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Thursday, 27 August, 2026
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HMT के लिए भारत की कभी खत्म न होने वाली दीवानगी — नेहरू के सपने से ‘देश की धड़कन’ और फिर पतन का सफर

पुरानी यादें ताज़ा करने वाले मशहूर ब्रांड HMT की अब वापसी होने वाली है. क्या यह सच में गर्व की वजह से 'Timekeeper to the Nation' (देश का समय बताने वाला) था, या इसलिए क्योंकि 'लाइसेंस-कोटा राज' के कारण भारतीयों के पास कोई और विकल्प नहीं था?

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1976 में क्रेमलिन में आयोजित एक डिनर में सोवियत नेता लियोनिद ब्रेजनेव की नजर भारतीय राजदूत आई.के. गुजराल की कलाई पर बंधी घड़ी पर टिक गई. वह जापानी घड़ी थी. ब्रेजनेव को घड़ियों और कारों का शौक था, यह बात किसी से छिपी नहीं थी. गुजराल ने उसी समय वह घड़ी उन्हें देने की पेशकश कर दी, जबकि इंदिरा गांधी टेबल के दूसरी तरफ से दोनों को देखकर मुस्कुरा रही थीं. ब्रेजनेव ने विनम्रता से मना कर दिया, लेकिन गुजराल की दूसरी पेशकश स्वीकार कर ली — एक खास तौर पर बनाई गई भारतीय HMT घड़ी.

गुजराल अपना वादा नहीं भूले. मॉस्को से लौटने के एक महीने बाद उन्होंने गांधी को घड़ी के बारे में याद दिलाया. 9 जुलाई 1976 को लिखे एक पत्र में, जिसे उनके संस्मरण Matters of Discretion (विवेक के मामलों में) में दोबारा प्रकाशित किया गया, उन्होंने लिखा: “मुझे दुख है कि अभी तक अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. करीब [रु] 15,000 का खर्च उनकी घड़ी पहनने से पूरी तरह वसूल हो जाएगा…”

30 अगस्त को एक खास तौर पर बनाई गई सोने की HMT घड़ी, इंदिरा गांधी के निजी पत्र के साथ मॉस्को पहुंची.

यह उस घड़ी के लिए काफी खास पल था, जिसने करीब डेढ़ दशक पहले अपनी यात्रा शुरू की थी. तब तक HMT भारतीय कलाई की अपनी घड़ी बन चुकी थी. 1961 में शुरू हुआ यह ब्रांड मेड इन इंडिया की साफ पहचान और देशभक्ति की भावना से जुड़ा था. यह सस्ती, भरोसेमंद और हर जगह उपलब्ध थी — आम लोगों की पसंद, नेताओं की पसंदीदा और सचमुच “देश की टाइमकीपर” थी.

HMT का एक पुराना विज्ञापन

जवाहरलाल नेहरू द्वारा लॉन्च की गई HMT जनता, इंदिरा गांधी के खास पहनावे का हिस्सा बन गई. जनता नाम उस समाजवादी भारत के लिए बिल्कुल सही था, जिसका वह प्रतिनिधित्व करती थीं.

लेकिन फिर जैसे-जैसे भारत बदला, HMT उसके साथ नहीं बदल पाई. अपनी कामयाबी से गिरावट की ओर जाते हुए, यह सरकारी कंपनी इस बात का उदाहरण बन गई कि जब कोई संस्था अपने आसपास की दुनिया के साथ समय के हिसाब से नहीं बदलती, तो क्या होता है. 2016 में सरकार ने HMT वॉचेस लिमिटेड को बंद करने की मंजूरी दे दी.

इससे एक सवाल उठता है: क्या HMT सच में “Timekeeper to the Nation” (देश का समय बताने वाला) थी, क्योंकि लोगों को उससे सच में लगाव और गर्व था, या सिर्फ इसलिए क्योंकि लाइसेंस-कोटा राज के कारण भारतीयों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था?

HMT का एक पुराना विज्ञापन

फिर भी, पुरानी यादों की यह घड़ी कभी सच में रुकी नहीं. बल्कि, HMT की गैरमौजूदगी ने इन घड़ियों को और ज्यादा पसंदीदा बना दिया.

2026 में भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर बेंगलुरु के जालाहल्ली में HMT के शांत शोरूम के बाहर 2.5 किलोमीटर लंबी लाइन लग गई, जहां हजारों युवा घड़ी प्रेमी घंटों इंतजार कर रहे थे ताकि नई जारी की गई खास संस्करण वाली घड़ियां खरीद सकें.

तो आखिर HMT में क्या बचा है? घड़ी, इंजीनियरिंग या वह भारत, जिसने कभी इसे पहना था?

इसका जवाब इन तीनों के बीच कहीं है. इसकी खूबसूरती का एक हिस्सा इसके मैकेनिकल मूवमेंट में हो सकता है, एक हिस्सा इसके पुराने अंदाज में और एक हिस्सा इस बात में कि यह देश की साझा यादों का हिस्सा कैसे बन गई. HMT अपने साथ पहली बार की यादें लेकर चलती थी. ग्रेजुएशन, पहली नौकरी, शादी या रिटायरमेंट के लिए जनता, पायलट या कोहिनूर होती थी.

