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Saturday, 20 June, 2026
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समाजवाद दुनिया भर में नाकाम रहा, भारत में भी उसका भविष्य नहीं है: एमआर पाई

1970 में एमआर पाई ने लिखा कि जो लोग स्वतंत्रता और राष्ट्रीय महानता में विश्वास रखते हैं, उनका कर्तव्य है कि वे उभरते हुए अधिनायकवाद के विरुद्ध संघर्ष करें. क्योंकि समाजवाद वास्तव में विनाश का मार्ग है.

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आज भारत में समाजवाद उतना ही फैशनेबल है जितने शहरों में साइडबर्न और तंग पैंट. समाजवाद का दावा करने वाले राजनेता एक-दूसरे से आगे निकलने की जो होड़ लगाए हुए हैं, उससे यह सिद्ध नहीं होता कि समाजवाद भारत के लिए अच्छा है, और न ही यह कि वह स्थायी सिद्ध होगा. भारतीय लोकतंत्र के एक नागरिक के रूप में मैं मुख्यतः चार कारणों से समाजवाद का विरोध करता हूँ.

पहला, समाजवाद हमारी गरीबी की समस्या का समाधान नहीं कर सकता. समाजवाद के रास्ते पर चलकर भारत गरीबी से निकलकर निर्धनता की और भी गहरी खाई में जा पहुंचेगा. दूसरा, यह व्यक्ति की स्वतंत्रताओं को नष्ट कर देगा. समाजवादी नीतियों के दबाव में हमारा लोकतांत्रिक संविधान धीरे-धीरे बिखर जाएगा. तीसरा, समाजवाद शासकों और शासितों के बीच चौंका देने वाली असमानताएँ पैदा करेगा और देश को सामाजिक न्याय के मार्ग से दूर ले जाएगा. अंततः, यह भारत की महानता के मार्ग में बाधा बनेगा और उसकी श्रेष्ठ परंपराओं को नष्ट कर देगा.

चूंकि स्वयं समाजवादियों के बीच भी इस बात को लेकर काफी भ्रम है कि समाजवाद वास्तव में है क्या, इसलिए पहले इसकी परिभाषा स्पष्ट कर लेना उचित होगा. व्यापक रूप से देखें तो समाजवाद का उद्देश्य एक स्वतंत्र और समान समाज की स्थापना करना है. यही लक्ष्य अनेक अन्य विचारधाराओं और गैर-समाजवादियों का भी है. असली अंतर समाजवाद की कार्यपद्धति में है. यह कार्यपद्धति दो आधारों पर टिकी है—(क) राज्य द्वारा आर्थिक गतिविधियों का केंद्रीकृत नियोजन, और (ख) उत्पादन, वितरण तथा विनिमय के साधनों पर राज्य का स्वामित्व. यह पद्धति अन्य देशों में असफल सिद्ध हो चुकी है. भारत में भी यह सफल नहीं होगी.

आर्थिक मामलों में केंद्रीकृत नियोजन का विरोध प्रायः हर प्रकार की योजना या राज्य के हर प्रकार के हस्तक्षेप के विरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. इसे मुक्त बाजार की अंध-समर्थक नीति कहकर खारिज कर दिया जाता है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. आधुनिक राज्य को अपने कर्तव्यों और दायित्वों की योजना बनानी ही पड़ती है. उदाहरण के लिए—देश की सीमाओं और स्वतंत्रता की रक्षा; कानून और व्यवस्था बनाए रखना; ऐसी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना जिन्हें नागरिक स्वयं नहीं दे सकते, जैसे ईमानदार और सक्षम प्रशासन, सड़कें, बंदरगाह आदि; पीने का पानी, सार्वजनिक स्वच्छता और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं; निजी उद्यमों का नियमन; स्थिर मुद्रा; तथा आर्थिक लेन-देन के लिए आवश्यक संस्थागत और कानूनी ढांचा—ये सभी आधुनिक राज्य की जिम्मेदारियाँ हैं. इनके लिए योजना बनाना और उन्हें उपलब्ध कराना आवश्यक है.

