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Saturday, 19 September, 2026
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तिरुप्पुर की सस्ती कपास की असली कीमत कौन चुका रहा है?

जब मिलों को ज़्यादा इनपुट लागत का सामना करना पड़ रहा हो, तो कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी में बार-बार बदलाव से टेक्सटाइल सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस को प्राथमिकता मिली है. लेकिन इस पॉलिसी से फ़ार्मगेट कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है.

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नई दिल्ली: पिछले पांच सालों में नई दिल्ली ने कपास पर लगने वाली एक खास कस्टम ड्यूटी को बार-बार लागू और हटाया है. हर बार ड्यूटी हटने के बाद कपास किसानों की कमाई तेजी से गिरती है, जबकि ड्यूटी दोबारा लगने की खबर पर ज्यादा ध्यान नहीं जाता, क्योंकि तब तक लोगों का ध्यान किसी और मुद्दे पर चला जाता है. यह सिलसिला अब भी जारी है.

अगर भारत की आर्थिक तरक्की से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा नहीं होता, तो यह तरक्की बहुत मायने नहीं रखती. टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग भारत के लिए किसानों को खेती से निकालकर स्थिर और सुरक्षित नौकरियों में लाने का सबसे बड़ा मौका देता है.

तिरुप्पुर का निटवेयर क्लस्टर इसका एक अच्छा उदाहरण है. यहां करीब 20,000 आपस में जुड़ी हुई यूनिट हैं, जो मिलकर एक मजबूत उत्पादन व्यवस्था बनाती हैं. तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्थाएं भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं. इस मॉडल को समझने और दूसरी जगहों पर दोहराने लायक माना जा सकता है.

लेकिन एक अहम सवाल है, जो इस पूरी कहानी को समझने का नजरिया बदल देता है. यह क्लस्टर अपना कच्चा माल इतनी कम कीमत पर कैसे खरीदता है, और आखिर इसका खर्च कौन उठाता है?

कृषक समाज के चेयरमैन और लंबे समय से किसानों की आजीविका के समर्थक रहे अजय वीर जाखड़ ने हाल ही में X पर एक पोस्ट में इस मुद्दे को उठाया. उन्होंने कहा कि कपास की कीमत “कॉटन एडवाइजरी बॉडी के जरिए टेक्सटाइल मंत्रालय नियंत्रित करता है”, न कि कृषि बाजार.

यह बात इस पूरी दलील में एक बड़ी कमी है.

क्लस्टर के पीछे का लीवर

भारत में कपास का बाजार किसी सामान्य, किताबों में बताए गए बाजार जैसा नहीं है. टेक्सटाइल मंत्रालय, कॉटन एडवाइजरी बोर्ड के साथ मिलकर कपास के आयात और निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी को नियंत्रित करता है. कॉटन एडवाइजरी बोर्ड एक वैधानिक संस्था है, जिसे मंत्रालय से फंड मिलता है.

यह व्यवस्था किसानों, जो अपनी फसल का उचित दाम चाहते हैं, और मिलों, जिन्हें लगातार और सस्ता कच्चा माल चाहिए, दोनों के हितों में संतुलन बनाने के लिए बनाई गई थी. लेकिन पिछले पांच सालों में यह व्यवस्था एकतरफा वाल्व की तरह काम करती दिखाई दी है.

Infographics: Shruti Naithani/ThePrint
इन्फोग्राफिक्स: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

घटनाओं का क्रम इसे समझने में मदद करता है. अप्रैल 2022 में सरकार ने कपास पर लगने वाली आयात ड्यूटी हटा दी थी. उस समय मिलों की ओर से कहा गया था कि घरेलू कपास की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ गई है. उसी साल अक्टूबर में, जब कपास की सप्लाई पर्याप्त मानी गई, तो यह ड्यूटी फिर लगा दी गई.

अगस्त 2025 में भी ऐसा ही हुआ. उस समय ड्यूटी हटा दी गई और इसे दिसंबर तक बढ़ाया गया. इसके बाद 1 जनवरी 2026 को ड्यूटी फिर लगा दी गई. यही सिलसिला 30 मई 2026 को दोबारा हुआ. उस समय साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन और तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन की ओर से सार्वजनिक याचिकाएं और मांगें आने के बाद सरकार ने हस्तक्षेप किया.

तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने उन सामूहिक संस्थाओं को बनाने में अहम भूमिका निभाई है, जिनकी वजह से यह क्लस्टर अच्छी तरह काम करता है.

लेकिन इसी एसोसिएशन ने हाल में सार्वजनिक तौर पर लॉबिंग भी की, जिसके बाद ऐसी ड्यूटी हटा दी गई जो कुछ हद तक कपास किसानों की आय की रक्षा करने के लिए थी. पांच साल में पांच बार ड्यूटी में बदलाव हुआ, और हर बार संगठित उद्योग के प्रतिनिधित्व के बाद बदलाव हुआ, जबकि संगठित किसान प्रतिनिधित्व की ओर से ऐसा कोई दबाव नहीं आया. यह केवल संयोग नहीं है. यह संस्थागत व्यवस्था का नतीजा है.

समय के हिसाब से बदलती कीमत

सरकार के आंकड़े इस व्यवस्था के असर की पुष्टि करते हैं और वही पैटर्न दिखाते हैं, जिसकी उम्मीद की जा सकती है. दिसंबर 2025 में राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में बताया गया कि अगस्त 2025 में ड्यूटी हटाए जाने के बाद घरेलू कपास की कीमत करीब 57,000 रुपये प्रति कैंडी से गिरकर करीब 52,000 रुपये प्रति कैंडी हो गई.

इसी तरह, कपास बाजार पर नजर रखने वाले एक विशेषज्ञ न्यूजलेटर ने मई 2026 में ड्यूटी हटाए जाने के बाद भी ऐसा ही रुझान देखा. ड्यूटी हटने के एक महीने के अंदर कीमत करीब 65,800 रुपये से गिरकर 61,000 रुपये प्रति कैंडी हो गई.

इन दोनों आंकड़ों में अलग-अलग बेंचमार्क इस्तेमाल हुए हैं, इसलिए इन्हें एक ही लगातार आंकड़ों की श्रृंखला नहीं माना जाना चाहिए. लेकिन एक बात साफ दिखाई देती है. हर बार ड्यूटी हटने के कुछ ही हफ्तों में किसानों को मिलने वाली कपास की कीमत में गिरावट आई.

जॉर्ज स्टिगलर ने करीब आधी सदी पहले इस पैटर्न की पहचान की थी. 1971 के अपने पेपर “द थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक रेगुलेशन” में उन्होंने कहा था कि “आम तौर पर उद्योग ही नियमन को अपने पक्ष में हासिल करता है और उसे मुख्य रूप से अपने फायदे के लिए बनाया और चलाया जाता है.” यही उस विचार की बुनियादी बात है, जिसे अर्थशास्त्री अब रेगुलेटरी कैप्चर कहते हैं.

Infographics: Shruti Naithani/ThePrint
इन्फोग्राफिक्स: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

इसमें किसी साजिश की जरूरत नहीं है. मिलों और एक्सपोर्टर्स के पास मजबूत और अच्छी तरह फंड की गई एसोसिएशन हैं, जिनकी मंत्रालय तक सीधी पहुंच है. इसके उलट, कपास किसान लाखों की संख्या में हैं और कई राज्यों में फैले हुए हैं. उनके पास इसी तरह का प्रतिनिधित्व नहीं है. इस असमानता को देखते हुए, रेगुलेटरी कैप्चर केवल एक संभावना नहीं है. यह एक ऐसा नतीजा है जिसकी उम्मीद की जा सकती है.

इंडस्ट्रियल ऑर्गनाइजेशन की एक दूसरी अवधारणा भी इस स्थिति को समझने में मदद करती है. जब किसी बाजार में बहुत सारे छोटे विक्रेता हों और उनके सामने कुछ बड़े खरीदारों का एक सीमित समूह हो, तो अर्थशास्त्री इसे मोनोप्सनी पावर कहते हैं. यह मोनोपॉली का उल्टा है, जहां बाजार की ताकत खरीदार के हाथ में होती है.

भारत की कपास वैल्यू चेन में ड्यूटी लगने से पहले ही ऐसी स्थिति दिखाई देती है. लाखों छोटे किसान अपनी कपास कुछ खास केंद्रों में केंद्रित स्पिनिंग और मिलिंग उद्योग को बेचते हैं. ऐसी ड्यूटी व्यवस्था, जो सबसे ज्यादा जोर से शिकायत करने वालों की मांग पर प्रतिक्रिया देती है, इस असंतुलन को दूर नहीं करती. इसके बजाय यह असंतुलन को और बढ़ाती है.

