भारत का बिल्कुल करीबी पड़ोसी दो साल पहले की तुलना में आज ज्यादा तनावपूर्ण दिखता है. भारत में इसका असर यह हुआ है कि पड़ोस में संकट या संबंधों में खटास हमारी घरेलू राजनीति का केंद्रीय हिस्सा बन गई है. इसके अपने नुकसान हैं. विदेश या पड़ोस के ऐसे मामलों का घरेलू राजनीति में घुलना भारत के राष्ट्रीय हित के लिए नुकसानदेह है.
आइए पहले, जरा हिसाब-किताब कर लें: नेपाल के साथ संबंधों में स्थिरता आई है, श्रीलंका और मालदीव के साथ संबंध बहुत अच्छे हो गए हैं, भूटान के साथ तो रिश्ता हमेशा से मजबूत रहा ही है.
पाकिस्तान में आसिम मुनीर का सितारा बुलंद होने; और मजहब, राष्ट्रीयता, सियासत, भूगोल आदि को लेकर उनके विचारों के कारण पाकिस्तान के साथ रिश्ते खराब ही हुए हैं. शेख हसीना के पतन और तारीक़ रहमान के गद्दीनशीन होने के बाद से बांग्लादेश एक नई चुनौती के रूप में उभरा है.
रहमान को मिले बड़े बहुमत के साथ कई बड़े विरोधाभास जुड़े हैं. इनमें सबसे बड़ा विरोधभास यह है कि जमात-ए-इस्लामी को वहां मुख्यधारा की राजनीति में आने का मौका मिला है, जो हमेशा से पाकिस्तान समर्थक रही है. अब तक दरकिनार रही यह जमात लगभग एकपक्षीय चुनाव में विपक्ष की भूमिका में आ गई है.
भौगोलिक रूप से बिल्कुल करीब अपने दो बड़े पड़ोसी देशों को देखने का एक नजरिया यह भी हो सकता है. इन दोनों देशों में पिछली सरकारों को चुनौती देने वालों ने चुनाव में शिकस्त दी. शहबाज़ शरीफ़ और तारीक़ रहमान एकपक्षीय चुनावों में विजयी रहे. लेकिन इन दोनों सरकारों की वैधता पर सवालिया निशान लगा हुआ है. बांग्लादेश की रहमान सरकार पर यह निशान कहीं ज्यादा बड़ा है.
इस लिहाज से दोनों ‘निर्वाचित’ सरकारें कमजोर हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी है. पाकिस्तान में फौज के दबदबे के कारण सत्ता का जैसा भी हो, एक स्पष्ट ढांचा बना हुआ है. लेकिन बांग्लादेश का मामला अलग है. इसलिए, रहमान को जमात के कारण बराबर दाएं-बाएं, आगे-पीछे देखकर चलना पड़ता है. यह एक क्रूर विडंबना है. लेकिन अपने भारी बहुमत के बावजूद वे एक कमजोर प्रधानमंत्री नजर आते हैं.
यह कमजोरी भारत के साथ रिश्ते बढ़ाने और अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी देश का दौरा करने में उनकी हिचक से जाहिर होती है. वे जानते हैं कि शेख हसीना का निष्कासन असंभव है. वे चीन से सबक सीखने को राजी नहीं हैं, जो दलाई लामा के हर बयान पर विरोध तो जाहिर कर सकता है लेकिन भारत में उनकी मौजूदगी के कारण भारत के साथ 1988 के बाद के अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहता. दलाई लामा और शेख हसीना की स्थितियों में दो अहम फर्क हैं. दलाई लामा को भारत ने शरण दी है. हसीना गुप्त रूप से भारत नहीं आईं. वे ढाका में हुए उथल-पुथल वाले दिन, 5 अगस्त 2024 को उस समय के शासकों की मदद से बांग्लादेश वायुसेना के हेलिकॉप्टर से भारत आई थीं.
रहमान के नजरिए से पूरी तस्वीर को देखें तो उन्हें जमात से और ‘सड़कों के माहौल’ से जो खतरा महसूस होता है वह वास्तविक लगती है. वे भारत के साथ रिश्ते सामान्य होने की अचानक घोषणा नहीं कर सकते, तब तो बिल्कुल नहीं जब हसीना उनकी सरकार के खिलाफ बयान दे रही हों और ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही हों. सो, रहमान के पास यह शिकायत करने की वजह है कि भारत, खासकर उसकी घरेलू सियासत, उनकी मदद नहीं कर रही है. असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ के खिलाफ मुद्दा बनाकर लड़े गए. भारत में दूसरी जगहों पर भी BJP की राजनीति का यही केंद्रीय मुद्दा रहता है.
