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Friday, 1 May, 2026
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अफसरों ने PESA, FRA, TRIFED को नक्सलवाद से लड़ने का हथियार कैसे बनाया

नक्सलवाद के खिलाफ जंग के कई योद्धाओं का कोई जिक्र नहीं किया जाता लेकिन गृह मंत्रालय के ‘समाधान’ कार्यक्रम को इन्हीं योद्धाओं के प्रयासों के कारण कामयाबी मिली.

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इस बात को लेकर कोई दो मत नहीं हो सकता वामपंथी उग्रवाद पर निर्णायक जीत का श्रेय केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और राज्यों की पुलिस के साहसी जवानों को ही जाता है. पिछले दशक में इनमें से कई ने इस जंग में अपनी जान गंवाई है.

लेकिन श्रेय उन सरकारी कर्मचारियों को भी दिया जाना चाहिए, जिन्होंने जमीन पर लोगों का विश्वास जीतने के उपायों के तहत कानूनों और कार्यक्रमों को लागू किया.

इस कॉलम में ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम’ (पेसा)’, ‘वन अधिकार अधिनियम’ (एफआरए), और ‘भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ’ (ट्राइफेड) के तहत किया गए उपायों की चर्चा करेंगे, क्योंकि इन्होंने जमीन पर ऐसे हालात बनाए कि वामपंथी उग्रवाद का मुक़ाबला करने के लिए गृह मंत्रालय के ‘समाधान’ नामक कार्यक्रम को घने वनों और उनसे जुड़े इलाकों में बसी जनजातीय आबादी स्वीकार कर सके.

बस्तर के एक्टिविस्ट कलेक्टर बी.डी. शर्मा

सबसे पहले हम ‘पेसा’ की बात करेंगे, जिसने वेरियर एल्विन तथा उनसे पहले के हर्बर्ट रिस्ले, एम.वी. ग्रिग्सन, और आर.वी. रसेल सरीखे औपनिवेशिक प्रशासकों के जमाने से चली आ रही इस धारणा को 1996 में पलट दिया कि जनजातीय समुदाय (जिन्हें पहले आदिवासी कहा जाता था) अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते.

इतिहास बताता है कि बड़ी जनजातीय आबादी वाले क्षेत्रों को ‘गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935’ के तहत ‘अपवर्जित एवं आंशिक अपवर्जित क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया था, और भारत जब गणतंत्र बन गया तब उन्हें पांचवीं और छठी अनुसूची में डाल दिया गया. वे जिस राज्य के हिस्से थे उसके प्रमुख राजनीतिक विमर्श से काट दिया गया और उनके विकास की ‘विशेष’ ज़िम्मेदारी राज्यपाल के मत्थे डाल दी गई.

इसके कारण एक विसंगति पैदा हो गई: 73वें संविधान संशोधन (1992) ने पूरे देश में तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और विकेंद्रीकरण तो लागू हुआ लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों को इससे अलग रखा गया.

बस्तर के कलेक्टर रह चुके एक्टिविस्ट IAS अधिकारी बी.डी. शर्मा ने पाया कि ऊपर से नीचे की ओर लागू होने वाले कार्यक्रम शायद ही सफल हो पाते हैं. इसलिए उन्होंने जनजातीय लोगों के स्वशासन की व्यवस्था की जोरदार वकालत की, क्योंकि उनका मानना था कि ग्रामीण समुदाय अपने पारंपरिक नियम-कानूनों के बूते अपना कामकाज चलाने की क्षमता और योग्यता रखते हैं.

अनुसूचित जाति तथा जनजाति कमिश्नर (1986-91) के रूप में उन्होंने पांचवीं अनुसूची को 73वें संविधान संशोधन के प्रावधानों से बाहर रखे जाने पर सवाल खड़े किए. उनकी वकालत के कारण 1996 में ‘पेसा’ लागू किया गया.

