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Saturday, 20 June, 2026
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असम में पशु क्रूरता के मामले में मिली सजा, उजागर हुई भारत के 50 रुपये वाले बेअसर कानून की हकीकत

सोते हुए पप्पी पर चाकू से वार करने के मामले में असम के व्यक्ति को एक साल की सजा मिली है. जानवर लहूलुहान होकर मर गया. उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम के तहत रिहा कर दिया गया.

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नई दिल्ली: 23 जून 2025 की दोपहर को असम के कोकराझार जिले के पटगांव में बाबूराम मुर्मू नाम का एक व्यक्ति सड़क किनारे सो रहे एक पप्पी के पास गया और चाकू से उस छोटे जानवर के अगले पैर को काट दिया. रात तक ज्यादा खून बहने की वजह से पप्पी की मौत हो गई.

इस साल 12 जून को एक मजिस्ट्रेट ने मुर्मू को जानवरों के साथ क्रूरता और एक जानवर की हत्या का दोषी ठहराया, लेकिन उसे जेल भेजने के बजाय प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 के तहत रिहा करने का आदेश दिया. यह कानून अदालतों को पहली बार अपराध करने वाले या छोटे अपराध करने वालों को सजा देने के बजाय अच्छे व्यवहार की शर्त पर या चेतावनी देकर छोड़ने की अनुमति देता है.

मुर्मू को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया और वह आज भी आजाद है. पिछले साल एक अनाम पप्पी के साथ हुई यह बेरहम क्रूरता अब लगभग लोगों की यादों से भी मिट चुकी है.

यह मामला और इसका नतीजा भारत के पशु संरक्षण कानून की कहानी को दिखाता है. जानवरों के साथ क्रूरता भले ही साफ और बेहद भयानक हो, और पुलिस व अदालतें कार्रवाई करने को तैयार हों, लेकिन देश का कानून ऐसी सजा की अनुमति नहीं देता जो किए गए नुकसान के अनुपात में हो.

असम का यह मामला कोई कानूनी अपवाद नहीं है. यह ऐसे कानूनी ढांचे के बीच मौजूद है जो बदलाव के दौर से गुजर रहा है. प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट (पीसीए एक्ट), 1960 की लगातार बनी कमजोरी, आवारा कुत्तों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के उतार-चढ़ाव भरे मामलों और जनता के लगातार गुस्से ने मिलकर भारत के पशु कल्याण के हालात, या उसकी कमी, को अभूतपूर्व चुनौती दी है.

असम का मामला

हालांकि इसके अंतिम नतीजे पर कई लोगों ने सवाल उठाए हैं, लेकिन यह मामला उम्मीद की एक किरण भी दिखाता है. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जानवरों के साथ क्रूरता के मामलों में मुकदमे बहुत कम होते हैं और दोषसिद्धि तो उससे भी कम होती है. पटगांव में असम पुलिस के वरिष्ठ निरीक्षक अमीरुल हुसैन ने एफआईआर दर्ज की, जांच की और अपराध के एक हफ्ते के भीतर चार्जशीट दाखिल कर दी.

दिप्रिंट से बात करते हुए इस मामले के जांच अधिकारी एसआई हुसैन ने कहा कि जानवरों के साथ क्रूरता गैरकानूनी और अस्वीकार्य है क्योंकि “सभी जीव समान हैं.” उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर घायल और बाद में मर चुके पप्पी का वीडियो देखकर वह भावनात्मक रूप से परेशान हो गए थे.

हुसैन ने कहा कि उनके वरिष्ठ अधिकारियों, खासकर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पुष्पराज सिंह ने उन्हें इस मामले में आपराधिक केस दर्ज करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि पटगांव के लोग अपने जानवरों की बहुत परवाह करते हैं. उन्होंने कहा कि प्रोबेशन पर रिहा होने के बावजूद “दोषसिद्धि, दोषसिद्धि ही होती है.” इससे अपराधी को बदलने का मौका मिलता है और भविष्य में ऐसे अपराध करने वालों के लिए यह एक चेतावनी भी है.