लेकिन विरासत या “देश की धड़कन” बनने से पहले, यह एक बड़ा सपना था. एक ऐसा सपना जिसमें एक देश बनाने की सोच थी. और इसकी कहानी नेहरू के भारत में शुरू हुई — आत्मनिर्भरता, आजादी के बाद की देशभक्ति और प्रशांत महासागर के उस पार हुई एक अहम साझेदारी की कहानी.

आत्मनिर्भर भारत की तलाश

15 अगस्त 1947 की आधी रात के साथ एक नया और अनिश्चित देश अपने भविष्य की ओर बढ़ा. संसाधन कम थे, जरूरतें बहुत थीं और हर फैसला एक समझौता था. सपना एक आधुनिक, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का था.

आजादी के बाद के पहले डेढ़ दशक तक यही नेहरू का भारत था.

1954 में भाखड़ा नांगल बांध का उद्घाटन करते हुए नेहरू ने ऐसे औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था. उन्होंने कहा था, “यहां हम किसी चीज की पूजा करते हैं: हम भारत को बनाते हैं, हम भारत के करोड़ों लोगों का भविष्य बनाते हैं.”

ऐसा ही एक और “मंदिर” बैंगलोर के बाहरी इलाके में बनना शुरू हो चुका था. 7 फरवरी 1953 को हिंदुस्तान मशीन टूल्स (HMT) की नींव रखी गई. नेहरू भारत की महत्वाकांक्षाओं की मूल समस्या समझते थे — अगर देश का उद्योग बनाने के लिए जरूरी मशीनें विदेशों से आती रहेंगी, तो देश मुश्किल से आत्मनिर्भर बन पाएगा. दो साल बाद उन्होंने साफ कहा: “इस देश में तब तक वास्तविक प्रगति या वास्तविक औद्योगीकरण नहीं हो सकता, जब तक मशीन खुद इस देश में न बनाई जाए.”

1955 में HMT फैक्ट्री में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी | फोटो: Nehru Archive

जल्द ही HMT ने सामान्य मशीनों से बहुत आगे बढ़कर काम शुरू किया. यह ट्रैक्टर से लेकर प्रिंटिंग प्रेस तक सब कुछ बनाने लगी और आखिर में एक बहुत छोटी चीज — कलाई की घड़ी.

लेकिन घड़ी ही क्यों? एक नए आजाद और पैसे की कमी से जूझ रहे देश को ऐसी चीज में निवेश करने की जरूरत क्यों थी, जो जरूरी नहीं लगती थी?

क्योंकि सिर्फ 30-40 मिमी की घड़ी अपने अंदर इंजीनियरिंग का एक छोटा चमत्कार होती है, जिसमें करीब सौ अलग-अलग हिस्से होते हैं — स्प्रिंग, गियर, पैलेट, रैचेट — और ये सभी एकदम सही तालमेल के साथ काम करते हैं. घड़ी बनाना बड़े स्तर पर सटीक इंजीनियरिंग में महारत हासिल करने जैसा था.

यही बात रक्षा उद्योग मंत्री मनुभाई शाह ने 30 मार्च 1960 को संसद में कही थी, जब इस प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए गए. उन्होंने सदन को याद दिलाया कि घड़ी छोटी जरूर है, लेकिन यह “सबसे जटिल और सबसे सटीक मशीनों में से एक है… जिसे एक औद्योगिक आधार के जरिए बनाया जाता है.” उन्होंने समझाया कि मकसद सिर्फ घड़ियां बनाना नहीं था, बल्कि “युवा लोगों” को प्रशिक्षित करना था, जो आगे चलकर देशभर में अपनी खुद की इंडस्ट्री शुरू कर सकें.

शाह ने माना, “हमें भी यह चिंता थी कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र को इसे शुरू करना चाहिए,” लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि घड़ी की फैक्ट्री असल में “अलग-अलग तरह के मशीन टूल्स का एक समूह” है.

इसके साथ ही, मशीन बनाने वाली कंपनी अब घड़ी बनाने की तैयारी कर रही थी.

तकनीक का हस्तांतरण और ‘रोजगार की बड़ी संभावना’

अक्टूबर 1959 में नेहरू ने मनुभाई शाह को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें एक “काफी अजीब रिपोर्ट” मिली है कि एक यूरोपीय कंपनी ने भारत में घड़ियां बनाने के लिए सरकार के साथ समझौता किया है. इस समझौते को आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति गिल्बर्ट एटिएन नाम का एक स्विस व्यक्ति था. नेहरू ने लिखा कि उसे फ्रांसीसी दूतावास का समर्थन प्राप्त था और “उसकी बहुत अच्छी प्रतिष्ठा नहीं मानी जाती.”

नेहरू जानना चाहते थे कि मामला कहां तक पहुंचा है.

