नई दिल्ली: भारत भले ही ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीद रहा है, लेकिन अमेरिका के नए प्रतिबंधों के बाद अगर तेहरान से तेल का निर्यात लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो भारत का कच्चा तेल आयात बिल बढ़ सकता है. इसकी वजह यह है कि दूसरे देशों से तेल खरीदना महंगा हो सकता है.
भारत पर तुरंत असर सीमित रहने की उम्मीद है क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों की चिंता के चलते भारतीय रिफाइनर काफी हद तक ईरान से कच्चा तेल खरीदने से दूर रहे हैं. लेकिन बड़ा खतरा अप्रत्यक्ष है. अगर ईरान से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदने वाला चीन दूसरे देशों से तेल खरीदने के लिए मजबूर होता है, तो वह उन्हीं दूसरे स्रोतों से तेल खरीदने के लिए भारत से मुकाबला कर सकता है.
व्यापार से जुड़े आंकड़ों और जानकारी देने वाली कंपनी केप्लर में ऑयल मार्केट्स और रिफाइनरी के मैनेजर सुमित रिटोलिया ने दिप्रिंट को बताया, “अगर ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन कहीं और से तेल खरीदने के लिए मजबूर होता है, तो इससे उन दूसरे स्रोतों से मिलने वाले तेल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी, जिन पर भारत निर्भर करता है. मांग में इस बदलाव से बेंचमार्क कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत का आयात बिल भी बढ़ेगा.”
अमेरिकी ट्रेजरी ने सोमवार को ईरान से जुड़े लोगों, संस्थाओं और जहाजों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया. उसने चेतावनी दी कि तेहरान के साथ कारोबार जारी रखने वाले देशों और कंपनियों पर भी सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. इन उपायों में ईरान के व्यापार से जुड़ी शिपिंग, एविएशन, टेक्नोलॉजी, सोना और डिजिटल संपत्तियों के साथ-साथ वित्तीय और दूसरी गतिविधियों को शामिल किया गया है.
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “हम दुनिया भर में ईरान के वित्तीय संबंधों पर आर्थिक हमला शुरू कर रहे हैं. हमारा उद्देश्य इस तानाशाही शासन को चलाने वाली हर आर्थिक जीवनरेखा को काटना है, जब तक कि तेहरान पूरी तरह अकेला न रह जाए.”
चीन हो सकता है कड़ी
अबू धाबी की कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया कटोना ने कहा कि भारत के लिए इन प्रतिबंधों से सीधा खतरा बहुत कम है. नियमों का पालन करने को लेकर चिंता के कारण भारतीय रिफाइनर काफी हद तक ईरान का कच्चा तेल खरीदने से दूर रहे हैं. हाल में केवल दो खेप भारत आई थीं, जिन्हें एमटी जया और एमटी फेलिसिटी जहाज अप्रैल में अमेरिका की अस्थायी छूट के तहत लेकर आए थे.
कटोना ने कहा कि तेल बाजार के लिए बड़ी चिंता नए प्रतिबंधों की घोषणा से ज्यादा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास जारी नाकेबंदी है.
अगस्त में ईरान का तेल निर्यात औसतन केवल करीब 3,00,000 बैरल प्रति दिन (bpd) रहा है. यह 2025 के 1.7 मिलियन bpd के औसत से काफी कम है. ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. उसने अब तक करीब 8,00,000 bpd का आयात जारी रखा है. चीन ऐसा उन जहाजों पर निर्भर रहकर कर रहा है, जो जून और जुलाई में समुद्री रास्ता थोड़े समय के लिए खुलने के दौरान ईरान से रवाना हुए थे.
हालांकि, यह जमा स्टॉक अब कम हो रहा है. अगस्त की शुरुआत से खाड़ी के बाहर रखे ईरानी कच्चे तेल का भंडार करीब 70 लाख बैरल घटकर 2.4 करोड़ बैरल रह गया है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीनी खरीदार बची हुई आपूर्ति का इस्तेमाल लगातार कर रहे हैं.