सिर्फ इतना ही नहीं. छह गवाहों ने अभियोजन पक्ष को बिना किसी उचित संदेह के अपराध साबित करने में मदद की. सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट बेगम नजीरा अहमद ने चार्जशीट दाखिल होने के एक साल के भीतर फैसला सुना दिया. सजा सुनाते हुए जस्टिस ने कहा, “उसके व्यवहार, अपराध की प्रकृति और इस तथ्य को देखते हुए कि उसकी एक नाबालिग बेटी है जो पूरी तरह उस पर निर्भर है, मेरी राय में यह ऐसा मामला है जिसमें आरोपी को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ दिया जाना चाहिए.” दोषी व्यक्ति को जेल नहीं भेजा गया, लेकिन इस हिंसक हत्या को स्वीकार किया गया और रिकॉर्ड में दर्ज किया गया.

पुराना कानून, अटका हुआ संशोधन

पीसीए एक्ट 1960 में लागू होने के समय एक ऐतिहासिक कानून था. यह भारत का पहला पशु कल्याण कानून था और इसका उद्देश्य जानवरों को अनावश्यक दर्द और पीड़ा से बचाना था.

पीसीए एक्ट की धारा 11 कई तरह की प्रताड़ना को अपराध मानती है, जिनमें मारना, लात मारना, जरूरत से ज्यादा बोझ लादना, यातना देना, जहर देना और जानवरों के साथ ऐसा व्यवहार करना शामिल है जिससे उन्हें अनावश्यक दर्द या पीड़ा हो. इस कानून ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के लिए भी एक कानूनी ढांचा बनाया.

समस्या यह है कि इस कानून की मुख्य सजा व्यवस्था 60 साल बाद भी लगभग वैसी ही बनी हुई है. इसमें बेहद कमजोर सजा का प्रावधान है. पहली बार अपराध करने पर अधिकतम 50 रुपये का जुर्माना और कुछ मामलों में तीन साल के भीतर दोबारा अपराध करने पर 25 से 100 रुपये तक का जुर्माना और तीन महीने तक की जेल हो सकती है.

ये जुर्माने तब से नहीं बदले हैं जब यह कानून लागू हुआ था. असंगत तरीके से कानून लागू होने और सजा को लेकर अनिश्चितता के साथ मिलकर देखा जाए तो यह मुख्य पशु-क्रूरता विरोधी कानून लगभग बेअसर हो गया है.

जानवरों के खिलाफ क्रूरता पर सख्त कानून बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है. हाल ही में “इंडिया यूनाइट्स फॉर एनिमल राइट्स” जैसी रैलियों में हजारों लोग शामिल हुए. पशु अधिकार कार्यकर्ता “नो मोर 50” के नारे के साथ एकजुट हुए हैं. इस नारे के जरिए यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि जानवरों के खिलाफ हिंसा के जवाब में सिर्फ 50 रुपये की सजा देना कितना बेतुका है.

पीपल फॉर एनिमल्स की ट्रस्टी और पशु अधिकार कार्यकर्ता अंबिका शुक्ला इस आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं. दिप्रिंट से बातचीत में उन्होंने कहा, “1960 में, जब नया देश कई समस्याओं से जूझ रहा था, तब हमारे पूर्वज पशुओं के साथ क्रूरता के मुद्दे पर इतने दूरदर्शी थे कि उन्होंने इससे निपटने के लिए एक व्यापक कानून को प्राथमिकता दी. इसके बाद की सरकारों का इसे अपडेट न करना जानबूझकर किया गया और माफ नहीं किया जा सकता.”

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की सदस्य और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित अंजलि गोपालन भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से सहमत हैं. उन्होंने कहा, “क्रूरता की सजा 50 रुपये है. हम किस दुनिया में रह रहे हैं?”

सालों से सांसदों, अभिनेताओं, खिलाड़ियों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और आम लोगों की ओर से पीसीए एक्ट को मजबूत बनाने और उसमें बदलाव करने की मांग की जाती रही है.

नवंबर 2022 में मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने जन सुझावों के लिए प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स (संशोधन) विधेयक, 2022 का मसौदा जारी किया था. इसमें 61 संशोधन प्रस्तावित थे. इनमें “भीषण क्रूरता” की परिभाषा तय करना, पशुओं के साथ यौन संबंध को गंभीर अपराध बनाना, क्रूरता पर सजा बढ़ाना और जानवरों की “पांच स्वतंत्रताओं” से जुड़े कर्तव्यों को मान्यता देना शामिल था.

