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Saturday, 19 September, 2026
होममत-विमतबदलते शासन के दौर में नेताओं के लिए लगातार सीखना क्यों ज़रूरी है

बदलते शासन के दौर में नेताओं के लिए लगातार सीखना क्यों ज़रूरी है

MP के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियों को जारी रखते हुए, डॉ. श्रीकांत शिंदे, जिनके पास डॉ. डी. वाई. पाटिल मेडिकल कॉलेज से MBBS और MS की डिग्री है, उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से MBA करना शुरू कर दिया है.

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आज शासन चलाना लगातार ज्यादा जटिल होता जा रहा है. किसी जनप्रतिनिधि के सामने आने वाली समस्याएं शायद ही कभी सिर्फ एक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं. इन बदलते समय में ऐसे नेता, जिनमें लगातार सीखते रहने की जिज्ञासा हो, एक ताजगी की तरह सामने आते हैं. जब कोई मौजूदा सांसद दोबारा क्लासरूम में जाकर पढ़ाई करने का फैसला करता है, तो यह प्रशंसा के लायक बात है. यह सीखने की भावना और इस भरोसे को दिखाता है कि सीखना कभी रुकना नहीं चाहिए.

डॉ. श्रीकांत शिंदे ने डॉ. डी. वाई. पाटिल मेडिकल कॉलेज. हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर से MBBS और MS (Orthopaedics) की पढ़ाई की और इसके बाद लगातार तीन बार कल्याण से सांसद बनकर सार्वजनिक जीवन में आए. अब संसद सदस्य के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमबीए कर रहे हैं. उन्होंने खुद को सिर्फ कल्याण का सांसद नहीं, बल्कि सबसे पहले एक छात्र बताया है.

इस सोच में एक खास बात है. जब नेता यह घमंड नहीं रखते कि ‘उन्हें सब कुछ पता है’, तो शासन लगातार सीखने की प्रक्रिया बन जाता है. सीखने, जो सीखा है उसे फिर से समझने और दोबारा सीखने की इच्छा नेताओं को समस्याओं को पूरे नज़रिए से देखने में मदद करती है. स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, तकनीक, शिक्षा और शहरी विकास शासन के अलग-अलग हिस्से नहीं हैं, बल्कि ये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. जो नेता लगातार सीखता रहता है, वह इन सभी चीजों के बीच के संबंध को बेहतर तरीके से समझ सकता है.

लगातार चलने वाली प्रक्रिया

जिस नेता को अर्थव्यवस्था की समझ हो, वह वित्तीय सीमाओं, सरकारी खर्च और कल्याणकारी योजनाओं को लंबे समय तक चलाने की क्षमता को बेहतर समझ सकता है. जो नेता तकनीक और डेटा को समझता है, वह देख सकता है कि डिजिटल सिस्टम, एआई और डेटा के आधार पर चलने वाला प्रशासन, सेवाएं देने से लेकर शहर की योजना बनाने तक कई चीजों को कैसे बेहतर कर सकता है.

जन नीति में सीखना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. तकनीक लगातार बदल रही है, अर्थव्यवस्थाएं बदल रही हैं और चुनौतियां भी बदल रही हैं. उदाहरण के लिए साइबर क्राइम एक अपेक्षाकृत नई समस्या है, जिससे सरकारों को निपटना पड़ा है. ऐसी नई चुनौतियों को समझने और उनका जवाब देने के लिए नेताओं में सीखने की क्षमता और इच्छा होना जरूरी है.

महाराष्ट्र में ही ऐसे उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों की समझ को जोड़ने से शासन को मजबूत किया जा सकता है. महाराष्ट्र कैडर के आईएएस अधिकारी श्रीकर परदेशी ने हार्वर्ड केनेडी स्कूल से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से पब्लिक हेल्थ की पढ़ाई की. बाद में उन्होंने पिंपरी-चिंचवड में स्मार्ट सारथी शिकायत प्लेटफॉर्म जैसी पहल के जरिए तकनीक का इस्तेमाल करके नागरिक प्रशासन को ज्यादा जवाबदेह और लोगों की ज़रूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाने की कोशिश की. इसी तरह पुणे नगर आयुक्त कुणाल कुमार ने नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और हार्वर्ड कैनेडी स्कूल में मिली अपनी ट्रेनिंग का इस्तेमाल लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों में खुले डेटा और नागरिकों की भागीदारी के वैश्विक मॉडल को समझने के लिए किया और उन्हें भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक अपनाने की कोशिश की.

