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Sunday, 8 November, 2026
होमदेशकमाई का असली हिसाब: BBMB के बिजली फैसले से हिमाचल प्रदेश को कितना फायदा होगा?

कमाई का असली हिसाब: BBMB के बिजली फैसले से हिमाचल प्रदेश को कितना फायदा होगा?

राज्य आखिर में कितनी बचत करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बिजली का कितना हिस्सा खरीदी गई बिजली की जगह लेगा, इसे पाने की लागत क्या है और क्या कोई सरप्लस बेचा जा सकता है.

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शिमला: हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) की परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली में उसके हिस्से पर सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य हर साल बिजली खरीद पर करीब 300 करोड़ रुपये बचा सकता है. यह अनुमान राज्य को हर साल बिजली की कमी वाले महीनों में मिलने वाली करीब 598 मिलियन यूनिट (MU) बिजली पर आधारित है. इसकी कीमत 5.12 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से आंकी गई है. इसी दर पर हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड (HPSEBL) ने 2024-25 की सर्दियों के लिए कम अवधि के बिजली खरीद समझौते किए थे.

बिजली की बाजार कीमत के आधार पर वास्तविक आर्थिक फायदा इससे ज्यादा भी हो सकता है. राज्य सरकार ने सालाना 600 करोड़ से 800 करोड़ रुपये तक के संभावित फायदे का अनुमान लगाया है. हालांकि, यह अतिरिक्त बिजली की अनुमानित बाजार कीमत है, जरूरी नहीं कि इतनी रकम HPSEBL की बचत या कमाई हो. वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि कितनी बिजली से बाजार से खरीदारी कम होगी, बिजली लेने की लागत कितनी होगी और क्या अतिरिक्त बिजली बेची जा सकेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने 6 नवंबर को हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम भारत संघ मामले में दिए अपने फैसले में निर्देश दिया कि हरियाणा और पंजाब से हिमाचल को 20 बिजली की कमी वाले मौसमों के दौरान कुल 11,973 MU बिजली दी जाए. इसका मतलब है कि राज्य को हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच करीब 598 MU बिजली मिलेगी. इस फैसले से BBMB की परियोजनाओं, जिनमें भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाएं शामिल हैं, से हिमाचल के बिजली हिस्से को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद खत्म हो गया है.

कोर्ट ने हिमाचल पर बकाया पूंजीगत लागत को ध्यान में रखने के बाद बिजली की मात्रा तय की. उसने माना कि हिमाचल को ऐतिहासिक रूप से 13,066 MU बिजली मिलनी बाकी थी. लेकिन साथ ही यह भी तय किया कि पंजाब और हरियाणा पर आने वाली पूंजीगत लागत के लिए हिमाचल को 420.77 करोड़ रुपये देने हैं. कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस रकम को 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर से हिमाचल के बिजली हिस्से में समायोजित किया जाए. इससे राज्य को मिलने वाली बिजली करीब 1,093 MU कम हो गई.

बाकी बची 11,973 MU बिजली अगले 20 बिजली की कमी वाले मौसमों में दी जाएगी. यानी हर साल करीब 598 MU बिजली मिलेगी. इसका मतलब यह नहीं है कि हिमाचल को मुफ्त बिजली मिलेगी. राज्य को हर साल बिजली मिलने पर BBMB की ओर से तय शुल्क चुकाना होगा. पूंजीगत लागत का समायोजन बिजली की मात्रा में बदलाव करके विवाद के एक हिस्से को सुलझाता है. इससे राज्य की हर साल लागू शुल्क चुकाने की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती.

ठंड के मौसम में बिजली खरीद का हिसाब

इस फैसले का सबसे तात्कालिक आर्थिक फायदा सर्दियों में हिमाचल को बाजार से कम बिजली खरीदने के रूप में मिल सकता है. बिजली की कमी वाले महीनों में राज्य की मांग बढ़ जाती है. इस दौरान नदियों में पानी का बहाव कम होने से पनबिजली उत्पादन भी घट जाता है. ऐसे में उपभोक्ताओं की जरूरत पूरी करने के लिए हिमाचल को दूसरे स्रोतों से बिजली का इंतजाम करना पड़ता है.

