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Saturday, 22 August, 2026
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भारत की जिला न्यायपालिका SC-ST-OBC की आरक्षित सीटें नहीं भर रही

RTI के जवाबों से पता चलता है कि कई राज्य जिला जजों के लिए आरक्षित खाली पदों को भरने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं. न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करना संविधान की जरूरी जिम्मेदारी है.

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हाल के सालों में कई फोरम पर ज्यूडिशियरी में सोशल डाइवर्सिटी पक्का करने और इसे ज़्यादा रिप्रेजेंटेटिव संस्था बनाने की ज़रूरत पर बात हुई है. डीवाई चंद्रचूड़ और बीआर गवई समेत भारत के कई पूर्व चीफ जस्टिस ने माना है कि भारतीय ज्यूडिशियरी की बनावट देश की सोशियो-इकोनॉमिक असलियत को ठीक से नहीं दिखाती है और उन्होंने बेंच पर डाइवर्सिटी बढ़ाने की बात कही है.

हालांकि, हायर ज्यूडिशियरी डाइवर्सिटी को लेकर चिंताओं के सेंटर में बनी हुई है, लेकिन यह भी उतना ही ज़रूरी है कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट कितने इनक्लूसिव हैं, इस पर नज़र रखी जाए क्योंकि ज़्यादातर नागरिकों के लिए जस्टिस सिस्टम से संपर्क का पहला पॉइंट आमतौर पर वही होते हैं. न्याय देने की बड़ी ज़िम्मेदारी वाले इंस्टीट्यूशन के लिए, फेयरनेस की शुरुआत उसकी बुनियाद से ही होनी चाहिए. ऐसी फेयरनेस के लिए ज़्यादा सोशल रिप्रेजेंटेशन ज़रूरी है.

हायर ज्यूडिशियरी को ज़्यादा रिप्रेजेंटेटिव बनाने पर होने वाली चर्चाएं रेगुलर तौर पर कॉलेजियम के काम करने के तरीके के आस-पास ही घूमती हैं. हालांकि, डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियरी के डाइवर्सिटी प्रोफाइल को एनालाइज़ करने में अलग तरह की बातें शामिल हैं, क्योंकि अपॉइंटमेंट्स आर्टिकल 233 के तहत राज्यों द्वारा बनाई गई अफरमेटिव एक्शन पॉलिसीज़ से कंट्रोल होती हैं.

अलग-अलग राज्य, अलग-अलग प्रतिनिधित्व

इस साल जनवरी में कानून और न्याय मंत्रालय ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिला न्यायपालिका में काम कर रहे कुल जजों में SC/ST/OBC जजों की संख्या 45.76 प्रतिशत है. जैसा कि यह आंकड़ा दिखाता है और इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 (IJR) जैसी रिपोर्टों ने भी बताया है, आरक्षण ने कुछ हद तक जिला न्यायपालिका में वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व के अंतर को कम करने में मदद की है.

हालांकि, अलग-अलग राज्यों की तस्वीर काफी अलग है. मंत्रालय के जवाब के अनुसार, SC/ST/OBC जजों का प्रतिशत झारखंड में 12.47 प्रतिशत से लेकर तमिलनाडु में 97.65 प्रतिशत तक है. ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि जिला न्यायपालिका में सीधे होने वाली नियुक्तियों में आरक्षण के नियम अलग-अलग राज्यों में काफी अलग हैं. इनमें मिलने वाले लाभ, इन लाभों के हकदार वर्ग और आरक्षण में तय सीटों की संख्या अलग-अलग है. इसलिए इन अंतर को देखना ज़रूरी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कुछ राज्यों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कम होने के पीछे कौन से कारण हैं.

मंत्रालय का जवाब जिला न्यायपालिका में अभी मौजूद सामाजिक विविधता की सिर्फ एक तस्वीर देता है. न्यायपालिका या कानून मंत्रालय की ओर से समय-समय पर आंकड़े जारी नहीं किए जाने के कारण हमारे पास यह जानकारी नहीं है कि अलग-अलग राज्यों में हर भर्ती प्रक्रिया के दौरान SC/ST/OBC वर्गों से कितने लोगों की जिला न्यायपालिका में नियुक्ति हुई. सकारात्मक कार्रवाई यानी आरक्षण की नीतियां सही तरीके से लागू हो रही हैं या नहीं, यह पता लगाने के लिए ये आंकड़े बहुत ज़रूरी हैं.

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में जस्टिस, एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया (JALDI) इनिशिएटिव की हाल ही में पब्लिश हुई एक रिपोर्ट, जिसका टाइटल है “भारत की डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियरी में अफरमेटिव एक्शन और रिप्रेजेंटेशन: लॉ, पॉलिसी, एंड प्रैक्टिस”, टीम द्वारा राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) एप्लीकेशन के ज़रिए इकट्ठा किए गए जवाबों के आधार पर, जानकारी की इन कमियों को भरने की कोशिश करती है.

