नई दिल्ली: अमेरिका-ईरान युद्ध को करीब छह महीने हो चुके हैं और ऑयल मार्केट एक बार फिर सप्लाई को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक समझौते की उम्मीद कम होने के बीच ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है.
भारत के लिए जो अपनी कच्चे तेल की करीब 85 प्रतिशत ज़रूरत आयात से पूरी करता है, दुनियाभर में तेल की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी का मतलब ज्यादा आयात बिल, डॉलर की ज्यादा मांग और रुपये तथा चालू खाते पर दबाव हो सकता है. इसका असर आखिरकार ईंधन और परिवहन की बढ़ी हुई लागत के रूप में आम लोगों तक भी पहुंच सकता है.
गुरुवार को ब्रेंट फ्यूचर्स करीब 94 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. इसकी कीमत 2.4 प्रतिशत बढ़ी और यह करीब एक महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. यह बढ़ोतरी 17 जून से शुरू हुआ अमेरिका-ईरान का अंतरिम युद्धविराम प्रभावी रूप से खत्म होने और इस हफ्ते 60 दिन की बातचीत की समय सीमा बिना किसी समझौते के खत्म होने के बाद हुई.
ब्रेंट कच्चा तेल, नॉर्थ सी में तेल के क्षेत्रों से निकाले जाने वाले कच्चे तेल की कीमत का वैश्विक मानक है.
जोखिम के केंद्र में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ बना हुआ है. फरवरी के आखिर में युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया की करीब पांचवीं हिस्से की तेल सप्लाई इस जलमार्ग से होकर गुज़रती थी. अगर यहां लंबे समय तक आवाजाही बाधित रहती है, तो दुनियाभर में तेल की सप्लाई कम हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं.
सप्लाई को लेकर चिंता सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं है. रॉयटर्स के मुताबिक, यूक्रेन के ड्रोन हमलों के बाद काला सागर के नोवोरोस्सिय्स्क बंदरगाह पर हुई परेशानियों के कारण अगस्त के पहले हिस्से में रूस के बंदरगाहों से कच्चे तेल की खेप 15 प्रतिशत घटकर करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई.
आयात बिल और रुपये पर पड़ेगा सबसे पहला असर
भारत में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का सबसे पहला असर देश के आयात बिल और रुपये पर पड़ेगा.
सलाहकार और कंसल्टिंग कंपनी ग्रांट थॉर्नटन भारत में ऑयल मार्केट्स के डायरेक्टर प्रवीण राय ने कहा, “भारत कच्चे तेल के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इसलिए तेल की कीमतों में किसी भी तेज बढ़ोतरी का असर ज्यादा आयात लागत और रुपये पर दबाव के रूप में लगभग तुरंत अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.”
राय ने कहा कि कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत के सालाना आयात बिल में करीब 12-15 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है.
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब रिफाइनर कंपनियों को डॉलर की ज्यादा जरूरत होना भी है. वहीं, अगर देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के हिसाब से नहीं बढ़ाई जाती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है.
अमेरिका की जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के एनर्जी एक्सपर्ट और सीनियर विजिटिंग फैकल्टी उमुद शोकरी ने कहा, “पहला असर ज्यादा तेल आयात बिल, रिफाइनर कंपनियों की ओर से डॉलर की बढ़ी हुई मांग और रुपये पर अतिरिक्त दबाव के रूप में होगा.”
इसके बाद इसका असर एयरलाइंस, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, पेट्रोकेमिकल्स और ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल करने वाले दूसरे क्षेत्रों तक फैल सकता है. हालांकि, महंगाई बढ़ने में थोड़ा समय लग सकता है, क्योंकि देश में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों से तुरंत या पूरी तरह जुड़ी नहीं हैं.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के जूनियर फेलो आर्या रॉय बर्धन ने कहा कि इसका असर ईंधन के अलावा माल ढुलाई, खाद और खाने-पीने की चीजों तक भी पहुंच सकता है. उन्होंने कहा, “ब्रेंट 90 डॉलर से ऊपर रहने पर भारत को ज्यादा आयात बिल, रुपये और चालू खाते पर दबाव और ईंधन, माल ढुलाई, खाद और खाद्य पदार्थों की कीमतों के जरिए बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ सकता है.”
दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ी हुई हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या तेल कंपनियां बढ़ी हुई लागत खुद उठाती रहेंगी या इसका बोझ ग्राहकों पर डालेंगी.
दिप्रिंट ने ईंधन की कीमतें बढ़ाने की किसी योजना को लेकर जानकारी मांगने के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) को पत्र भेजा है, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.
शोकरी को उम्मीद है कि कीमतों में बढ़ोतरी अचानक एक बार में बहुत ज्यादा होने के बजाय धीरे-धीरे होगी.
राय ने कहा कि सरकार ईंधन की कीमतें बढ़ाने से पहले दूसरे कदमों पर भी विचार कर सकती है, जैसा उसने मार्च-मई में सप्लाई में आई परेशानी के दौरान किया था. उस समय सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, निर्यात शुल्क में बदलाव किया था, एलपीजी का उत्पादन बढ़ाया था और घरेलू तथा उज्ज्वला योजना के ग्राहकों के लिए सप्लाई को प्राथमिकता दी थी.
अगर तेल 100 डॉलर के पार जाता है तो भारत के सामने बड़ी चुनौती
भारत के लिए बड़ी चिंता तब होगी, जब ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली जाए और लंबे समय तक उसी स्तर पर बनी रहे. राय ने कहा कि अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है या प्रमुख समुद्री रास्तों और तेल निर्यात करने वाले देशों में सप्लाई बाधित होती है, तो तेल की कीमत कुछ समय के लिए 100 डॉलर से ऊपर जा सकती है.
अगर तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती है, तो देश का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ेगा और परिवहन की लागत भी बढ़ेगी.
सरकार के लिए लंबे समय तक ईंधन की कीमतें कम रखना सरकारी वित्त और सरकारी तेल कंपनियों के वित्तीय हालात पर दबाव डाल सकता है. लेकिन अगर कीमतें तेजी से बढ़ने दी जाती हैं, तो इसका बोझ आम लोगों पर बढ़ेगा.
पिछले कुछ महीनों में भारत ने कच्चे तेल के लिए अपने स्रोतों में विविधता बढ़ाई है. राय के मुताबिक, इससे देश को ज्यादा सुरक्षा मिली है. हालांकि, लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची रहने से अर्थव्यवस्था को इससे पूरी तरह बचाया नहीं जा सकता.
इसलिए सरकार की प्रतिक्रिया किसी एक कदम तक सीमित रहने के बजाय कई उपायों का मिश्रण हो सकती है.
राय को उम्मीद है कि सरकार लक्षित सब्सिडी और चुनिंदा टैक्स कटौती के साथ विदेशी मुद्रा से जुड़े उपाय कर सकती है. इसके अलावा अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से कच्चे तेल की सप्लाई के स्रोतों को और बढ़ाया जा सकता है. गंभीर सप्लाई संकट की स्थिति में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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