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Saturday, 19 September, 2026
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भारत की कृषि क्यों पिछड़ी? जमीन-पानी की कमी नहीं, नीतियों और निवेश की कमी रही वजह

1986 में भानु प्रताप सिंह ने निबंध में तर्क दिया कि भारत में कृषि की कम उत्पादकता प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि कम निवेश, किसानों पर सरकारी नियंत्रण और कृषि से जुड़े संसाधनों के असमान बंटवारे का नतीजा रही.

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पुराने चीन में माता-पिता अपनी बेटियों के पैरों को बांधकर रखते थे ताकि उनका आकार छोटा रहे. उस समय छोटे पैर सुंदर माने जाते थे. स्वतंत्रता के बाद भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ. नेहरू और महालनोबिस ने एक ऐसी विकास रणनीति अपनाई जिसे वे प्रगतिशील मानते थे, लेकिन जिसने भारतीय कृषि को अपनी पूरी क्षमता तक बढ़ने से रोक दिया. इस रणनीति के अनुसार आर्थिक विकास की दर मुख्य रूप से बड़े उद्योगों, खासकर सार्वजनिक क्षेत्र में पूंजी निर्माण पर निर्भर थी. इसलिए देश की अधिकांश पूंजी और अन्य संसाधनों को इसी दिशा में लगा दिया गया. इस व्यवस्था में कृषि की भूमिका केवल इतनी मानी गई कि वह लोगों के लिए न्यूनतम भोजन उपलब्ध कराए, कृषि-आधारित उद्योगों को कच्चा माल दे और औद्योगिक विकास के लिए अतिरिक्त उत्पादन उपलब्ध कराए. कृषि का अपने विकास के लिए विस्तार करना या किसानों की आर्थिक और जीवन-स्थितियों को बेहतर बनाना गौण समझा गया, हालांकि राजनीतिक कारणों से कृषि की लगातार प्रशंसा की जाती रही.

अगर इस विकास रणनीति की नीतिगत पाबंदियां न होतीं, तो भारतीय कृषि कहीं अधिक तेजी से विकसित हो सकती थी और आज भारत कृषि उत्पादों के प्रमुख निर्यातक देशों में होता. राजीव गांधी का कहना है कि वे पंडित नेहरू और श्रीमती गांधी द्वारा बनाई गई नीतियों का ही अनुसरण कर रहे हैं. कम-से-कम कृषि के क्षेत्र में अभी तक हमारे पास इस बात पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं है.

प्रकृति की देन

कृषि उत्पादन के मामले में भारत को कई प्राकृतिक लाभ प्राप्त हैं. हमारे देश का आधे से अधिक भौगोलिक क्षेत्र खेती योग्य है, जबकि पूरी दुनिया में यह अनुपात लगभग 11 प्रतिशत है. हमारी जनसंख्या भले ही बड़ी हो, लेकिन अमेरिका, सोवियत संघ और कनाडा को छोड़ दें तो भारत में प्रति व्यक्ति उपलब्ध कृषि भूमि दुनिया के औसत के बराबर और एशिया के बाकी हिस्सों की तुलना में 63 प्रतिशत अधिक है.

हमारे पास पानी के पर्याप्त स्रोत भी हैं, जिनसे 11.3 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकती है, लेकिन हमारा सबसे बड़ा लाभ हमारी समशीतोष्ण जलवायु है. इसकी वजह से हम साल में दो से तीन फसलें उगा सकते हैं, जबकि अधिकांश देशों में कड़ाके की सर्दियों के कारण साल में केवल एक फसल ही ली जा सकती है. इसलिए हमारे लोगों में व्यापक कुपोषण का कारण प्राकृतिक संसाधनों—भूमि, पानी और धूप—की कमी नहीं है. हमारी भूमि की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता उन्नत देशों की तुलना में लगभग एक-तिहाई और विश्व औसत की लगभग दो-तिहाई है. इसका कारण प्रकृति की कमी नहीं, बल्कि उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का कम उपयोग है. हमारी कृषि के लगातार पिछड़े रहने के अन्य संकेत भी हैं.