‘पेसा’ ने स्व-सुरक्षा और स्वशासन की व्यवस्था करके सत्ता संतुलन को इन समुदायों के पक्ष में लाने की कोशिश की. इस एक्ट ने माना कि जनजातीय समुदाय अपना शासन खुद चलाने की योग्यता रखते हैं और ये समुदाय अपनी जीवनशैली की वैधता और मूल्यों का सम्मान करते हैं.

‘पेसा’ से ‘एफआरए’ तक

जैसा कि MP-IDSA के लिए तैयार किए गए एक शोधपत्र में प्रोफेसर (कॉल) शशांक रंजन ने लिखा है, ‘पेसा’ को उसकी पूरी क्षमता और अपेक्षा के मुताबिक लागू नहीं किया जा सका. प्रशासनिक जड़ता, नौकरशाही अड़चनों, औपचारिक कानून और रस्मी प्रक्रियाओं के बीच अंतर की वजह से तात्कालिक असर सीमित ही रहा.

‘पेसा’ से संबंधित एक कमिटी के अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया ने इनमें से कुछ मसलों के बारे में कहा है कि यह अधिनियम जनजातीय लोगों के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर सकता था, जिन्होंने भारत द्वारा अपनाए गए विकास के मॉडल के चलते भारी और विनाशकारी कीमत चुकाई है. भूरिया ने कहा है कि जमीन और जंगल के संसाधनों तक पहुंच के बिना पंचायत या ग्रामसभा की सदस्यता बेमानी है.

इस समझदारी ने महत्वपूर्ण ‘अनुसूचित जाति तथा दूसरे पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम’ 2006 (एफआरए) के लिए रास्ता बनाया.

इस अधिनियम ने वनवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देकर और टिकाऊ वन प्रबंधन की सुविधा देकर सदियों से चले आ रहे अन्याय को दूर करने की कोशिश की. इस अधिनियम ने 13 दिसंबर 2005 से पहले से जंगल में रह रहे लोगों को स्वामित्व तथा प्रबंधन के अधिकार दिए. नियमन की पुरानी व्यवस्था के तहत वनवासियों को ऊपर से सुरक्षा प्राप्त लाभभोगी माना जाता था लेकिन ‘एफआरए’ ने उनके अधिकारों की मान्यता और वन प्रशासन में ग्रामसभा को केंद्रीय भूमिका सौंपी.

गढ़चिरोली से आया बदलाव

‘एफआरए’ से कितना बदलाव आ सकता है, इसकी मिसाल है महाराष्ट्र का गढ़चिरोली जिला, जो लंबे समय से नक्सलवाद का केंद्र माना जाता था.

श्री भगवान के नेतृत्व में समर्पित वन अधिकारियों की एक टीम के प्रयासों से गढ़चिरोली ने ‘एफआरए’ के तहत वन प्रबंधन का अधिकार केंद्रित तरीका अपनाया और जनजातीय समुदायों तथा सरकार के बीच भरोसे के रिश्ते की नींव डाली.
उनके कामकाज ने व्यक्ति तथा समुदाय के वन अधिकारों को तेजी से मान्यता प्रदान की, ग्रामसभाओं को मजबूत बनाया, और पद अवधि को टिकाऊ आजीविका और ‘ईकोसिस्टम’ बहाली से जोड़ा. इस पहल के कारण अधिकारों की मान्यता, स्थानीय शासन, आजीविका की मजबूती, और वन सुरक्षा के मामलों में बड़ी उपलब्धियां हासिल हुईं. इस तरह यह अधिकार केंद्रित वन प्रबंधन का अनुकरणीय मॉडल बन गया.

गढ़चिरोली के ही मेंढ़ा लेखा गांव को अगस्त 2009 में भारत में पहली ‘समुदाय वन अधिकार’ (सीएफआर) मान्यता प्रदान की गई. ‘एफआरए’ ने वन के वर्गीकरण का ख्याल किए बिना, पहले से प्राप्त अधिकारों को मान्यता दी और समुदायों को बांस तथा तेंदू पत्ते समेत दूसरे छोटे वन उत्पादों पर नियंत्रण प्रदान किया, तथा ग्रामसभाओं के जरिए प्रबंधन के अधिकार सौंपे.

