नई दिल्ली: भारत में 22 करोड़ से ज्यादा लोग हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन के साथ जी रहे हैं. इनमें से सिर्फ 12 प्रतिशत लोगों का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में है. दवा लेने के बावजूद जिन लोगों का BP हाई रहता है, उनमें डॉक्टरों का कहना है कि रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन वाले मरीजों की पहचान करना जरूरी है. हाई BP वाले लोगों में यह समस्या बढ़ रही है.
रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन तब होता है जब BP कम करने वाली तीन या उससे ज्यादा दवाएं लेने के बावजूद BP इलाज के लिए तय लक्ष्य से ऊपर रहता है. इनमें एक ऐसी दवा भी शामिल होती है जो शरीर से अतिरिक्त पानी और नमक बाहर निकालती है. ये दवाएं अधिकतम या मरीज के लिए सहन की जा सकने वाली सबसे ज्यादा खुराक में दी जाती हैं. या फिर BP को कंट्रोल करने के लिए चार या उससे ज्यादा दवाओं की जरूरत पड़ती है.
अनकंट्रोल्ड हाइपरटेंशन का मतलब है कि BP इलाज के तय लक्ष्य से ऊपर रहता है. ऐसा तब भी हो सकता है जब मरीज का इलाज ही नहीं चल रहा हो, वह दवा की खुराक छोड़ देता हो या कम खुराक ले रहा हो. इसके उलट, रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन अनकंट्रोल्ड हाइपरटेंशन की एक खास कैटेगरी है.
यह शरीर में एल्डोस्टेरोन हार्मोन की ज्यादा मात्रा जैसी अंदरूनी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है. इससे शरीर में ज्यादा नमक और पानी जमा हो सकता है और BP बढ़ सकता है. यह किडनी की बीमारी या ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया से भी जुड़ा हो सकता है.
इस समस्या की पुष्टि करने से पहले डॉक्टरों को यह देखना जरूरी होता है कि मरीज रेगुलर दवा ले रहा है या नहीं. उन्हें “व्हाइट कोट” प्रभाव को भी बाहर करना होता है. इसमें अस्पताल या क्लिनिक में BP नापने पर ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है.
बेंगलुरु, चेन्नई, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों के कार्डियोलॉजिस्ट और शोधकर्ताओं ने दिप्रिंट को बताया कि वे ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ते देख रहे हैं, जिनका BP तीन से ज्यादा दवाएं लेने के बावजूद हाई रहता है.
मुंबई के पी.डी. हिंदुजा अस्पताल और मेडिकल रिसर्च सेंटर के कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट और कार्डियक इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. अमेय उदयवार ने कहा, “पिछले कुछ सालों में हमने रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देखी है. पहले हाइपरटेंशन के करीब 15 प्रतिशत मरीजों में यह समस्या होती थी. अब करीब 30 प्रतिशत मरीज दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हैं.”
बेंगलुरु के फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. गोपी ए. ने अनुमान लगाया कि उनके पास आने वाले हाइपरटेंशन के 15 प्रतिशत तक मरीजों को रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन हो सकता है. चेन्नई के एसआरएम प्राइम अस्पताल के कंसल्टेंट-इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बालामुरुगन ने भी अपने मरीजों के बीच लगभग ऐसा ही अनुमान बताया.
हालांकि, भारत में ऐसे लोगों की संख्या का कोई आधिकारिक राष्ट्रीय या राज्य स्तर का अनुमान नहीं है, जिन्हें सच में रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन है. इससे समस्या का स्तर पता करना और इससे निपटने के लिए कदम उठाना मुश्किल है.
दुनिया भर में 2019 में ‘हार्ट’ जर्नल में प्रकाशित एक मेटा-विश्लेषण में 91 अध्ययनों के 32 लाख से ज्यादा इलाज करा रहे मरीजों के आंकड़ों को शामिल किया गया था. इसमें अनुमान लगाया गया कि 10.3 प्रतिशत लोगों को वास्तविक रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन था, जबकि 14.7 प्रतिशत लोगों में इलाज के बावजूद रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन जैसा दिखने वाला मामला था.