3 फरवरी 2026 को संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मंत्रालय ने पुष्टि की कि प्रस्तावित विधेयक अभी भी “विचाराधीन” है और अब तक संसद में पेश नहीं किया गया है.

नया कानून ज्यादा मजबूत, लेकिन अधूरा

भारत का नया आपराधिक कानून, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), कम से कम एक मामले में स्थिति को बेहतर बनाता है. बीएनएस की धारा 325 किसी जानवर को मारने, जहर देने, घायल करने या बेकार बना देने को अपराध मानती है और इसके लिए पांच साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रावधान पुराने भारतीय दंड संहिता के मुकाबले ज्यादा व्यापक है क्योंकि यह जानवर की “बाजार कीमत” से जुड़ा नहीं है. इसलिए यह गाय, कुत्ते और बिल्ली जैसे आवारा जानवरों पर भी लागू हो सकता है.

गोपालन मानती हैं कि धारा 325 एक बड़ा सुधार है, लेकिन उनका कहना है कि इसके साथ-साथ पीसीए एक्ट को भी मजबूत करना जरूरी है. उन्होंने कहा, “मैं यह नहीं कह रही कि कुछ भी काम नहीं कर रहा, लेकिन समस्या तब है जब आप पुराने पीसीए कानून को नहीं बदलते, क्योंकि बहुत सी चीजें अब भी इसी कानून पर आधारित हैं.” उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार पीसीए एक्ट में संशोधन की जरूरत पर बात कर चुका है.

वकील दिव्यम खेड़ा का कहना है कि बीएनएस जानवर को मारने या घायल करने पर पीसीए एक्ट की तुलना में ज्यादा सख्त सजा देता है, लेकिन नए कानून में जानवरों के साथ यौन संबंध या यौन उत्पीड़न के मामलों में मुकदमा चलाने का कोई प्रावधान नहीं है.

भारतीय दंड संहिता की जगह जुलाई 2024 में लागू हुई भारतीय न्याय संहिता में पशुओं के साथ यौन संबंध को अलग अपराध के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है, जिससे एक बड़ा कानूनी खालीपन पैदा हो गया है. आईपीसी में धारा 377 “प्रकृति के विरुद्ध यौन संबंध” को अपराध मानती थी, चाहे वह किसी पुरुष, महिला या जानवर के साथ हो, और इसी धारा का इस्तेमाल पशुओं के साथ यौन संबंध के मामलों में किया जाता था.

उन्होंने कहा, “जानवर के साथ बलात्कार को प्रभावी रूप से अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है.” उन्होंने सोशल मीडिया पर गायों, कुत्तों और अन्य जानवरों के यौन उत्पीड़न के “घिनौने वीडियो” का जिक्र किया. खेड़ा के अनुभव में पुलिस भी इस बात को लेकर असमंजस में है कि अब ऐसे अपराध में कौन-सी धाराएं लगाई जाएं.

हाल ही में ऐसे ही एक मामले की शिकायत दर्ज कराने का अपना अनुभव बताते हुए खेड़ा ने कहा, “पुलिस ने मुझसे पहला सवाल यही पूछा कि एफआईआर किस कानून के तहत दर्ज करें?” उन्होंने आगे कहा, “हम असली अपराध को कवर करने वाले सीधे कानून के अभाव में दूसरे पूरक कानूनों का सहारा लेने को मजबूर हैं.”

न्यायिक मानक

सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51ए(जी) का समर्थन करता रहा है, जो हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह सभी जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखे.

सुप्रीम कोर्ट ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम ए. नागराजा (2014) मामले में जानवरों की पांच स्वतंत्रताओं को मान्यता दी थी. इनमें भूख, प्यास और कुपोषण से मुक्ति, डर और तनाव से मुक्ति, शारीरिक और ताप संबंधी असुविधा से मुक्ति, दर्द, चोट और बीमारी से मुक्ति, और अपने सामान्य व्यवहार को व्यक्त करने की स्वतंत्रता शामिल है.

अदालत ने कहा था कि पीसीए एक्ट जानवरों को कानूनी अधिकार देता है, लेकिन व्यंग्यात्मक अंदाज में यह भी कहा कि “उन अधिकारों के उल्लंघन पर मिलने वाली सजा बहुत मामूली है, क्योंकि कानून इंसानों द्वारा बनाए जाते हैं.” यह उन कई मामलों में से एक था, जिनमें अदालत ने सरकार से पीसीए एक्ट को मजबूत बनाने की अपील की थी.

