Tuesday, 25 January, 2022
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गुरुग्राम एक नई अतरंगी आधुनिकता अपना रहा, शहर में मुस्लिम मिडिल क्लास के लिए सोच में आ रही संकीर्णता

तीन दशकों के आर्थिक विकास ने गुरुग्राम में कॉस्मोपॉलिटिन कल्चर को बढ़ावा दिया. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इस उपनगर के मुसलमानों का कहना है कि उन्हें अपनी पहचान तक छिपानी पड़ रही है.

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चहल-पहल भरी गगनचुंबी इमारतों और बड़े-बड़े शीशे लगे दफ्तरों और मॉल के साथ गुरुग्राम एनसीआर का नेवरलैंड बन चुका है. इसने उसी तर्ज पर अपना आधुनिक संस्कृति वाला चेहरा भी दिखाया जैसा कि 1990 के दशक में बैंगलोर का था, और वो भी पूरे जोरशोर के साथ. लेकिन बेवर्ली पार्क, निर्वाण काउंटी और वेलिंगटन एस्टेट जैसे नामों की ‘पहचान बना उपनगर’ अब नाथूराम गोडसे की जय-जयकार करने वाले स्ट्रीट ग्रुप का अड्डा बनता जा रहा है. विभिन्न आवासीय परिसरों के अंदर आरएसएस की शाखाएं बढ़ीं हैं. हालांकि, इस रविवार सुबह 10 बजे ये चाय बैठक में तब्दील नजर आईं, जो कि यहां के रुढ़िवादी निवासियों के लिए उपयुक्त ही है.

गुरुग्राम तीन दशकों के आर्थिक विकास से हासिल मिल-जुलकर रहने वाली जीवनशैली अब अपना स्वरूप खोने लगी है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब शहर के हिंदू निवासी सड़कों और पार्कों पर एकत्र होते हैं और मुस्लिम नागरिकों को शुक्रवार की नमाज अदा करने से रोकते हैं. अब तो इस तरह नमाज में बाधा डालना हर हफ्ते की बात हो गई है, जहां कभी बड़ी संख्या में मुसलिम नमाज अदा करते थे, अब वहां बड़ी संख्या में हिंदू जमा हो जाते हैं. ऐसी जगहों पर गाय का गोबर डाल दिया जाता है या फिर हिंदू अनुष्ठान किए जाने लगते हैं.

मुसलिमों के प्रति नफरत की भावना काफी तेजी से बढ़ी है और केवल नमाज तक ही सीमित नहीं है. 24 वर्षीय डिजाइन इंटर्न हिना कहती हैं, ‘उबर राइड कैंसल होना अब कुछ ज्यादा ही हो गया है. पता नहीं नाम देखकर या कुछ और, लेकिन ऐसा पहले की तुलना में ज्यादा होता है. ऐसा लगता है कि मसला मुसलिमों के सामूहिक रूप से नमाज पढ़ने से कहीं आगे पहुंच गया है और यह बन गया है कि उन्हें कुछ और भी क्यों करना चाहिए.’ हिना का मानना है कि उबर ड्राइवर अक्सर नाम देखकर ही राइड कैंसिल कर देते हैं.

सालों से इसी शहर में रह रहे लोग इस बदलाव से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जो कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय की सहनशीलता ‘टेस्ट’ करने का मोर्चा बन गया है. शहर में 17 साल से रह रहे एक पायलट ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘गुरुग्राम में जो हुआ, वो एक प्रयोग जैसा लगता है कि आप किस हद तक जा सकते हैं और इसके नतीजे क्या निकलने वाले हैं.’


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प्रतीकात्मक तस्वीर/ गुड़गांव का एंबियंस मॉल/कॉमंस

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मिलेनियम सिटी का बदलता चेहरा

गुरुग्राम की आर्थिक समृद्धि का रास्ता तमाम मल्टीनेशनल कंपनियों के यहां आने के साथ खुला था, जिन्होंने यहां अपने कार्यालय खोले—इसमें अर्नेस्ट एंड यंग, सिटीबैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस आदि शामिल हैं. भारत के अन्य शहरों की तुलना में इनके गुरुग्राम स्थित परिसरों में ही सबसे ज्यादा कर्मचारी हैं. और यहां बड़ी संख्या में खुले कॉल सेंटर नौकरी की तलाश करने वाले हजारों लोगों की जीवनरेखा बन गए हैं.