वास्तविक रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन में कम से कम तीन दवाओं, जिनमें एक डाययूरेटिक भी शामिल है, से सही इलाज करने के बावजूद BP तय लक्ष्य से ऊपर रहता है. इसमें गलत तरीके से BP नापने, मरीजों के दवा न लेने और व्हाइट-कोट प्रभाव जैसी वजहों को पहले बाहर कर दिया जाता है.
मुंबई के पी.डी. हिंदुजा अस्पताल के कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अमेय उदयवार ने कहा, “पिछले कुछ सालों में हमने रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देखी है. पहले हाइपरटेंशन के करीब 15 प्रतिशत मरीजों में यह समस्या होती थी. अब यह करीब 30 प्रतिशत है.”
इलाज के बावजूद रेजिस्टेंट दिखने वाले हाइपरटेंशन में BP इलाज के प्रति रेजिस्टेंट नजर आता है, लेकिन यह पुष्टि करने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं होती कि वास्तव में समस्या रेजिस्टेंट है या नहीं. इसके अलावा दवा न लेने या आंकड़ों की कमी जैसी दूसरी वजहें भी हो सकती हैं.
सबूत बताते हैं कि रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक बड़ी समस्या है. अलग-अलग आबादी पर किए गए अध्ययनों में इसे कुछ समूहों में ज्यादा मौतों के खतरे से जोड़ा गया है.
दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में, चेन्नई के ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एपिडेमियोलॉजी में नॉन-कम्युनिकेबल डिज़ीज़ेज़ के डिवीज़न के हेड और साइंटिस्ट डॉ. पी गणेशकुमार ने कहा कि कुछ मेटा-एनालिसिस ने स्टडी की गई आबादी के आधार पर, रेसिस्टेंट हाइपरटेंशन के फैलाव का अनुमान 1 परसेंट से 5 परसेंट के बीच लगाया है.
हालांकि, उन्होंने सावधान किया कि इस आंकड़े को भारत के लिए अनुमान के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि अलग-अलग आबादी में अलग-अलग आंकड़े सामने आ सकते हैं.

उन्होंने कहा, “ज्यादा भरोसेमंद अनुमान लंबे समय तक मरीजों के इलाज के आंकड़ों से निकाले जा सकते हैं. इसमें उन मरीजों पर नजर रखी जा सकती है, जो BP कम करने वाली तीन दवाएं ले रहे हैं. इसके बाद समय के साथ उनके इलाज और BP के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जा सकता है.”
उन्होंने कहा कि इस तरह के विश्लेषण से रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन की समस्या का ज्यादा सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है.
रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन से जुड़े आंकड़ों की यह कमी हाई BP वाले लोगों की पहचान और इलाज के लिए चल रहे बड़े प्रयास के बीच सामने आई है.
इस साल अप्रैल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में बताया था कि 2017 से अब तक 41.5 करोड़ लोगों की हाइपरटेंशन के लिए जांच की जा चुकी है. इनमें 7.1 करोड़ लोगों में यह बीमारी पाई गई और 5.7 करोड़ लोगों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में दर्ज किया गया.
दर्ज किए गए मरीज वे होते हैं, जिन्हें सरकार के स्वास्थ्य पोर्टल पर आधिकारिक रूप से रजिस्टर किया गया है, ताकि उन्हें तय इलाज, आगे की जांच और नियमित दवा मिल सके.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), भारत ने 2017 में इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव शुरू करने के लिए साथ काम किया था. इसका उद्देश्य तय इलाज की व्यवस्था, दवाओं की नियमित उपलब्धता और मरीजों की नियमित जांच के जरिए हाई BP के इलाज और उसे कंट्रोल करने में सुधार करना था.
यह कार्यक्रम 2017 में पांच राज्यों और 26 जिलों से शुरू हुआ था. 2017 तक इसका विस्तार 25 राज्यों के 141 जिलों तक हो गया था. इसके तहत 30.3 करोड़ लोगों और 21,579 स्वास्थ्य केंद्रों को शामिल किया गया था.