इन बातों से तिरुप्पुर की बड़ी उपलब्धियां कम नहीं होतीं और न ही इस तर्क पर सवाल उठता है कि टेक्सटाइल उद्योग को भारत के प्रमुख रोजगार देने वाले क्षेत्रों में होना चाहिए. तिरुप्पुर की उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं और टेक्सटाइल उद्योग को भारत में रोजगार देने वाला प्रमुख क्षेत्र बने रहना चाहिए. लेकिन आंकड़े एक महत्वपूर्ण बात सामने रखते हैं. ऐसी नीति व्यवस्था, जो बार-बार किसान से मिलने वाली कीमत की तुलना में प्रोसेसर के मुनाफे को फायदा पहुंचाती है, और हर बार इसके लिए किसी उचित सार्वजनिक हित का कारण दिया जाता है, उस सेक्टर की कम लागत वाली प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करती है.

क्या बदलाव होना चाहिए

इस समस्या का समाधान किसानों और एक्सपोर्टर्स में से किसी एक को चुनना नहीं है. न ही इसका मतलब तिरुप्पुर के मॉडल को खारिज करना है. तीन खास बदलाव इस अंतर को कम कर सकते हैं.

पहला, ड्यूटी लगाने या हटाने के सरकार के विवेकाधीन फैसलों की जगह पहले से तय नियम लागू होने चाहिए. एक पहले से घोषित फॉर्मूला होना चाहिए, जो घरेलू बेंचमार्क और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ कीमत, जैसे Cotlook A Index, के बीच के अंतर से जुड़ा हो. इससे सभी पक्षों को पहले से पता होगा कि किन परिस्थितियों में ड्यूटी हटेगी और किन परिस्थितियों में फिर से लगाई जाएगी.

इससे ड्यूटी में बदलाव का मौजूदा तरीका खत्म हो जाएगा, जिसमें हाल की लॉबिंग का असर पड़ सकता है. इससे वह भरोसा और स्थिरता भी वापस आ सकती है जिसकी एक्सपोर्टर्स जरूरत बताते हैं, क्योंकि लगातार बदलती नीति ने भारत की एक भरोसेमंद कपास सप्लायर के रूप में विश्वसनीयता को पहले ही नुकसान पहुंचाया है.

दूसरा, किसान संगठनों को कॉटन एडवाइजरी बोर्ड में केवल सलाह देने की भूमिका के बजाय फैसले लेने की प्रक्रिया में वैधानिक सीट दी जानी चाहिए. अभी उद्योग संगठनों के पास मंत्रालय के फैसलों को प्रभावित करने के प्रभावी रास्ते हैं. कपास किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों को औपचारिक और अनिवार्य सीट देने से प्रतिनिधित्व का यह असंतुलन उसकी जड़ से दूर किया जा सकता है. इससे उस स्थिति पर निर्भरता कम होगी, जिसमें बाद में राजनीतिक दबाव बनाना पड़ता है, जैसा 2012 में कपास के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को वापस लेने के मामले में हुआ था.

तीसरा, हर बार ड्यूटी हटाने के साथ किसानों के लिए अपने आप लागू होने वाला, उसी तरह का एक न्यूनतम सुरक्षा प्रावधान होना चाहिए. इसमें MSP के ऊपर एक अतिरिक्त भुगतान शामिल हो सकता है, जिसका खर्च उसी सरकारी वित्तीय संसाधन से हो जिससे ड्यूटी हटाने की लागत को पूरा किया जाता है.

अगर सरकार कपास की कीमत बढ़ने के समय मिलों की मदद करने के लिए ड्यूटी से मिलने वाला राजस्व छोड़ने को तैयार है, तो बाद के महीनों में जब घरेलू कीमतें एक तय सीमा से नीचे गिरें, तब किसानों के लिए भी उसी तरह का फॉर्मूला-आधारित समर्थन शुरू होना चाहिए.

भारत को तिरुप्पुर जैसी कहानियां कम करने की जरूरत नहीं है. उसे कपास की कीमत तय करने वाली उस संस्थागत व्यवस्था की जरूरत है, जो इसके आधार पर बनाए गए रोजगार के बड़े लक्ष्य के साथ सही तालमेल बैठाए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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