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Saturday, 22 August, 2026
होमफीचरसैनिक फार्म: आलीशान कोठियों के पीछे बुनियादी सुविधाओं का संकट, ‘अमीर’ होने का ठप्पा भी बना परेशानी

सैनिक फार्म: आलीशान कोठियों के पीछे बुनियादी सुविधाओं का संकट, ‘अमीर’ होने का ठप्पा भी बना परेशानी

सैनिक फार्म RWA के अध्यक्ष हरदीप सिंह भल्ला ने कहा, ‘हमारे साथ अमीर इलाके का टैग जुड़ा है, इसलिए यहां रहने वाले लोगों की परेशानियों को कोई नहीं देखता.’

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नई दिल्ली: सैनिक फार्म की बड़ी-बड़ी कोठियों और हवेलियों के किले जैसे गेटों के पीछे Fortuners, Scorpios, Thars और Mercedes गाड़ियां गायब हो जाती हैं. एक पल के लिए खुला हुआ गेट अंदर का सजा हुआ लॉन या स्विमिंग पूल दिखाता है और फिर बंद हो जाता है. यहां कोई पब्लिक पार्क नहीं है, बच्चे खेलते हुए नहीं दिखते, बालकनी से झांकते हुए लोग नहीं दिखते और न ही लोग गलियों में टहलते नज़र आते हैं. ऊंची दीवारों वाले इस इलाके में एक अजीब सी शांति छाई रहती है.

लेकिन हर प्रवेश द्वार पर लगे बड़े ‘Important Notice’ बोर्ड यहां की असली स्थिति की याद दिलाते हैं: यहां निर्माण पर रोक है. इन रास्तों के अंदर गलियां संकरी और गड्ढों से भरी हैं. पानी के टैंकर रोज की पानी की सप्लाई लेकर किसी तरह इन गलियों से निकल पाते हैं.

सैनिक फार्म अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चीज़ें हैं. किसी के लिए पैसा, किसी के लिए फार्महाउस की गुप्त ज़िंदगी और किसी के लिए पुराना राजीव गांधी के दौर का अमीर वर्ग, लेकिन असल में यहां की सारी दौलत किसी काम नहीं आती. यह नई दिल्ली के सबसे बड़े अनधिकृत इलाकों में से एक है.

सैनिक फार्म में रहने वाले करणवीर शर्मा ने कहा, “सैनिक फार्म की ज़िंदगी बाहर से बहुत आलीशान और महंगी दिखती है, लेकिन अंदर से हाल यह है कि रसोई में लीक हो रहे पाइप को ठीक कराने में भी पुलिस की चिंता सताती रहती है.”

सैनिक फार्म में पेड़ों से घिरी एक शांत गली, जिसके दोनों तरफ बड़े-बड़े घर हैं. अमीरी के पीछे सार्वजनिक सुविधाओं की भारी कमी छिपी हुई है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सैनिक फार्म में पेड़ों से घिरी एक शांत गली, जिसके दोनों तरफ बड़े-बड़े घर हैं. अमीरी के पीछे सार्वजनिक सुविधाओं की भारी कमी छिपी हुई है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

दक्षिण दिल्ली के इस इलाके में कई करोड़ रुपये की कीमत वाले बड़े फार्महाउस, बंगले और आलीशान घर पेड़ों से घिरी सड़कों के बीच बने हुए हैं, लेकिन यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. कूड़ा उठाने से लेकर सड़कों की मरम्मत और पानी की सप्लाई तक, ज्यादातर काम निवासी खुद अपनी रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के जरिए करते हैं. यहां रहने वाले लोगों की लगातार यही शिकायत रहती है कि नगर निगम के अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते. यहां आरडब्ल्यूए ही असल में सरकार की तरह काम करती है, हालांकि यह एक कमजोर और बेबस सरकार है.

उनकी सबसे बड़ी शिकायत उन्हें अमीर इलाके के तौर पर देखे जाने को लेकर है. वे इस टैग से परेशान हो चुके हैं.

