आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का प्रशासन अब इस बात का जवाब ढूंढने में लगा है कि राजस्थान सरकार ने आगरा के पॉश जयपुर हाउस इलाके की कुछ जमीन पर अपना मालिकाना हक कैसे जताया है. राजस्थान सरकार के दावे में दो ऐतिहासिक बंगले शामिल हैं, जिनमें GST कार्यालय और आगरा विकास प्राधिकरण का कार्यालय है. इसके अलावा करीब 100 बीघा जमीन भी इस दावे में शामिल है, जहां BJP और उसके वैचारिक संगठन RSS के स्थानीय कार्यालय हैं.
राजस्थान के मुख्य सचिव ने पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश सरकार को एक चिट्ठी लिखकर मांग की कि घनी आबादी वाले जयपुर हाउस इलाके में मौजूद इस जमीन का मालिकाना हक राजस्थान को सौंपा जाए. राजस्थान का कहना है कि यह जमीन 14 रियासतों के विलय से राजस्थान के संयुक्त राज्य बनने से पहले जयपुर की तत्कालीन रियासत की थी.
अब तक देखे गए रिकॉर्ड से यह साफ नहीं हुआ है कि उत्तर प्रदेश सरकार और आगरा नगर निगम ने यह जमीन कैसे हासिल की, इसे अलग-अलग प्लॉटों में कैसे बांटा और राजस्थान की आपत्तियों के बावजूद इसे कैसे बेचा.
राजस्थान सरकार ने मथुरा, प्रयागराज और वाराणसी की कुछ संपत्तियों पर भी इसी तरह के दावे किए हैं. ये दावे उन संपत्तियों की व्यापक समीक्षा के बाद किए गए हैं, जिनके बारे में राजस्थान का कहना है कि वे कभी जयपुर की तत्कालीन रियासत की थीं.
आगरा के अपर जिलाधिकारी प्रशासन आजाद भगत सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि सवाल यह नहीं है कि जयपुर रियासत के पास आगरा में जमीन थी या नहीं, क्योंकि ऐतिहासिक रिकॉर्ड से यह बात साबित होती है. असली चुनौती यह पता लगाना है कि 1949 से 1952 के बीच, जब जयपुर समेत 14 रियासतों का विलय हुआ और राजस्थान का संयुक्त राज्य बना, उस समय यह जमीन कानूनी तौर पर किस श्रेणी में आती थी.
दो ऐतिहासिक बंगलों और 100 बीघा जमीन के अलावा, राजस्थान ने मनकामेश्वर मंदिर क्षेत्र के एक हिस्से और आगरा में मुख्य सड़क के किनारे की जमीन की एक पट्टी पर भी दावा किया है.
घनी आबादी वाले जयपुर हाउस इलाके में कई बड़े नेताओं, डॉक्टरों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के निजी घर भी हैं.
राजस्थान के दावे का आधार
राजस्थान सरकार के दावे के समर्थन में राजस्थान के मुख्य सचिव ने अपनी चिट्ठी में राजस्थान कॉवेनेंट के आर्टिकल VI(2)(c) का हवाला दिया है. यह 1949 में भारत सरकार और 14 रियासतों के शासकों के बीच हुआ एक समझौता था. यह समझौता संविधान बनने से पहले हुआ था.
चिट्ठी में 16 फरवरी 1952 की एक राजपत्र अधिसूचना का भी जिक्र किया गया है. इसमें जयपुर रियासत की संपत्तियों की सूची दी गई थी. इसमें मिर्जा राजा जय सिंह का महल भी शामिल था. इसी इमारत में इस समय आगरा का GST कार्यालय है.
आगरा के जिलाधिकारी ने अब जमीन के पुराने रिकॉर्ड और बाद में हुए सभी हस्तांतरणों की विस्तार से जांच के आदेश दिए हैं. इसका मकसद यह पता लगाना है कि उस समय, यानी कॉवेनेंट से पहले, यह जमीन जयपुर की रियासत की थी या जयपुर के राजपरिवार की निजी संपत्ति थी. पुराने जमीन रिकॉर्ड देखने के लिए एक टीम लखनऊ भी भेजी जा रही है.
अगर जांच में यह पता चलता है कि उस समय जमीन जयपुर रियासत की थी, तो राजस्थान कॉवेनेंट का आर्टिकल VI(2)(c) यहां लागू होगा और जमीन का मालिकाना हक राजस्थान सरकार के पास चला जाएगा.
दूसरी तरफ, अगर यह पता चलता है कि जमीन जयपुर के राजपरिवार की निजी संपत्ति थी, तो अधिकारियों को यह भी देखना होगा कि जयपुर के राजघराने ने इस संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति के तौर पर सूचीबद्ध किया था या नहीं और यह सूची भारत सरकार को दी थी या नहीं.
ऐसे मामलों में सिर्फ एक राजपत्र दस्तावेज से मामला तय नहीं हो सकता. जमीन के मालिकाना हक की पूरी कड़ी की जांच करनी होगी. सिर्फ राजस्थान कॉवेनेंट को देखना पर्याप्त नहीं होगा.
