मुंबई के मिडिल क्लास के हीरो के तौर पर तुकाराम मुंढे के उभरने से मुझे फूड पॉलिसी के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ा. एक दशक पहले, जब एक पार्लियामेंट्री इलेक्शन और कई असेंबली इलेक्शन ने भारत को मिडिल एज में वापस धकेल दिया था, तो हममें से कई लोग खाने को लेकर एक नए पॉलिटिकल ऑब्सेशन से डर गए थे. कैंपेन का सेंटर असल में बीफ होना था.
न सिर्फ बीफ बेचने वाले लोगों के लिए कड़ी सज़ा तय की गई थी (कई राज्यों में पांच साल तक की सख्त जेल), बल्कि इस कैंपेन का असली मकसद तब सामने आया जब लोगों को बीफ रखने या ले जाने के शक में पीट-पीटकर मार दिया जाने लगा.
यह राजनीतिक जुनून पवित्र गाय की रक्षा से कम और गरीब मुसलमानों को परेशान करने से ज्यादा जुड़ा था, जिनमें से कुछ लोग बीफ खाते हैं (बीफ की कीमत बकरे के मांस से एक-तिहाई तक कम हो सकती है).
बाद में बीफ को लेकर यह जुनून सभी मांसाहारी खाने तक फैल गया और यह धारणा फैलाई गई कि हिंदू धर्म में शाकाहार को उसके पवित्र नियमों में से एक माना गया है. अगर कोई हाउसिंग सोसाइटी या मकान मालिक किसी मुस्लिम को घर नहीं देना चाहता था, तो उसके पास एक तैयार बहाना होता था: वह कहता था कि उसे मांसाहारी लोग नहीं चाहिए.
यह कैंपेन इतना उग्र था कि दिल्ली पुलिस ने राजधानी के केरल भवन की कैंटीन में भी छापा मार दिया था, यह जांचने के लिए कि वहां बीफ परोसा जा रहा है या नहीं (नहीं परोसा जा रहा था). घटिया न्यूज़ चैनलों ने होटलों में स्टिंग ऑपरेशन तक किए, ताकि उन्हें यह कहते हुए पकड़ा जा सके कि वहां बीफ मिलता है.
अब इस कैंपेन को कम कर दिया गया है, हालांकि, कानून अभी भी लागू हैं, लेकिन ‘भारत शाकाहारी है’ वाला नारा अभी भी सरकार की आधिकारिक सोच जैसा लगता है. हम ऐसा देश हैं जहां दो सबसे ताकतवर राजनेता और दो सबसे अमीर आदमी गुजराती शाकाहारी हैं (इनमें से तीन बनिया हैं). जैसा कि अब आम बात है, एजेंडा अमीर और ताकतवर लोग ही तय करते हैं.
अब इस कैंपेन को कम क्यों किया गया है? तीन कारण हैं. पहला: इससे बीजेपी बहुत ज्यादा बनिया पार्टी जैसी दिखने लगी थी और अब उसे दूसरी मांसाहारी जातियों तक पहुंच बनानी है. दूसरा: यह कैंपेन बहुत ज्यादा विरोधाभासी हो गया था. बीजेपी उत्तर भारत में बीफ बेचने वालों को जेल भेजना चाहती है, लेकिन गोवा और पूर्वोत्तर में उसका रुख है कि बीफ खाना ठीक है.
तीसरा: खाने को लेकर ऐसी पाबंदियों की किसी को वास्तव में परवाह नहीं है. बीफ विरोधी कैंपेन से बीजेपी समर्थकों के बीच हिंदुत्व के कट्टर लोगों को खुशी मिली होगी और उन तथाकथित गौ रक्षकों को भी इससे फायदा हुआ होगा, जो मुसलमानों को पीटने का बहाना ढूंढ रहे थे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे आम वोटर पर कोई फर्क पड़ा, जो शासन और अर्थव्यवस्था को लेकर ज्यादा चिंतित था, बजाय उन बुराइयों के जिन्हें बीजेपी बीफ चिली फ्राई में बताती थी.
आखिरकार बीजेपी इस नतीजे पर पहुंची कि खाना कोई मुद्दा नहीं है और वह दूसरे मुद्दों की ओर बढ़ गई, लेकिन, निश्चित तौर पर, बीजेपी पूरी तरह गलत थी. खाना एक बड़ा मुद्दा है.
बीजेपी से गलती इसलिए हुई क्योंकि उसे लगा कि लोगों को इस बात की चिंता है कि उनके पड़ोसी क्या खा रहे हैं. ऐसा नहीं है, लेकिन लोगों को इस बात की चिंता ज़रूर है कि वे खुद क्या खा रहे हैं और बीजेपी की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है.