जैसा कि बाद में पता चला, काफी कुछ चल रहा था, लेकिन कहीं और. पर्दे के पीछे भारत ने जापान के साथ बातचीत शुरू कर दी थी. चुनाव साफ था. युद्ध के बाद जापान की औद्योगिक सफलता ने वहां के घड़ी निर्माताओं को स्विट्जरलैंड के बेहतरीन घड़ी निर्माताओं के बराबर ला खड़ा किया था. और जल्द ही इसकी चर्चा संसद तक पहुंच गई.

9 फरवरी 1960 को शाह ने लोकसभा को जापान की सिटिज़न वॉच कंपनी के साथ आधिकारिक साझेदारी की जानकारी दी. जब सांसद संधान गुप्ता ने पूछा कि “किस तरह की घड़ियां बनाने का विचार है”, तो शाह ने जवाब दिया, “फुल लीवर घड़ियां, महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए.”

बेंगलुरु में HMT फैक्ट्री में काम करती महिलाएं | फोटो: HMT वेबसाइट

उस समय आत्मनिर्भरता तुरंत हासिल करना लक्ष्य नहीं था. जरूरी था तकनीकी क्षमता बनाना और उस चीज का फायदा उठाना, जिसे शाह ने “इस उद्योग में रोजगार की बड़ी संभावना” कहा था.

25 मार्च 1960 को समझौता हो गया. सिटिज़न ने 1,06,330 पाउंड के बदले तकनीकी जानकारी देने और 2 प्रतिशत रॉयल्टी लेने पर सहमति दी. पांच दिन बाद शाह ने संसद में इस फैसले का बचाव किया. उन्होंने सिटिज़न को “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत अच्छी प्रतिष्ठा रखने वाली बेहद योग्य कंपनियों में से एक” बताया और कहा कि सरकार “खुश है कि समझौता अंतिम रूप ले चुका है.”

भारत इस बदलाव के लिए तैयार था. देश पहले से ही कलाई की घड़ियों का दीवाना था. हालत इतनी खराब थी कि विदेशी घड़ियों की बड़े पैमाने पर काला बाजार में बिक्री होती थी और भारत तस्करी की गई विदेशी घड़ियों के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन गया था. अब देश में बनी घड़ी का समय था.

28 जनवरी 1961 को द इंडियन एक्सप्रेस ने एक छोटा सा विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमें “HMT के तहत भारत की पहली घड़ी फैक्ट्री” की नींव रखे जाने की जानकारी दी गई. छह महीने बाद, 28 जुलाई को बैंगलोर में HMT की नई यूनिट के उद्घाटन के दौरान नेहरू ने 800 घड़ियों का पहला बैच पेश किया, जिन्हें आयात किए गए हिस्सों से जोड़ा गया था.

जब एक कर्मचारी ने नेहरू को पहली दो घड़ियां दीं, तो उन्होंने मजाक में कहा, “मुझे नहीं पता कि मैं इनके साथ क्या करूंगा, क्योंकि एक घड़ी मेरे पास इतने लंबे समय से चल रही है.” इसके बाद उन्होंने इस उपलब्धि को “देश के लिए अच्छी बात” बताया, जो “जापान में हमारे दोस्तों के सहयोग” से संभव हुई थी.

फिर भी, फैक्ट्री अभी पूरी तरह भारतीय नहीं बनी थी. आयात किए गए मूवमेंट पर निर्भर ये शुरुआती HMT घड़ियां असली आत्मनिर्भरता की तैयारी थीं — जापानी निगरानी में कौशल विकसित करने की एक तरह की ट्रेनिंग.

1953 में हिंदुस्तान मशीन टूल्स की स्थापना, नेहरू के उद्योग भारत की प्रमुख सरकारी कंपनियों में से एक बनी | फोटो: HMT वेबसाइट

 

मार्च 1962 में शाह ने संसद में पूरा प्लान बताया. बैंगलोर की साइट पर निर्माण अगस्त 1961 में शुरू हो गया था, जबकि HMT अपने भविष्य के घड़ी निर्माताओं को जापान में ट्रेनिंग दे रही थी. जुलाई 1961 में 52 प्रशिक्षु जापान गए थे और 50 और जाने वाले थे.

संख्या भी बढ़ने लगी थी. फरवरी के मध्य तक 11,465 घड़ियां पहले ही असेंबल की जा चुकी थीं, शाह ने सदन को बताया. इनमें महिलाओं के लिए सोने की परत वाली सुजाता और पुरुषों के लिए स्टेनलेस-स्टील जनता और सिटिज़न शामिल थीं.

घड़ी के हिस्सों का वास्तविक निर्माण जनवरी 1963 में शुरू होना था, जिसमें 54 प्रतिशत हिस्से भारत में बनाए जाने थे. चौथे चरण तक 1966 में इसे बढ़ाकर 85-90 प्रतिशत करने का लक्ष्य था.

और लगता है कि घड़ियों ने निराश नहीं किया. जब सांसद तिरुमला राव ने उनकी गुणवत्ता के बारे में पूछा, तो शाह के जवाब में गर्व साफ दिखाई दिया: “अब तक रिपोर्ट बहुत अच्छी रही है और मुझे हर तरफ से मांगों की भरमार मिली है.”

