मुझे अभी भी हिंदी फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में ज़ायरा वसीम का इंसिया मलिक का किरदार याद है. वह बड़ौदा की 15 साल की स्कूली लड़की है, जो मशहूर सिंगर बनने का सपना देखती है. अपने हिंसक पिता और घर के सख्त पुरुष-प्रधान माहौल की वजह से वह इस सपने को खुलकर पूरा नहीं कर पाती. इसलिए वह बुर्के के पीछे अपनी पहचान छिपाती है और अपना संगीत दुनिया के साथ शेयर करती है.
इस फिल्म ने मुझे निजी तौर पर बहुत खुशी दी थी. बॉलीवुड ने पुरुष-प्रधान सोच को लेकर अनगिनत फिल्में बनाई हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर कहानियों में हिंदू परिवारों और समाज को केंद्र में रखा जाता है. भारतीय मुस्लिम परिवार की असल ज़िंदगी को इसी तरह दिखाने वाली फिल्में बहुत कम हैं. मेरे लिए इंसिया की कहानी जानी-पहचानी थी, मेरे घर की कई महिलाओं की कहानियों जैसी. मेरा भरोसा कीजिए, इसे देखने वाली बहुत सी मुस्लिम महिलाएं इस कहानी के कुछ हिस्सों को अपनी असल ज़िंदगी से जोड़ पाएंगी. जितना हम मानना चाहते हैं, उससे कहीं ज्यादा बार.
इसीलिए अब ज़ायरा वसीम को लड़कियों के सार्वजनिक रूप से दिखाई देने को लेकर बिल्कुल अलग राय रखते देखना खास तौर पर अजीब लगता है. ‘दंगल’ में भी काम कर चुकीं इस एक्ट्रेस ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की आलोचना की क्योंकि बोर्ड ने स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में बच्चों, खासकर लड़कियों, को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुति देने की अनुमति दी थी.
उन्होंने एक्स पर लिखा, “क्या वक्फ बोर्ड एक धार्मिक संस्था नहीं है, जिसे मुस्लिम समुदाय की सेवा करने और आदर्श रूप से इस्लामी मूल्यों को बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है?”
वसीम ने एक्टिंग छोड़ दी और अपनी ज़िंदगी इस तरह जीने का फैसला किया, जो उनके लिए उनके धर्म के ज्यादा करीब थी. इसके लिए उन्होंने उस सार्वजनिक करियर से भी दूरी बना ली, जिसने उन्हें बहुत बड़े मौके दिए थे.
यह, निश्चित रूप से, उनकी अपनी पसंद थी. हालांकि मैं ऐसे मूल्यों से सहमत नहीं हूं, लेकिन हर व्यक्ति को अपनी पसंद के मूल्यों के अनुसार जीने का अधिकार है. लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने मूल्यों को हर दूसरे व्यक्ति के लिए भी नियम बना दे.
मुस्लिम लड़कियों को परफॉर्म क्यों नहीं करना चाहिए?
ज़ायरा वसीम को वक्फ बोर्ड से यह शिकायत नहीं है कि वह समुदाय की सेवा करने में नाकाम रहा है या उस पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, बल्कि उनकी परेशानी बच्चों के परफॉर्म करने से है. जो व्यक्ति समुदाय की बेहतरी की चिंता करने का दावा करता है, उसके लिए यह प्राथमिकता बिल्कुल गलत है.
आखिर मुस्लिम बच्चों के स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हिस्सा लेने में गलत क्या है? वसीम के लिए ऐसे कार्यक्रम “हमारे बच्चों को सिर्फ मंच पर दिखाने वाली चीज़ और परफॉर्मर बना देते हैं.”
गाना गाना, डांस करना, कविता पढ़ना या सिर्फ मंच पर आना कब से अपमानजनक हो गया? बच्चों के लिए किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के ये बिल्कुल आम तरीके हैं. इससे उनमें आत्मविश्वास और रचनात्मकता बढ़ती है और सबसे ज़रूरी, उनमें अपनेपन की भावना पैदा होती है.
स्कूल के मंच पर किसी लड़की के डांस करने से वह अचानक कम समझदार, पढ़ाई करने में कम सक्षम या समाज के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाती. वह डांस भी कर सकती है और पढ़ाई भी कर सकती है. वह गा भी सकती है और डॉक्टर भी बन सकती है. वह मंच पर परफॉर्म भी कर सकती है और बड़ी होकर वैज्ञानिक, शिक्षक या नेता भी बन सकती है. ये चीजें कभी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं रही हैं.
ऐसा कौन सा मूल्य-व्यवस्था है, जिसे सिर्फ तब परेशानी होती है जब लड़कियां सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देने लगती हैं? कश्मीर की बेटियों को सम्मान पाने के लिए सार्वजनिक जगहों से गायब होने की जरूरत नहीं है. उन्हें भी अपने बेटों जैसी आज़ादी मिलनी चाहिए कि वे बिना हर बार उनकी मर्यादा पर बहस किए बोल सकें, परफॉर्म कर सकें, सीख सकें और जश्न मना सकें.
