चेन्नई: किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर सामान्य हो सकता है, फिर भी उसकी धमनियों में बदलाव के शुरुआती संकेत दिख सकते हैं. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के शोधकर्ता यह पता लगा रहे हैं कि धमनियों की सख्ती मापने से डॉक्टर दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे का पहले ही पता लगा सकते हैं या नहीं. ऐसा रूटीन हेल्थ चेकअप में कोई गड़बड़ी सामने आने से पहले भी हो सकता है.
IIT मद्रास रिसर्च पार्क में मौजूद हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी इनोवेशन सेंटर (HTIC) एक मेडिकल टेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर है. यहां शोधकर्ता ऐसे उपकरण बना रहे हैं, जिनकी मदद से डॉक्टर स्वास्थ्य से जुड़े खतरों का पहले ही पता लगा सकें.
उनके सबसे आगे चल रहे प्रोजेक्ट्स में से एक ARTSENS (ARTerial Stiffness Evaluation for Non-invasive Screening) है. यह एक पोर्टेबल डिवाइस है, जो मापता है कि किसी व्यक्ति की धमनियां कितनी सख्त हैं. अब टीम इस डिवाइस का इस्तेमाल देशभर में एक अध्ययन के लिए कर रही है, ताकि यह समझा जा सके कि भारत में रक्त वाहिकाओं की उम्र बढ़ने का असर कैसा दिखाई देता है.
VESPA (Vascular Health Based Early Screening for Public Health Adoption) नाम के इस अध्ययन के तहत टीम अब तक 8,000 से ज्यादा लोगों को शामिल कर चुकी है. टीम का लक्ष्य 2027-28 तक एक लाख लोगों की जांच करना है.
HTIC और IIT मद्रास रिसर्च पार्क के वाधवानी इनोवेशन सेंटर फॉर मेडटेक एंड हेल्थटेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. रविशंकर रामनाथन ने द प्रिंट को बताया, “हम ARTSENS से मापी जाने वाली धमनियों की सख्ती और रक्त वाहिकाओं से जुड़े दूसरे मापदंडों के सामान्य मान तय करना चाहते हैं. इससे हम समझ सकेंगे कि भारतीय आबादी में अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए सामान्य स्थिति क्या है.”
नॉमोग्राम ऐसे चार्ट होते हैं, जो बताते हैं कि अलग-अलग उम्र के लोगों में आम तौर पर कौन-से मापदंड किस स्तर पर होते हैं. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इस डेटा से डॉक्टर भारतीय मरीजों की रक्त वाहिकाओं की सेहत से जुड़े माप को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे.
अब शोधकर्ता देशभर में लोगों की रक्त वाहिकाओं की सेहत का डेटा जुटा रहे हैं. उनका लक्ष्य भारत में रक्त वाहिकाओं की उम्र बढ़ने के आधार पर दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे की शुरुआती जांच के लिए पहली गाइडलाइन तैयार करना है.
डॉ. रामनाथन ने कहा कि एक लाख लोगों की जांच करके टीम अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए सामान्य मान तय करना चाहती है. साथ ही, वह पूरे भारत में दिल की सेहत की स्थिति को बेहतर तरीके से समझना चाहती है. इन नतीजों का विश्लेषण करना और उनकी पुष्टि करना जरूरी होगा. इसके बाद ही इन गाइडलाइंस का इस्तेमाल रोजाना मरीजों के इलाज में किया जा सकेगा.

धमनियों की सख्ती मापना क्यों जरूरी है
जब भी दिल धड़कता है, धमनियां फैलती हैं ताकि शरीर में खून पहुंच सके. इसके बाद वे फिर अपनी पुरानी स्थिति में लौट आती हैं. उम्र बढ़ने के साथ या हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां होने पर धमनियों की दीवारें कम लचीली हो सकती हैं.
इससे धमनियों के लिए दिल की हर धड़कन से पैदा होने वाले दबाव को सहना मुश्किल हो जाता है. धमनियों का सख्त होना दिल से जुड़ी कई समस्याओं के बढ़ते खतरे से जुड़ा है. इनमें हार्ट फेल होना और दिमाग तथा किडनी जैसे अंगों को नुकसान पहुंचना शामिल है.
समस्या यह है कि ये बदलाव किसी व्यक्ति में साफ लक्षण दिखने या रूटीन जांच में असामान्य नतीजे आने से पहले ही शुरू हो सकते हैं.
VESPA मिशन का नेतृत्व कर रहे डॉ. जयराज जोसेफ ने कहा कि धमनियों में बदलाव किसी व्यक्ति की 20 या 30 साल की उम्र में ही शुरू हो सकते हैं. इन्हें मापने से शोधकर्ताओं को ऐसे लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिनकी धमनियां उम्मीद से ज्यादा तेजी से बूढ़ी हो रही हैं.
डॉ. जोसेफ ने द प्रिंट को बताया, “यहां हमारा मकसद ऐसे लोगों की पहचान करना है, जिनकी धमनियां सामान्य से ज्यादा तेजी से बूढ़ी हो रही हैं और जिन्हें इसका ज्यादा खतरा है.”
यहीं पर “वैस्कुलर एज” यानी रक्त वाहिकाओं की उम्र की बात आती है. इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति की रक्त वाहिकाएं उसकी असली उम्र के मुकाबले कितनी पुरानी दिखाई देती हैं.
उदाहरण के लिए, 40 साल के किसी व्यक्ति की धमनियां उसी उम्र के औसत व्यक्ति की धमनियों से ज्यादा स्वस्थ हो सकती हैं. वहीं, 40 साल के किसी दूसरे व्यक्ति की धमनियों में ज्यादा सख्ती के संकेत दिख सकते हैं. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इन अंतर को मापने से भविष्य में डॉक्टर दिल से जुड़ी बीमारियों के खतरे का ज्यादा सही आकलन कर सकेंगे.