सैनिक फार्म में मौजूद वेस्टर्न एवेन्यू रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (WARWA) के अध्यक्ष हरदीप सिंह भल्ला ने कहा, “हम सही पानी की सप्लाई जैसी बुनियादी ज़रूरतों के बिना रह रहे हैं और जब हम अपनी रोज की जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद विकल्प तैयार करते हैं, तो हमें सिर्फ अमीर कह दिया जाता है. हमारे साथ ‘अमीर’ का टैग जुड़ा है, इसलिए यहां रहने वाले लोगों की परेशानियों को कोई नहीं देखता.”

RWA मदद के लिए आगे

सैनिक फार्म के दो मंजिला WARWA ऑफिस में एक गोल मेज के चारों ओर RWA के चार सदस्य कुछ स्थानीय निवासियों के साथ बैठे हैं. चर्चा एक बार फिर सैनिक फार्म में जगह-जगह टूट रहे स्पीड ब्रेकरों की समस्या को लेकर हो रही है.

क्या इनकी मरम्मत कराई जानी चाहिए? इसमें कितना खर्च आएगा? RWA के पास कितने पैसे हैं? इन सवालों पर चर्चा चल रही है और इसी बीच निवासी अपनी-अपनी शिकायतें भी सामने रख रहे हैं.

भल्ला ने कहा, “हमारी सड़कों का इस्तेमाल सिर्फ सैनिक फार्म के रहने वाले लोग नहीं करते. खानपुर, संगम विहार, नेब सराय और छतरपुर के बीच आने-जाने वाले वाहन चालक अक्सर मुख्य सड़कों के ट्रैफिक से बचने के लिए हमारी अंदरूनी गलियों से होकर निकलते हैं. इस अतिरिक्त ट्रैफिक की वजह से हमारी सड़कें बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं और हमें उनकी बार-बार मरम्मत करवानी पड़ती है.”

बातचीत जल्द ही एक और पुरानी समस्या पर पहुंच जाती है—रात के समय सुरक्षा. निवासी रात में होने वाली चोरियों और संदिग्ध गतिविधियों की बात करते हैं. वहीं, RWA के सदस्य मुख्य चौराहों और प्रवेश द्वारों पर कुछ और सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना पर चर्चा करते हैं. एक बार फिर सवाल उठता है कि इसमें कितना खर्च आएगा, कैमरों की देखभाल कौन करेगा और इस पूरी व्यवस्था के लिए पैसे कहां से आएंगे.

सैनिक फार्म RWA के एग्जीक्यूटिव कमिटी मेंबर राजीव भसीन, अपने ऑफिस के बाहर। RWA कचरा उठाने से लेकर सड़कें बनाने तक सब कुछ मैनेज करता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सैनिक फार्म RWA के एग्जीक्यूटिव कमिटी मेंबर राजीव भसीन, अपने ऑफिस के बाहर। RWA कचरा उठाने से लेकर सड़कें बनाने तक सब कुछ मैनेज करता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

सैनिक फार्म के अलग-अलग ब्लॉकों और आसपास के इलाकों में कुल छह RWA काम करती हैं. इनमें डिफेंस सर्विस एन्क्लेव , खिड़की एक्सटेंशन, अनुपम गार्डन, नेब सराय वैली और फॉरेस्ट लेन शामिल हैं. इनमें WARWA मुख्य सैनिक फार्म RWA के रूप में काम करती है और नागरिक सुविधाओं तथा प्रशासन से जुड़े मामलों में निवासियों और सरकारी अधिकारियों के बीच समन्वय करती है.

सैनिक फार्म की RWA की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के साथ रही है. यह लड़ाई कॉलोनी में होने वाली तोड़फोड़ की कार्रवाई और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर है.

सैनिक फार्म की निवासी कावेरी अग्रवाल ने बताया, “अगर मुझे कोई परेशानी होती है या रात में इलाके में कोई हंगामा सुनाई देता है, तो मेरा पहला ख्याल अधिकारियों या पुलिस को फोन करने का नहीं होता. मैं RWA से संपर्क करती हूं क्योंकि जब हमें मदद की जरूरत होती है, तब सरकारी अधिकारी शायद ही कभी यहां पहुंचते हैं.”