बस एक समस्या थी. बड़े पैमाने पर उत्पादन.

नए उद्योग मंत्री नित्यानंद कानूनगो ने 1963 में लोकसभा को बताया कि भारत में हर साल करीब 15 लाख घड़ियों की खपत होती है. HMT का शुरुआती उत्पादन करीब 15,000 घड़ियों का था, जो आयात की इस बड़ी संख्या को शायद ही कम कर सकता था.

लेकिन शायद मकसद कभी यह था ही नहीं. भारत उस क्षेत्र में कदम रख चुका था, जहां जाने की हिम्मत बहुत कम देशों ने की थी. अपने आप में यह गर्व का एक पल था.

जब HMT घर-घर में जाना जाने लगा

जल्द ही बड़े शहरों में HMT के खास शोरूम खुलने लगे — चेन्नई के माउंट रोड, हैदराबाद के निजाम शुगर फैक्ट्री बिल्डिंग, एर्नाकुलम के MG रोड और कोयंबटूर के अविनाशी रोड से लेकर. अखबारों में HMT के विज्ञापन आने लगे, जिनमें समाजवादी कीमतों पर अच्छी गुणवत्ता का वादा किया जाता था — सोने की परत वाली सुजाता की कीमत 99 रुपये थी, जो जनता से सिर्फ 10 रुपये ज्यादा थी.

मांग बढ़ी, तो HMT भी बढ़ने लगी. इसके बाद नई फैक्ट्रियां खुलीं, जिनमें 1972 में कश्मीर की एक फैक्ट्री भी शामिल थी. कश्मीर की पहचान चिनार के पत्ते वाली डिजाइन के साथ एक खास HMT चिनार घड़ी जारी की गई.

HMT अभी भी देश की घड़ियों की मांग पूरी करने में मुश्किल का सामना कर रही थी, लेकिन आंकड़े सही दिशा में बढ़ रहे थे. उद्योग मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद ने राज्यसभा को बताया कि 1967 तक उत्पादन बढ़कर करीब 2.4 लाख घड़ियां हो गया था. निर्यात भी बढ़ने लगा था — 1965 में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में 1,680 घड़ियां भेजी गईं, जो 1975 में बढ़कर 10,256 हो गईं.

जाहिर है, भारत में कलाई घड़ियों की इस नई क्रांति के साथ संसद में भी बहस होती रही. कीमतों से लेकर बछड़े की चमड़े की पट्टियों के इस्तेमाल और भारतीय घड़ियों के निर्यात तक, कई मुद्दों पर बहस हुई. 1963 में सांसद कपूर सिंह ने सदन में शिकायत की कि जापानी हिस्सों वाली एक घड़ी “वहां 15 रुपये में बिकती है और यहां 100 रुपये में”.

गोल्ड-प्लेटेड HMT कंचन दहेज में दी जाने वाली एक पसंदीदा चीज़ बन गई | विशेष व्यवस्थालेकिन शायद खरीदारों के साथ HMT के जुड़ाव का सबसे साफ संकेत उसकी घड़ियों के आम और भारतीय नाम थे: विजय, केदार, रजत, सोना, कंचन. ये नाम किसी प्रोडक्ट कोड से कम और उन लोगों के नाम जैसे ज्यादा लगते थे, जिन्हें आप जानते हों. इन नामों ने घड़ियों को व्यक्तिगत बना दिया और आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया. इसके बाद राष्ट्रीय जयंती और सांस्कृतिक उपलब्धियों के मौके पर खास संस्करण वाली घड़ियां भी आईं.

यह जानबूझकर किया गया था — और मजेदार भी था.

“हर कोई नाम सुझाता था और कई नाम लेकर आता था. फिर हम उन नामों में से चुनते थे. यह बहुत मजेदार था,” HMT Watches में 1980 के दशक में काम करने वाली और Saatchi & Saatchi Focus की पूर्व CEO मालविका हरिता ने कहा. कुछ ग्राहक रिसर्च भी होती थी, लेकिन इसका काफी हिस्सा कंपनी के अंदर ही होता था. “एक तरह से, नाम घड़ियों को व्यक्तिगत बना रहे थे.”

फिर क्वार्ट्ज घड़ियां आईं और नाम रखने का तरीका बदल गया.

“क्वार्ट्ज घड़ियों के नाम नहीं रखे जाते थे. उन पर सिर्फ HQ लोगो — HMT क्वार्ट्ज होता था. उन पर सिर्फ नंबर होते थे, जो अंतरराष्ट्रीय तरीका था,” हरिता ने दिप्रिंट को बताया.

HMT किरण, अप्पू और रोहित ऐसी कई घड़ियों में शामिल थीं, जिनके नाम आम लोगों जैसे लगते थे. खरीदार अक्सर ऐसी घड़ी ढूंढते थे, जिसका नाम उनके अपने नाम से मिलता हो | विशेष व्यवस्था

कंचन, रोहित, तारिक की दूसरी जिंदगी

कंचन और केदार जैसी घड़ियां हमेशा के लिए गायब नहीं हुईं. इसके बजाय, उन्हें कलेक्टरों ने फिर से खास बना दिया.

