Thursday, 26 May, 2022
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विशेष दर्जे से नमाज़ प्रतिबंध तक, नीतीश की बिहार सरकार के विपक्ष की भूमिका निभा रही है सहयोगी BJP

बिहार में नीतीश कुमार- BJP गठबंधन ने पहले भी बुरा समय देखा है, लेकिन अब बीजेपी नेता खुले तौर पर उस सरकार के कार्यों की निंदा कर रहे हैं, जिसका वो हिस्सा हैं.

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पटना: बिहार मुख्यमंत्री और जेडी(यू) नेता नीतीश कुमार इन दिनों जितना विरोध सहयोगी बीजेपी से झेल रहे हैं, उतना आरजेडी जैसी विरोधी पार्टियों से भी नहीं है. पिछले सोमवार नीतीश ने अपना रोष छिपाने की कोशिश नहीं की, जब उन्हें पता चला कि उनके दो बीजेपी उप-मुख्यमंत्रियों में से एक रेणु देवी ने, बिहार के लिए विशेष दर्जे की उनकी मांग को कमज़ोर करने की कोशिश की थी.

अपने साप्ताहिक जनता दरबार के बाद नीतीश ने कहा, ‘डिप्टी सीएम को कुछ भी पता नहीं’. लेकिन अगले दिन एक दूसरे बीजेपी मंत्री जीवेश कुमार ने अधिकृत तौर पर दिप्रिंट से कहा, कि विशेष दर्जे की कोई ज़रूरत नहीं है.

ये विवाद तब शुरू हुआ जब पिछले महीने केंद्र सरकार के लोक नीति थिंक- टैंक नीति आयोग ने, अपनी एक रिपोर्ट में बिहार को देश के सबसे ग़रीब राज्य का दर्जा दिया. उसके जवाब में नीतीश सरकार ने नीतीश आयोग को पत्र लिखकर, बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग की, ताकि मानव विकास, प्रति व्यक्ति आय, और जीने की आसानी के मानदंडों पर, उसकी ‘पिछड़ी’ हैसियत में सुधार किया जा सके. लेकिन डिप्टी सीएम रेणु देवी ने कहा, कि विशेष दर्जा देने की मांग ‘अनावश्यक’ है, चूंकि केंद्र सरकार पहले ही बिहार में उससे अधिक फंड्स भेज रही है, जितना राज्य का विशेष दर्जा होने की स्थिति में भेजती.

हालांकि बीजेपी और जेडी(यू) दूसरे विषयों पर भी झगड़ रहे हैं- जिनमें संसदीय कार्यवाही और सार्वजनिक नमाज़ पर पाबंदी शामिल है- लेकिन पार्टी प्रवक्ता मतभेदों को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं. बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने दिप्रिंट से कहा कि ‘हिचकियां हर गठबंधन में आती हैं,’ जबकि जेडी(यू) एमएलसी नीरज कुमार ने कहा ‘इन घटनाओं से सरकार पर फर्क़ नहीं पड़ेगा’.

विशेष दर्जा विवाद

रेणु देवी के बयान पर नीतीश की तीखी प्रतिक्रिया का सरकारी प्रेस ने संज्ञान लिया, लेकिन बाद में उसी शाम एक निजी सभा में, सीएम ने इस मुद्दे पर ज़्यादा सावधानी से बात की. नीतीश ने कहा कि नीति आयोग रिपोर्ट में सबसे पिछड़े राज्य के तौर पर बिहार की स्थिति से, विशेष दर्जे की मांग को विश्वसनीयता मिलती है.

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नीतीश ने कहा, ‘2005 में जब मैं सत्ता में आया, तो बिहार में एक व्यक्ति की औसत आय केवल 7,000 थी. अब ये 43,000 हज़ार रुपए से ऊपर है, लेकिन राष्ट्रीय औसत से अभी भी बहुत पीछे है’.

लेकिन बीजेपी नेता अभी भी आश्वस्त नहीं हैं. राज्य श्रम मंत्री जीवेश मिश्रा ने मंगलवार को दिप्रिंट से कहा, कि बिहार विशेष दर्जे के ‘मानदंडों को पूरा नहीं करता’. मिश्रा ने कहा ‘हम उसके बिना भी अच्छा कर रहे हैं. केंद्र यहां अधिक पैसा भेज रहा है’.

नीतीश कुमार 2009 से ही रह-रहकर विशेष दर्जे का मुद्दा उठाते रहे हैं. जब नीतीश ने रैलियां कीं और इस मामले में मनमोहन सिंह सरकार से इस बारे में अनुरोध किया, तो बीजेपी नेताओं ने उन्हें मौखिक समर्थन दिया, लेकिन अब वो खुले तौर पर विशेष दर्जे की उनकी मांग ख़ारिज कर रहे हैं.

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि समर्थन उस समय था, जब नीतीश गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में थे, लेकिन फिलहाल प्रदेश असेम्बली में 43 सीटों के साथ वो एक ‘कनिष्ठ साथी’ हैं, जबकि बीजेपी के पास 74 सीटें हैं.

नमाज़ प्रतिबंध

पिछले हफ्ते बीजेपी विधायक हरिभूषण ठाकुर ने, हरियाणा के नए नियमों की तर्ज़ पर, सार्वजनिक नमाज़ पर पाबंदी की मांग की. बीजेपी मंत्री सम्राट चौधरी ने उनका समर्थन किया. चौधरी ने दिप्रिंट से कहा, ‘धर्म एक निजी मामला है, उसे सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए’.