सिर्फ पुरानी सोच नहीं, बल्कि खतरनाक भी
यह सिर्फ एक अकेली और पुरानी सोच वाली राय नहीं है; यह पूरी तरह से मिटा देने की शुरुआत है. जिस सोच में एक महिला की पवित्रता को उसके लोगों की नज़रों से दूर रहने से जोड़ा जाता है, उसी सोच की नींव पर तालिबान ने अपना शासन बनाया था.
इसका रास्ता जितना डरावना है, उतना ही आसानी से समझ में आने वाला भी है. पहले समाज यह सवाल करता है कि लड़की परफॉर्म क्यों करती है; फिर सवाल होता है कि वह गाना क्यों गाती है, पढ़ाई क्यों करती है और काम क्यों करती है. आखिर में सवाल यह बन जाता है कि वह सार्वजनिक जगहों पर दिखाई ही क्यों देती है. आधुनिक समाज आधी आबादी को गायब करके नहीं बनाया जा सकता.
इसलिए ज़ायरा वसीम की पोस्ट देखने में भले ही एक ऐसी राय लगे जो नुकसान नहीं पहुंचाती, लेकिन यह आधुनिक दुनिया के लिए खतरनाक है.
क्या मुस्लिम मूल्यों का देशभक्ति से टकराव है?
स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में देशभक्ति के गानों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों को “बेमतलब” कहना अपने आप में एक अजीब तर्क है.
अगर बच्चे स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति के गाने नहीं गा सकते, परफॉर्म नहीं कर सकते और साथ मिलकर जश्न नहीं मना सकते, तो वे आखिर ऐसा कब करेंगे? पूरा कार्यक्रम ही साथ आने, अपनी साझा नागरिकता का जश्न मनाने और बच्चों को यह महसूस कराने के बारे में है कि वे खुद से भी बड़ी किसी चीज़ का हिस्सा हैं.
या असली समस्या यह है कि ये बच्चे खुद को एक ऐसे देश का हिस्सा मान रहे हैं, जो सभी का है? ऐसा देश जो धर्म से अलग, नागरिक होने की एक साझा पहचान पर बना है, जहां आप दूसरे धर्म के किसी व्यक्ति को भी उसी सम्मान और अपनेपन की भावना से देख सकते हैं, जो आप अपने धर्म के किसी व्यक्ति को देते हैं.
किसने तय किया कि मुस्लिम मूल्य किसी तरह देशभक्ति के खिलाफ हैं?
मुसलमानों के अपने देश का जश्न मनाने, अपनी नागरिकता पर गर्व करने या अपने बच्चों बल्कि लड़कियों सहित को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में हिस्सा लेने देने में कुछ भी गैर-इस्लामिक नहीं है. वक्फ जैसी संस्था के स्वतंत्रता दिवस मनाने जैसी सामान्य बात पर धार्मिक शक पैदा करने से सिर्फ धर्म और अपनेपन के बीच दूरी पैदा होती है.
यह संकीर्ण और दूसरों को बाहर रखने वाली सोच जिस धर्म की रक्षा करने का दावा करती है, उसी धर्म को बहुत नुकसान पहुंचाती है. मुसलमानों को एक साथ साफ तौर पर मुस्लिम और देशभक्त होने के लिए किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है.
करोड़ों भारतीय मुसलमान ऐसे हैं, जिनकी इस्लाम की समझ में उन्हें लगातार यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है कि वे भारत से कितनी दूरी रखते हैं. मैं ऐसे ही एक व्यक्ति के साथ बड़ी हुई हूं. मेरे पिता बहुत धार्मिक मुसलमान थे. उन्होंने सात बार हज किया था, लेकिन उन्हें अपने देश की सेवा करने पर भी उतना ही गर्व था. वह हमसे कहते थे कि अगर कभी ड्यूटी के दौरान उनकी मौत हो गई, तो उनके लिए जन्नत लिखी होगी. उनके लिए इन दोनों बातों में कभी कोई विरोध नहीं था. हब्बुल वतनी यानी अपने वतन से प्यार उनके ईमान का हिस्सा था.
मेरे पिता की तरह, मैं इस सोच को स्वीकार करने से इनकार करती हूं कि मेरे देश के साथ मेरा जुड़ाव कमजोर होने पर मेरा धर्म ज्यादा पवित्र हो जाता है. मुस्लिम बच्चों को कभी भी अपनी पहचान और अपने देश में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. उन्हें अपने दिल में अपना धर्म और हाथों में तिरंगा लेकर आगे बढ़ने की आज़ादी होनी चाहिए, बिना किसी के यह कहे कि इनमें से एक को अपनाने से वे दूसरे के प्रति कम वफादार हो जाते हैं.
आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ट्रांसपेरेंसी की मांग करना वक्फ बोर्ड पर हमला नहीं, इससे संस्थाओं को भी मदद मिलती है