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Friday, 21 August, 2026
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आत्मनिर्भर भारत, लेकिन राज्य निर्भर? पिछले 10 साल में दिल्ली पर उनकी निर्भरता बढ़ी

जब देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया, तब राज्यों के लिए जिस वित्तीय व्यवस्था पर वे निर्भर हैं, वह केंद्र के हर साल लिए जाने वाले फैसलों पर ज्यादा निर्भर होती गई.

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आज़ादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए कहा कि भारत अब दूसरे देशों पर निर्भर रहना बर्दाश्त नहीं कर सकता. आत्मनिर्भर भारत यानी खुद पर निर्भर भारत की सोच पिछले एक दशक से आर्थिक नीति का अहम हिस्सा रही है. इसमें दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने, देश के अंदर अपनी क्षमता विकसित करने और दूसरे देशों या बाहरी ताकतों को भारत के जरूरी संसाधनों पर नियंत्रण करने से रोकने पर जोर दिया गया है. देश के स्तर पर यह तर्क मजबूत है. लेकिन राज्यों के स्तर पर तस्वीर थोड़ी अलग और ज्यादा जटिल हो जाती है.

दुनिया के बाकी देशों पर निर्भरता कम करने की बात हो रही है, लेकिन देश के अंदर पिछले एक दशक में भारत के राज्य दिल्ली यानी केंद्र सरकार पर और ज्यादा निर्भर होते गए हैं. केंद्र के 17 साल के बजट के आंकड़े बताते हैं कि यह निर्भरता कब बढ़ी और क्यों बढ़ी.

राज्यों के लिए बड़ा हिस्सा, लेकिन छोटा होता पूल

भारत की वित्तीय व्यवस्था में शुरुआत से ही एक असंतुलन था. संविधान बनाने वालों ने इसे समझा और ज़रूरी समझौते के तौर पर इसे स्वीकार किया. स्वास्थ्य, शिक्षा और पुलिस से जुड़े खर्च की जिम्मेदारी राज्यों की है—ये ऐसी सेवाएं हैं जिनका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है. वहीं केंद्र सरकार के पास आयकर, कॉरपोरेट टैक्स और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में केंद्र के हिस्से जैसे ऐसे टैक्स हैं, जिनसे ज्यादा और आसानी से राजस्व बढ़ाया जा सकता है.

अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड मस्क्रेव के संघीय वित्त के पुराने और प्रसिद्ध मॉडल के अनुसार, शिक्षा जैसी सेवाओं का काम लोगों के करीब वाले स्तर पर करना बेहतर होता है, जबकि संकट के समय अर्थव्यवस्था को संभालने का काम केंद्र के पास होना चाहिए. इसमें पैसे की सप्लाई और कर्ज लेने जैसे कामों पर केंद्र का नियंत्रण जरूरी होता है. बाद में वॉलेस ओट्स ने भी सरकार के स्थानीय स्तरों पर खर्च की जिम्मेदारी देने की बात कही.

सीधी बात यह है कि सरकार के पास जितना खर्च करने की जिम्मेदारी है, उसके हिसाब से उसके पास आमदनी भी होनी चाहिए. भारत का वित्त आयोग भी इसी सिद्धांत को बनाए रखने के लिए बनाया गया था. हालांकि, यह संतुलन हमेशा हासिल नहीं हो पाया.

भारत में लंबे समय से वर्टिकल फिस्कल इम्बैलेंस यानी राज्यों के खर्च और उनकी अपनी आमदनी के बीच अंतर बना हुआ है. कुछ अनुमानों के अनुसार यह अंतर सरकारों की कुल संयुक्त आमदनी का 60 प्रतिशत तक रहा है—यानी राज्य जितनी आमदनी खुद जुटा सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा खर्च करते हैं. भारत में पहले वित्त आयोग के बनने के समय से ही यह संघीय व्यवस्था की एक बड़ी समस्या रही है.

इस अंतर को दूर करने के लिए राजस्व का बंटवारा यानी डिवॉल्यूशन किया जाता है. सिद्धांत के तौर पर इसमें बढ़ोतरी हुई है. 2015 में 14वें वित्त आयोग ने राज्यों को बांटे जाने वाले टैक्स के पूल में राज्यों का हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया. इसे एक बड़ी उपलब्धि माना गया और इसे सहयोगी संघवाद के एक नए दौर की शुरुआत बताया गया.

