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Sunday, 20 September, 2026
होमहेल्थनमक में आयोडीन मिलाने से भारतीय बच्चों में घेंघे के मामले हुए कम, पर थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी बढ़ी—लैंसेट

नमक में आयोडीन मिलाने से भारतीय बच्चों में घेंघे के मामले हुए कम, पर थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी बढ़ी—लैंसेट

एक दशक से भी ज़्यादा समय में भारतीय स्कूली बच्चों में आयोडीन पोषण के पहले देशव्यापी आकलन से पता चला है कि घेंघा रोग (goitre) की दर 2003 में 23.5 प्रतिशत से घटकर 2024-2025 में 10.3 प्रतिशत हो गई है.

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नई दिल्ली: भारत में यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन (USI) कार्यक्रम शुरू हुए चार दशक हो चुके हैं. एक नई देशव्यापी स्टडी में पता चला है कि स्कूली बच्चों में घेंघा (goitre) के मामले काफी कम हुए हैं. हालांकि, इसी स्टडी में थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी में भी काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर हमला करने लगता है.

हाल ही में दि लैंसेट रीजनल हेल्थ, साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित इस स्टडी में जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच भारत के आठ क्षेत्रों में 10 से 18 साल की उम्र के 8,903 बच्चों की जांच की गई. इसमें पाया गया कि बच्चों में घेंघे की दर 2003 में 23.5 प्रतिशत थी, जो 2012 में घटकर 17.6 प्रतिशत और अब की ताजा स्टडी में 10.3 प्रतिशत रह गई है.

Goitre (घेंघा), जब थायरॉइड ग्रंथि जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है और गर्दन में सूजन या उभार दिखाई देने लगता है. थायरॉइड गर्दन में मौजूद तितली के आकार की एक छोटी ग्रंथि है. यह ऐसे हार्मोन बनाती है जो शरीर की ग्रोथ, दिमाग के विकास और शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने के लिए जरूरी होते हैं.

आयोडीन एक जरूरी पोषक तत्व है, जिसका इस्तेमाल थायरॉइड इन हार्मोन्स को बनाने के लिए करता है. जब शरीर को पर्याप्त आयोडीन नहीं मिलता, तो थायरॉइड को हार्मोन बनाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और धीरे-धीरे यह ग्रंथि बढ़ सकती है, जिससे घेंघा हो जाता है. आयोडीन की गंभीर कमी से दिमाग के विकास पर भी असर पड़ सकता है, खासकर बच्चों और गर्भावस्था के दौरान.

यही वजह थी कि भारत ने 1980 के दशक में यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन की तरफ कदम बढ़ाया. इसके तहत नमक में आयोडीन की थोड़ी और तय मात्रा मिलाई जाती है, ताकि लोग रोज के खाने के जरिए आयोडीन ले सकें. 1984 में सरकार ने भारत में खाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सभी नमक को आयोडीनयुक्त बनाने का बड़ा नीतिगत फैसला लिया. यह पहल 1986 से चरणों में शुरू हुई. 1992 में इसे बढ़ाकर इसका नाम नेशनल आयोडीन डेफिशिएंसी डिसऑर्डर्स कंट्रोल प्रोग्राम कर दिया गया, ताकि आयोडीन की कमी से होने वाली अलग-अलग बीमारियों को भी इसमें शामिल किया जा सके.

भारत में अब हर साल करीब 65 लाख मीट्रिक टन आयोडीनयुक्त नमक तैयार होता है, जो देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है. खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत सीधे इंसानों के खाने के लिए बिना आयोडीन वाला सामान्य नमक बेचना या इस्तेमाल करना अनुमति नहीं है.

स्टडी के लेखकों के अनुसार, यह एक दशक से ज्यादा समय में भारतीय स्कूली बच्चों में आयोडीन की स्थिति और थायरॉइड की सेहत का पहला देशव्यापी आकलन है.

डॉ. रमन कुमार मरवाहा SEHEAC (Society of Endocrine Health Care for Elderly, Adolescents, and Children), नई दिल्ली के संस्थापक और अध्यक्ष हैं और इस स्टडी के लेखकों में से एक हैं. उन्होंने कई दशकों तक भारत में नमक में आयोडीन मिलाने के असर का अध्ययन किया है. उन्होंने कहा कि घेंघे के मामलों और उसके आकार, दोनों में कमी पहले के सर्वे की तुलना में साफ बदलाव दिखाती है.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “पहले दशक में हमने करीब 8 से 10 प्रतिशत ग्रेड 2 घेंघा दर्ज किया था और प्रतिभागियों में 90 प्रतिशत ग्रेड 2 घेंघा था.” वह पहले के देशव्यापी सर्वे की बात कर रहे थे. “अब चौथे दशक में हमें ग्रेड 2 घेंघा लगभग देखने को ही नहीं मिला.”