“मेरे नाम की एक HMT रोहित है. मैं लोगों को उनके नाम वाली HMT घड़ियां गिफ्ट करता रहता हूं,” 50 के दशक में चल रहे और स्फीयर ट्रैवलमीडिया के संस्थापक और निदेशक रोहित हंगल ने कहा.

उनके पास HMT की 800 घड़ियों का कलेक्शन है, जो अपने आप में एक छोटा संग्रहालय जैसा है: रोहिणी और किरण, एक ISRO घड़ी, एक वसुधैव कुटुम्बकम को समर्पित घड़ी, एक नई सहस्राब्दी के आने के मौके पर बनाई गई घड़ी और गंडाबेरुंड, जिसके डायल पर पुराने मैसूर राज्य का चिन्ह और कन्नड़ अंक हैं.

रोहित हंगल ने HMT की करीब 800 घड़ियां इकट्ठी की हैं | स्पेशल अरेंजमेंट

कुछ घड़ियां अपनी खास उपयोगी खूबियों के लिए मशहूर हुईं. बड़े और आसानी से दिखने वाले अंकों वाली Pilot घड़ी देशभर में पसंद की गई. तारिक, जिसका मतलब तारीख है, HMT की शुरुआती मैकेनिकल घड़ियों में से एक थी, जिसमें दिन और तारीख दोनों दिखते थे.

और कभी-कभी, ऐसी घड़ी खरीदना अपने आप में एक कहानी होती थी.

दिल्ली के निजामुद्दीन की एक छोटी सी बेसमेंट की दुकान में, अजान की आवाज और सिलाई मशीनों की लगातार आवाज के बीच, जावेद खान तीन दशक से घड़ियां ठीक कर रहे हैं. क्वार्ट्ज घड़ियों का दौर आ गया, लेकिन मैकेनिकल HMT घड़ियां अब भी उनके पास आती हैं.

उन्हें वह समय याद है जब HMT की घड़ी खरीदना हमेशा आसान नहीं था.

“एक घड़ी लेने के लिए राशन कार्ड चाहिए होता था. लोगों को पहले से बुकिंग करनी पड़ती थी,” उन्होंने कहा. मांग हमेशा सप्लाई से ज्यादा होती थी. HMT के शोरूम के बाहर लाइनें लगती थीं और कुछ खरीदार घड़ी लेने के लिए राजनीतिक सिफारिश वाले पत्र भी मांगते थे. खान को याद है कि निम्न-मध्यम वर्ग के खरीदार सोना लेते थे, जबकि “अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोग कंचना लेते थे.”

दिल्ली के निजामुद्दीन में अपनी घड़ी की मरम्मत की दुकान पर जावेद खान, जहां आज भी HMT की घड़ियां आती हैं. स्पेशल अरेंजमेंट

 

अलग-अलग घड़ियों के साथ अलग-अलग कहानियां जुड़ गई थीं, कभी बदनामी की तो कभी राष्ट्रीय गर्व की. सोने की परत वाली कंचन को ‘दहेज की घड़ी’ के नाम से जाना जाने लगा.

बेंगलुरु के HMT प्रेमी गंगाधरन एस को वह दौर याद है, जब एक घड़ी शादी की बातचीत का हिस्सा बन सकती थी.

“उन दिनों दहेज में या तो घड़ी दी जाती थी या साइकिल,” 60 के दशक में चल रहे गंगाधरन ने कहा, जो एक स्कूल की किताबें बांटने वाली कंपनी में काम करते हैं.

साइकिल आसानी से मिल सकती थी. कंचन मिलना दूसरी बात थी.

“HMT कंचन की इतनी मांग थी कि स्टॉक खत्म होने की वजह से शादियां तक टाल दी जाती थीं.”

लेकिन शायद कोई भी मॉडल जनता जितना भावनात्मक महत्व नहीं रखता. 1970 और 1980 के दशक में यह परीक्षा पास करने के साथ लगभग जुड़ गई थी.

“अगर आप किसी लड़के को HMT जनता पहने देखते थे, तो इसका मतलब था कि उसने SSC परीक्षा पास कर ली है,” गंगाधरन ने कहा.

रोहित हंगल के लिए भी जनता उनकी पहली HMT घड़ी थी.

“हम इसके आसपास बड़े हुए थे, ‘देश की धड़कन’ अभियान के साथ,” उन्होंने कहा.

यादों को संभालने वाली घड़ी

अपनी शुरुआत और गिरावट के बीच HMT अनगिनत लोगों की जिंदगी में ‘पहली बार’ की यादों का हिस्सा बन गई. जिस किसी के पास HMT रही, उसके लिए उसकी तकनीकी खूबियों से ज्यादा मायने उस पल का था, जब वह घड़ी उसकी जिंदगी में आई.

HMT की घड़ी अक्सर जिंदगी के एक खास पड़ाव की निशानी होती थी — जिसे कमाया जाता था, किसी खास मौके पर दिया जाता था या अगली पीढ़ी को सौंप दिया जाता था.