हिमाचल प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने अक्टूबर 2024 से मार्च 2025 के बीच सर्दियों में बिजली की 2,076 MU की कमी का अनुमान लगाया था. BBMB से हर साल मिलने वाली अतिरिक्त 598 MU बिजली इस अनुमानित कमी का करीब 29 फीसदी होगी. इससे राज्य में सर्दियों के दौरान बिजली की कमी पूरी तरह खत्म नहीं होगी, लेकिन HPSEBL को बाजार से खरीदनी पड़ने वाली बिजली की मात्रा कम हो सकती है.

नियामक आयोग के आंकड़ों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह की खरीद पर कितना खर्च आता है. 2024-25 की सर्दियों के लिए HPSEBL ने बिजली कारोबारियों के जरिए 1,122 MU कम अवधि की बिजली खरीदने के समझौते किए थे. इसकी अनुमानित लागत करीब 575 करोड़ रुपये थी. विक्रेता के राज्य ट्रांसमिशन यूटिलिटी के स्तर पर इसकी औसत दर 5.12 रुपये प्रति यूनिट थी.

महीने के हिसाब से खरीद के आंकड़े बताते हैं कि HPSEBL ने अक्टूबर में 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से 122.94 MU बिजली खरीदी, जिस पर करीब 61.47 करोड़ रुपये खर्च हुए. नवंबर में 5.03 रुपये प्रति यूनिट की दर से 158.96 MU बिजली खरीदने का समझौता किया गया, जिसकी लागत करीब 79.96 करोड़ रुपये थी. दिसंबर में बिजली की मात्रा बढ़कर 217.94 MU हो गई. इसे 5.05 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदा गया और इस पर 110.06 करोड़ रुपये खर्च हुए. जनवरी में बिजली बोर्ड ने 214.30 MU बिजली का इंतजाम किया, जिसकी अनुमानित लागत 109.85 करोड़ रुपये थी. हालांकि, नियामक आयोग के आदेश में जनवरी की दर 3.40 रुपये प्रति यूनिट दर्ज है. यह दर बताई गई बिजली की मात्रा और लागत से मेल नहीं खाती. मात्रा और लागत के हिसाब से यह दर करीब 5.13 रुपये प्रति यूनिट होनी चाहिए. इस अंतर पर HPERC या HPSEBL से स्पष्टीकरण की जरूरत है.

फरवरी में HPSEBL ने 5.23 रुपये प्रति यूनिट की दर से 193.56 MU बिजली खरीदने का समझौता किया, जिस पर 101.23 करोड़ रुपये खर्च हुए. वहीं मार्च में इसी दर पर 214.30 MU बिजली का इंतजाम किया गया, जिसकी लागत 112.98 करोड़ रुपये थी. इस तरह कुल 1,122 MU बिजली खरीदी गई और इस पर करीब 575 करोड़ रुपये खर्च हुए.

5.12 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से देखें तो BBMB से हर साल मिलने वाली 598 MU बिजली की कुल कीमत करीब 306 करोड़ रुपये होगी. अगर राज्य को यह पूरी बिजली उस समय मिलती है, जब उसे इसकी जरूरत है और इससे बाजार से इसी तरह की दर पर होने वाली खरीदारी कम होती है, तो HPSEBL करीब इतनी रकम खर्च करने से बच सकता है.

ये दरें विक्रेता के ट्रांसमिशन नेटवर्क के स्तर पर बिजली खरीद की अनुमानित दरें हैं. इन्हें हिमाचल तक बिजली पहुंचने की अंतिम लागत नहीं माना जाना चाहिए. इसमें ट्रांसमिशन और दूसरे शुल्क भी शामिल हो सकते हैं. इन आंकड़ों से यह भी साबित नहीं होता कि BBMB से मिलने वाली हर यूनिट के न होने पर HPSEBL को उतनी ही दर पर बिजली खरीदनी पड़ती. फिर भी, संभावित बचत का अंदाजा लगाने के लिए ये आंकड़े एक उपयोगी आधार देते हैं.

क्या हिमाचल बिजली बेच सकता है?