लेकिन इन बुनियादी कार्यों पर ध्यान देने के बजाय, केंद्रीकृत नियोजन का अर्थ धीरे-धीरे महंगे इस्पात संयंत्रों, अक्षम सरकारी उद्योगों और बीमा, हवाई परिवहन तथा बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में एकाधिकारों या लगभग एकाधिकारों के जाल से जोड़ दिया गया है, जो नागरिकों की आर्थिक गतिविधियों और तीव्र आर्थिक विकास में बाधा डालते हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से राज्य स्वामित्व और निजी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की धारणा अब उन देशों के समाजवादियों को भी स्वीकार्य नहीं रही जहां लंबे समय तक समाजवादी सरकारें रही हैं, जैसे स्वीडन और ब्रिटेन. स्वीडन में अर्थव्यवस्था का 90 प्रतिशत से अधिक भाग निजी उद्यमों के हाथों में है, जबकि वहां लगभग चालीस वर्षों तक समाजवादी शासन रहा. अधिकांश यूरोपीय समाजवादियों ने अनुभव से जाना है कि राज्य स्वामित्व अर्थव्यवस्था को समृद्धि का स्वर्ग नहीं बना देता. सरकारी उद्योगों में तकनीकी और प्रबंधकीय समस्याएं बनी रहती हैं. उत्पादन और उत्पादकता—जो सभी के बेहतर जीवन का आधार हैं—अक्सर तेजी से गिरने लगते हैं. यदि सार्वजनिक क्षेत्र पर संसदीय नियंत्रण को प्रभावी बनाने की कोशिश की जाए तो दक्षता घटती है. और यदि दक्षता के नाम पर स्वायत्तता दी जाए तो सार्वजनिक क्षेत्र का नौकरशाही तंत्र जवाबदेही के बिना शक्ति का उपभोग करने लगता है. धीरे-धीरे व्यक्तिगत स्वतंत्रताएँ, यहाँ तक कि कर्मचारियों के ट्रेड यूनियन अधिकार भी समाप्त होने लगते हैं.

हमारी सबसे बड़ी आर्थिक समस्या गरीबी है. इसका त्वरित समाधान तभी संभव है जब जनता की रचनात्मक ऊर्जा को मुक्त किया जाए. इसका उत्तर राज्यवाद नहीं, बल्कि स्वतंत्रता है. भारत के समाजवादियों ने गरीबी में वही स्वार्थ विकसित कर लिया है जो साम्यवादियों ने अव्यवस्था और अराजकता में विकसित किया है. दोनों की दवा गरीबी को समाप्त नहीं करेगी; वह गरीबी के अत्याचार के साथ सत्ता के अत्याचार को भी जोड़ देगी.

इसके अतिरिक्त, समाजवाद भारत को गरीबी से उठाकर निर्धनता की गहराइयों में ले जाएगा क्योंकि यह दुर्लभ संसाधनों की भारी बर्बादी करता है. सार्वजनिक क्षेत्र की लगातार हानियों और सीमित संसाधनों को पूंजी-प्रधान तथा कम रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों में झोंकने की प्रवृत्ति भारतीय गरीबी को और बढ़ाएगी. इसी राज्यवाद के अन्य परिणाम खाद्यान्न संकट और मुद्रास्फीति हैं—जो निश्चित आय वाले मेहनतकश वर्गों पर एक निर्दयी कर के समान हैं. इनमें से कोई भी गरीबी मिटाने या सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में सहायक नहीं है.