55 साल की केमिस्ट्री प्रोफेसर रत्ना शेरी के लिए उनकी पहली HMT रोहिणी थी, जो उनके माता-पिता ने उन्हें दी थी और जिसे उन्होंने कॉलेज के दौरान पहना. बाद में सितारा आई, जो उनके परिवार में लंबे समय से काम कर रहे रसोइए ने उनकी शादी पर उन्हें दी थी.

क्वार्ट्ज कोहिनूर, देवनागरी जनता, HMTसितारा और बिना स्ट्रैप वाली HMT रोहिणी . ये घड़ियां रत्ना शेरी और उनके 28 साल के बेटे दिव्ये शेरी की हैं, जो खुद भी कलेक्शन बना रहे हैं | विशेष व्यवस्था

इत्तिचांडा पोन्नप्पा को उनकी पहली HMT रोमन मिली, जब उन्होंने 10वीं कक्षा पास की. पांच लोगों के उनके परिवार के लिए उस समय घड़ी अभी भी एक महंगी चीज थी, इसलिए वह पल खास था, जब उनके पिता, जो HMT के मशीन-टूल्स डिविजन में काम करते थे, उन्हें एक शोरूम में लेकर गए.

“यह करीब 1992 की बात है और टाइटन अभी-अभी क्वार्ट्ज के साथ आई थी,” 49 साल के पोन्नप्पा ने याद किया, जो एक IT कंपनी में काम करते हैं. “बचपन में मुझे चाबी से चलने वाली घड़ियां पुरानी तकनीक और कम उपयोगी लगती थीं. इसलिए मैंने HMT रोमन खरीदी.”

इसके बाद पोन्नप्पा ने HMT की 4,000 से ज्यादा अलग-अलग घड़ियां इकट्ठी कर लीं.

“मैंने गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इसे यह कहकर मानने से मना कर दिया कि वे HMT को एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड नहीं मानते,” उन्होंने कहा. उन्हें पायलट घड़ी बहुत पसंद है: “इसके इतने सारे मॉडल, रंग और विकल्प हैं और यह हाथ पर अच्छी लगती है. इसके अलावा, कुछ मॉडलों में रेडियम होता था, जो रात में चमकता था.”

इत्तिचांडा पोन्नप्पा का कहना है कि उनके पास भारत का सबसे बड़ा HMT कलेक्शन है, जिसमें 4,000 से ज्यादा घड़ियां हैं | स्पेशल अरेंजमेंट

हालांकि, हर किसी की पहली HMT किसी गिफ्ट के रूप में नहीं आई थी.

गंगाधरन के लिए इसकी शुरुआत कूड़ेदान से हुई. एक दोस्त के घर पर उन्हें बिना स्ट्रैप वाली HMT जनता फेंकी हुई मिली. उन्होंने उसे उठा लिया और बेंगलुरु के बेल्लारी रोड की एक दुकान पर मरम्मत के लिए ले गए, जहां उसे फिर से चलने लायक बनाया गया. उसी जनता से उनका 200 से ज्यादा HMT घड़ियों का कलेक्शन शुरू हुआ.

हर साल मिलने वाला बोनस HMT के शोरूम जाने का मौका बन जाता था. यहां एक सोना. वहां एक पॉकेट वॉच. धीरे-धीरे घड़ियां खरीदना एक तरह से परिवार का पेड़ बनाने जैसा हो गया.

“मैं नाम वाली घड़ियां खरीदने लगा,” उन्होंने कहा. उनकी भतीजी के लिए कीर्ति है और उनके कजिन के दामाद के लिए विवेक. उनकी बेटी के लिए HMT कीर्तन नहीं है, लेकिन उनकी सबसे पसंदीदा घड़ी ऊषा है — उनकी पत्नी का नाम.

गंगाधरन के पास HMT घड़ियों का एक ‘फैमिली ट्री’ है. उनकी पसंदीदा HMT ऊषा है — उनकी पत्नी के नाम पर.

लेकिन HMT की जिंदगी सिर्फ पुराने समय के लोगों की वजह से जारी नहीं है. इसके सुनहरे दौर के काफी समय बाद नए कलेक्टर भी इसे खोज रहे हैं.

घड़ियों के बारे में कंटेंट बनाने वाले मनु श्रीकुमार भी हाल ही में HMT के प्रशंसक बने हैं. 42 साल की उम्र वाले मनु ने अपनी जिंदगी का ज्यादातर समय डिजिटल कैसियो घड़ियां पहनते हुए बिताया था, जब तक कि एक दोस्त ने 1,000 रुपये में खरीदी गई दो पुरानी HMT घड़ियों का व्हाट्सएप स्टेटस पोस्ट नहीं किया. उत्सुक होकर श्रीकुमार ने ऑनलाइन कलेक्टर ग्रुप खोजे और पायलेट खरीदी. फिर जनता, जुबली और सोना आईं.

“अब मेरे पास HMT का पूरा ट्रक भर गया है,” उन्होंने हंसते हुए कहा. “शायद अभी करीब सौ से ज्यादा हैं.”

