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Saturday, 19 September, 2026
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मुस्लिम पर्सनल लॉ का POCSO से टकराव है, इसमें सुधार की ज़रूरत है

धार्मिक नियमों की हमारी समझ नई हकीकत को स्वीकार कर सकती है, बिना हर सुधार की कोशिश को धर्म पर हमला माने.

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क्या कोई लड़की 15 साल की उम्र में शादी के लिए पर्याप्त उम्र की मानी जा सकती है, लेकिन POCSO लागू होने पर 17 साल की उम्र में भी बच्ची मानी जाए? यह विरोधाभास अब चल रही न्यायिक बहस के केंद्र में है.

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में 26 साल के एक मुस्लिम व्यक्ति और 17 साल 8 महीने की लड़की के मामले पर सुनवाई की. दोनों ने परिवार की इच्छा के खिलाफ निकाह किया था. सुरक्षा की मांग वाली उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यह बात दोहराई कि जो व्यक्ति बालिग होने की उम्र यानी यौवन की अवस्था तक पहुंच चुका है, वह अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर सकता है. आम तौर पर, अगर इसके उलट कोई सबूत न हो, तो 15 साल की उम्र में यौवन की अवस्था मानी जाती है.

कोर्ट उनके परिवार से मिलने वाली धमकियों से सुरक्षा के अधिकार पर सुनवाई कर रहा था और यह अंतर महत्वपूर्ण है. जिस नाबालिग लड़की को अपने परिवार से हिंसा का डर है, उसे पुलिस सुरक्षा मांगने का पूरा अधिकार है. हालांकि, उसकी जान और आज़ादी की रक्षा करना और उसकी शादी कराना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.

पर्सनल लॉ का जटिल मामला

POCSO के तहत 18 साल से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है. सिर्फ इसलिए कोई अपवाद नहीं है कि वह बच्चा शादीशुदा है. केरल हाई कोर्ट ने अगस्त 2026 में यह बात साफ की, जब उसने उस व्यक्ति के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसने दावा किया था कि 17 साल की लड़की उसकी कानूनी रूप से शादीशुदा मुस्लिम पत्नी है.

सुप्रीम कोर्ट पहले ही Independent Thought v. Union of India मामले में इसी दिशा में फैसला दे चुका है. कोर्ट ने कहा था कि 18 साल से कम उम्र की शादीशुदा लड़की को उसी उम्र की अविवाहित लड़की को मिलने वाली यौन सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता.

तो एक मुस्लिम परिवार को इन सब बातों से आखिर क्या समझना चाहिए? क्या उनकी बेटी 15 साल की उम्र में कानूनी रूप से शादी कर सकती है या 18 साल की उम्र तक बच्ची ही मानी जाएगी?

मुस्लिम समुदाय के लोग भी इस मुद्दे को एक जैसी नज़र से नहीं देखेंगे. कुछ लोग यौवन की उम्र से जुड़ी इस व्यवस्था को धार्मिक आज़ादी और पर्सनल लॉ का हिस्सा मान सकते हैं. वहीं कुछ लोग शादी के लिए 18 साल को सभी के लिए न्यूनतम उम्र रखने का मजबूती से समर्थन कर सकते हैं.

लेकिन इस बहस में कोई भी व्यक्ति किसी भी पक्ष में हो, हर नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि कानून वास्तव में क्या कहता है. मेरे लिए इससे एक बहुत बुनियादी सवाल उठता है. अगर कानून कहता है कि 17 साल की लड़की इतनी बड़ी नहीं है कि वह कानूनी रूप से सेक्स के लिए सहमति दे सके, तो हम एक साथ यह कैसे कह सकते हैं कि 15 साल की उम्र में वह शादी करने के लिए पर्याप्त समझदार है? शादी ऐसा रिश्ता है, जिसके बाद सेक्स, गर्भधारण, आर्थिक निर्भरता और ज़िंदगी भर की जिम्मेदारियां आ सकती हैं.

POCSO एक आपराधिक कानून है और इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण है: बच्चों को यौन शोषण से बचाना, लेकिन हमने ऐसे मामले भी देखे हैं, जहां नाबालिग लड़की अपनी पसंद से किसी साथी को चुनती है और उसके माता-पिता की इच्छा के खिलाफ जाने पर वे POCSO का इस्तेमाल करते हैं. बाद में कुछ मामलों में अदालतों ने उनकी खास परिस्थितियों को देखते हुए कानूनी कार्रवाई रद्द कर दी.