यदि पिछले पंद्रह वर्षों की समाजवादी आर्थिक नीतियों के झटकों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था और समाज जीवित रह पाए हैं, तो इसका कारण यह है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मौद्रीकरण की प्रक्रिया से बाहर रहा है और इसलिए सरकारी आर्थिक नीतियों की अनेक विकृतियों से बचा हुआ है. दूसरा कारण जनता की वह अद्भुत क्षमता है जिसके बल पर वह शासकों द्वारा समाजवाद के नाम पर थोपे गए अव्यावहारिक कानूनों को दरकिनार करने के रास्ते खोज लेती है. एक किसान से जुड़ी पुरानी कहावत है—“जो मैं आज खाता हूं वह मेरा है; जो मैं कल के लिए बचाकर रखता हूँ वह राजा का हो जाता है.”

किसी ने समाजवाद को सर्वसत्तावाद की ओर जाने वाला पुल कहा है. समाजवादी भाषणों में स्वतंत्रता के सबसे बड़े समर्थक दिखाई देते हैं, लेकिन उनके कार्य स्वतंत्रता को नष्ट करते हैं. इस प्रकार वे सर्वसत्तावाद का मार्ग प्रशस्त करते हैं. जैसे-जैसे राज्य का स्वामित्व और अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण बढ़ेगा, ट्रॉट्स्की की चेतावनी सच साबित होगी—पहले नियम यह था कि जो काम नहीं करेगा, वह खाएगा नहीं; अब नियम यह होगा कि जो आज्ञा का पालन नहीं करेगा, वह खाएगा नहीं.

प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे, संपत्ति के अधिकार पर आक्रमण, उद्योग और व्यापार पर बढ़ता नियंत्रण, पवित्र संविदात्मक दायित्वों की अवहेलना, ऑल इंडिया रेडियो और सरकारी मशीनरी का व्यक्तिगत तथा गुटीय हितों के लिए दुरुपयोग, “प्रतिबद्ध नौकरशाही” की मांग—जिसके बाद “प्रतिबद्ध सशस्त्र बलों” की मांग भी उठेगी—ये सब एक पूर्ण समाजवादी राज्य की दिशा में बढ़ते कदम हैं.

यह बात बहुत कम समझी जाती है कि समाजवाद केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं का ही शत्रु नहीं है—यद्यपि समाजवादी शासकों में सभी को नियंत्रित करने की अदम्य इच्छा होती है, स्वयं को छोड़कर—बल्कि यह विशेष रूप से किसानों, मध्यवर्ग और सामान्य नागरिक के भी विरुद्ध है. इसका कारण यह है कि राज्य स्वामित्व स्वभावतः विशाल संरचनाओं को जन्म देता है, क्योंकि बड़े ढाँचे शासकों के लिए जनता को नियंत्रित करना आसान बना देते हैं.

समाजवादी हमेशा सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन जिन नीतियों को वे लागू करते हैं वे सामाजिक न्याय को नष्ट करती हैं. उदाहरण के लिए समानता को ही लें. आय और संपत्ति की पूर्ण समानता एक मृगतृष्णा है, जिसे केवल ठहरे हुए समाज या गुलामों की बस्ती में ही पाया जा सकता है. वास्तविक समानता का अर्थ है कानून के समक्ष समानता. समाजवादी राज्य में यही नष्ट हो जाती है.

शासक और शासित दो अलग-अलग वर्गों में बंट जाते हैं. कानून एक ही रहता है, लेकिन उसका प्रयोग दो अलग-अलग मानकों से किया जाता है. जो समाजवादी आय की समानता और आय की अधिकतम सीमा की बात करते हैं, वही सार्वजनिक धन से मिलने वाली भारी सुविधाओं का आनंद लेने में कोई संकोच नहीं करते. ऐसे केंद्रीय मंत्री जो नाममात्र का वेतन लेते हैं लेकिन उससे कई गुना अधिक मूल्य की सुविधाएँ भोगते हैं, इस ढोंग के स्पष्ट उदाहरण हैं. विधायक भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं. समाजवाद के अंतर्गत पेशेवर राजनेता सुविधाभोगी समाज का निर्माण करते हैं और कानून के समक्ष समानता को समाप्त कर देते हैं.