बेंगलुरु के बाद इसी शहर में सबसे अधिक स्टार्टअप हैं और 1980 के दशक में मारुति से लेकर पिछले साल यहां आई हुंडई तक, ने अपने तमाम लक्जरी वाहनों के विनिर्माण संयंत्र यहीं स्थापित किए हैं. गुरुग्राम का नाम ‘मिलेनियम सिटी’ पड़ने के साथ ही इसे रहने या व्यवसाय स्थापित करने के लिहाज से बेहतरीन शहरों में शुमार किया जाने लगा.

एक नागरिक संगठन गुरुग्राम नागरिक एकत मंच (जीएनईएम) के संस्थापक सदस्य अल्ताफ अहमद कहते हैं, ‘पिछले 20 वर्षों के दौरान कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने के दौरान हमें विशेष रूप से रमजान के दौरान इबादत की जगह दी जाती थी. इफ्तार पार्टी होती थी. लेकिन अब तो लगता है कि कॉरपोरेशन भी, कम से कम गुरुग्राम में, यही कहेंगे, ‘इसे हमारे दफ्तर से बाहर रखें.’ वे डरते हैं कि कहीं कोई हिंदू समूह आकर बेवजह बखेड़ा न खड़ा कर दे. बड़े पैमाने पर ‘गैर-राजनीतिक’ कॉरपोरेट समूह भी अब गुरुग्राम में जारी राजनीति पर बेहद सावधानी के साथ प्रतिक्रिया दे रहे हैं—या तो वे चुप्पी साध लेते हैं या फिर किसी बिन बुलाई परेशानी से ‘बचने’ के लिए इससे किनारा कर लेते हैं.

एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक वरिष्ठ एचआर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘अब यह एक लगभग अलिखित कोड बन गया है. यदि आप मुसलमानों को काम पर रखते हैं, तो दिल्ली या गुरुग्राम में जो कुछ भी हो रहा है, उसके कारण आपको परेशानी हो सकती है.’

मुसलमान पहले ही अपनी धार्मिक पहचान के कारण किराए पर मकान नहीं ले पाते थे या प्रमुख स्थानों में घर-जमीन नहीं खरीद पाते थे. अब यही हाल नौकरियों के मामले में भी हो गया है.

बड़े, निजी स्कूलों और यूनिवर्सिटी में भी छात्रों का यह अनुभव करना पड़ रहा है. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक छात्र ने कहा, ‘आजकल, मुसलमान वास्तव में अपने धर्म का पालन करने से डरते हैं और यहां तक कि टोपी पहनकर सड़कों पर चलने से भी डरते हैं.’

एमिटी यूनिवर्सिटी के मानेसर कैंपस से पढ़ाई करने वाले गुरुग्राम निवासी 28 वर्षीय आर्किटेक्ट इफहम ने पिछले हफ्ते अपने दोस्तों के साथ हुई बातचीत के बारे में बताया. उसके मुताबिक, उन्हें इस बात पर बहुत अचरज हो रहा था कैसे कॉलेज परिसर में कभी ‘एकदम सामान्य’ मानी जाने वाली दो वक्त की नमाज अदा करना ‘अब असंभव है.’

दुकान के अंदर नमाज अदा करते मजदूर/ मनीषा मोंडल/ दिप्रिंट

राजनीति, प्रशासनिक समर्थन की कमी

10 दिसंबर को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपना नमाज विरोधी रुख जाहिर कर दिया था. उन्होंने कहा था, ‘नमाज शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं की जानी चाहिए.’ साथ ही जोड़ा कि सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यह पहला मौका नहीं था जब खट्टर ने इस तरह की बात की है. 2018 में उन्होंने कहा था कि मस्जिदों, ईदगाहों या अन्य निर्धारित जगहों के अलावा कहीं भी सार्वजनिक रूप से नमाज अदा नहीं की जानी चाहिए.