इन सबके ऊपर, भारत के सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक प्रभावशाली आवाजें बांग्लादेश को पाकिस्तान जितना बड़ा दुश्मन ही घोषित करती हैं. दोनों के लिए एक ही तरह की भाषा का प्रयोग किया जाता है. पाकिस्तान को ‘भिखारिस्तान’ कहा जाता है, तो बांग्लादेश को ‘कंगलादेश’ कहा जाता है.
बेशक यह सब सोशल मीडिया पर चलता रहता है. लेकिन राष्ट्रवादी जनमत में फर्क करने का सब्र नहीं दिखता. इसके साथ, ‘मामूली पड़ोसी देश’ जैसे जुमले बांग्लादेश को नाराज़ करते हैं. यह भी आम धारणा है कि भारत में इन सबको प्रोत्साहित चाहे न किया जाता हो, लेकिन इसे व्यापक राजनीतिक सहमति हासिल है. फिलहाल हम पाकिस्तान की ज्यादा परवाह भले न करें लेकिन क्या हम बांग्लादेश को भी उसी खांचे में डालना चाहेंगे?
हमारी घरेलू राजनीति की जो मजबूरियां हैं, या हमारे यहां निरंतर होने वाले चुनावों में जिस तरह के प्रचार किए जाते हैं, उन सबका नतीजा यह हुआ है कि बांग्लादेश को पाकिस्तान के साथ जोड़ दिया गया है. शेख हसीना के निष्कासन को लेकर लोग और सत्तातंत्र चाहे जितना नाराज हो, सत्ता में उनकी वापसी को रिश्ते सामान्य करने की शर्त नहीं बनाया जा सकता.
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत के एजेंडे में शामिल नहीं है. मोदी सरकार को यह पता है, और यह उसके फैसलों से जाहिर है. जैसे, उसने कुशल राजनेता दिलीप त्रिवेदी को ढाका में भारत का हाई कमिश्नर नियुक्त किया है. लेकिन जब तक ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ भारत की घरेलू राजनीति का मुद्दा बने रहेंगे तब तक बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने की इस व्यापक रणनीतिक इच्छा का तालमेल कैसे बैठेगा?
इसलिए, भारत अपने ही बनाए जाल में फंस गया है. 2015 में, पाकिस्तान की ओर हाथ बढ़ाने की पहली कोशिश में मोदी की विफलता के बाद से पाकिस्तान BJP की राजनीति के केंद्र में रहा है. उरी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जनाक्रोश की लहर में, 2017 में BJP ने उत्तर प्रदेश को जीता, और पुलवामा हमले के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव जीता. अब पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव पर तो असर डाल ही सकते हैं. बशर्ते इस बीच कोई नई और भीषण घटना न घट जाए. बांग्लादेशियों का मुद्दा तो बाद में जुड़ा. यह इस विचार से बिलकुल मेल खाता है कि भारत अपनी पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर मौजूद दो मुस्लिम-बहुल रणनीतिक खतरों की घेराबंदी में फंसा देश है.
लेकिन, इस समीकरण को जरा उलटकर देखें कि इससे किसे फायदा हो रहा है? इस तरह के असुरक्षा-बोध का फायदा उठाना BJP के लिए सुविधाजनक है लेकिन यह पाकिस्तान को, और इसके साथ बांग्लादेश को भी हमारी घरेलू राजनीति में बढ़त मिलने का मौका मिल जाता है. यह एक हकीकत है कि ज़िया-उल-हक़ के बाद से, पाकिस्तान की चुनावी राजनीति में भारत शायद ही कोई अहम मुद्दा रहा है.