राजस्थान कॉवेनेंट का आर्टिकल VI(2)(c) साफ तौर पर कहता है कि सदस्य रियासतों की सभी संपत्तियां और देनदारियां राजस्थान के संयुक्त राज्य की संपत्ति और देनदारियां बन जाएंगी. राजस्थान सरकार के दावे का मुख्य आधार यही आर्टिकल है. लेकिन राजस्थान सरकार ने अभी यह साफ नहीं किया है कि यह जमीन रियासत की थी या शासक की निजी संपत्ति थी.
राजस्थान कॉवेनेंट के आर्टिकल्स XI और XII दोनों तरह की संपत्तियों में साफ अंतर करते हैं और दोनों के लिए अलग-अलग अधिकार तय करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 1978 में कर्नल हिज़ हाइनेस सवाई तेज सिंहजी, अलवर के महाराजा बनाम भारत संघ मामले में इन अधिकारों को मान्यता दी थी. अदालत ने कहा था कि कॉवेनेंट से पहले रियासतों की जो संपत्तियां थीं, वे न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं थीं. साथ ही, राजस्थान कॉवेनेंट का आर्टिकल XI शासकों की निजी संपत्तियों की सुरक्षा करता था, अगर उन संपत्तियों की सूची भारत सरकार को दी गई थी.
आपत्ति के बावजूद जमीन के प्लॉट बनाए गए
इस कई दशक पुराने विवाद को और जटिल बनाने वाली बात यह है कि 1952 से 1955 के बीच राजस्थान और उत्तर प्रदेश सरकारों के बीच जयपुर हाउस इलाके की इस जमीन को लेकर काफी पत्राचार हुआ था.
उस समय राजस्थान ने आगरा इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की ओर से जयपुर हाउस इलाके की 100 बीघा जमीन और दो ऐतिहासिक बंगलों को अधिग्रहित करने पर आपत्ति जताई थी. राजस्थान ने उत्तर प्रदेश से कहा था कि अधिग्रहण रोक दिया जाए और जयपुर की तत्कालीन रियासत की किसी भी संपत्ति का इस्तेमाल करने से पहले राजस्थान से अनुमति ली जाए.
आगरा इंप्रूवमेंट ट्रस्ट ने 20 अक्टूबर 1951 को जयपुर हाउस विकास योजना के लिए तकनीकी मंजूरी हासिल कर ली थी.
लेकिन जब ट्रस्ट ने जमीन का अधिग्रहण शुरू किया, तब जयपुर रियासत ने आपत्ति जताई. जुलाई 1955 की एक चिट्ठी में इसका जिक्र मिलता है.
खास बात यह है कि इस पत्राचार में यह भी बताया गया है कि ट्रस्ट ने जमीन को 4 लाख रुपये में खरीदने और विकास करने के बाद उसे 7 रुपये प्रति वर्ग गज के हिसाब से बेचने का प्रस्ताव दिया था. ट्रस्ट ने कहा था कि मुआवजा देने के बाद भी यह योजना आर्थिक रूप से फायदेमंद रहेगी.
हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. सरकार को चिंता थी कि अगर विकसित जमीन की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई, तो राजस्थान को दिया गया मुआवजा राज्य सरकार के लिए बड़ी आर्थिक परेशानी बन सकता है.
जयपुर रियासत की आपत्तियों और राजस्थान को मुआवजा देने से उत्तर प्रदेश सरकार के इनकार के बावजूद, आगरा नगर निगम ने 1960 के दशक में जयपुर हाउस इलाके की जमीन को 350 प्लॉटों में बांट दिया. इनमें से 110 प्लॉट सहकारी समितियों के जरिए बेच दिए गए.
सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि अब तक देखे गए दस्तावेजों से यह पता नहीं चला है कि जयपुर रियासत की आपत्तियों के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार और आगरा नगर निगम ने यह जमीन कैसे हासिल की.
लेकिन इस मामले की जटिलता सिर्फ जमीन का मालिकाना हक तय करने तक सीमित नहीं है.
संविधान के आर्टिकल 1 और आर्टिकल 3 के अनुसार, कोई भी राज्य संवैधानिक तौर पर दूसरे राज्य के अंदर अपनी अलग जमीन या इलाका नहीं रख सकता. ये आर्टिकल्स राज्यों और उनके क्षेत्रों को तय करते हैं और संसद को राज्यों की सीमाएं तय करने की शक्ति देते हैं.
अगर राजस्थान यह साबित कर देता है कि आगरा के जयपुर हाउस इलाके की जमीन उसकी है, तो मामला एक संवैधानिक सवाल बन जाएगा.
आगरा प्रशासन को ऐसी ही दिक्कतें उन संपत्तियों को लेकर भी हैं, जो तत्कालीन रियासतों से जुड़ी हुई हैं. इनमें कोठी मीना बाजार भी शामिल है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इस जगह पर शिवाजी को समर्पित एक संग्रहालय बनाने का फैसला किया है.
इस संपत्ति को लेकर मालिकाना हक का मुकदमा अभी अदालत में लंबित है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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