सरकारी अधिकारियों के साथ हुए अनुभवों ने RWA के सदस्यों को अक्सर निराश किया है. मेज पर रखे दस्तावेज़ के ढेर की ओर इशारा करते हुए भल्ला बताते हैं कि RWA ने बुनियादी नागरिक सुविधाओं के लिए दिल्ली जल बोर्ड और नगर निगम को वर्षों से पत्र लिखे हैं और लगातार अनुरोध किए हैं.

भल्ला ने कहा, “हम विधायकों से मिल चुके हैं, हर अधिकारी के दफ्तर के चक्कर लगा चुके हैं और अनगिनत पत्र और ईमेल लिख चुके हैं, लेकिन हमारी फाइलें बढ़ती जा रही हैं और हमारी शिकायतों का कोई जवाब नहीं मिल रहा.”

फिर भी, जगह-जगह गड्ढों वाली सड़कों के बावजूद सैनिक फार्म दिल्ली के कई इलाकों की तुलना में काफी साफ-सुथरा और व्यवस्थित नजर आता है. निवासियों का कहना है कि इसका श्रेय सिर्फ उन्हें जाता है.

RWA के सदस्य राजीव भसीन ने कहा, “हम अपना कूड़ा खुद इकट्ठा करते हैं. बाहर की गलियों की सफाई भी हम खुद करते हैं. हम एमसीडी से सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि हमें कूड़े से खाद बनाने के लिए एक तय जगह दे दी जाए.”

राजीव भसीन बताते हैं कि इस मांग को लेकर RWA के सदस्य एमसीडी के दफ्तर के कई चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी. नगर निगम का कहना है कि वह ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं करा सकता. इसके बाद अब RWA ने समाधान की उम्मीद में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी पत्र लिखा है.

वेस्टर्न एवेन्यू रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (WARWA) सैनिक फार्म और आस-पास के इलाकों में काम करने वाली छह RWA में से एक है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
वेस्टर्न एवेन्यू रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (WARWA) सैनिक फार्म और आस-पास के इलाकों में काम करने वाली छह RWA में से एक है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

सैनिक फार्म की शुरुआत से ही इसकी स्थिति मुश्किल रही है. 1960 के दशक के आखिर में सैनिक फार्म की शुरुआत युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं और सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों के लिए एक सहकारी समिति के रूप में हुई थी, लेकिन समय के साथ यह इलाका अमीर लोगों की एक बड़ी रिहायशी कॉलोनी में बदल गया, जबकि डीडीए से इसके लिए ज़रूरी मंजूरियां नहीं ली गई थीं.

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2001 से नए निर्माण पर रोक लगा रखी है. इसके बावजूद सैनिक फार्म के निवासी वर्षों से इस कॉलोनी को नियमित कराने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला. अगस्त 2025 में अदालत ने कॉलोनी की कानूनी स्थिति को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार को “जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने” के लिए फटकार लगाई थी.

इस समस्या को और जटिल बनाता है साउथर्न रिज, जो सैनिक फार्म के कुछ हिस्सों से सटा हुआ है. इसकी वजह से जंगल और संरक्षित जमीन से जुड़े अलग-अलग प्रतिबंध भी लागू होते हैं. यहाँ तोड़फोड़ की कार्रवाई अक्सर होती रहती है. इस साल अप्रैल में डीडीए ने 23 फार्महाउस गिराए थे, जबकि जून में एक और संपत्ति को गिराया गया और 10 अन्य संपत्तियों को सील कर दिया गया.

भल्ला ने कहा, “अधिकारी हमारी समस्याएं सुनने के लिए यहां कभी नहीं आते, लेकिन नोटिस देने या छोटे-मोटे मरम्मत के काम तक को रोकने के लिए वे हमेशा पहुंच जाते हैं और उसे गैरकानूनी बता देते हैं.”