कटोना ने कहा, “अगर नाकेबंदी जारी रहती है, तो अक्टूबर तक चीन के पास ईरान से तेल लेने के विकल्प कम पड़ सकते हैं.” अक्टूबर के बाद चीन के पास दो विकल्प होंगे: दूसरे देशों से कच्चा तेल लेना या रिफाइनरियों में तेल का उत्पादन कम करना.
अगर चीन दूसरे देशों से तेल खरीदने जाता है, तो उपलब्ध तेल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी और इससे दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसका असर अभी से ईरानी कच्चे तेल की कीमतों में दिख रहा है. ईरान लाइट तेल की कीमत ICE Brent से करीब 4 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा चल रही है.
हालांकि, आखिर में तेल की आपूर्ति कितनी प्रभावित होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका अपने नए प्रतिबंधों को कितनी सख्ती से लागू करता है. खासकर चीन के बड़े खरीदारों और वित्तीय संस्थानों के खिलाफ अमेरिका कितनी कार्रवाई करता है, यह महत्वपूर्ण होगा. कटोना ने कहा, “अभी तक हमारे पास किसी के नाम, कोई सार्वजनिक समयसीमा और यह जानकारी नहीं है कि इसे कैसे लागू किया जाएगा.”
उन्होंने कहा कि यह कदम तुरंत बाजार को बड़ा झटका देने के बजाय बातचीत के लिए अपनाई गई रणनीति ज्यादा लगती है.
आयात बिल बड़ी चिंता
दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदने के लिए संभावित प्रतिस्पर्धा का असर भारत पर पड़ सकता है, भले ही वह ईरान से तेल आयात न करे. रिटोलिया ने कहा, “ईरान के कच्चे तेल पर भारत की सीधी निर्भरता अभी बहुत कम है, क्योंकि भारत ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीदता.”
लेकिन उन्होंने कहा कि अगर ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन दूसरे देशों से तेल खरीदने के लिए मजबूर होता है, तो इससे उन दूसरे स्रोतों से मिलने वाले तेल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी, जिन पर भारत निर्भर करता है. मांग में इस बदलाव से बेंचमार्क तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और भारत का आयात बिल बढ़ सकता है.
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 फीसदी आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से तेल आयात करने की लागत बढ़ेगी. इससे रुपये पर दबाव पड़ेगा और चालू खाते पर भी असर पड़ेगा.
भारत पर असर रूस से मिलने वाले कच्चे तेल पर उसकी मौजूदा निर्भरता के जरिए भी पड़ सकता है. हालांकि, रिटोलिया का मानना है कि ईरान पर प्रतिबंधों से रूस को बहुत ज्यादा फायदा नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि भारत को रूस से पहले ही करीब 2.0-2.5 मिलियन bpd तेल मिल रहा है, जो भारत के कुल आयात का करीब आधा है.
इसके बजाय बड़ी चिंता दुनिया के बाजार से सस्ते दाम पर मिलने वाले तेल की कमी है. ईरान से तेल की आपूर्ति में आने वाली किसी भी कमी को काफी हद तक मध्य पूर्व के तेल उत्पादकों से पूरा करना होगा. लेकिन उनके पास अतिरिक्त तेल उत्पादन की क्षमता पहले से ही सीमित है.
इसलिए, अगर अमेरिका आखिरकार सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की सिर्फ धमकी देने से आगे बढ़कर चीन के बड़े खरीदारों, रिफाइनरों या वित्तीय संस्थानों को निशाना बनाता है, तो दुनिया भर में तेल की आपूर्ति पर इसका असर बहुत ज्यादा हो सकता है.
भारत के लिए इसका मतलब होगा ज्यादा आयात बिल, महंगाई का ज्यादा दबाव और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता दबाव.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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