लेकिन गुरुग्राम के मुसलमानों ने ऐसी परेशानी होने का अनुमान बहुत पहले ही लगा लिया था और 2016 में हरियाणा सरकार की तरफ से बेची जा रही पांच साइट में दो की खरीद के लिए आवेदन कर दिया था. द हिंदू की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले ट्रस्टों ने भूखंड के लिए 18 लाख रुपये का भुगतान भी किया था, लेकिन उन्हें इसके लिए कभी मंजूरी नहीं मिली.

गुरुग्राम के एक मजहबी नेता मुफ्ती सलीम कासमी ने बताया, ‘शहर में केवल 13 मस्जिदें हैं और कई लोगों को नमाज अदा करने के लिए जगह तक नहीं मिल पाती है.’

मुसलमान जिन ‘सार्वजनिक स्थान’ पर नमाज अदा करते हैं, वे या तो दुकानों के सामने की बेतरतीब जमीनें होती हैं या फिर डंपिंग ग्राउंड, जहां वे सफाईकर्मी के तौर पर काम कर रहे होते हैं. ये कोई सार्वजनिक पार्क या कोई ‘प्रमुख स्थल’ नहीं हैं, जिनके बारे में हिंदुओं का आरोप है कि नमाज के नाम पर मुस्लिम समूह उस पर ‘कब्जा’ कर रहे हैं.

और इसलिए शुक्रवार की नमाज बाधित करने के लिए वे ट्रक खड़े करने से लेकर क्रिकेट खेलने, पूजा करने और गोबर के कंडे बनाने तक हर तरकीब अपना रहे हैं. लेकिन पुलिस शायद ही कभी उपद्रवियों को रोकती है.

गुरुग्राम में 10 वर्षों से रह रहे और चार प्रमुख निगमों को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाने वाले एक कॉरपोरेट नेता कहते हैं, ‘इस तरह की गड़बड़ियां पहले भी चुनाव के आसपास होती रहती थीं. हर पार्टी ने कुछ हद तक ऐसा किया है. लेकिन अब अमूमन अक्सर और ज्यादा ही खुले तौर पर होने लगा है.’

अल्ताफ अहमद कहते हैं, ‘यह एक आर्थिक समस्या की सामाजिक अभिव्यक्ति है.’ सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की मार्च 2021 की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत में सबसे अधिक बेरोजगारी दर हरियाणा में थी—जो कि राष्ट्रीय औसत 6.9 फीसदी के मुकाबले 26.4 फीसदी थी. हालांकि, कुछ लोग इससे सहमत नहीं हो सकते.

बजरंग दल से जुड़े और राष्ट्रीय हिंदू शक्ति संगठन नामक एक संगठन के युवा मोर्चा के अध्यक्ष होने का दावा करने वाले पूर्व रेसलर अमित का कहना है कि वह बेरोजगार है और ‘अब हिंदू राष्ट्र’ के लिए काम करते हैं.

पुलिस के हाथ में इस मामले में यह टिप्पणी करने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है, कि वो ‘अपना कर्तव्य निभा रही है.’ निवासियों के बीच भ्रम की स्थिति भी बनी हुई है क्योंकि प्रशासन नमाज अदा करने के लिए ‘अनुमति प्राप्त’ स्थानों की संख्या बदलता रहता है. यह सब इस पर निर्भर करता है कि प्रदर्शनकारी कितने ‘अराजक’ हैं. विडंबना यह है कि यह सब ‘शांति-व्यवस्था बनाए रखने’ के लिए किया जाता है.