बैंड बाजा बारात के सपने

42 साल के करणवीर शर्मा ने 2015 में अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी लगाकर सैनिक फार्म में एक घर खरीदा था. वह निर्माण सामग्री सप्लाई करने का काम करते हैं. इससे पहले वह गुरुग्राम के डीएलएफ 2 में रहते थे, लेकिन सैनिक फार्म स्थित अपने ऑफिस आने-जाने में उन्हें रोज़ एक से दो घंटे लग जाते थे. लगातार ट्रैफिक में सफर करने से वह परेशान हो चुके थे. उन्हें लगा कि ऑफिस के पास, इसी इलाके में रहने से ज्यादा जगह मिलेगी, उनके रिटायर्ड माता-पिता को शांति मिलेगी और रोज़ के ट्रैफिक से भी छुटकारा मिल जाएगा. ऊपर से सैनिक फार्म की अमीर और आलीशान इलाके वाली पहचान भी उनके फैसले के पक्ष में थी.

सैनिक फार्म में आने से पहले शर्मा ने इस इलाके की आलीशान ज़िंदगी के बारे में सिर्फ कहानियां ही सुनी थीं. उन्हें बड़े-बड़े फार्महाउस, भव्य शादियां, सेलिब्रिटीज की पार्टियां और एक खास तरह की रईसी और प्रतिष्ठा के बारे में बताया गया था. फिल्मों ने भी सैनिक फार्म की इसी छवि को मजबूत किया था. ‘बैंड बाजा बारात’ जैसी फिल्मों में सैनिक फार्म को बड़े-बड़े और भव्य विवाह समारोहों और हाई-प्रोफाइल आयोजनों के पसंदीदा ठिकाने के रूप में दिखाया गया था.

सैनिक फार्म के वेस्टर्न एवेन्यू में एक घर. निवासियों का कहना है कि उन्हें अपनी रोज़ाना की ज़रूरतों के लिए पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सैनिक फार्म के वेस्टर्न एवेन्यू में एक घर. निवासियों का कहना है कि उन्हें अपनी रोज़ाना की ज़रूरतों के लिए पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

शर्मा ने कहा, “मैंने इस जगह के बारे में बहुत कुछ सुना था. प्रॉपर्टी डीलर भी मुझे सिर्फ बड़ी-बड़ी और शानदार संपत्तियां और उनके खूबसूरत अंदरूनी हिस्से ही दिखाते थे.” शर्मा दो मंजिला घर में रहते हैं, जो सैनिक फार्म के घरों की पहचान बन चुकी ऊंची दीवारों और घने पेड़ों के पीछे मुश्किल से दिखाई देता है.

लेकिन दिल्ली के सबसे चर्चित इलाकों में से एक में एक आलीशान घर खरीदने का उनका सपना जल्द ही एक अनधिकृत कॉलोनी में रहने की मुश्किलों से टकरा गया. बुनियादी नागरिक सुविधाओं की कमी और घर की कानूनी स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता ने उस आलीशान जिंदगी की तस्वीर को फीका कर दिया, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी.

उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह घर, जो ज़िंदगी भर की मेहनत की उपलब्धि का प्रतीक था, जल्द ही सैनिक फार्म की चमकदार छवि के पीछे छिपी जटिल सच्चाई की याद दिलाने लगा. मुझे पता था कि इस कॉलोनी के अनधिकृत होने और यहां होने वाली तोड़फोड़ की कार्रवाई के बारे में खबरें आती रहती हैं, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे और मेरे बुजुर्ग माता-पिता के लिए रोज़मर्रा की बुनियादी ज़रूरतें भी एक संघर्ष बन जाएंगी.”

एमसीडी के सैनिटरी इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह ने कहा, “सैनिक फार्म एक अनधिकृत कॉलोनी है और कानूनी तौर पर यह एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती. इसलिए हम यहाँ किसी भी तरह की सेवाएँ उपलब्ध नहीं कराते.”

पानी ऐसी ही एक बड़ी समस्या है. शर्मा के मुताबिक, इलाके में सीधे आने वाला पानी इतना खारा है कि उससे पानी साफ करने वाले फिल्टर और प्यूरीफायर खराब हो जाते हैं. इसलिए रोज़मर्रा के इस्तेमाल के लिए लोगों को पानी के टैंकरों और बाल्टियों में जमा किए गए पानी पर निर्भर रहना पड़ता है. निवासी यह भी शिकायत करते हैं कि उन्हें एमसीडी की सेवाएं नहीं मिलतीं.