भारतीय कृषि की क्षमता

भारतीय कृषि की क्षमता बहुत बड़ी है, यह केवल सैद्धांतिक अनुमान नहीं है. देश के कुछ हिस्सों में इसे व्यवहार में भी साबित किया जा चुका है. पंजाब की कृषि भूमि देश की कुल कृषि भूमि का 3 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी 1983-84 में उसने देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 9.75 प्रतिशत का योगदान दिया. वहां प्रति हेक्टेयर उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से तीन गुने से भी अधिक थी, लेकिन पंजाब में ऐसा कुछ विशेष नहीं है जो देश के दूसरे हिस्सों में नहीं हो सकता. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में लगाए गए राष्ट्रीय प्रदर्शन खेतों का उद्देश्य विभिन्न फसलों की उत्पादन क्षमता का पता लगाना है. इन खेतों में धान, गेहूँ, मक्का, बाजरा और ज्वार की औसत पैदावार राष्ट्रीय औसत से क्रमशः 3.00, 2.56, 3.31, 6.34 और 6.12 गुना अधिक रही है.

इससे स्पष्ट है कि हमारी कृषि की कम उत्पादकता का कारण प्रकृति की कमी नहीं, बल्कि कृषि में पर्याप्त मात्रा में आवश्यक साधनों और निवेश का उपयोग न होना है.

कृषि की क्षमता को किसी औद्योगिक इकाई की उत्पादन क्षमता की तरह देखा जाना चाहिए. किसी औद्योगिक इकाई के प्रदर्शन को परखने के लिए यह देखा जाता है कि उसकी कुल क्षमता का कितना उपयोग हो रहा है. यही कसौटी कृषि पर लागू करें तो पता चलता है कि कृषि की उपलब्ध क्षमता का उपयोग बहुत कम हो रहा है. संभवतः वास्तविक उत्पादन उसकी संभावित क्षमता का केवल 30 प्रतिशत है.

कृषि का प्रदर्शन

अब देखते हैं कि हाल के वर्षों में और लंबे समय में भारतीय कृषि का प्रदर्शन कैसा रहा है. छठी पंचवर्षीय योजना में खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्यों और वास्तविक उत्पादन को देखें तो योजना के पांचों वर्षों को अलग-अलग और सामूहिक रूप से देखना चाहिए. 1980-81 से 1984-85 के बीच केवल 1983-84 में वास्तविक उत्पादन लक्ष्य से अधिक रहा. बाकी सभी वर्षों में उत्पादन लक्ष्य से कम रहा. इसके बावजूद छठी योजना को कृषि उत्पादन बढ़ाने में अत्यंत सफल बताया गया. यह दावा मुख्यतः 1983-84 के अच्छे प्रदर्शन पर आधारित था. लेकिन इससे संतुष्ट होकर बैठना उचित नहीं है.

प्रति व्यक्ति हमारी कैलोरी खपत आज भी स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक न्यूनतम स्तर से कम है. इससे भी अधिक चिंता की बात दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में लगातार गिरावट है, जबकि गरीब परिवारों के लिए दाल प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है.

छठी योजना के दौरान औसत वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन 13.82 करोड़ टन रहा, जबकि पहली योजना में यह 6.30 करोड़ टन था. पहली से छठी योजना के बीच 30 वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.65 प्रतिशत रही. यही भारत के खाद्यान्न उत्पादन की दीर्घकालीन वृद्धि दर मानी जा सकती है. पिछले पांच वर्षों की वृद्धि दर सबसे तेज नहीं रही; इससे पहले के दो पंचवर्षीय कालखंडों में भी वृद्धि इससे कम थी.

यह भी समझना जरूरी है कि सरकारी गोदामों में आज जो बड़ी मात्रा में खाद्यान्न जमा है, वह देश में जरूरत से ज्यादा उत्पादन का परिणाम नहीं है. इसका कारण 1982, 1983 और 1984 में किए गए अनावश्यक आयात थे. इन वर्षों में देश के भीतर कुल खरीद 4.973 करोड़ टन थी, जबकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से केवल 4.440 करोड़ टन खाद्यान्न वितरित किया गया. यानी देश में खाद्यान्न की कमी नहीं थी. फिर भी इन तीन वर्षों में 80.2 लाख टन खाद्यान्न आयात किया गया.