इसका एक उदाहरण है: 2026 में Vijay Laxman Rotke v. State of Maharashtra मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐसे मामले में कानूनी कार्रवाई रद्द कर दी, जिसमें लड़की की उम्र रिश्ता शुरू होने के समय 15 साल थी. बाद में वह यौवन की अवस्था में पहुंची, उसने आरोपी से शादी कर ली और गर्भवती हो गई. कोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखा कि लड़की ने जबरदस्ती का कोई आरोप नहीं लगाया था और उसे उस व्यक्ति से कोई शिकायत भी नहीं थी. इसका मतलब यह नहीं है कि POCSO के तहत नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से मान्य हो जाती है, लेकिन यह दिखाता है कि अदालतों को कभी-कभी कितनी जटिल परिस्थितियों से निपटना पड़ता है.

POCSO का मकसद नाबालिगों की सुरक्षा करना है, लेकिन ऐसे किशोर-किशोरियों के रिश्ते भी होते हैं, जिनमें नाबालिग लड़कियां अपनी इच्छा से शामिल होती हैं. कानून बच्चों की सुरक्षा करने की कोशिश कर रहा है, जबकि अदालतों को कभी-कभी उनकी अपनी पसंद और आजादी से जुड़े सवालों से भी निपटना पड़ता है.

लेकिन मुस्लिम विवाह से जुड़े मामलों में उलझन थोड़ी अलग है. यहां सिर्फ यह कहने के बजाय कि नाबालिग होने के बावजूद लड़की को आजादी और सुरक्षा पाने का अधिकार है, तर्क पर्सनल लॉ और यौवन की उम्र को ज्यादा महत्व देने लगता है. जब यही पर्सनल लॉ POCSO जैसे आपराधिक कानून से सीधे टकराता है, तो फिर क्या होता है?

धर्म पर हमला नहीं

निष्पक्ष रूप से कहें तो, जब बच्चों और महिलाओं के अधिकारों की बात आती है, तो मुझे समझ नहीं आता कि 21वीं सदी में भी हमें यह तय करने के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ क्यों देखने पड़ते हैं कि किसी व्यक्ति को कौन से बुनियादी अधिकार मिलने चाहिए. भारत के सभी बच्चों, महिलाओं और नागरिकों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और उन्हें समान बुनियादी अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए. सिर्फ इसलिए कि कोई बच्चा मुस्लिम है, उसके लिए क्या अच्छा या बुरा है या उसे किस तरह की सुरक्षा मिलनी चाहिए, यह उसके उस समुदाय के कारण अचानक नहीं बदल जाना चाहिए, जिसमें वह पैदा हुआ है.

मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या प्यूबर्टी को ही कानूनी तौर पर वयस्क होने के पैमाने के तौर पर इस्तेमाल करना है. प्यूबर्टी एक बायोलॉजिकल घटना है. इससे इमोशनल मैच्योरिटी, फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस, ज़बरदस्ती से आज़ादी या किसी बड़े एडल्ट के साथ असमान रिश्ते को संभालने की क्षमता नहीं मिलती. पहली बार पीरियड आने वाली नाबालिग अचानक एक एडल्ट महिला की तरह मैच्योर या इंडिपेंडेंट नहीं हो जाती.

धार्मिक परंपराएं खास ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों में विकसित हुई थीं, लेकिन समाज बदलते हैं. बचपन को लेकर हमारी समझ बदली है. शिक्षा बदली है. महिलाओं की ज़िंदगी बदली है. खुद शादी का स्वरूप बदल गया है. निश्चित रूप से धार्मिक नियमों की हमारी समझ इन हकीकतों को स्वीकार कर सकती है, बिना सुधार की हर कोशिश को धर्म पर हमला माने.

सुप्रीम कोर्ट को आखिरकार पर्सनल लॉ, बाल विवाह निषेध कानून और POCSO के बीच बड़े कानूनी टकराव को सुलझाना पड़ सकता है. लेकिन शायद मूल सिद्धांत इतना जटिल नहीं होना चाहिए.

अगर कानून किसी लड़की को 17 साल की उम्र में भी उसकी सुरक्षा के लिए बच्चा मानता है, तो सिर्फ यौवन की अवस्था उसे शादी के सवाल पर 15 साल की उम्र में वयस्क कैसे बना सकती है?

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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