सीधी भाषा में देखें तो यह वित्तीय आत्मनिर्भरता का एक तरीका था: राज्यों की आमदनी केंद्र के हर साल के फैसले पर कम निर्भर होती और संविधान के तहत उनका हिस्सा ज्यादा तय और सुरक्षित होता, लेकिन राजस्व बंटवारे की दर कितनी प्रभावी है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिस पूल पर यह दर लागू होती है, उसमें कुल कितना पैसा है.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

समस्या यह रही कि समय के साथ केंद्र सरकार के कुल टैक्स राजस्व का छोटा हिस्सा ही इस पूल में जाने लगा.

2010 के दशक की शुरुआत में इस पूल में जाने वाला हिस्सा औसतन करीब 87 प्रतिशत था. यह उस समय की बात है जब 14वें वित्त आयोग की ओर से राज्यों के हिस्से में बढ़ोतरी लागू नहीं हुई थी. उस समय सेस और सरचार्ज, जिन्हें संविधान के तहत राज्यों के साथ बांटना ज़रूरी नहीं है, कुल टैक्स कलेक्शन का सिर्फ एक छोटा हिस्सा थे.

लेकिन जैसे-जैसे इन साधनों यानी सेस और सरचार्ज का इस्तेमाल बढ़ा, राज्यों के साथ बांटे जाने वाले टैक्स का पूल छोटा होता गया, जबकि कागज पर राज्यों के हिस्से की दर बढ़ी हुई थी. खास तौर पर वित्त वर्ष 2020-21 में यह पूल घटकर 71.6 प्रतिशत रह गया. यह इस पूरी सीरीज में एक साल में हुई सबसे बड़ी गिरावट थी. यह कमी उस समय हुई जब केंद्र ने कोविड-19 से निपटने के लिए ऐसे सेस का इस्तेमाल किया, जिन्हें राज्यों के साथ बांटना जरूरी नहीं था. इस तरह इन पैसों को उस पूल से बाहर रखा गया, जिसे राज्यों के साथ बांटा जाना था.

विडंबना यह है कि जब देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया गया, उसी समय राज्यों के लिए जिस वित्तीय व्यवस्था पर वे निर्भर हैं, वह केंद्र के हर साल लिए जाने वाले फैसलों पर ज्यादा निर्भर होती गई. हालांकि, इसमें कुछ सुधार हुआ है और अनुमान है कि 2026-27 तक यह हिस्सा बढ़कर 84.5 प्रतिशत हो सकता है. फिर भी इससे एक अहम बात सामने आती है: जिस पूल पर राज्य निर्भर हैं, उसमें बहुत तेजी से बदलाव हो सकता है और यह बदलाव केंद्र के फैसलों पर निर्भर करता है.

वह नंबर जो पूरी कहानी को उलट देता है

आंकड़ों की एक और, पूरी तरह अलग सीरीज इस विश्लेषण को और जटिल बनाती है क्योंकि यह इसके उलट तस्वीर दिखाती है.

ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

राज्यों को कुल ट्रांसफर, जिसमें डिवॉल्यूशन, ग्रांट और लोन शामिल हैं, 2020-21 में अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. यह केंद्र की ट्रांसफर से पहले की आमदनी का 59.1 प्रतिशत था. ऑडिट किए गए 15 साल के आंकड़ों में यह सबसे ज्यादा अनुपात था. ऊपर-ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि केंद्र ने राज्यों को ज्यादा पैसा दिया. लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि यह बढ़ोतरी काफी हद तक गणित की वजह से हुई थी.

उस साल महामारी की वजह से केंद्र की टैक्स और गैर-टैक्स आमदनी में काफी गिरावट आई. वहीं जीएसटी मुआवजा, बैक-टू-बैक लोन और राहत के लिए दी जाने वाली ग्रांट राज्यों को मिलती रहीं. उस समय राज्य स्वास्थ्य संकट की सबसे आगे वाली लाइन में थे. यह अनुपात इसलिए नहीं बढ़ा क्योंकि दिल्ली ने सामान्य सालों के मुकाबले कुल मिलाकर ज्यादा पैसा दिया था, बल्कि इसलिए बढ़ा क्योंकि उसकी अपनी आमदनी उस पैसे के मुकाबले ज्यादा तेजी से कम हुई, जो उसने राज्यों को दिया था. यह अनुपात 2021-23 के दौरान भी ऊंचा बना रहा, क्योंकि महामारी से जुड़ी मदद जारी रही. इसके बाद केंद्र की आमदनी बढ़ने लगी और 2024-25 तक यह अनुपात धीरे-धीरे घटकर करीब 51 प्रतिशत हो गया.