ग्रेड 2 घेंघा वह होता है जिसमें गर्दन को देखने पर थायरॉइड का बढ़ना दिखाई देता है. वहीं ग्रेड 1 आमतौर पर सिर्फ जांच करने पर पता चलता है.

मरवाहा ने कहा, “पहले जो यह दिखाई देने वाली चीज थी, यानी बड़ी-बड़ी ग्रंथियां, वह नाटकीय रूप से गायब हो गई हैं.”

आठ स्टडी सेंटरों में घेंघे की दर काफी अलग-अलग थी. पुणे में यह 7.3 प्रतिशत से लेकर पांडिचेरी में 12.8 प्रतिशत तक थी. इससे पता चलता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है और सिर्फ पूरे देश का एक आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं दिखा सकता.

नमक में आयोडीन मिलाने से स्थिति कैसे बदली

भारत में आयोडीन की कमी से निपटने की कोशिश 1960 के दशक में शुरू हुई थी. उस समय उन इलाकों पर ध्यान दिया गया जहां घेंघा बहुत आम था. मरवाहा ने बताया कि शुरुआती काम से पता चला था कि आयोडीन की कमी वाले क्षेत्रों में आयोडीन देने से घेंघे के मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है.

बाद में शोधकर्ताओं ने पाया कि आयोडीन की कमी और घेंघा सिर्फ हिमालय के निचले इलाकों तक सीमित नहीं थे, बल्कि पूरे देश में पाए जाते थे. इसके बाद सरकार ने 1986 में यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन कार्यक्रम शुरू किया.

इसका मकसद यह था कि रोजाना इस्तेमाल होने वाले खाने के एक आम सामान, यानी नमक, के जरिए ज्यादातर लोगों को पर्याप्त आयोडीन मिल सके.

मरवाहा ने बताया कि सदी के आसपास किए गए पहले देशव्यापी आकलन में, जिसमें करीब 23 शहरों के लगभग 40,000 स्कूली बच्चे शामिल थे, करीब 23 प्रतिशत बच्चों में घेंघा पाया गया था. शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि बच्चों के पेशाब में आयोडीन का स्तर बहुत ज्यादा था. इससे पता चलता था कि कुछ बच्चे जरूरत से ज्यादा आयोडीन ले रहे थे.

उन्होंने बताया कि इसकी एक वजह यह थी कि नमक बनाने वाली कंपनियां जानबूझकर नमक में जरूरत से ज्यादा आयोडीन डालती थीं. इसका मकसद पैकेजिंग की वजह से आयोडीन की कमी, धूप और नमी के संपर्क, सामान ले जाने के दौरान होने वाली कमी, दुकानों में खुले में रखने और खाना पकाने के दौरान होने वाले नुकसान की भरपाई करना था.

मरवाहा ने कहा, “रोज की सामान्य जरूरत 100 माइक्रोग्राम है. इसलिए हम 30 पीपीएम, यानी 300 माइक्रोग्राम, डालते थे, ताकि होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके.”

ताजा स्टडी से पता चलता है कि अब आबादी के स्तर पर आयोडीन का सेवन पर्याप्त है. पेशाब में आयोडीन की औसत मात्रा 133.2 माइक्रोग्राम प्रति लीटर थी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की पर्याप्त आयोडीन की सीमा के अंदर है. इसके अलावा, 90 प्रतिशत से ज्यादा परिवारों ने बताया कि वे आयोडीनयुक्त नमक इस्तेमाल करते हैं. वहीं, नमक के 89 प्रतिशत सैंपल में आयोडीन की मात्रा जरूरी 15 पार्ट्स प्रति मिलियन की सीमा से ज्यादा थी.

मरवाहा ने कहा कि नमक बनाने वाली कंपनियों पर बेहतर नियंत्रण और सप्लाई चेन में सुधार से भी आयोडीन का स्तर सही सीमा के करीब लाने में मदद मिली होगी.

उन्होंने कहा, “जब हमने इस बार जांच की, तो नमक में आयोडीन की मात्रा अब सामान्य सीमा के अंदर थी.”

घेंघा कम हुआ, लेकिन ऑटोइम्यूनिटी बढ़ी

हालांकि, स्टडी में एक और बदलाव सामने आया.

13 प्रतिशत बच्चों में सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म पाया गया. इसमें थायरॉइड-स्टिमुलेटिंग हार्मोन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, लेकिन इसके बहुत कम या कोई लक्षण नहीं भी हो सकते हैं.