समानता एक और तरीके से नष्ट होती है. सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती हुई विशाल सेना को राजनीतिक शक्ति तक पहुंच से वंचित रखा जाता है. नागरिकों के लिए निर्णय लेने का क्षेत्र लगातार सिमटता जाता है और निर्णय लेने की शक्ति कुछ राजनीतिक हाथों में केंद्रित हो जाती है.

सामाजिक अन्याय को एक और रूप में स्थायी बना दिया जाता है. आय की समानता और अधिकतम सीमा के नाम पर योग्य और अयोग्य दोनों को लगभग समान पुरस्कार मिलने लगते हैं. पचास वर्षों के कटु अनुभव के बाद सोवियत व्यवस्था स्वयं आय के अंतर की आवश्यकता को समझने लगी. जैसा कि सोवियत अर्थशास्त्री प्रोफेसर अलेक्जेंडर बिरमान ने पूछा था—“आलसी व्यक्ति को कुशल और मेहनती श्रमिक के बराबर वेतन क्यों मिलना चाहिए?”

समाजवाद ने भारतीय समाज में वर्ग संघर्ष का विष घोल दिया है. बड़े व्यवसाय को छोटे व्यवसाय के विरुद्ध, व्यापारियों को जनता के विरुद्ध, शहरी मजदूरों को किसानों के विरुद्ध, भूमिहीन मजदूरों को कृषकों के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है. लोगों को अवसरों का विस्तार करने और समझदारी के पुल बनाने के बजाय एक-दूसरे से घृणा करना सिखाया जा रहा है. पेशेवर राजनेता शायद यह नहीं समझते कि शांत समाज में नफरत की आग लगाने के क्या परिणाम हो सकते हैं. जब समाजवाद के प्रति मोहभंग का समय आएगा—और वह अवश्य आएगा—तब जनता के उसी क्रोध से इन राजनेताओं को कोई नहीं बचा सकेगा जिसे उन्होंने स्वयं वर्षों तक पोषित किया है.

इन सभी प्रवृत्तियों का संयुक्त परिणाम यह होता है कि औसतपन को पुरस्कार मिलता है और उत्कृष्टता का ह्रास होता है. क्या यह आश्चर्य की बात है कि समाजवादी नीतियों के विस्तार के साथ अधिकाधिक लोग इस देश को छोड़कर जा रहे हैं, जिसे आज हम ‘ब्रेन ड्रेन’ के नाम से जानते हैं? कितने समाजवादी नेता स्वयं स्थायी रूप से इस देश को छोड़कर गए हैं? निश्चित ही कोई नहीं, जब तक कि वे भारतीय जनता के स्वयंभू दामाद बनकर आराम से जीवन बिता सकते हैं.

भारत जैसा विशाल प्राकृतिक संसाधनों और प्रतिभाशाली लोगों वाला, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देश एक महान शक्ति बनने के लिए नियत है. समाजवाद उस महान लक्ष्य की शीघ्र प्राप्ति में बाधा है, क्योंकि वह देश को गरीबी से निर्धनता की ओर और स्वतंत्रता से दासता की ओर ले जाएगा. लेकिन अंततः, जब समाजवाद के प्रति मोहभंग होगा, तब भारतीय जनता उसे अस्वीकार कर देगी और ऐसी विचारधारा को अपनाएगी जो उसके स्वभाव और देश की आवश्यकताओं के अधिक अनुरूप होगी.

तब तक, जो लोग स्वतंत्रता और राष्ट्रीय महानता में विश्वास रखते हैं, उनका कर्तव्य है कि वे उभरते हुए अधिनायकवाद के विरुद्ध संघर्ष करें. क्योंकि समाजवाद वास्तव में विनाश का मार्ग है.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” किताब से लिया गया है जिसका शीर्षक “मैं समाजवाद का विरोध क्यों करता हूं” था जो जो फ़रवरी 1970 में प्रकाशित हुई थी. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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