In the 2023 Jallikattu review, Supreme Court cautioned that it was not within its powers to extend Article 21 to animals as direct bearers of fundamental rights, while continuing to recognise the legal importance of minimising pain and suffering | ANI file photo
2023 में जल्लीकट्टू मामले की समीक्षा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जानवरों को मौलिक अधिकारों का सीधा हकदार मानते हुए अनुच्छेद 21 का दायरा उन तक बढ़ाना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, हालांकि कोर्ट ने दर्द और तकलीफ को कम करने के कानूनी महत्व को भी माना | ANI फ़ाइल फ़ोटो

जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष की दो-जजों की बेंच ने कहा, “पैरेंस पैट्रिए के सिद्धांत के तहत अदालत का भी कर्तव्य है कि वह जानवरों के अधिकारों की रक्षा करे, क्योंकि वे इंसानों की तरह अपना ख्याल खुद नहीं रख सकते.” पैरेंस पैट्रिए लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है ‘देश का अभिभावक’. इसका मतलब उन लोगों के संरक्षक के रूप में अदालत की जिम्मेदारी से है, जो खुद अपनी बात नहीं कह सकते.

2023 में जल्लीकट्टू की समीक्षा के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि उसके अधिकार क्षेत्र में यह नहीं है कि वह जानवरों को सीधे मौलिक अधिकारों के धारक के रूप में अनुच्छेद 21 का लाभ दे. हालांकि अदालत ने यह भी माना कि दर्द और पीड़ा को कम करना कानूनी रूप से अहम है.

Elephant Raman decked up for a temple festival in Palakkad district of Kerala. | Photo: Hareesh Poomarathil, Facebook/Techikottukavu Ramachandran
केरल के पलक्कड़ जिले में एक मंदिर उत्सव के लिए हाथी रमन को सजाया गया | फोटो: हरीश पूमराथिल, फेसबुक/टेकिकोट्टुकवु रामचंद्रन

सबसे हाल में, जून 2026 में केरल के हाथी रमन के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा, “हम मूक दर्शक नहीं बने रह सकते, खासकर उन बेजुबान जानवरों के मामलों में, जिनका कल्याण भी बेहद महत्वपूर्ण है.”

अपवाद

सड़क के कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान लेना उसके पहले के पशु कल्याण संबंधी फैसलों से अलग था और इससे आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर बहस और तेज हो गई.

दो-जजों की बेंच ने अगस्त 2025 में अपने शुरुआती आदेश में दिल्ली के सभी आवारा कुत्तों को स्थायी रूप से हटाने का निर्देश दिया था. देशभर में विरोध प्रदर्शन होने के बाद उसी महीने तीन-जजों की बेंच ने इस आदेश में बदलाव किया और इसे “बहुत कठोर” बताया. नवंबर 2025 में आए तीसरे आदेश में ‘संस्थागत क्षेत्रों’ से कुत्तों को स्थायी रूप से हटाने का निर्देश दिया गया.

इस आदेश के खिलाफ भी विरोध हुआ. लोगों ने ढांचागत सुविधाओं और बजट की कमी के साथ-साथ पशु क्रूरता और कुत्तों को हटाने की अप्रभावी व्यवस्था जैसे बड़े मुद्दे उठाए. इसके बाद अदालत ने लंबी बहस सुनी और जनवरी 2026 में फैसला सुरक्षित रख लिया. मई 2026 में अदालत ने नवंबर वाले अपने आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया.

गोपालन इस आदेश को “काफी अविश्वसनीय” बताती हैं और कहती हैं कि अदालत अपने ही पुराने फैसलों के खिलाफ चली गई है. वह इसकी अव्यावहारिकता, संसाधनों की कमी और विशेषज्ञों की राय न लेने की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, “उन लोगों से बिल्कुल भी चर्चा नहीं हुई जो बहुत अच्छे सुझाव दे सकते थे. इस देश में लोग कई वर्षों से खुद जानवरों की देखभाल कर रहे हैं और उन्होंने अपना जीवन इसके लिए समर्पित कर दिया है. उनके अनुभवों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है.”