ये आयात देश की कमी पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि किसानों की कीमतों को दबाए रखने के लिए किए गए थे. जिस वर्ष देश में रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, उसी वर्ष 1975 के बाद सबसे अधिक आयात भी हुआ. रिकॉर्ड उत्पादन और रिकॉर्ड आयात के इस विरोधाभास के कारण सरकार को भारी नुकसान होगा और देशभर के किसानों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण की कमी

भारतीय कृषि को केवल आश्वासनों के सहारे आधुनिक नहीं बनाया जा सकता. इसके लिए कृषि को पर्याप्त पूंजी और अन्य आवश्यक संसाधन देने होंगे. यह आश्चर्यजनक है कि योजना आयोग ने अब तक कृषि के आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक पूंजी की मात्रा तक तय नहीं की है, न ही उसे जुटाने की कोई ठोस योजना बनाई है.

खाद्य और कृषि संगठन ने विकासशील देशों में कृषि विकास के लिए पूंजी की जरूरत का अध्ययन किया है. उनकी पुस्तक एग्रीकल्चर टुवर्ड्स 2000 में कहा गया है कि 1980 से 2000 के बीच कृषि के लिए अतिरिक्त शुद्ध पूंजी-उत्पादन अनुपात 3:1 होगा. मौजूदा सुविधाओं में होने वाली घिसावट को भी शामिल करें तो अतिरिक्त सकल पूंजी-उत्पादन अनुपात 4.5:1 होगा. भारत में कृषि विकास के लिए पूंजी के उपयोग का हमारा अपना अनुभव भी एफएओ के अनुमान की पुष्टि करता है.

पूंजी का सवाल

हमारे देश में गरीबी को उल्लेखनीय रूप से कम करने के लिए अगले 15 वर्षों में कृषि उत्पादन को दोगुना करना जरूरी है और यह पूरी तरह संभव है. अगले 25-30 वर्षों में उत्पादन दोगुना करने से कोई खास मदद नहीं मिलेगी, क्योंकि तब तक हमारी जनसंख्या भी लगभग दोगुनी हो जाएगी और पोषण तथा अन्य मामलों में हम आज जैसी ही स्थिति में रहेंगे.

15 वर्षों में उत्पादन दोगुना करने के लिए हर वर्ष 5 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करनी होगी. इसके लिए कृषि क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण कृषि से मिलने वाले मूल्य-वर्धन का लगभग 22.5 प्रतिशत होना चाहिए. इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि योजनाकार कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण को कृषि के मूल्य-वर्धन के 22.5 प्रतिशत तक कैसे बढ़ाएंगे?

राष्ट्रीय आय के आंकड़ों के अनुसार 1972-73 से 1980-81 के नौ वर्षों में कृषि क्षेत्र में सकल पूंजी निर्माण, कृषि से मिलने वाले मूल्य-वर्धन का केवल 10.79 प्रतिशत था. इसी अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में यह 39.99 प्रतिशत था. यही बताता है कि विनिर्माण उद्योगों की वृद्धि कृषि से तेज क्यों रही.

वास्तव में देश के लिए संपत्ति पैदा करने में विनिर्माण उद्योगों की कोई स्वाभाविक श्रेष्ठता नहीं है. समान पूंजी निवेश पर कृषि से मिलने वाला प्रतिफल विनिर्माण उद्योगों से अधिक है. फिर भी सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है. सार्वजनिक क्षेत्र में विनिर्माण क्षेत्र में पूंजी निर्माण सामान्यतः कृषि की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक रहा है, जबकि राष्ट्रीय शुद्ध घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान विनिर्माण क्षेत्र से दोगुने से भी अधिक है.

सरकार ने कृषि में पर्याप्त निवेश नहीं किया. इसके अलावा, उसने किसानों के पक्ष में व्यापार की शर्तों को बदलने के बजाय ऐसी नीतियां अपनाईं जिनसे कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण भी प्रभावित हुआ. 1970-71 के बाद से गेहूं की सरकारी खरीद कीमत में 2.06 गुना वृद्धि हुई, जबकि सभी वस्तुओं के मूल्य सूचकांक में 3.57 गुना वृद्धि हुई. इसका मतलब है कि आज किसानों को उतनी ही वस्तुएँ खरीदने के लिए 1970-71 की तुलना में 73.3 प्रतिशत अधिक गेहूं बेचना पड़ता है.