दोनों चार्ट को साथ रखने पर एक अहम लेकिन कम बताई गई बात सामने आती है. जिस डिविजिबल पूल पर राज्यों का संविधान के तहत अधिकार है, वह ठीक उस समय छोटा हो गया जब राज्यों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. दूसरी ओर, कुल ट्रांसफर का अनुपात, जिसमें केंद्र की ओर से हर साल अपने फैसले के आधार पर दी जाने वाली ग्रांट भी शामिल है, उसी दौरान बढ़ गया.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दिल्ली ने इस कमी को उन तरीकों से पूरा करने का फैसला किया, जिनके तहत इन पैसों को राज्यों के साथ बांटना जरूरी नहीं था. इसलिए राज्यों को मदद तो मिली, लेकिन यह मदद संविधान बनाने वालों की सोच के अनुसार अपने-आप और नियमों के आधार पर मिलने वाले रास्ते से नहीं, बल्कि केंद्र की शर्तों और उसके फैसले के आधार पर मिली. अधिकार के तौर पर मिलने वाले पैसे और अपनी मर्जी से दी जाने वाली मदद के बीच यह अंतर संघवाद और उदारता के बीच के मूल अंतर को दिखाता है.

यह किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने की बात नहीं है. 1980 के दशक से जब भी सरकारों के सामने वित्तीय मुश्किलें आईं, अलग-अलग सरकारों ने सेस का इस्तेमाल किया है. खास बात यह है कि 15वें और 16वें वित्त आयोग ने डिवॉल्यूशन की दर को 41 प्रतिशत पर बनाए रखा, इसे कम नहीं होने दिया, लेकिन समस्या कागज़ पर दिखाई देने वाली दर में नहीं है, बल्कि उस पूल में है जिस पर यह दर लागू होती है.

राज्यों के लिए वित्तीय आत्मनिर्भरता उसी तरह है जैसे किसी देश के लिए राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता. इसका मतलब है कि दूसरे की इच्छा या मदद पर निर्भरता कम हो और ऐसे अधिकार बढ़ें जिन्हें बिना पहले बताए बदला न जा सके. अगर इसे ठीक किया जाए तो डिवॉल्यूशन उसी तरह काम कर सकेगा, जैसा संविधान बनाने वालों ने सोचा था. इससे राज्यों को अपनी योजनाएं बनाने के लिए एक भरोसेमंद आधार मिलेगा. अगर इस समस्या को दूर नहीं किया गया, तो भविष्य के संकटों में भी मदद ऐसे तरीकों से दी जाती रहेगी, जिनके पैसे को राज्यों के साथ बांटना केंद्र के लिए ज़रूरी नहीं है.

17वें वित्त आयोग के सामने एक अहम फैसला है: क्या वह सिर्फ डिवॉल्यूशन की दर पर बातचीत जारी रखे या एक ऐसा फिक्स्ड बेस तय करे, जिस पर यह दर लागू हो. प्रधानमंत्री ने राज्यों से कहा है कि वे सुधारों की रफ्तार में केंद्र के साथ कदम मिलाएं. लेकिन सुधारों के लिए पैसे की जरूरत होती है. और अभी केंद्र यह तय करता है कि राज्यों के पास काम करने के लिए कितने संसाधन होंगे: इस साल की दर, इस साल का पूल, इस साल की ग्रांट. यह बराबरी की साझेदारी नहीं है. यह ऐसी साझेदारी है जिसमें एक पक्ष शर्तें तय करता है और दूसरे पक्ष से उसके साथ कदम मिलाने को कहता है.

आज़ादी के बाद से भारत ने जो प्रगति की है, वह साफ दिखाई देती है. यह ज़रूरी है कि कोई वित्त आयोग यह जांच करे कि राज्यों को सुधारों को आगे बढ़ाने में देरी क्यों हो रही है.

बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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