शुक्ला भी इससे सहमत हैं. पिछले पशु कल्याण मामलों में लंबी विचार-विमर्श प्रक्रिया का जिक्र करते हुए वह कहती हैं, “इस मामले में हमने देखा कि सुप्रीम कोर्ट कुछ ही महीनों में बार-बार अपना रुख बदलता रहा.” वह अदालत के आदेश में मीडिया रिपोर्टों पर अत्यधिक निर्भरता पर भी सवाल उठाती हैं. उनका कहना है कि अदालत ने फैसले के एक फुटनोट में ‘डोगेश भाई का आतंक’ नाम के एक वायरल मीम लेख का हवाला दिया. शुक्ला कहती हैं, “कोई भी न्यायपालिका सिर्फ मीडिया रिपोर्टों पर बिना पुष्ट सबूत के भरोसा नहीं करती.”

यह स्वत: संज्ञान की कार्यवाही टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के आधार पर शुरू हुई थी. दिलचस्प बात यह है कि सबरीमला संदर्भ मामले में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने खुद समाचार रिपोर्टों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में मामलों को स्वीकार करने की परंपरा पर सवाल उठाया था.

A January protest in Lucknow against a Supreme Court order on stray dogs. The apex court’s suo motu intervention in the matter marks a departure from its animal welfare precedents | ANI file photo
लखनऊ में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ़ जनवरी में हुआ एक विरोध प्रदर्शन. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का खुद संज्ञान लेना, जानवरों के कल्याण से जुड़े उसके पुराने फैसलों से हटकर एक अलग कदम है | ANI फ़ाइल फ़ोटो

एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) नियम, 2023 इस समय आवारा कुत्तों की आबादी के मानवीय प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय ढांचा हैं, जिन्हें संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने मंजूरी दी है. एबीसी नियम आवारा जानवरों के प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते हैं और नसबंदी, टीकाकरण तथा कुत्तों को उनके मूल स्थान पर वापस छोड़ने की व्यवस्था पर आधारित हैं. ये नियम किसी भी कुत्ते को पकड़ने के लिए ‘मानवीय तरीकों’ को अनिवार्य बनाते हैं और मनमाने तरीके से उन्हें कहीं और ले जाने पर रोक लगाते हैं.

मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल ने 22 जुलाई 2025 को लोकसभा में लिखित जवाब में बताया था कि वर्ष 2024 में रेबीज से संदिग्ध मानव मौतों की संख्या 54 रही, जबकि 2007 में यह संख्या 20,000 थी. विशेषज्ञ इस बड़ी गिरावट को एबीसी नियमों की प्रभावशीलता का प्रमाण मानते हैं.

शुक्ला पूछती हैं, “आखिर ऐसा कौन-सा जन स्वास्थ्य संकट है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े और इतने कठोर कदम उठाने पड़ें?”

हिंसा, हिंसा को जन्म देती है

स्वत: संज्ञान की कार्यवाही के बाद हुई तीखी और भावनात्मक बहसों के मानवीय परिणाम भी सामने आए हैं. कई रिपोर्टों में पशुओं को खाना खिलाने वाले लोगों और उनकी देखभाल करने वालों पर हमले की घटनाएं सामने आई हैं. कई बार अदालत के आदेश को गलत तरीके से समझकर या गलत ढंग से पेश करके ऐसे हमलों का बचाव भी किया गया.

गोपालन हिंसा के इस लगातार चलते चक्र पर दुख जताते हुए कहती हैं, “एक संस्कृति के रूप में, एक समाज के रूप में… हमने परवाह करना ही छोड़ दिया है… चाहे जानवर हों, महिलाएं हों या बच्चे, देखिए हम सबके साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं.”

2025 और 2026 के दौरान मीडिया रिपोर्टों में बार-बार यह आरोप सामने आया कि पशुओं को खाना खिलाने वाले, बचाने वाले और पशु कल्याण कार्यकर्ताओं को धमकाया गया, उन पर हमला किया गया या उन्हें परेशान किया गया. अक्सर ऐसा करने वाले लोग आवारा कुत्तों वाले मुकदमे का हवाला देते थे. जब जनवरी 2026 में मामले की सुनवाई कर रही पीठ को ऐसी घटनाओं की जानकारी दी गई, तो उसने प्रभावित लोगों को एफआईआर दर्ज कराने और आपराधिक कानून का सहारा लेने की सलाह दी.