एमसीडी के सैनिटरी इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह ने कहा, “सैनिक फार्म एक अनधिकृत कॉलोनी है और कानूनी तौर पर यह एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती. इसलिए हम यहां किसी भी तरह की सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते.”

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यहां रहने की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि RWA ने अब पहले से ज्यादा सक्रिय होकर इलाके की जिम्मेदारियां संभालनी शुरू कर दी हैं.

सरकार पीछे हटी, RWA ने संभाली जिम्मेदारी

सैनिक फार्म की RWA का गठन 2004 में हुआ था. तब से यह संस्था कई दशकों से इलाके में नागरिक सुविधाओं की कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही है. लेकिन निवासियों का कहना है कि 2019 में हरदीप सिंह भल्ला के नेतृत्व में नई टीम के चुने जाने के बाद RWA ने पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय होकर काम करना शुरू किया.

इसके बाद RWA ने स्पीड ब्रेकरों की मरम्मत कराने से लेकर बोरवेल खुदवाने और सुरक्षा चौकियां चलाने तक की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. फिलहाल RWA करीब 1,500 परिवारों का प्रतिनिधित्व करती है.

RWA द्वारा लगाए गए CCTV कैमरे सैनिक फार्म लेन पर नज़र रखते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
RWA द्वारा लगाए गए CCTV कैमरे सैनिक फार्म लेन पर नज़र रखते हैं | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

RWA के अनुमान के मुताबिक, सैनिक फार्म के करीब 70 प्रतिशत निवासी बुजुर्ग हैं. इसलिए यहां सुरक्षा के बेहतर इंतजाम करना ज़रूरी हो गया है. इलाके के हर प्रवेश द्वार पर सुरक्षा गार्ड तैनात हैं, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर बुजुर्ग निवासियों की मदद करने के निर्देश दिए गए हैं. अंदर की गलियों में भी सुरक्षा चौकियां बनाई गई हैं. RWA सड़कों की सफाई और रोज़मर्रा की छोटी-मोटी मरम्मत का काम भी देखती है.

सैनिक फार्म में पिछले 20 साल से रह रहीं कावेरी अग्रवाल ने कहा, “पिछले कुछ वर्षों में हमने पूरी कॉलोनी में एक-दूसरे से जुड़ाव की मजबूत भावना विकसित होते देखी है. पहले हम सिर्फ अलग-अलग रहने वाले लोग थे, लेकिन RWA के सक्रिय होने के बाद अब हम एक-दूसरे से जुड़े हुए समुदाय की तरह रहने लगे हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर कहीं ट्रैफिक की समस्या होती है, तो निवासी और RWA के सदस्य खुद गलियों में निकलकर उसे संभालने और रास्ता साफ कराने में मदद करते हैं. अगर किसी बुजुर्ग को किसी तरह की मदद चाहिए, तो RWA की टीम आगे आती है और काम शुरू करवाती है. पहले हमें इस तरह का सहयोग नहीं मिलता था, लेकिन अब मिलता है.”

लेकिन RWA के सामने एक और समस्या भी लगातार बनी हुई है—लोगों की धारणा.

‘अमीरों की बस्ती’ का ठप्पा

हरदीप सिंह भल्ला और कई दूसरे निवासी अब सैनिक फार्म के साथ जुड़ चुके ‘अमीर’ या ‘एलीट’ इलाके के ठप्पे का खुलकर विरोध कर रहे हैं.

यह पहचान 2006 की केके माथुर कमिटी की रिपोर्ट में भी दिखाई दी थी. शहरी विकास मंत्रालय ने फार्महाउस और अनधिकृत कॉलोनियों की स्थिति की जांच के लिए यह समिति बनाई थी. रिपोर्ट में सैनिक फार्म को माहेंद्रु एन्क्लेव और अनंत राम डेयरी के साथ ऐसी कॉलोनियों में रखा गया था, जहां “समाज के संपन्न वर्ग” के लोग रहते हैं. इन तीनों कॉलोनियों में आधे से ज्यादा प्लॉट 350 वर्ग मीटर से बड़े थे.

