नई दिल्ली: सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के टैलेंट को अपने साथ जोड़ने के लिए बड़ी रकम खर्च करने को तैयार है. जिन सबसे वरिष्ठ AI पदों पर सरकार सप्लायर एजेंसियों के एक पैनल के जरिए लोगों को रखेगी, उनके लिए हर महीने 4.58 लाख रुपये तक दिए जा सकते हैं—यानी साल में करीब 55 लाख रुपये और इन लोगों को यही तय रेट स्वीकार करना होगा.
यह रकम सरकार के अपने सबसे बड़े वेतनमान से भी ज्यादा है. भारत सरकार के सचिव, जो सबसे वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों में शामिल होते हैं, उन्हें 7वें वेतन आयोग के Apex Scale के तहत हर महीने 2.25 लाख रुपये बेसिक वेतन मिलता है. वहीं देश के सबसे वरिष्ठ सरकारी अधिकारी कैबिनेट सचिव को 2.50 लाख रुपये बेसिक वेतन मिलता है.
हालांकि, यह तुलना पूरी तरह एक जैसी नहीं है. पैनल में तय रकम वह है जो सरकार हर विशेषज्ञ के लिए सप्लायर कंपनी को देगी. इसमें कंपनी का खर्च और उसका मुनाफा भी शामिल है, साथ ही उस व्यक्ति की सैलरी भी, लेकिन इससे यह पता चलता है कि सरकार इन नई तकनीक वाली स्किल्स के लिए कितनी ज्यादा रकम देने को तैयार है.
ये आंकड़े इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत नेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन (NeGD) की ओर से इस महीने दोबारा खोले गए Request for Empanelment (RFE) में दिए गए हैं. दिप्रिंट ने इसकी एक कॉपी देखी है. इस टेंडर में रेट पर बातचीत की अनुमति नहीं है.
यह शायद पहली बार है जब सार्वजनिक तौर पर यह पता चला है कि सरकार निजी बाजार में ज्यादा मांग वाली स्किल्स के लिए मुकाबला करने के लिए कितनी रकम देने को तैयार है.
ये रेट पहले की एक प्रक्रिया में तय किए गए थे. सरकार ने नवंबर 2025 में पहला टेंडर निकाला था और इसमें करीब 80 कंपनियों ने बोली लगाई थी. तकनीकी और वित्तीय जांच के बाद छह कंपनियों—टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (TCS), एनईसी कॉर्पोरेशन इंडिया, किंड्रिल सॉल्यूशंस, कैक्टस टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस, कोरोवर और इनेफू लैब्स को पैनल में शामिल किया गया और अप्रैल 2026 में उन्हें पैनल में शामिल किए जाने के पत्र जारी किए गए.
पहले टेंडर में सिर्फ खाली रेट-कार्ड फॉर्म था, जिसमें बोली लगाने वाली कंपनियों को अपनी दरें भरनी थीं. अब जो आंकड़े सामने आए हैं, वे उसी प्रक्रिया से आए हैं. सभी 12 पदों के लिए सबसे कम कुल बोली लगाने वाली कंपनी ने वह रेट तय किया, जिसे बाकी योग्य कंपनियों को भी मानना पड़ा.
जो पैनल बनाया गया है, वह अप्रैल 2028 तक वैध रहेगा. सरकार चाहे तो इसे एक साल के लिए और बढ़ा सकती है. इस व्यवस्था के तहत मंत्रालय, राज्य सरकारें और सरकारी कंपनियां (PSU) हर ज़रूरत के लिए नया टेंडर निकाले बिना सीधे इस पैनल से लोगों को रख सकती हैं. दोबारा खोले गए टेंडर से इसी पैनल में और कंपनियां जुड़ेंगी. इसलिए नई कंपनियों को पहले दौर में तय किए गए रेट ही मानने होंगे.
इस रेट कार्ड में AI/सॉल्यूशन आर्किटेक्ट, डेटा साइंस लीड और एआई/एमएल लीड के लिए हर महीने की फीस 4,58,500 रुपये तय की गई है. प्रोग्राम या प्रोडक्ट मैनेजर को 4,12,500 रुपये, डेटा इंजीनियरिंग लीड को 3,66,666 रुपये, जबकि एआई/एमएल इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट और MLOps Lead को 3,20,834 रुपये प्रति माह मिलेंगे. सबसे कम स्तर पर बिजनेस एनालिस्ट को हर महीने 2,16,666 रुपये मिलेंगे, यानी साल में करीब 26 लाख रुपये. इन सभी रकम में जीएसटी शामिल नहीं है.
टेंडर के मुताबिक, खास या “niche” पदों के लिए एआई/एमएल इंजीनियर के रेट से 1.5 गुना रकम ली जाएगी. यह करीब 4.81 लाख रुपये प्रति महीने होगी. हर साल रेट में अधिकतम 10 प्रतिशत तक बदलाव की अनुमति है. हालांकि, टेंडर में L1 रेट—यानी बोली प्रक्रिया में मिले सबसे कम रेट, में किसी भी तरह की बढ़ोतरी या बातचीत की अनुमति नहीं है. नई कंपनियों के लिए इसका मतलब है कि उन्हें पहले सफल बोली लगाने वाली कंपनी की तय दरें स्वीकार करनी होंगी या फिर पैनल में शामिल नहीं होना होगा.
प्रस्ताव जमा करने की आखिरी तारीख 7 सितंबर है और तकनीकी बोलियां अगले दिन खोली जाएंगी. 100 में से 75 या उससे ज्यादा अंक पाने वाली कंपनियां ही अंतिम चरण में जाएंगी.