उर्वरक को छोड़कर कृषि में इस्तेमाल होने वाली दूसरी वस्तुओं के मामले में स्थिति और खराब है. किसानों को डीजल, बिजली, ट्रैक्टर और कृषि औजार जैसी चीजें खरीदने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक गेहूँ बेचना पड़ता है. चूंकि गेहूँ की उत्पादकता अन्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के साथ कदम नहीं मिला सकी, इसलिए किसानों की वास्तविक आय और उनकी क्रय-शक्ति में भारी गिरावट आई है.

निष्पक्ष विश्लेषण करने वाला कोई भी व्यक्ति देख सकता है कि कीमतों में इस तरह के बदलावों के कारण कृषि क्षेत्र से बाकी अर्थव्यवस्था की ओर आय का जो हस्तांतरण हुआ है, वह सरकार द्वारा कृषि और ग्रामीण विकास पर किए गए खर्च से भी अधिक रहा है.

बंधे हुए उत्पादक और बंधे हुए उपभोक्ता

कृषि उत्पादों की यह मूल्य-स्थिति बाजार की स्वाभाविक मांग और आपूर्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि सरकारी नीतियों का परिणाम है.

सरकार देश में खरीदे गए और विदेशों से आयात किए गए खाद्यान्न को उनकी आर्थिक लागत से बहुत कम कीमत पर वितरित करती है. इससे किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है. इसके अलावा खाद्यान्न के व्यापार, प्रसंस्करण और आवागमन पर प्रतिबंध हैं. केंद्र और राज्य सरकारें कृषि इनपुट पर अप्रत्यक्ष कर लगाती हैं. किसानों को देश में बने ऐसे कृषि उपकरण खरीदने पड़ते हैं जो अक्सर खराब गुणवत्ता के होते हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इससे बेहतर उपकरण कम कीमत पर उपलब्ध हैं.

इस तरह किसानों को “बंधे हुए उत्पादक और बंधे हुए उपभोक्ता” बना दिया गया है.

राष्ट्रीय संसाधनों के वितरण में भी ग्रामीण लोगों को अभी उनका उचित हिस्सा नहीं मिला है. यदि ग्रामीण क्षेत्रों की बिजली और ऋण की जरूरतें पर्याप्त रूप से पूरी की जाएं, तो एक दशक के भीतर ग्रामीण भारत का चेहरा बदल सकता है. लेकिन तमाम बड़े दावों के बावजूद देश में कुल बिजली खपत का केवल लगभग छठा हिस्सा कृषि क्षेत्र को मिलता है. इसी तरह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋण में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल लगभग सातवां हिस्सा है.

कृषि क्षेत्र पर डाली गई यह कीमतों की मार और संसाधनों से वंचित किया जाना कृषि में निवेश और उत्पादन की वृद्धि को लगातार रोकता रहा है. ये सब अब तक अपनाई गई नीतियों के परिणाम हैं.

ग्रामीण प्रगति की दिशा में पहला कदम यही होना चाहिए कि इन नीतियों को बदला जाए और कृषि क्षेत्र को अपने अधिशेष का उपयोग अपने विकास के लिए करने दिया जाए. इसके लिए किसानों को अपनी उपज सबसे अच्छी कीमत पर बेचने का अधिकार वापस देना होगा. यह तभी संभव होगा जब गांवों में पर्याप्त भंडारगृहों का जाल बनाया जाए, खाद्यान्न के व्यापार, प्रसंस्करण और आवागमन पर लगे सभी प्रतिबंध हटाए जाएं और विदेशों से भारी सब्सिडी पर आयात किए गए खाद्यान्न को देश में कम कीमत पर बेचने की प्रथा बंद की जाए.

इसके अलावा, गांवों को रहने के लिए बेहतर स्थान बनाना होगा. इसके लिए सुरक्षित पेयजल, बेहतर संचार व्यवस्था, स्कूल, अस्पताल आदि उपलब्ध कराने होंगे. संक्षेप में, कीमतों में हेरफेर के जरिए कृषि क्षेत्र का शोषण बंद होना चाहिए और ग्रामीण लोगों को बजटीय आवंटनों तथा बिजली और ऋण जैसे दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों में उनका उचित हिस्सा मिलना चाहिए. यह हिस्सा राष्ट्रीय आय में उनके योगदान के अनुपात में होना चाहिए, यदि उनकी संख्या के अनुपात में नहीं.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “भारतीय कृषि — एक विशाल क्षमता, लेकिन अधूरा विकास” था और इसका प्रकाशन मूलरूप से जनवरी 1986 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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