समिति ने ऐसी कॉलोनियों को नियमित करने की सिफारिश की थी, लेकिन इसके लिए निवासियों को भारी जुर्माना और नागरिक सुविधाओं के विकास का पूरा खर्च उठाना था.

WARWA के अध्यक्ष हरदीप सिंह भल्ला ने कहा, “हमारे पास ग्रेटर कैलाश या वसंत कुंज जैसी चौड़ी सड़कें और सुविधाएं भी नहीं हैं. सैनिक फार्म में कुछ बड़े घर ज़रूर हैं, लेकिन हर घर आलीशान नहीं है. यहां संपत्तियों की कीमत भी ग्रेटर कैलाश और दिल्ली के कई दूसरे इलाकों की तुलना में काफी कम है.”

भल्ला ने कहा, “कोई व्यक्ति या परिवार अमीर हो सकता है, लेकिन पूरी कॉलोनी को अमीर कैसे कहा जा सकता है, जब यहां हर तरह के लोग रहते हैं—व्यापारियों से लेकर कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोगों तक?”

उनके मुताबिक, ‘अमीर’ होने के इस ठप्पे ने ऐसी धारणा बना दी है, जिसकी वजह से कॉलोनी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से भी वंचित रह गई है.

सैनिक फार्म को लेकर अक्सर छपने वाली खबरों पर नजर डालें तो इन तथाकथित ‘अमीर लोगों’ की मुश्किलों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

मई 2025 में एक खबर की हेडलाइन थी, “उपराज्यपाल के आदेश के बाद डीडीए ने सैनिक फार्म में तोड़फोड़ की कार्रवाई की.”

इस साल अप्रैल में एक और खबर में कहा गया, “सरकारी ज़मीन पर हरियाली बचाने के लिए डीडीए ने सैनिक फार्म के घरों को गिराया.”

जून में एक अन्य खबर की हेडलाइन थी, “दिल्ली नगर निगम के बुलडोजर सैनिक फार्म में पहुंचे.”

कभी-कभी इन खबरों में एक तरह की खुशी या तंज भी दिखाई देता है. दैनिक जागरण की एक हेडलाइन में लिखा था, “आलीशान कोठियां जमींदोज, दिल्ली के सैनिक फार्म में डीडीए का बुलडोजर.”

65-वर्षीय राजीव भसीन, जो RWA की कार्यकारिणी समिति के सदस्य हैं और 1997 से सैनिक फार्म में रह रहे हैं, बताते हैं, “अगर तोड़फोड़ की कार्रवाई पास के किसी इलाके या किसी दूसरी जगह पर भी हो रही हो, तब भी खबर की हेडलाइन में सैनिक फार्म का नाम ज़रूर आ जाएगा. इंटरनेट पर सैनिक फार्म के बारे में जो भी खबरें मिलती हैं, उनमें ज्यादातर नकारात्मक ही होती हैं.”

सैनिक फार्म में अप्रैल 2026 में एक फार्महाउस गिराया जा रहा है | एक्स स्क्रीनग्रैब/@PTI_News
सैनिक फार्म में अप्रैल 2026 में एक फार्महाउस गिराया जा रहा है | एक्स स्क्रीनग्रैब/@PTI_News

पीछे छूट गया इलाका

शुरुआत में सैनिक फार्म को खेती की ज़मीन के रूप में विकसित किया गया था, जहां छोटे-छोटे मकान हुआ करते थे, लेकिन धीरे-धीरे ज़मीन के छोटे-छोटे प्लॉट काटकर नए लोगों को बेचे जाने लगे. समय के साथ यहां छोटे मकानों की जगह बड़े बंगले और विशाल फार्महाउस बनते गए, लेकिन यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि दिल्ली के दूसरे इलाके विकास की दौड़ में आगे निकल गए, जबकि सैनिक फार्म पीछे छूट गया.