वैसे, हकीकत यह भी है कि चुनावी राजनीति पाकिस्तान में शायद ही कोई अहमियत रखती है क्योंकि उसका प्रधानमंत्री चाहे कितने भी बड़े बहुमत से जीता हो (नवाज़ शरीफ़, 1997), भारत के लिए प्रासंगिक नीतियों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता, और फौज चुनाव लड़ती नहीं. फिर भी, हकीकत यह है कि भारत के साथ जब थोड़ी शांति रहती है उस दौरान घरेलू मामलों में पाकिस्तानी फौज का दबदबा कमजोर हो जाता है. उदाहरण के लिए, ऐसा 2003 और 2008 में देखा गया था. तब सड़कों पर यह नारा बुलंद हुआ था कि ‘यह जो दहशतगर्दी है, उसके पीछे वर्दी है.’ ISI ने 26/11 कांड करके इस ‘भटकाव’ को ‘दुरुस्त’ किया, भारत की ओर से हमले का खौफ पैदा किया, और फौज ने पाकिस्तान की एकमात्र रक्षक होने का अपना दावा फिर से कायम कर लिया. मुनीर ने ऑपरेशन सिंदूर का यही इस्तेमाल किया.
वे जानते हैं कि मोदी सरकार उनके उकसावों का जवाब देने को प्रतिबद्ध है, इसलिए भारत की राजनीति में खेल करने की कुंजी उनके हाथ में है. अगर वे यह खेल करने में कामयाब रहते हैं, तो उनकी अपनी गद्दी अगले दस साल के लिए महफूज रहने वाली है. तब उन्हें इसकी परवाह नहीं होगी कि उनके अपने मुल्क के कितने हवाई अड्डे तबाह होते हैं, क्योंकि एक छोटी लड़ाई में, पूर्वाग्रहग्रस्त जनमत उनकी कहानी पर हमेशा यकीन कर लेगा.
हमारी आंतरिक राजनीति पर पाकिस्तान का जितना असर है, उतना बांग्लादेश का नहीं है. लेकिन दोनों ने अगर हाथ मिला लिए तो इससे भारत को नुकसान ही होगा. जो भी हो, ये बातें ‘पार्टी पॉलिटिक्स’ की नहीं हैं. यह भारत के रणनीतिक हित का मामला है. उसके दोनों तरफ दो बड़े पड़ोसी देश अगर आक्रामक रुख अपना लेते हैं और हाथ मिला लेते हैं तब भारत को क्या हासिल होगा? भारत की कोशिश यह होनी चाहिए कि वे हाथ न मिला पाएं. यह पाकिस्तान को बांग्लादेश से दूर करके नहीं किया जा सकता. मुनीर को इसके लिए बढ़ावा देने की हम कोई पेशकश नहीं कर सकते, न ही वे इसके काबिल हैं.
दशकों से भारत में दो तरह की प्रतिद्वंद्वी विचारधारा प्रचलित रही है. जो ज्यादा प्रबल विचार है उसमें इस बात पर जोर दिया जाता है कि विदेश तथा रणनीतिक नीति राजनीति से मुक्त रहे, इस लिहाज से कि हर कोई उसे राष्ट्रीय नीति के रूप में कबूल करे. प्रायः पूरा जनमत इसके पक्ष में रहा है, खासकर शीतयुद्ध वाले दौर में. दूसरी विचारधारा कहती है कि विदेश नीति घरेलू नीति का एक हिस्सा होना चाहिए और उसको ही आगे बढ़ाती हो. यही लोकतंत्र की सच्ची भावना है. लेकिन मैं पूरी विनम्रता से कहना चाहूंगा कि मैं भी इस विचार का हूं कि रणनीतिक सोच राजनीति से अछूता नहीं रह सकता.
अटल बिहारी वाजपेयी के उत्कर्ष ने यथास्थिति को तोड़ दिया. तब से हम भारत में राजनीतिक बदलाव के साथ नीतियों में बदलाव होता देखते रहे हैं. यह अच्छी बात है. मतदाता जब ईवीएम का बटन दबाते हैं उस समय उन्हें मुफ्त अनाज और खाते में सीधे पैसे आने के मामलों के सिवा व्यापक मसलों की भी जानकारी होनी चाहिए. फिलहाल तो इसका उल्टा ही हो रहा है.
हमारी जो ध्रुवीकृत राजनीति है, उसमें पड़ोसी देशों के प्रति हमारी नीति को प्रमुखता देकर हम उनकी अहमियत ही बढ़ा रहे हैं. यह ऐसा खेल है जिसे खेलना उन्हें, खासकर पाकिस्तान को, खूब आता है. इससे भारत के लिए विकल्प और गुंजाइश सीमित हो जाती है. इसे ठीक करना जरूरी है. इसकी शुरुआत छोटी चीजों से भी की जा सकती है, मसलन भारतीय क्रिकेट टीम को बांग्लादेश में मैच खेलने का निमंत्रण स्वीकार करके.
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