ARTSENS धमनियों की सख्ती कैसे मापता है
यह डिवाइस अल्ट्रासाउंड की मदद से गर्दन में मौजूद कैरोटिड आर्टरी की हलचल को मापता है. यह धमनी दिमाग तक खून पहुंचाती है.
डिवाइस का प्रदर्शन करते हुए डॉ. रामनाथन ने बताया कि इसे चलाने वाला व्यक्ति गर्दन पर एक छोटी-सी प्रोब रखता है. डिवाइस हर धड़कन के साथ धमनी में होने वाली हलचल को रिकॉर्ड करता है और सॉफ्टवेयर की मदद से इन संकेतों का विश्लेषण करता है. सामान्य अल्ट्रासाउंड जांच से अलग, यह डिवाइस रक्त वाहिका की तस्वीरें नहीं बनाता.
ARTSENS तीन चीजें मापता है. पहली, कैरोटिड आर्टरी कितनी सख्त है. यह धमनी गर्दन के दोनों तरफ होती है. दूसरी, धमनियों में ब्लड प्रेशर की लहरें कितनी तेजी से आगे बढ़ती हैं. तीसरी, एओर्टा यानी शरीर की मुख्य धमनी में ब्लड प्रेशर कितना है. एओर्टा दिल से खून को शरीर के बाकी हिस्सों तक ले जाती है.
दबाव की लहरें सख्त धमनियों में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ती हैं. इसलिए, इनकी रफ्तार मापने से शोधकर्ताओं को धमनियों की सख्ती का पता लगाने में मदद मिल सकती है. वहीं, सेंट्रल ब्लड प्रेशर से दिल के पास मौजूद धमनियों में ब्लड प्रेशर मापा जाता है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक, पूरा टेस्ट करीब पांच मिनट में हो जाता है. सिर्फ कैरोटिड आर्टरी की जांच करीब 30 सेकंड में पूरी की जा सकती है.
डॉ. रामनाथन ने कहा कि इस तकनीक का मकसद ऐसी खास जांच को कम खर्च में ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है, जिसके लिए आमतौर पर महंगे उपकरणों की जरूरत होती है और जो हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती.
शोधकर्ताओं को भारतीय लोगों का डेटा क्यों चाहिए
फिलहाल, डॉक्टर धमनियों की सख्ती से जुड़े माप को समझने के लिए ज्यादातर यूरोप और अमेरिका की आबादी पर आधारित सामान्य मानों का इस्तेमाल करते हैं. डॉ. रामनाथन ने कहा कि भारत में अभी तक पूरी आबादी के लिए अपने सामान्य मान तय नहीं किए गए हैं.
भारत के लोगों से जुटाया गया बड़ा डेटा शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद कर सकता है कि उम्र और दूसरी विशेषताओं के साथ इन मापों में किस तरह बदलाव आता है. VESPA अध्ययन में लोगों की धमनियों के माप के साथ-साथ उनकी सेहत, खून से जुड़े मापदंडों, शरीर की बनावट और जीवनशैली की जानकारी भी जुटाई जा रही है.
इस अध्ययन के लिए कई संस्थानों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है. इनमें दिल्ली और पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), पुडुचेरी का जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (JIPMER) और वेल्लोर का क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज शामिल हैं.
शोधकर्ता इन संस्थानों के साथ मिलकर जांच शिविर लगा रहे हैं और अध्ययन में शामिल होने वाले लोगों की संख्या बढ़ा रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि इससे मिले डेटा के जरिए देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों के दिल और मेटाबॉलिज्म की सेहत की बेहतर तस्वीर सामने आएगी.
लैब से मरीजों तक तकनीक पहुंचाना
HTIC की शुरुआत 2012 में IIT मद्रास और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की संयुक्त पहल के रूप में हुई थी. इसका काम रिसर्च और स्वास्थ्य सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों के बीच की दूरी को कम करना है.
डॉ. रामनाथन ने कहा कि अकादमिक रिसर्च से अक्सर यह पता चलता है कि कोई तकनीक काम करती है या नहीं. लेकिन मरीजों तक उस तकनीक को पहुंचाने के लिए यह सिर्फ पहला कदम होता है. किसी डिवाइस को मरीजों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराने से पहले उसकी क्लिनिकल जांच और पुष्टि, नियामक मंजूरी, मैन्युफैक्चरिंग में मदद और उसे बनाने तथा बाजार में पहुंचाने वाली कंपनी की जरूरत हो सकती है.
उन्होंने कहा कि HTIC अस्पतालों और उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करता है, ताकि तकनीकों को इन सभी चरणों से आगे बढ़ाया जा सके. इसके पहले के प्रोजेक्ट्स में मोबाइल आई सर्जरी यूनिट बनाने में इंजीनियरिंग से जुड़ी मदद और आंखों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली तकनीक शामिल हैं. सेंटर ने मेडिकल डिवाइस और बीमारियों की जांच करने वाले सिस्टम पर भी काम किया है.
डॉ. रामनाथन ने कहा कि इस तकनीक की जांच करके इसकी सटीकता और क्लिनिकल उपयोग की पुष्टि की जा चुकी है. साथ ही, अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की 510(k) नियामक प्रक्रिया के तहत आवेदन भी जमा किया गया है.
उन्होंने कहा, “रोजाना मरीजों के इलाज में इस तकनीक का इस्तेमाल कब शुरू होगा, यह इसे बनाने और लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था के साथ-साथ चल रहे अध्ययन की प्रगति पर निर्भर करेगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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