हालांकि, हाइपरटेंशन के इलाज में मौजूद कमियों के कारण वास्तविक रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन वाले लोगों की पहचान करना मुश्किल है.
रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन और इसे ट्रैक करना क्यों मुश्किल है
डायबिटीज के उलट, जिसे एचबीए1सी टेस्ट से जांचा जा सकता है और यह टेस्ट करीब तीन महीने के औसत ब्लड शुगर को मापता है, रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन की पुष्टि किसी एक टेस्ट से नहीं की जा सकती.
इसके बजाय डॉक्टर बार-बार लिए गए BP रीडिंग, मरीज कौन-सी दवाएं और कितनी खुराक ले रहा है, इलाज में क्या बदलाव किए गए हैं और मरीज दवाएं नियमित रूप से ले रहा है या नहीं, इन सब चीजों को देखते हैं. सिर्फ एक बार BP हाई आने से यह साबित नहीं होता कि मरीज को रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन है.
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन भी उन कारणों की जांच करने की सलाह देता है, जिनकी वजह से हाइपरटेंशन इलाज के बावजूद रेजिस्टेंट दिखाई दे सकता है. इनमें दवा नियमित रूप से न लेना, BP गलत तरीके से मापना और व्हाइट-कोट प्रभाव शामिल हैं.
रेजिस्टेंट दिखने वाले हाइपरटेंशन के करीब 37.5 प्रतिशत मामलों की वजह व्हाइट-कोट प्रभाव हो सकता है. दवा नियमित रूप से न लेना भी ऐसे मामलों में एक बड़ी वजह है.
डॉ. गोपी ने कहा कि BP मापने में गलती और व्हाइट-कोट प्रभाव की वजह से BP रेजिस्टेंट दिखाई दे सकता है, जबकि अस्पताल के बाहर यह लगातार हाई नहीं रहता हो.
24 घंटे का एंबुलेटरी BP मॉनिटर डॉक्टरों को यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि क्लिनिक के बाहर भी BP हाई रहता है या नहीं. यह डिवाइस दिन और रात में नियमित अंतराल पर BP रिकॉर्ड करता है.
उन्होंने दवा रेगुलर न लेना, जीवनशैली से जुड़े कारण, प्रोसेस्ड फूड से ज्यादा नमक लेना, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी और ज्यादा शराब पीने को भी इसके पीछे जिम्मेदार कारण बताया.
उन्होंने कहा, “ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, एक ऐसी बीमारी जिसमें सोते समय बार-बार सांस रुकती और फिर शुरू होती है, भी एक महत्वपूर्ण कारण है.” यह समस्या दुबले और कम उम्र के लोगों में भी हो सकती है, भले ही उन्हें कोई दूसरी साफ स्वास्थ्य समस्या न हो.
डॉ. बालामुरुगन ने कहा कि मोटापे और बिना पता चले ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया के अलावा किडनी से जुड़ी समस्याएं, जैसे क्रॉनिक किडनी डिजीज और सेकेंडरी हाइपरटेंशन भी इसके संभावित कारण हो सकते हैं.
मेडिकल विशेषज्ञों ने एल्डोस्टेरोन हार्मोन के ज्यादा बनने और किडनी तक खून पहुंचाने वाली धमनियों के संकरे होने जैसी अंदरूनी समस्याओं की ओर भी इशारा किया. कुछ दवाएं, जिनमें आम दर्द की दवाएं, नाक खोलने वाली दवाएं और स्टेरॉयड शामिल हैं, भी BP को कंट्रोल करना मुश्किल बना सकती हैं.
अपोलो अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. सप्तर्षि भट्टाचार्य ने समझाया कि जब दवा लेने के बावजूद BP हाई रहता है, तो जरूरी नहीं कि दवाओं ने काम करना बंद कर दिया हो. शरीर में कोई दूसरी समस्या लगातार BP बढ़ा रही हो सकती है.
उन्होंने कहा, “यह दवाओं का रेजिस्टेंस नहीं है. यह शरीर के अंदर का रेजिस्टेंस है. शरीर के अंदर कुछ ऐसा हो रहा है, जिसकी वजह से दवाएं लेने के बावजूद BP हाई बना हुआ है.”
