पंजाब चाहता है कि अनुमति देने से इनकार करने का फैसला रद्द किया जाए और मंजूरी दी जाए. ऐसा नहीं होने पर वह चाहता है कि विदेश मंत्रालय राज्य की बात सुनने के बाद कारण बताते हुए आदेश जारी करे और 24 घंटे के भीतर नए सिरे से फैसला ले.
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) सत्य पाल जैन पेश हो रहे हैं. यह मेला शनिवार को शुरू होगा.
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