RTI से क्या पता चला

सकारात्मक कार्रवाई यानी आरक्षण की नीतियों को सही तरीके से लागू करने की दिशा में पहला कदम यह साफ तौर पर पता होना है कि किस वर्ग को कितने लाभ मिलते हैं और इन लाभों के हकदार कौन हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि आरक्षण का प्रतिशत और दूसरी छूट तय करने वाले लागू कानून की पूरी कॉपी सरकारी या अदालत की आधिकारिक वेबसाइटों पर उपलब्ध कराई जाए.

हालांकि, रिपोर्ट में पाया गया कि सिर्फ 15 राज्यों ने ऐसी कॉपियां उपलब्ध कराई हैं और इनमें से केवल 13 राज्यों के ज्यूडिशियल सर्विस रूल्स में आरक्षण की सीटों का बंटवारा बताया गया है.

कई राज्य सिर्फ इतना बताते हैं कि आरक्षण की नीति राज्य या केंद्र सरकार की नीति या आदेशों के अनुसार लागू होती है. ज्यादातर मामलों में इन आदेशों को सरकारी वेबसाइटों पर ढूंढना लगभग नामुमकिन है. इससे यह साफ तौर पर पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि नियुक्तियों में किसे और कितने लाभ मिलते हैं. इसके अलावा, कई राज्यों में योग्य वर्गों को इन लाभों से बाहर रखा गया है. उदाहरण के लिए, जिला जजों की सीधी भर्ती में दिल्ली ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं देता, जबकि असम किसी भी जाति आधारित वर्ग के लिए आरक्षण नहीं देता.

टीम की ओर से RTI के तहत दाखिल किए गए आवेदनों से नियुक्तियों के बारे में जुटाए गए आंकड़े यह समझने में मदद करते हैं कि इन नियमों को जमीन पर कैसे लागू किया गया है. लागू कानून की तरह ही RTI के जवाबों में भी जानकारी की बहुत बड़ी कमी दिखाई दी. 2018 से 2024 के बीच सिविस जज (जूनियर. डिविजन) पदों पर नियुक्त किए गए SC/ST/OBC उम्मीदवारों की संख्या बताने वाले जवाब केवल 16 राज्यों से मिले. जिला जजों की नियुक्तियों के लिए इसी अवधि की जानकारी केवल 10 राज्यों से मिली. कई सवालों के जवाब में या तो जानकारी देने से इनकार कर दिया गया या ऐसी नियुक्तियों का डेटा दिया गया, जिसमें जाति के हिसाब से अलग-अलग जानकारी नहीं थी.

जवाबों से यह भी पता चला कि काफी संख्या में राज्य अपनी आरक्षित खाली सीटों को भरने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं. उदाहरण के लिए, हिमाचल प्रदेश में इस अवधि के दौरान नियुक्त किए गए उम्मीदवारों में से सिर्फ 9 प्रतिशत SC, 2 प्रतिशत ST और 11 प्रतिशत OBC वर्ग से थे. यह तब है जब फरवरी 2025 तक राज्य में आरक्षित सीटों की तुलना में काम कर रहे SC, ST और OBC जजों की संख्या क्रमशः 56 प्रतिशत, 78 प्रतिशत और 40 प्रतिशत थी.

इसी तरह, ओडिशा में भी आरक्षित वर्ग की सीटों पर काफी संख्या में पद खाली हैं. 2018 से 2024 के बीच वहां हुई नियुक्तियों में 9 प्रतिशत SC, 1 प्रतिशत ST और 18 प्रतिशत OBC/SEBC वर्ग के थे. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भी यही स्थिति देखने को मिली.

आरक्षण की नीतियों को सही तरीके से लागू करना

ऊपर किए गए विश्लेषण से साफ है कि आरक्षण की नीतियों को सभी योग्य वर्गों पर सही तरीके से लागू करने के लिए राज्य सरकारों और हाई कोर्ट को कई कदम उठाने की जरूरत है. आज जिला न्यायपालिका में जानकारी की कमी, कुछ वर्गों को आरक्षण से बाहर रखना और आरक्षित खाली पदों को नहीं भरने जैसी समस्याएं हैं. किन सामाजिक वर्गों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए और उन्हें कितना आरक्षण मिल रहा है, इसकी जानकारी देना राज्यों की आरक्षण नीतियों का सही तरीके से आकलन करने की दिशा में पहला कदम है.

कुछ वर्गों को बिना किसी साफ कारण के आरक्षण से बाहर रखना समान अवसर की संवैधानिक गारंटी की भावना के खिलाफ है और इसे खत्म किया जाना चाहिए. आखिर में, हर भर्ती प्रक्रिया में योग्य वर्गों को उनके हिस्से के अनुसार सीटें दी जानी चाहिए, ताकि आरक्षित खाली पदों को जल्दी भरा जा सके.

न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करना संविधान की एक जरूरी जिम्मेदारी है. इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता मजबूत होती है. इसलिए राज्यों की जिम्मेदारी है कि जिला न्यायपालिका उन समुदायों के लिए पहुंच से बाहर न रहे, जिनका सही और महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए बहुत जरूरी है.

अभिषेक रथ बेंगलुरु में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में जस्टिस, एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया (JALDI) इनिशिएटिव के साथ एक रिसर्च फेलो हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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