ये लोग क्या काम करेंगे
इन तय रेट पर रखे जाने वाले एक्सपर्ट सिर्फ सलाह देने का काम नहीं करेंगे. टेंडर में विस्तार से बताया गया है कि उन्हें क्या-क्या बनाना होगा. इसमें सरकार की अपनी AI व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल है.
NeGD ने कहा है कि वह सरकारी कंप्यूटरों पर “इन-हाउस, मल्टी-टेनेंट इंफरेंस सर्वर” बनाएगा. इसके लिए नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर के MeghRaj क्लाउड का इस्तेमाल किया जाएगा. इसका मतलब है कि एआई प्रोग्राम बाहर की सेवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सरकारी सिस्टम पर ही चल सकेंगे.
इन कर्मचारियों को इस सिस्टम पर मुफ्त में उपलब्ध एआई मॉडल लोड करके चलाने होंगे. इसके बाद उन्हें “स्थिर APIs के पीछे” उपलब्ध कराना होगा, ताकि NeGD/DIC का कोई भी प्रोजेक्ट उनका इस्तेमाल कर सके. एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) नियमों या प्रोटोकॉल का एक सेट होता है, जिसकी मदद से अलग-अलग सॉफ्टवेयर एक-दूसरे से जुड़कर डेटा, फीचर और दूसरी सुविधाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं.
इसके अलावा, सरकारी कामकाज में रोज इस्तेमाल होने वाले कई तरह के टूल भी बनाए जाएंगे. इनमें एक ऐसा सॉफ्टवेयर होगा जो लंबी सरकारी फाइलों को छोटा करके उनका जल्दी पढ़ा जा सकने वाला सार बनाएगा. टेंडर में इसके उदाहरण के तौर पर “कैबिनेट नोट्स, टेंडर सारांश और नीतियों का सार” दिए गए हैं. एक अन्य टूल UMANG (Unified Mobile Application for New-age Governance) और DigiLocker जैसे ऐप के लिए चैटबॉट होंगे. ये चैटबॉट अंग्रेज़ी के साथ-साथ “अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं” में लोगों के सवालों के जवाब देंगे.
तीसरे टूल की मदद से आम लोग और फील्ड कर्मचारी टाइप करने के बजाय बोलकर सरकारी फॉर्म भर सकेंगे. वे भारतीय भाषाओं में आवाज के जरिए सरकारी वेबसाइटों को भी चला सकेंगे.
इन कर्मचारियों को ऐसे सिस्टम भी बनाने होंगे जो “सर्टिफिकेट, आईडी, फॉर्म और स्कैन किए गए पीडीएफ” से जानकारी पढ़कर निकाल सकें. इसके अलावा, उन्हें “अटेंडेंस, eKYC और डिजिटल ऑनबोर्डिंग” के लिए चेहरा पहचानकर सत्यापन करने वाले टूल भी बनाने होंगे. टेंडर में ऐसे सॉफ्टवेयर असिस्टेंट बनाने के लिए भी कहा गया है जो यूजर की तरफ से डिजीलॉकर में कुछ काम कर सकें, जैसे कोई दस्तावेज़ निकालना और उसकी जांच करना. हालांकि, जिस काम को बाद में वापस नहीं किया जा सकता, उसके लिए इंसान की मंजूरी ज़रूरी होगी.
एक बड़ा दरवाज़ा, एक फिक्स्ड कीमत
कीमत तय करते समय, दोबारा खोले गए राउंड ने दरवाज़े को और ज़्यादा खोल दिया है. एक बिडर को जो एवरेज सालाना टर्नओवर दिखाना होता है, उसे 50 करोड़ रुपये से घटाकर 25 करोड़ रुपये कर दिया गया है. मिनिमम स्टाफ की संख्या भी 200 फुल-टाइम कर्मचारियों से घटाकर 100 कर दी गई है. एक क्वालिफाइंग पिछले प्रोजेक्ट की मिनिमम वैल्यू तीन करोड़ रुपये से घटाकर एक करोड़ रुपये कर दी गई है. पहले राउंड से यह शर्त कि बिडर के पास लगातार तीन साल तक पॉजिटिव नेट वर्थ हो, अब हटा दी गई है.
स्टार्टअप्स को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता है. टेंडर में कहा गया है कि “MSMEs और स्टार्टअप्स को टर्नओवर और स्टाफ क्राइटेरिया दोनों से छूट दी गई है.” पहले राउंड में, ऐसी फर्मों को सिर्फ़ “NeGD की मर्ज़ी से छूट के लिए सोचा गया था”. यह छूट डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ़ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT), या नेशनल स्मॉल इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन (NSIC) से मान्यता प्राप्त फर्मों के लिए खुली है. इन आसान शर्तों के मुकाबले, सरकार ने एक नियम बढ़ाया है: बोली लगाने वाले को आगे बढ़ने के लिए जो टेक्निकल स्कोर हासिल करना होता है, वह 100 में से 70 से बढ़कर 75 हो गया है.
किसी भी मिनिस्ट्री, डिपार्टमेंट या PSU द्वारा किसी एम्पैनल्ड एजेंसी को NeGD के ज़रिए या, टेंडर में कहा गया है, “अलग से उन्हीं खोजी गई दरों पर, NeGD को रिपोर्ट किए बिना” हायर किया जा सकता है.
पेमेंट दो हिस्सों में बंटा होता है: मैनपावर के लिए हर महीने 60 परसेंट दिया जाता है, जबकि हर तिमाही में किए गए काम के आधार पर 40 परसेंट दिया जाता है. जो एजेंसियां 15 दिनों के अंदर कोई पद भरती हैं, उन्हें पहले महीने के बिल का 5 परसेंट एक बार में बोनस के तौर पर मिलता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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