आज गढ़चिरोली के वनवासी समुदायों को जिले के कुल 9,902 वर्ग किमी में फैले जंगल में से 5,110.07 वर्ग किमी जंगल में समूहिक वन अधिकार हासिल हैं. राष्ट्रीय स्तर पर यह एक ‘बेजोड़’ आंकड़ा है. जिले की कुल आबादी में  अनुसूचित जनजातियों की आबादी 38.17 फीसदी है और अनुसूचित जातियों की आबादी 11.25 फीसदी है. गढ़चिरोली में जो पहल की गई उसमें द्विपक्षीय समर्थन ने निर्णायक भूमिका निभाई. अपनी पसंद के संग्राहकों को बांस की फसल बेचने का पहला ‘ट्रांज़िट पास’ मेंढ़ा लेखा की ग्रामसभा को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चहवाण ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की उपस्थिति में सौंपा. राजनीतिक सत्ता में बदलाव के बावजूद विनियमन और ‘सीएफआर’ मान्यता जारी रही.

वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने अपने पहले कार्यकाल (2014-19) में मान्यताप्राप्त ‘सीएफआर’ गांवों के लिए योजनाओं और 1.78 लाख की वित्तीय सहायता की घोषणा की. महाराष्ट्र के राज्यपाल के कार्यालय ने राज्य सरकार को लघु वन उत्पादों से संबंधित नियमों में संशोधन करके पांचवीं अनुसूची वाले गांवों को यह छूट देने का निर्देश दिया कि वे अपने संग्रहीत लघु वन उत्पादों को अपने अधिकार में रखें और उनकी नीलामी करके सबसे ज्यादा कीमत देने वालों को बेच सकें.

पिछले साल ‘टीएसएस’ के प्रोफेसर गीतांजय साहू ने लिखा कि गढ़चिरोली में ‘सीएफआर’ द्वारा मान्यताप्राप्त 1,109 गांवों ने इन अधिकारों का उपयोग किया और इन गांवों का हरेक घर वन संसाधनों से हर महीने औसतन करीब 7,000 रुपये की आमदनी कर रहा है. साहू ने कहा कि वन शासन अब पहले से ज्यादा “लोकतांत्रिक, विकेंद्रित, और पारदर्शी” हो गया है.

IAS, IPS उतरे जमीन पर

महाराष्ट्र सरकार ने अपने कुछ सबसे अच्छे IAS, IPS अधिकारियों को जानबूझकर जिले में तैनात किया. एक सब-डिवीज़नल मजिस्ट्रेट, IAS अधिकारी मनुज जिंदाल ने भामग्राद में कुछ खाली पड़ी इमारतों को ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों’ (PVTGs) के लिए ट्रेनिंग सेंटर में बदल दिया. 2017 बैच की IAS अधिकारी मिताली सेठी ने समुदाय केंद्रित तरीका अपनाया और नीति तथा गांवों की दैनिक जरूरतों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की. असिस्टेंट मजिस्ट्रेट शुभम गुप्ता ने जनजातीय छात्रों की पोषण संबंधी स्थिति पर नजर रखने और उसमें सुधार करने के लिए, और दूरदराज़ के गांवों तक मेडिकल सुविधाएं पहुंचाने के लिए ‘AI’ का उपयोग किया.

पुलिस ने भी लोगों तक पहुंचने की कोशिश की है. IPS अधिकारी नीलोत्पल ने ‘एक गांव, एक पुस्तकालय’ योजना शुरू करके 73 पुस्तकालयों की स्थापना कर डाली है और कई पुलिस थानों को साक्षरता तथा शिक्षण केंद्रों में तब्दील किया है. यह नागरिकों और पुलिस के बीच की खाई को पाटने में काफी प्रभावी साबित हुआ है. उनके साथी अंकित गोयल ने ‘पुलिस द्वार: एक खिड़की’ व्यवस्था लागू की है, जिसने नक्सल प्रभावित इलाकों के 270,000 लोगों को सरकारी जनकल्याण योजनाओं का लाभ उठाने में मदद की है.