कितने लोगों को है?
कुछ आंकड़ों से यह पता चलता है कि इलाज करा रहे लोगों में अनकंट्रोल्ड BP की समस्या कितनी बड़ी है.
जनवरी 2025 में प्रकाशित नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़ों के एक विश्लेषण में पाया गया कि BP की दवा लेने वाले 49.5 प्रतिशत पुरुषों और 36.8 प्रतिशत महिलाओं का हाइपरटेंशन अभी भी कंट्रोल में नहीं था.
लेकिन इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि इनमें से कितने लोगों को रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन था. इस अध्ययन में यह नहीं देखा गया कि मरीज अपनी दवाएं नियमित रूप से ले रहे थे या नहीं, जरूरत पड़ने पर इलाज बढ़ाया गया था या नहीं, या BP कंट्रोल न होने के दूसरे कारणों को बाहर किया गया था या नहीं.
भारत में करोड़ों लोगों की हाइपरटेंशन जांच, लेकिन BP कंट्रोल करना चुनौती
डॉ. गणेशकुमार के मुताबिक, देश में हाइपरटेंशन की पहचान से जुड़ी कमी करीब 70 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि हाई BP वाले हर 10 में से करीब सात लोगों में अभी तक हाइपरटेंशन की पहचान नहीं हुई थी.
इलाज से जुड़ी कमी करीब 14 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि जिन लोगों में हाइपरटेंशन की पहचान हो चुकी थी, उनमें से कुछ लोगों को अभी भी इलाज नहीं मिल रहा था.
उन्होंने बताया कि उदाहरण के लिए तमिलनाडु में हाइपरटेंशन वाले करीब आधे लोगों की पहचान हो चुकी थी और जिन लोगों की पहचान हुई थी, उनमें से करीब 30 प्रतिशत को इलाज नहीं मिल रहा था. इलाज करा रहे लोगों में से केवल करीब आधे लोगों का BP कंट्रोल में था.
आईसीएमआर-एनआईई, चेन्नई के एनसीडी डिविजन के प्रमुख डॉ. पी. गणेशकुमार ने कहा, “अगर आपके पास डेटा नहीं है, तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि इसकी वजह इलाज की कमी है, इलाज में बदलाव न करना है या वास्तव में रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन है.”
इलाज में ‘जड़ता’
डॉ. गणेशकुमार ने कहा कि हाइपरटेंशन के इलाज को मोटे तौर पर तीन चरणों में बांटा जा सकता है: बीमारी की पहचान करना, दवाओं से इलाज करना और BP को कंट्रोल में लाना.
लेकिन इलाज शुरू होने के बाद भी कुछ मरीजों का BP हाई बना रहता है क्योंकि जरूरत पड़ने पर उनकी दवाओं की खुराक नहीं बढ़ाई जाती या कोई दूसरी दवा नहीं जोड़ी जाती. इसे इलाज में ‘जड़ता’ यानी थेराप्यूटिक इनर्शिया कहा जाता है.
उन्होंने कहा कि इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव (आईएचसीआई) के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन मरीजों का BP कंट्रोल में नहीं है और जिनके इलाज में बदलाव की जरूरत है, उनमें करीब 80-90 प्रतिशत मरीजों में ऐसा होता है.
उन्होंने कहा, “अगर आपके पास डेटा नहीं है, तो आपको पता नहीं चलेगा कि इसकी वजह इलाज की कमी है, इलाज में जड़ता है या वास्तव में रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन है.”
उन्होंने कहा कि रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन की पहचान तभी की जा सकती है, जब डॉक्टर यह तय कर लें कि मरीज को सही इलाज मिल रहा है और उसकी नियमित निगरानी की जा रही है.
उन्होंने कहा, “इन रिकॉर्ड के बिना, अनकंट्रोल्ड BP वाले व्यक्ति को रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन वाला मरीज माना जा सकता है, जबकि असली समस्या बीमारी की पहचान न होना, दवा नियमित रूप से न लेना या जरूरत पड़ने पर इलाज को बढ़ाया न जाना हो सकती है.”