शुक्ला मीडिया के कुछ हिस्सों की डर फैलाने वाली रिपोर्टिंग की भी आलोचना करती हैं. उनका कहना है, “गुर्राते, नुकीले दांत दिखाते और डरावनी तस्वीरों वाले कुत्तों की तस्वीरें बार-बार दिखाई जाती हैं, जब तक कि लोग यह मानने न लगें कि दुनिया में कुत्तों का कोई और काम ही नहीं है, वे सिर्फ लोगों और उनके बच्चों को काटने का इंतजार कर रहे हैं.”

वह कहती हैं, “हर दिन कुत्तों के सिर काटे जा रहे हैं, उन्हें मारा जा रहा है, फांसी दी जा रही है, जहर दिया जा रहा है, कहीं और ले जाया जा रहा है, डुबोया जा रहा है और पीटा जा रहा है.” वह आगे कहती हैं कि यह हिंसा उन लोगों तक भी पहुंच रही है “जिन्होंने रेबीज से मौतों की संख्या 20,000 से घटाकर 54 तक पहुंचाने में वर्षों लगाए हैं.”

वह आगे कहती हैं, “जो लोग हमेशा सही पक्ष में रहे, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी इनाम या पहचान की उम्मीद के काम किया… वही लोग आज दोषी ठहराए जा रहे हैं, पीटे जा रहे हैं, गालियां दी जा रही हैं और बदनाम किए जा रहे हैं, जबकि उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है.”

अपराध विज्ञान और फॉरेंसिक मनोचिकित्सा के बड़े हिस्से में जानवरों के साथ क्रूरता को अलग-थलग अपराध नहीं माना जाता, बल्कि इसे व्यापक हिंसक और असामाजिक प्रवृत्तियों का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है. 1985 से ही कई अध्ययन यह दिखाते हैं कि जानवरों के साथ दुर्व्यवहार आगे चलकर लोगों के खिलाफ हिंसा, घरेलू हिंसा, बच्चों और बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार तथा अन्य हिंसक अपराधों से जुड़ा होता है. जानवरों के साथ क्रूरता को संवेदनहीनता, कम सहानुभूति और मनोविकृति जैसी प्रवृत्तियों से भी जोड़ा गया है.

कानून लागू करने वाली एजेंसियां भी इस संबंध को गंभीरता से लेती हैं. अमेरिकी संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) 1980 के दशक के मध्य से सीरियल किलर की प्रोफाइल तैयार करते समय जानवरों के साथ पिछले दुर्व्यवहार को ध्यान में रखता रहा है. 2016 में उसने अपने नेशनल इंसिडेंट-बेस्ड रिपोर्टिंग सिस्टम में इसे ‘समाज के खिलाफ अपराध’ के रूप में एक अलग अपराध श्रेणी के तौर पर दर्ज करना शुरू किया. एफबीआई की सीरियल किलर प्रोफाइलिंग पद्धति विकसित करने वाले रॉबर्ट रेस्लर का यह कथन अक्सर उद्धृत किया जाता है कि हत्यारे अक्सर शुरुआत जानवरों को मारने और यातना देने से करते हैं.

भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने 2026 में पहली बार पशु क्रूरता से जुड़े अलग आंकड़े जारी किए. वकील खेड़ा इसे “बहुत स्वागत योग्य कदम” बताते हैं. शुक्ला भी इससे सहमत हैं और इसे “सकारात्मक बदलाव” कहती हैं, लेकिन “बहुत कम रिपोर्टिंग” के प्रति सावधान भी करती हैं. उनका कहना है कि क्रूरता का स्तर “विस्फोटक रूप से बढ़ गया है” और रूपक के तौर पर कहें तो “बांध में लगी न्यायिक उंगली हटा दी गई है.”

भारत के इतिहास में पहली बार अब पशु क्रूरता का राष्ट्रीय आंकड़ा है. 2024 में ऐसे 9,039 मामले दर्ज हुए. लेकिन अभी भी देश के पास ऐसा कानून नहीं है, जो इन मामलों पर कोई सार्थक कार्रवाई कर सके.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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