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दुकान के अंदर नमाज अदा करते मजदूर/ मनीषा मोंडल/ दिप्रिंट

नफरत की भावना और उस पर साधी जा रही चुप्पी

गुरुग्राम नव धनाढ्यों, नई आकांक्षाओं और नए निवेश के जरिये बना था. यह ‘दिल्ली मेरी जान’ नहीं है—बल्कि एक ऐसा समृद्ध शहर है जो पैसे से खरीदी जा सकने वाली हर चीज अपने पास होने पर गर्व करता है. लेकिन मध्यमवर्गीय मुसलिमों के प्रति इसकी सोच में संकीर्णता हावी होती जा रही है.

70 वर्षीय सुहेल फारूक खान बताते हैं, ‘मैं 12 साल अमेरिका में रहने के बाद भारत लौट आया था. क्योंकि मैं चाहता था कि मेरे बच्चे भारतीय संस्कृति को समझ सकें. मैंने अपने पड़ोसी को नमस्ते कहा, और उसने जवाब तक नहीं दिया. मुझे समझ नहीं आता कि अब और क्या कह सकता हूं. सुहेल ने उस समय पालम गांव में एक घर बनाया था, जब वहां बमुश्किल 200 मकान ही होते थे. अब वहां 5,000 से अधिक घर निर्मित हो चुके हैं.

मुसलिमों के खिलाफ नफरत की भावना बढ़ने की बात स्वीकार करने वाले हिंदुओं का कहना है कि वे कुछ भी बोलने से ‘डरते’ हैं. सेक्टर 12ए, जहां भाजपा सदस्य कपिल मिश्रा ने नमाज को बाधित करने के लिए गोवर्धन पूजा का आयोजन किया था, के नजदीक किराये के मकान में रहने वाले राहुल वर्मा कहते हैं, ‘काफी गलत है ये सब, हम सालों से आपस में मिलकर रह रहे हैं. लेकिन क्या कर सकते हैं, डर लगता है गुंडों से.’

लेकिन इस खामोशी की कीमत मुसलमान चुकाते हैं. गुरुग्राम नागरिक एकता मंच के अल्ताफ अहमद कहते हैं, ‘लोगों ने अपना नाम बदल लिया है ताकि वे काम करना जारी रख सकें.’ वह बताते हैं कि कैसे व्हाट्सएप पर एक डेयरी मालिक के मुसलिम होने का मैसेज फॉरवर्ड होने के बाद तमाम लोगों ने वहां से खरीदारी बंद कर दी है.

सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड प्रैक्टिस में रिसर्च डायरेक्टर अमीर उल्लाह खान का कहना है कि मौजूदा माहौल सरकार बदलने के साथ आया है. वह चाहते हैं कि लोग ‘प्रदर्शन करें’ नहीं तो फिर ‘सभी को नुकसान होगा.’

लेकिन प्रदर्शन की तो बात तो छोड़ ही दीजिए, शायद ही कोई इसके खिलाफ बोलने को भी तैयार दिखता है.

एक शिक्षाविद् आमिर आबिदी, जिनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे, कहते हैं, ‘इस सब में जो अखर रहा है, वो है कथित तौर पर शांतिप्रिय हिंदुओं की खामोशी. खासकर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की चुप्पी बेहद शर्मनाक है.’

अल्ताफ अहमद इसके खतरे को कुछ इस तरह बयां करते हैं, ‘देखो उन लोगों के साथ क्या हुआ जो दिल्ली में सीएए के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन का हिस्सा थे. सिर्फ विरोध जताने के कारण कुछ लोग तो अभी भी जेल में ही हैं.

और यही वजह है कि मुसलमान अपनी नौकरी, नमाज के दौरान और यहां तक कि घरों में भी किसी भी तरह की नफरत झेलने से बचने के नए तरीके ढूंढ़ रहे हैं.

पहचान उजागर करने वाले सरनेम से लेकर ऐसे ‘प्रतीक’ तक, वे सब कुछ छिपा रहे हैं. हिना, जिनकी नौकरी का समय देर शाम तक है, अपने पूरे नाम के बजाये सिर्फ इनीशियल का इस्तेमाल करती है क्योंकि वह अपनी उबर या ओला राइड कैंसल होने की परेशानी नहीं झेल सकती.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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