भल्ला ने कहा, “हमारे पास ग्रेटर कैलाश या वसंत कुंज जैसी चौड़ी सड़कें और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं. सैनिक फार्म में कुछ बड़े घर ज़रूर हैं, लेकिन हर घर आलीशान नहीं है. यहां संपत्तियों की कीमत भी ग्रेटर कैलाश और दिल्ली के कई दूसरे इलाकों की तुलना में काफी कम है.”

नागरिक सुविधाओं की अनदेखी के अलावा सैनिक फार्म को पिछले कई वर्षों से अदालतों के चक्कर भी लगाने पड़े हैं. इनमें कॉलोनी को नियमित कराने की लंबे समय से चली आ रही लड़ाई, बड़े पैमाने पर हो रहे अनधिकृत निर्माण पर अदालत की निगरानी और 2021 का वह मामला भी शामिल है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने सैनिक फार्म की RWAs को कुछ वाहनों से प्रवेश शुल्क लेने से रोक दिया था.

सैनिक फार्म में RWA द्वारा मैनेज किया गया सिविक वर्क | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सैनिक फार्म में RWA द्वारा मैनेज किया गया सिविक वर्क | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

इन सबके बीच यहां रहने वाले लोगों की परेशानी पर अदालतों ने भी ध्यान दिया है. 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि सैनिक फार्म के निवासी “सालों से ऐसी स्थिति में लटके हुए हैं, जहां वे मरम्मत के लिए एक ईंट तक नहीं लगा सकते.” माथुर कमिटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि “बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण अनधिकृत कॉलोनियों में जीवन की गुणवत्ता बहुत खराब है.”

सैनिक फार्म में आने के बाद दस साल से ज्यादा समय तक भसीन और उनका परिवार बिजली के लिए बड़े जनरेटरों पर निर्भर रहा. कई सालों तक बैठकें करने, पत्र लिखने, अधिकारियों से अनुरोध करने और उनके दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार 2008 में उन्हें कानूनी बिजली कनेक्शन मिला.

भसीन बताते हैं कि सैनिक फार्म की वजह से कॉलोनी और उसके आसपास काम करने वाले कई लोगों की रोज़ी-रोटी चलती है. वहीं, RWA निवासियों से जमा किए गए पैसे का इस्तेमाल इलाके और समुदाय से जुड़े कामों में करती है.

उन्होंने कहा, “हमने सड़कों की मरम्मत कराई है. इन सड़कों का इस्तेमाल सिर्फ यहां रहने वाले लोग ही नहीं करते, बल्कि आसपास के इलाकों से आने वाले वाहन भी इन अंदरूनी गलियों से होकर गुजरते हैं. हमने सिर्फ व्यावसायिक वाहनों से टोल लिया था, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने उस पर भी सवाल उठाया.”

सैनिक फार्म में एक साइनबोर्ड. यह इलाका 1960 के दशक के आखिर में युद्ध विधवाओं और रिटायर्ड रक्षा कर्मियों के लिए एक कोऑपरेटिव सोसाइटी के तौर पर शुरू हुआ था | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट
सैनिक फार्म में एक साइनबोर्ड. यह इलाका 1960 के दशक के आखिर में युद्ध विधवाओं और रिटायर्ड रक्षा कर्मियों के लिए एक कोऑपरेटिव सोसाइटी के तौर पर शुरू हुआ था | फोटो: अलमिना खातून/दिप्रिंट

‘हमारी बात कौन सुनेगा?’

2021 में सैनिक फार्म के एक निवासी ने दो RWAs की ओर से लिए जा रहे प्रवेश शुल्क को अदालत में चुनौती दी. उनका कहना था कि महामारी के दौरान इस शुल्क की वजह से एंबुलेंस, डिलीवरी वाहनों और दूसरी जरूरी सेवाओं के लिए कॉलोनी में प्रवेश करना मुश्किल हो रहा था. एसडीएमसी और दिल्ली पुलिस ने भी अदालत को बताया था कि इन गेटों और टोल की व्यवस्था अधिकारियों को जानकारी दिए बिना शुरू की गई थी.

दिल्ली हाई कोर्ट ने RWAs के खिलाफ काफी सख्त रुख अपनाया.