जब रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन की पुष्टि हो जाती है, तो डॉक्टर मौजूदा इलाज को और बढ़ा सकते हैं. इसमें अक्सर स्पिरोनोलैक्टोन जैसी दवाएं जोड़ी जाती हैं. जिन मरीजों का BP सही दवाएं लेने के बावजूद कंट्रोल में नहीं आता, उनके लिए नए विकल्पों में रीनल डिनर्वेशन भी शामिल है. यह एक कम चीरा लगाने वाली प्रक्रिया है, जिसमें किडनी की धमनियों के आसपास नसों की गतिविधि को कम किया जाता है.
इन इलाज के विकल्पों के साथ ऐसी नई दवाओं पर भी काम किया जा रहा है, जो मुश्किल से कंट्रोल होने वाले हाइपरटेंशन में शामिल कुछ हार्मोन से जुड़े रास्तों पर असर करती हैं.
उदाहरण के लिए, इस साल मई में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने बैक्सड्रोस्टैट को मंजूरी दी. यह एल्डोस्टेरोन सिंथेज इनहिबिटर है और उन वयस्कों के लिए है, जिनका हाइपरटेंशन दूसरी दवाओं से पर्याप्त रूप से कंट्रोल नहीं हो रहा है.
यह दवा एल्डोस्टेरोन को कम करती है. एल्डोस्टेरोन एक ऐसा हार्मोन है, जो शरीर में सोडियम को रोककर रखता है और BP बढ़ा सकता है. हालांकि, भारत में अभी इस दवा को मंजूरी नहीं मिली है.
लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं?
2019 में तत्कालीन आईसीएमआर महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने कहा था कि भारत की राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग कार्ययोजना के तहत सरकार ने 2025 तक हाई BP को 25 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखा था. आईएचसीआई का उद्देश्य इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद करना था.
जब डॉ. गणेशकुमार से पूछा गया कि क्या भारत ने यह लक्ष्य हासिल कर लिया है, तो उन्होंने कहा कि इसका जवाब देने के लिए देश के स्तर का डेटा उपलब्ध नहीं है.
भारत में आखिरी राष्ट्रीय स्तर का प्रतिनिधि नेशनल नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मॉनिटरिंग सर्वे 2017-18 में हुआ था. इसमें पाया गया था कि 18 से 69 साल की उम्र के 28.5 प्रतिशत वयस्कों को हाइपरटेंशन था, जबकि सिर्फ 12.6 प्रतिशत लोगों का BP कंट्रोल में था.
डॉ. गणेशकुमार ने बताया कि एक नया राष्ट्रीय सर्वे कराने की योजना बनाई जा रही है.
उन्होंने कहा, “जब तक तुलना करने योग्य राष्ट्रीय स्तर का डेटा उपलब्ध नहीं होता, भारत भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि 25 प्रतिशत कमी का लक्ष्य हासिल हुआ या देश इस लक्ष्य से कितना दूर है.”
हालांकि, जिला स्तर पर आईएचसीआई के अध्ययनों में BP कंट्रोल में सुधार देखा गया है. उन्होंने पंजाब के बठिंडा और केरल के त्रिशूर का उदाहरण दिया.
उन्होंने कमियों की पहचान की: बीमारी की पहचान, इलाज और BP कंट्रोल, साथ ही मरीजों का नियमित रूप से दवा न लेना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टरों का इलाज न बढ़ाना.
यही कमियां रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन की पहचान करना भी मुश्किल बनाती हैं. उन्होंने इस बीमारी को “महत्वपूर्ण और उपेक्षित” और “बढ़ती चिंता” बताया.
उन्होंने कहा, “क्या हम इसे गंभीरता से लेकर इसका इलाज कर रहे हैं? नहीं, हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. कुल मिलाकर हम अब भी इस खास बीमारी की अनदेखी कर रहे हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: नमक में आयोडीन मिलाने से भारतीय बच्चों में घेंघे के मामले हुए कम, पर थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी बढ़ी—लैंसेट