मनु श्रीकुमार अपने HMT कलेक्शन के साथ.

जब टाइमकीपर ने समय खो दिया

HMT ने देश की सबसे बड़ी “Timekeeper to the Nation” (देश का समय बताने वाला) कंपनी के रूप में एक साम्राज्य बनाया था. लेकिन इस चमक के पीछे लालफीताशाही ने नई सोच को रोक दिया था. बोर्डरूम में फैसले बहुत धीरे होते थे और प्रोडक्शन लाइनें मांग पूरी करने के लिए संघर्ष करती थीं.

फिर भी HMT रातोंरात खत्म नहीं हुई. इसके बिल्कुल उलट, 1991-92 में, जब भारत अपनी बंद अर्थव्यवस्था को खोलना शुरू कर रहा था, HMT अपने सबसे अच्छे दौर में थी. उसके 8,000 से ज्यादा कर्मचारी थे और करीब 300 करोड़ रुपये की बिक्री थी, जो उसकी अब तक की सबसे ज्यादा बिक्री थी.

शुरुआत से ही कंपनी अकेले काम नहीं कर रही थी. कई दशकों तक उसके मुकाबले में वे विदेशी घड़ियां थीं, जो “गधे वाले रास्तों” से भारत में चोरी-छिपे आती थीं.

“यह HMT बनाम इन सभी विदेशी ब्रांडों की लड़ाई थी,” HMT के अकाउंट पर मुद्रा कम्युनिकेशंस में काम करने वाले पवन पडकी ने कहा. उनका मुकाबला करने के लिए घड़ी बनाने वाली कंपनी ने अपनी देशभक्ति वाली पहचान पर जोर दिया: “Helping the nation keep time” (देश को समय के साथ चलने में मदद करना).

HMT हेरिटेज सेंटर और संग्रहालय में ‘Wall of Watches’ (घड़ियों की दीवार) | Photo: Museums of India website

फिर 1980 के दशक में टाइटन मैदान में उतरी — देश में बनी, स्टाइलिश, आधुनिक, टाटाज़ की आर्थिक ताकत से समर्थित और क्वार्ट्ज तकनीक से लैस.

“हमने क्वार्ट्ज घड़ियों में समय रहते कदम नहीं रखा, हालांकि हमने टाइटन से पहले एक क्वार्ट्ज घड़ी लॉन्च की थी,” मालविका हरिता ने कहा. “हम बस मौका गंवा चुके थे.”

उनके अनुसार Titan के पास एक अहम फायदा था: शुरुआत में वह घड़ियों को बनाने के बजाय उन्हें असेंबल करती थी, जिससे उसे डिजाइन में ज्यादा आजादी मिलती थी. इसके बाद HMT के टॉप मैनेजमेंट के कुछ लोग कंपनी छोड़कर चले गए और अपने साथ जानकारी और अनुभव भी ले गए. इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह थी कि HMT बदलती ग्राहक पसंद के साथ नहीं बदल पाई.

“हम ग्राहक को सही तरह से समझ नहीं पाए. ग्राहक की पसंद बदल रही थी. घड़ी सिर्फ समय बताने वाली चीज से फैशन की चीज बन रही थी,” हरिता ने कहा.

1987 तक Titan करीब 500 मॉडलों की बड़ी रेंज पेश कर रही थी, HMT के अकाउंट पर 1980 के दशक के आखिर में मुद्रा कम्युनिकेशन्स में काम करने वाले श्रीधर रामानुजम के अनुसार. वह ऐसे बाजार में नए आकार और आधुनिक डिजाइन लेकर आई, जो ज्यादातर मैकेनिकल घड़ियों के साथ बड़ा हुआ था.

उसने आगे बढ़ने और बेहतर जीवन की नई भाषा भी पेश की.

“हम एक नए भारत की बात कर रहे हैं… टाइटन ने इसे बेचा. उसके पूरे पेज के प्रिंट विज्ञापन, मोजार्ट की धुन वाले टीवी विज्ञापन, HMT के विज्ञापनों से ज्यादा असरदार थे,” रामानुजम ने कहा.

पडकी के अनुसार, 1990 के दशक के मध्य तक HMT के दो बिल्कुल अलग रूप सामने आने लगे थे.

एक HMT घड़ी थी — भरोसेमंद, सस्ती, राष्ट्रीय महत्व वाली और भावनाओं से जुड़ी. और दूसरी HMT कंपनी थी — सुरक्षित, सरकारी नियमों में बंधी, नौकरशाही वाली, उत्पादन पर केंद्रित और बदलते ग्राहक व्यवहार के हिसाब से ढलने में बहुत धीमी. पहली ने ब्रांड की बहुत बड़ी पहचान बनाई. दूसरी उसे आगे नहीं बढ़ा पाई.

“जरूरी नहीं कि HMT इसलिए हारी क्योंकि उसकी घड़ियां खराब हो गई थीं,” पडकी ने कहा. “वह इसलिए हारी क्योंकि अच्छी घड़ी की परिभाषा बदल गई.”