न्यायमूर्ति रेखा पाली ने RWAs से कहा, “ऐसे समय में आप प्रवेश शुल्क कैसे ले सकते हैं? हर कोई लोगों की मदद कर रहा है, लेकिन आप कोविड का इस्तेमाल पैसे वसूलने के लिए कर रहे हैं….बहुत अच्छा.” अदालत ने RWAs को टोल वसूलना बंद करने का आदेश दिया.

भल्ला का कहना है कि RWA की असली मंशा को गलत तरीके से पेश किया गया.

उन्होंने कहा, “यह कभी पैसे कमाने के लिए नहीं था. इसका उद्देश्य सुरक्षा और ट्रैफिक को नियंत्रित करना था और टोल सिर्फ व्यावसायिक वाहनों से लिया जाता था. लेकिन हमारी बात कौन सुनेगा या यह देखने की कोशिश कौन करेगा कि असल में यहां क्या हो रहा है?”

WARWA की कार्यकारिणी समिति के सदस्य राजीव भसीन ने कहा, “हम चाहे कितने भी सामाजिक काम कर लें या बुनियादी सुविधाओं के लिए कितनी भी मुश्किलें झेलें, खबरों में सिर्फ बड़े घरों वाले अमीर इलाके की छवि पर ध्यान दिया जाता है—हमारी असली समस्याओं पर नहीं.”

RWA के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने हमेशा समुदाय की मदद की है. वे बताते हैं कि निवासियों से मिले पैसों का इस्तेमाल बारिश के पानी को जमा करने जैसी योजनाओं में किया गया है. उनके मुताबिक, इससे मानसून के दौरान जलभराव रोकने और बारिश के पानी का दोबारा इस्तेमाल करने में मदद मिली है.

कोविड महामारी के दौरान सैनिक फार्म में एक कोविड-केयर सुविधा भी बनाई गई थी, जहां घरेलू कामगारों, उनके परिवारों और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की मदद की गई. बारिश के मौसम में RWA ट्रैफिक पुलिसकर्मियों और बाहर काम करने वाले दूसरे लोगों को रेनकोट और छाते भी बांटती है.

भसीन ने कहा, “हम चाहे कितने भी सामाजिक काम कर लें या बुनियादी सुविधाओं के लिए कितनी भी मुश्किलें झेलें, खबरों में सिर्फ बड़े घरों वाले अमीर इलाके की छवि पर ध्यान दिया जाता है—हमारी असली समस्याओं पर नहीं.”

अग्रवाल जैसे निवासियों का कहना है कि उनके लिए RWA ही सरकार के सबसे करीब है. चाहे कच्ची सड़कों को पक्की गलियों में बदलना हो या पूरे इलाके में सीसीटीवी कैमरे लगाना—ज्यादातर काम RWA के जरिए ही होते हैं.

अग्रवाल ने कहा, “अगर मुझे कोई परेशानी होती है या रात में इलाके में कोई हंगामा सुनाई देता है, तो मेरा पहला ख्याल अधिकारियों या पुलिस को फोन करने का नहीं होता. मैं RWA से संपर्क करती हूं क्योंकि जब हमें मदद की जरूरत होती है, तब सरकारी अधिकारी शायद ही कभी यहां पहुंचते हैं.”

लोहे के बड़े-बड़े गेटों के पीछे रहने वाले लोग आज भी भरोसेमंद पानी की सप्लाई का इंतजार कर रहे हैं. छह RWAs की ओर से मिलकर चलाए जा रहे 15 सामुदायिक बोरवेल हैं, लेकिन इसके बावजूद निवासियों की ज़रूरत पूरी करने के लिए पानी के टैंकर पूरे दिन कॉलोनी में आते-जाते रहते हैं.

भल्ला ने कहा, “हम लगातार अधिकारियों से उचित पाइपलाइन वाली पानी की सप्लाई, सफाई कर्मचारियों और जैविक कचरे के प्रबंधन के लिए ज़मीन देने की मांग करते रहे हैं, लेकिन वर्षों से हमें या तो कोई जवाब नहीं मिला या फिर एक विभाग से दूसरे विभाग के पास जाने के निर्देश मिलते रहे हैं.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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