इन कदम ने जमीनी स्तर पर सरकार की वैधता स्थापित की है और यह दिखाया है कि सुरक्षा के ऑपरेशन शासन तथा सेवा के साथ-साथ चल सकते हैं.

TRIFED’ और जनजातीय उपक्रम

अंतिम मगर उतनी ही महत्वपूर्ण है मध्य प्रदेश काडर के 1987 बैच के आइएएस अधिकारी प्रवीर कृष्ण की विकास संबंधी रणनीति. वे 2017 से लेकर रिटायर होने तक ‘TRIFED’ के प्रबंध निदेशक रहे. उन्होंने जनजातीय विकास के नजरिए को जनकल्याण तथा मुफ्त सहायता से आत्म-निर्भरता की ओर मोड़ने का प्रयास किया है.

‘पेसा’ और ‘एफआरए’ ने वनवासी समुदायों को अपने ‘इको-सिस्टम’ के खुद मालिक के रूप में मान्यता दे ही रखी है; कृष्ण का योगदान उन्हें ‘मनरेगा’ के दिहाड़ी मजदूर वाली पुरानी हैसियत से स्वतंत्र उद्यमी के रूप में बदलना रहा है.
उन्होंने ‘प्रधानमंत्री वन धन योजना’ का इस्तेमाल जनजातीय इलाकों में हजारों ‘वन धन विकास केंद्रों’ का गठन करके आदिवासी स्टार्ट-अप का विशाल नेटवर्क तैयार किया. ऐसे हर एक केंद्र में जनजातीय सदस्य इमली, शहद, झाड़ू, और फलों के रस जैसे लघु वन उत्पादों (एमएफपी) के संग्रहण, संशोधन और पैकेजिंग के लिए संसाधनों का एकत्रीकरण करते हैं. इस पहल ने 50 लाख संग्राहकों को बाजार से जोड़ा, उन्हें कम लागत वाली आर्थिक व्यवस्था और उद्यम के अवसर उपलब्ध कराए, मुनाफे को बिचौलियों के हाथों गंवाने की जगह समुदाय के भीतर ही रखा.

वन उत्पादों के लिए ‘एमएसपी’ स्कीम तो पहले से मौजूद थी लेकिन यह तब तक प्रायः दबी रही जब तक कि ‘ट्राइफेड’ को ‘नोडल एजेंसी’ के रूप में नामजद नहीं किया गया. यह कदम खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान महत्वपूर्ण साबित हुआ, जब पारंपरिक जनजातीय आजीविका बुरी तरह अस्तव्यस्त हो गई थी.

48 से ज्यादा प्रकार के लघु वन उत्पादों की तेज उगाही की व्यवस्था करके ‘ट्राइफेड’ ने ‘डाइरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफर’ के जरिए जनजातीय अर्थव्यवस्था में सीधे 2,000 करोड़ रु. डाल दिए. इसने आर्थिक सुस्ती के दौरान अहम सुरक्षा उपलब्ध कराई. वन धन यूनिटों ने हुनर प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाजार से जुड़ाव भी उपलब्ध कराया. इन कदमों ने सरकार के बारे में सकारात्मक धारणा बनाई. यह ‘समाधान’ कार्यक्रम के तहत नक्सल विरोधी समन्वित कार्रवाई का भी मुख्य तत्व रहा. इस कार्यक्रम के बारे में चर्चा अगले लेख में करेंगे.

यह लेफ्ट-विंग एक्सट्रीमिस्ट सीरीज़ का दूसरा आर्टिकल है.

संजीव चोपड़ा एक पूर्व IAS अधिकारी और ‘वैली ऑफ़ वर्ड्स’ के फेस्टिवल डायरेक्टर हैं. हाल तक, वे लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के डायरेक्टर थे. वे @ChopraSanjeev पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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