10.4 प्रतिशत बच्चों में एंटी-थायरॉइड पेरॉक्सिडेज (anti-TPO) एंटीबॉडी पाई गईं. ये एंटीबॉडी थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी का संकेत हो सकती हैं.

एडजस्टेड विश्लेषण में पाया गया कि लड़कियों में लड़कों की तुलना में TPO एंटीबॉडी पॉजिटिव आने की संभावना करीब दो गुना थी. जिन बच्चों को घेंघा था, उनमें भी TPO पॉजिटिव होने की संभावना दो गुने से ज्यादा थी.

ऑटोइम्यूनिटी तब होती है जब शरीर का इम्यून सिस्टम शरीर के अपने ही टिश्यू के खिलाफ प्रतिक्रिया करने लगता है. थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी में एंटीबॉडी थायरॉइड से जुड़े प्रोटीन या एंजाइम को निशाना बना सकती हैं.

मरवाहा ने कहा कि इसकी एक संभावित वजह जरूरत से ज्यादा आयोडीन का संपर्क हो सकता है. जब थायरॉइड की कोशिकाओं को नुकसान होता है, तो थायरोग्लोबुलिन और थायरॉइड पेरॉक्सिडेज जैसे थायरॉइड प्रोटीन इम्यून सिस्टम के सामने आ सकते हैं. इससे एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

उन्होंने कहा, “ज्यादा आयोडीन से सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म और ऑटोइम्यूनिटी बढ़ सकती है.”

हालांकि, स्टडी यह साबित नहीं करती कि भारत में ऑटोइम्यूनिटी बढ़ने की वजह ज्यादा आयोडीन ही है.

मरवाहा ने कहा, “यह नहीं कहा जा सकता कि इसकी वजह सिर्फ आयोडीन है या इसके पीछे दूसरी चीजें भी हैं.” उन्होंने कीटनाशकों और पर्यावरण में मौजूद दूसरी चीजों को भी थायरॉइड की गड़बड़ी और ऑटोइम्यूनिटी की संभावित वजहों में शामिल किया.

रिसर्चर्स ने सावधान किया है कि इस स्टडी का क्रॉस-सेक्शनल डिजाइन कारण और प्रभाव साबित नहीं कर सकता. उन्होंने यह पता लगाने के लिए लंबे समय तक चलने वाली स्टडी की जरूरत बताई है कि जिन बच्चों में थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी पाई गई है, क्या आगे चलकर उन्हें स्थायी थायरॉइड बीमारी होती है.

मरवाहा ने कहा कि अभी यह जानना जल्दबाजी होगी कि थायरॉइड एंटीबॉडी में हुई बढ़ोतरी का लंबे समय में इन बच्चों पर क्या असर पड़ेगा.

इन निष्कर्षों का यह मतलब नहीं है कि भारत को नमक में आयोडीन मिलाने का कार्यक्रम बंद कर देना चाहिए, मरवाहा ने कहा. उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम ने आयोडीन की कमी से होने वाले गंभीर नुकसान को रोकने में मदद की है, खासकर गर्भावस्था और बचपन के दौरान.

उन्होंने कहा, “अगर आप यह कार्यक्रम बंद कर देंगे, तो फिर क्रेटिनिज्म और कम IQ जैसी वही समस्याएं वापस आ जाएंगी.”

उन्होंने यह भी कहा कि निगरानी करना जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग कंपनियों और अलग-अलग घरों में नमक में आयोडीन की मात्रा अलग हो सकती है. नमक को रखने और पकाने के दौरान आयोडीन कम हो सकता है, खासकर जब नमक गर्मी, नमी या खुली हवा के संपर्क में आता है. इसलिए नमक बनाने के समय उसमें कितनी मात्रा में आयोडीन डाला जाता है, साथ ही उसे कैसे ले जाया और रखा जाता है, यह भी महत्वपूर्ण है.

मरवाहा ने कहा कि बेहतर पैकेजिंग और सप्लाई चेन से आयोडीन के कुछ नुकसान कम हुए हैं. लेकिन निगरानी अभी भी जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग कंपनियों और घरों में आयोडीन की मात्रा अब भी अलग हो सकती है.

रिसर्चर्स ने कहा कि यूनिवर्सल सॉल्ट आयोडाइजेशन कार्यक्रम जारी रहना चाहिए और इसके साथ गुणवत्ता पर नियंत्रण भी होना चाहिए. उन्होंने आयोडीन मिलाने की मात्रा को समय-समय पर सही तरीके से तय करने और थायरॉइड ऑटोइम्यूनिटी की बढ़ती दर पर नजर रखने के लिए समय-समय पर देशव्यापी सर्वे करने की भी मांग की है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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