दूसरी संभावना यह है कि हिमाचल जरूरत न होने पर अतिरिक्त बिजली का कुछ हिस्सा बेच सकता है. लेकिन राज्य में बिजली की मांग के मौसमी रुझान को देखते हुए BBMB से मिलने वाली बिजली का मुख्य इस्तेमाल सर्दियों में अपनी जरूरत पूरी करने के लिए होने की संभावना है. इससे बाहर बिजली बेचकर बड़ी कमाई होने की संभावना कम है.

598 MU बिजली की आपूर्ति बिजली की कमी वाले मौसम में की जानी है. इसी दौरान हिमाचल को बिजली की कमी का सामना करना पड़ता है. सर्दियों में राज्य में बिजली की अनुमानित कमी 2,076 MU है, जो BBMB से मिलने वाली सालाना बिजली से काफी ज्यादा है. इसलिए संभावना है कि इस बिजली का बड़ा हिस्सा स्थानीय मांग पूरी करने या बाजार से खरीदारी कम करने में इस्तेमाल होगा. हालांकि, बिजली की आपूर्ति, उत्पादन और खपत के समय के आधार पर कुछ अवधि में बिजली की उपलब्धता मांग से ज्यादा हो सकती है. ऐसी अतिरिक्त बिजली को बेचा जा सकता है या पावर बैंकिंग की व्यवस्था में इस्तेमाल किया जा सकता है.

लेकिन बिजली बेचना और बिजली खरीदने से बचना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. बिजली बेचने पर बाजार में तय हुई दर के हिसाब से कमाई होती है. वहीं, बिजली खरीदने से बचने का मतलब है कि HPSEBL उस बिजली की खरीद पर होने वाला खर्च बचा लेगा, जिसे उसे अपनी जरूरत पूरी करने के लिए खरीदना पड़ता. दोनों ही स्थितियों में आर्थिक फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि बिजली कब मिलती है और उस समय बाजार में उसकी कीमत क्या है. कोर्ट के फैसले से हर साल मिलने वाली बिजली का मतलब यह नहीं है कि हिमाचल के पास बेचने के लिए अतिरिक्त बिजली जरूर होगी.

HPSEBL के अपने आंकड़े बताते हैं कि राज्य पहले से ही बिजली की खरीद, बिक्री और बैंकिंग व्यवस्था के मिले-जुले तरीके से काम करता है. 2023-24 में उसने इंडियन एनर्जी एक्सचेंज और PXIL के जरिए 984.80 MU बिजली खरीदी थी. इस पर 598.66 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. यानी औसतन करीब 6.08 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदी गई थी. इसी दौरान उसने राज्य के बाहर 531.83 MU बिजली बेची और करीब 258.28 करोड़ रुपये कमाए. बिजली बेचने पर औसतन करीब 4.86 रुपये प्रति यूनिट मिले. ये आंकड़े बताते हैं कि बिजली की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कब खरीदा या बेचा जा रहा है. इसलिए यह मानकर नहीं चला जा सकता कि BBMB से मिलने वाली हर यूनिट की कीमत बाजार में ज्यादा ही होगी.

बैंकिंग भी एक विकल्प है, लेकिन यह सीधे बिजली बेचने से अलग है. इस व्यवस्था के तहत कोई बिजली बोर्ड या कंपनी अतिरिक्त बिजली होने पर उसे दूसरे राज्य या बिजली कंपनी को दे सकती है. इसके बदले जरूरत पड़ने पर उसे बिजली वापस मिलती है. इसमें अक्सर पहले से तय अतिरिक्त शुल्क या समायोजन शामिल होता है. इससे अलग-अलग मौसमों में बिजली की कमी को संभालने में मदद मिल सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राज्य को दी गई बिजली के बदले नकद कमाई हुई है.

अनुमान अलग-अलग क्यों हैं?

राज्य सरकार ने इस फैसले से होने वाले फायदे का जो अनुमान लगाया है, वह 306 करोड़ रुपये के अनुमान से ज्यादा है. एडवोकेट जनरल अनूप कुमार रतन ने कहा है कि बिजली की कीमत तय करने के आधार पर सालाना फायदा करीब 600 करोड़ से 800 करोड़ रुपये तक हो सकता है. अगर बिजली की कीमत 10 रुपये प्रति यूनिट मानी जाए तो 598 MU की कीमत करीब 598 करोड़ रुपये होगी. वहीं, 13.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से इसकी कीमत करीब 807 करोड़ रुपये होगी.