लगातार पढ़ाई करना और दुनिया में अपनाई जा रही व्यवस्थाओं का अनुभव लेना प्रशासनिक अधिकारियों के बीच अपेक्षाकृत आम बात है. उनके करियर में प्रोफेशनल लर्निंग का हिस्सा होना पहले से स्थापित है, लेकिन किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि का पद पर रहते हुए और अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियां निभाते हुए औपचारिक पढ़ाई शुरू करना कम देखने को मिलता है. यही वजह है कि मौजूदा सांसद का दोबारा क्लासरूम में जाना सार्वजनिक नेतृत्व के बदलते तरीके को दिखाने वाली दिलचस्प बात है.

अलग तरीके से सोचने की कोशिश

LSE प्रोग्राम खुद स्ट्रेटेजी, फाइनेंस, लीडरशिप, इनोवेशन और बिज़नेस, पॉलिसी और ग्लोबल मामलों के बीच बातचीत को एक साथ लाता है. इसे एक ऐसे प्रोग्राम के तौर पर बनाया गया है जो अनुभवी प्रोफेशनल्स को पढ़ाई के साथ-साथ अपना काम जारी रखने की इजाज़त देता है. इसलिए, डॉ. श्रीकांत शिंदे पढ़ाई के लिए पॉलिटिक्स से दूर नहीं जा रहे हैं. बल्कि वे मौजूदा प्रोफेशनल और पॉलिटिकल अनुभव में एक और डिसिप्लिन जोड़ रहे हैं.

सीखने का यह तरीका कल्याण के विकास की योजना में भी दिखाई देता है. प्रस्तावित डबल-डेकर मेट्रो मॉडल में नीचे सड़कें, उनके ऊपर फ्लाईओवर और सबसे ऊपर मेट्रो होगी. यह सीमित जगह में शहर की आवाजाही से जुड़ी कई जरूरतों को पूरा करने की कोशिश है. यह सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर समाधानों से आगे सोचने और यह देखने का एक उदाहरण है कि शहर के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की अलग-अलग परतें एक साथ कैसे काम कर सकती हैं.

इसी तरह उल्हासनगर, अंबरनाथ और बदलापुर नगर निकायों से जुड़ी संयुक्त ठोस कचरा प्रबंधन परियोजना ऐसी समस्या के लिए क्षेत्रीय तरीके को दिखाती है, जो नगर निकायों की सीमाओं तक सीमित नहीं रहती.

डॉ. शिंदे का संसदीय रिकॉर्ड भी इस संदर्भ को समझने में मदद करता है. PRS Legislative Research के मुताबिक, 18वीं लोकसभा में 13 अगस्त 2026 तक सांसद की सदन में 82 प्रतिशत उपस्थिति रही. उन्होंने 37 बहसों में हिस्सा लिया और 257 सवाल पूछे. ये सवाल रेलवे और हाईवे से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क तक कई मुद्दों से जुड़े थे.

राजनीतिक पद एक कार्यकाल के लिए मिल सकता है, लेकिन सीखते रहने की आदत पूरी जिंदगी बनाए रखनी पड़ती है. भारत के साथ-साथ भारतीय राजनीति भी बदल रही है. चुने हुए जनप्रतिनिधियों के सामने आने वाली चुनौतियां अब तेजी से अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक बाजारों तक फैल रही हैं. राजनीतिक अनुभव जरूरी है, लेकिन नए क्षेत्रों को समझने की इच्छा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

शायद किसी नेता के दोबारा यूनिवर्सिटी जाने से मिलने वाली सबसे अहम सीख यह नहीं है कि किसी के पास हर सवाल का जवाब होना चाहिए, बल्कि यह है कि बेहतर सवाल पूछते रहने की जिज्ञासा भी होनी चाहिए.

लेखिका शिवसेना की नेशनल सेक्रेटरी और स्पोक्सपर्सन हैं. उनका एक्स हैंडल @ShainaNC है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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