जेडी(यू) नेताओं ने ऐसे किसी प्रतिबंध से इनकार किया है, लेकिन इस मुद्दे को लेकर उन्हें टीस है. एक जेडी(यू) विधायक ने नाम छिपाने की शर्त पर कहा, ‘वास्तविकता ये है कि बीजेपी ने इसकी चिंता किए बिना ये मुद्दा उठाया है, कि इसका हमारे ऊपर क्या असर हो सकता है’.

स्पीकर से जुड़े विवाद

बिहार स्पीकर विजय कुमार सिन्हा ने, जिनका ताल्लुक़ बीजेपी से है, हाल ही में संपन्न हुए शीत सत्र में एक नई प्रथा शुरू की: उन्होंने विधायकों से राष्ट्रगान गाने को कहा- एक ऐसा क़दम जिसके बारे में जेडी(यू) को नहीं बताया गया था. सिन्हा ने दिप्रिंट से कहा, ‘इसमें कुछ असामान्य नहीं है. मध्य प्रदेश में ऐसा होता है’.

स्पीकर ने एक और परंपरा को तोड़ा जब उन्होंने ऐलान किया, कि एक हाउस कमेटी एक सार्वजनिक मुद्दे की जांच करेगी, जो कि नीतीश के राज में पहली बार था. ग्रामीण विकास महकमे में, जो एक जेडी(यू) मंत्री के आधीन है, एक इंजीनियर के भ्रष्टाचार से जुड़ा एक सवाल पूछे जाने पर, स्पीकर ने ऐलान किया कि मामले की जांच के लिए एक हाउस कमेटी गठित होगी. मामला तब और बिगड़ गया जब स्पीकर ने पूर्व मंत्री नीतीश मिश्रा को- जो एक बीजेपी विधायक हैं और सीएम के विरोधी के तौर पर जाने जाते हैं- इस पैनल का अध्यक्ष बना दिया.


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लोकसभा में झगड़े

जेडी(यू) और बीजेपी के बीच के मतभेद, इस हफ्ते लोकसभा में भी सामने आ गए. मंगलवार को प्रश्नकाल के बीच में, बीजेपी सांसद राम कृपाल यादव ने, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत सड़क परियोजनाएं पूरा करने में पिछड़ने पर, बिहार सरकार की आलोचना की. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह ने भी यादव के दावों के समर्थन में आंकड़ों का हवाला दिया.

जैसा कि अपेक्षित था, जेडी(यू) नेता बेहद नाराज़ हो गए. जेडी(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने गिरिराज सिंह को याद दिलाया, कि बिहार और केंद्र दोनों में एनडीए की सरकार है, और ख़ुद गिरिराज भी बिहार से हैं. उन्होंने गिरिराज पर आरोप लगाया कि बाधाओं को दूर करने के लिए, उन्होंने राज्य के अधिकारियों के साथ बैठक नहीं की. गिरिराज ने जवाब दिया कि उन्होंने अधिकारियों तथा राजनेताओं के साथ कई दौर की बैठकें की हैं, और ललन इस बारे में उनके साथ बात करने के लिए आज़ाद हैं.

राज्यपाल से झगड़ा

पिछले महीने, नीतीश कुमार ने मांग उठाई कि बिहार राज्यपाल फागू चौहान द्वारा नियुक्त किए गए, विवादास्पद यूनिवर्सिटी उप-कुलपतियों को उनके पदों से हटाया जाए. ये मुद्दा तब चर्चा में आया जब मगध विश्वविद्यालय के वीसी ऑफिस में, सतर्कता विभाग के एक छापे के दौरान, भारी मात्रा में बेहिसाब नक़द पैसा बरामद हुआ.

हालांकि नीतीश ने 24 नवंबर को राज्यपाल से मिलकर विवादास्पद उप-कुलपतियों की बर्ख़ास्तगी के बारे में चर्चा की, लेकिन राज्यपाल ने अभी तक इस मांग पर कोई कार्रवाई नहीं की है, जिससे क़यास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र ने नीतीश का समर्थन नहीं किया है.

क्यों हो रही अनबन?

नीतीश कुमार- BJP गठबंधन ने पहले भी बुरा समय देखा है, लेकिन मौजूदा परिदृश्य अभूतपूर्व है, जिसमें बीजेपी नेता और मंत्री तक खुले तौर पर, उस सरकार की नीतियों की निंदा कर रहे हैं जिसका वो हिस्सा हैं.

राज्य के बहुत से राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है, कि इसका एक कारण ये है कि अब राज्य में सुशील कुमार मोदी, और नंद किशोर यादव जैसे जैसे अनुभवी बीजेपी नेता नहीं हैं, जो पार्टी सदस्यों के सुरों को साध सकें.

दूसरे, शासन को लेकर ख़ुद नीतीश कुमार की छवि भी नीचे आई है, और बीजेपी नहीं चाहती कि वो उनके ‘बहुत नज़दीक’ नज़र आए. एनडीए गठबंधन मुश्किल से 2020 के असेम्बली चुनाव जीत पाया था, और बीजेपी सोच रही है कि संपत्ति बनने की बजाय, नीतीश कुमार कहीं उनके लिए बोझ न बन जाएं.

लेकिन, बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ज़ोर देकर कहा कि हालिया तनाव अस्थायी हैं. उन्होंने कहा, ‘मुख्य बात ये है कि दोनों पार्टियां जानती हैं, कि वो बिहार के भले के लिए ही एक साथ हैं’.

जेडी(यू) प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी इससे इनकार किया कि ये मनमुटाव गंभीर है. उन्होंने कहा, ‘गठबंधन सरकार उन सात संकल्पों के आधार पर चल रही है, जो नीतीश कुमार ने चुनावों के दौरान लिए थे. वहां पर कोई मतभेद नहीं हैं’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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