पडकी के अनुसार, एक रास्ता यह हो सकता था कि HMT के तहत एक बिल्कुल नया ब्रांड बनाया जाता — बिक्री का मौजूदा नेटवर्क रखा जाता, लेकिन नए ग्राहक के लिए एक नई पहचान बनाई जाती. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

कंपनी के खातों ने एक खराब तस्वीर दिखाई. आर्थिक उदारीकरण और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बाद HMT को 1994 में पहली बार 90 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. इसके बाद स्थिति और खराब होती गई. 2013-14 तक उसका घाटा बढ़कर 233.08 करोड़ रुपये हो गया.

सालों के दौरान कंपनी को फिर से खड़ा करने की कई कोशिशें हुईं. इनमें नए मॉडल, नई पूंजी, रिटेल कंपनियों के साथ साझेदारी और जॉइंट वेंचर के प्रस्ताव शामिल थे. उत्तराखंड में एनडी तिवारी, हरीश रावत और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे नेताओं ने अलग-अलग समय पर रानीबाग यूनिट को बचाने की कोशिश की. लेकिन इनमें से कोई भी कोशिश सफल नहीं हुई.

पुरानी पहचान की ढाल भी कंपनी को ज्यादा समय तक नहीं बचा सकी. 2016 में सरकार ने HMT वॉचेस लिमिटेड को बंद करने की औपचारिक मंजूरी दे दी. देश की टाइमकीपर के पास अब समय खत्म हो चुका था.

नई शुरुआत?

HMT के खत्म होने का दुख बहुत लोगों को हुआ. गंगाधरन और उनके साथी कलेक्टरों ने इसे फिर से शुरू करने की मांग करते हुए केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री को एक औपचारिक ज्ञापन भी तैयार किया था.

अब, HMT की वापसी का सपना जोर पकड़ रहा है.

2026 में HMT की स्वतंत्रता दिवस की घड़ियों को मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया के बाद केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा, “ग्राहकों की प्रतिक्रिया ने कंपनी को फिर से शुरू करने के हमारे इरादे को और मजबूत किया है. एक समय था जब HMT की घड़ी रखना गर्व और प्रतिष्ठा की बात होती थी. मेरा लक्ष्य उस गौरव को वापस लाना है.”

करीब दो साल से सरकार HMT को फिर से शुरू करने की तैयारी कर रही है. पूर्व नीति आयोग सदस्य वी.के. सारस्वत की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति नवंबर 2024 में बनाई गई थी और उसने पिछले साल मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. इस जून में कुमारस्वामी ने कहा था कि उन सुझावों के आधार पर तैयार की जा रही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट अपने अंतिम चरण में है. इसके बाद प्रमुख मंत्रालयों और संबंधित पक्षों के साथ बातचीत की जाएगी.

फिलहाल, ब्रांड की याद खास संस्करण वाली घड़ियों और बेंगलुरु के एक उपनगर में बने संग्रहालय में जिंदा है.

2019 में खोला गया HMT हेरिटेज सेंटर और म्यूज़ियम ऐसे भारत की याद दिलाता है, जहां लोग कभी गर्व के साथ HMT पहनते थे. उस समय एक घड़ी खरीदने के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था या कई महीने पहले बुकिंग करनी पड़ती थी.

अंदर लगी पुरानी तस्वीरें और क्लासिक प्रिंट विज्ञापन उस दौर की याद दिलाते हैं, जब इन घड़ियों को पहली बार पसंद किया गया था. एक पुराने विज्ञापन में एक बच्चा HMT ऑटोमैटिक घड़ी को पानी में गिराता हुआ दिखाया गया है और इसमें कहा गया है, “एक बच्चा भी साबित कर सकता है कि HMT ऑटोमैटिक कितनी अच्छी है.” एक दूसरे विज्ञापन में एक लड़का अपने पिता की कलाई पकड़े हुए है और उसमें लिखा है, “समय में किया गया निवेश… आपका बेटा इसे 15 साल बाद गर्व के साथ पहन सकता है.”

इनके सामने मशहूर “Wall of Watches” है, जो छत से फर्श तक बनी एक जगह है और इसमें लगभग हर वह मॉडल रखा गया है जिसे कभी बनाया गया था. इसमें साधारण मैकेनिकल जनता से लेकर सोलर, क्वार्ट्ज और ब्रेल एडिशन तक शामिल हैं.

ऊपर की मंज़िल पर पिंजौर फ़ैक्टरी के 1963 के उद्घाटन का फ़्रेम किया हुआ सर्टिफ़िकेट रखा है, जिस पर खुद जवाहरलाल नेहरू के साइन हैं. इसके साथ ही देश भर में ब्रांड के मैन्युफ़ैक्चरिंग हब की जानकारी देने वाले मैप भी लगे हैं. इसके आगे खास गैलरी बनी हैं, जिनमें नाज़ुक बैलेंस व्हील, माइक्रो-गियर और वे सटीक मशीनें दिखाई गई हैं, जिन्होंने कभी “देश की धड़कन” को चलाया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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