HPSEBL के एक अधिकारी ने कहा, “ये गणनाएं अलग-अलग अनुमानित कीमतों पर बिजली का बाजार मूल्य बताती हैं. इनसे यह तय नहीं होता कि HPSEBL वास्तव में कितने पैसे बचाएगा. इसका पता लगाने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि किसी दूसरे राज्य ने सबसे ज्यादा कितनी कीमत चुकाई है या बाजार में क्या दर चल रही है. असल तुलना इस बात से होगी कि BBMB से बिजली मिलने के समय अपनी जरूरत पूरी करने के लिए HPSEBL को कितना खर्च करना पड़ता और BBMB से बिजली लेने पर उससे जुड़े शुल्क और दूसरे खर्च कितने होते हैं.”

यह अंतर इसलिए मायने रखता है क्योंकि बिजली की कीमत अलग-अलग महीनों और यहां तक कि अलग-अलग घंटों में भी तेजी से बदल सकती है. अगर हिमाचल को उस समय बिजली मिलती है, जब उसे बाजार से 5 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदनी पड़ती, तो बचत उस स्थिति से काफी अलग होगी, जब उसे 10 रुपये या उससे ज्यादा प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदनी पड़ती. अगर बिजली ऐसे समय मिलती है, जब राज्य को उसकी जरूरत नहीं है, तो उसका मूल्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उसे बेचा जा सकता है, बैंकिंग व्यवस्था के तहत रखा जा सकता है या बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है.

20 साल में मिलेगा फायदा

20 मौसमों में बिजली देने की व्यवस्था का मतलब यह भी है कि हिमाचल को बिजली का पूरा ऐतिहासिक बकाया एक साथ नहीं मिलेगा. यह फायदा अगले दो दशकों में फैला होगा. राज्य को हर साल करीब 598 MU बिजली मिलेगी. अगर 5.12 रुपये प्रति यूनिट की दर 20 साल तक एक जैसी रहती है, तो हर साल मिलने वाली बिजली की कुल कीमत करीब 306 करोड़ रुपये होगी. इस तरह 20 साल में इसकी कीमत करीब 6,120 करोड़ रुपये होगी.

लेकिन इस दौरान बिजली की कीमतें बदलेंगी. हिमाचल में बिजली की मांग, उत्पादन और खरीद की जरूरतें भी बदलेंगी. इसके अलावा, BBMB के सालाना शुल्क और बिजली के ट्रांसमिशन व डिलीवरी की लागत को भी ध्यान में रखना होगा. इसलिए 6,120 करोड़ रुपये को इस पूरी व्यवस्था के दौरान होने वाली पक्की बचत बताना सही नहीं होगा.

इस फैसले से हिमाचल को उन महीनों में बिजली का एक ज्यादा भरोसेमंद स्रोत मिलेगा, जब राज्य में बिजली की कमी और महंगी खरीद का जोखिम सबसे ज्यादा होता है. फिलहाल, सबसे उचित अनुमान यही है कि BBMB से हर साल मिलने वाली 598 MU बिजली से 2024-25 की सर्दियों में HPSEBL की औसत खरीद दर के हिसाब से करीब 300 करोड़ रुपये की बिजली खरीदने से बचा जा सकता है. अगर इस बिजली से ज्यादा महंगी दर पर होने वाली खरीदारी कम होती है, तो बचत बढ़ सकती है. हालांकि, लागू शुल्क और दूसरे खर्चों को घटाने के बाद यह रकम कम होगी.

सेवानिवृत्त इलेक्ट्रिकल इंजीनियर आर.एल. जस्टा ने दिप्रिंट से कहा, “इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अतिरिक्त बिजली बेचकर होने वाली बड़ी कमाई के बजाय सर्दियों में बिजली की जरूरत पूरी करने की लागत घटाने के एक मौके के रूप में देखना चाहिए. इस मौके से वास्तव में कितना आर्थिक फायदा होगा, यह तभी साफ होगा जब राज्य को बिजली मिलनी शुरू होगी और HPSEBL की बिजली खरीद की लागत की तुलना BBMB से मिलने वाली बिजली के लिए चुकाए जाने वाले शुल्क से की जा सकेगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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