इसलिए खाना एक बड़ा मुद्दा है. बस वैसे नहीं, जैसा बीजेपी ने सोचा था.
भारतीय हकीकत
यह हमें फिर से तुकाराम मुंढे के पास ले आता है—जो इस समय हीरो बने हुए हैं. वह महाराष्ट्र सरकार के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन में कमिश्नर हैं. पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने महाराष्ट्र में रेस्टोरेंट, गोदाम और खाने की दुकानों पर कार्रवाई शुरू की है. मुंबई में मुंढे के विभाग को रसोई और दूसरी उन जगहों पर चूहे, कॉकरोच और हर तरह के कीड़े-मकौड़े मिले हैं, जहां खाना रखा या बनाया जाता है.
मुंढे ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी के पद या नाम से प्रभावित नहीं होते. उन्होंने मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित क्लब विलिंगडन, Blinkit के गोदामों और यहां तक कि अदालतों की कैंटीनों पर भी कार्रवाई की है. हर कदम पर राजनेताओं और जजों ने नाराज़गी जताई है, लेकिन नागरिकों ने उनका समर्थन किया है. लोग उन्हें एक ऐसी दुर्लभ मिसाल मानते हैं: ऐसा अधिकारी जो बिना किसी पक्षपात या डर के नियम लागू करता है.
लोग मिलावटी और असुरक्षित खाना खाकर थक चुके हैं. भारत की हकीकत यह है कि खाने की लगभग हर चीज़ में मिलावट हो सकती है. नकली पनीर ने लगभग पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया है. खाने वाला तेल अक्सर मिलावटी और खतरनाक होता है. जब लोग बाहर खाना खाने जाते हैं (या किसी खाने की दुकान पर खाते हैं), तो उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि खाना सुरक्षित है. क्या रसोई कॉकरोचों से भरी हुई हैं? हमें पता नहीं और घर तक खाना पहुंचाने के लिए बनाई गई क्लाउड किचन का क्या? ज्यादातर लोगों को यह भी पता नहीं होता कि वे कहां हैं, उनकी सफाई कैसी है और वहां काम करने वालों के लिए स्वच्छता के क्या नियम ज़रूरी हैं.
जिस देश के बारे में हमें बार-बार बताया जाता है कि वह एक उभरती हुई महाशक्ति है, क्या यह सही है कि हमें अपने खाने की सुरक्षा का भी भरोसा नहीं हो सकता? यह भारत के बारे में क्या बताता है कि सबसे अमीर लोग भी बड़े और महंगे रेस्टोरेंट में नकली पनीर खाने को मजबूर हैं, जहां रसोई में चूहे और कॉकरोच घूमते रहते हैं?
अब सोचिए, अगर एक दशक पहले सरकार ने असुरक्षित खाने और मिलावट पर ध्यान दिया होता तो लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होती? अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से कहा होता कि क्योंकि सफाई और स्वास्थ्य सबसे पहले आते हैं, इसलिए उनकी सरकार (कम से कम बीजेपी शासित राज्यों में राज्य सरकारों के साथ मिलकर) यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी कार्रवाई करेगी कि नागरिकों की सेहत को कोई खतरा न हो?
मुंढे को अभी जिस तरह का समर्थन मिल रहा है, उसे देखते हुए यह कार्रवाई बहुत लोकप्रिय होती और मोदी को ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता जिसने हमें हमारी सेहत वापस दी, हमारे बच्चों को सुरक्षित रखा और यह सुनिश्चित किया कि भारत में मान लीजिए, सिंगापुर जैसे स्वच्छता के मानक हों.
लेकिन ज़ाहिर है कि सरकार का ऐसा कुछ करने का कोई इरादा नहीं था. वह असहिष्णुता को बढ़ावा देते हुए सुशासन की बात करती रही. अगर कोलकाता में कोई आदमी बीफ बिरयानी खाना पसंद करता है तो क्या इससे किसी को सच में नुकसान होता है? अगर कोच्चि में कोई घर रात के खाने के लिए बीफ चिली फ्राई बनाता है तो क्या इससे किसी को नुकसान होता है? बिल्कुल नहीं, लेकिन जब हम बहुत असुरक्षित और खतरनाक खाना खाते हैं तो इससे हमें नुकसान ज़रूर होता है.
सरकार ने खाने को लेकर अपना पूरा ध्यान ऊंची जातियों (मुख्य रूप से ब्राह्मण-बनिया) की खाने की आदतें सभी पर थोपने पर क्यों लगा दिया? हां, इससे शायद उसके कुछ मुस्लिम विरोधी समर्थकों को खुशी मिलती है, लेकिन इससे भारत को आगे बढ़ाने में बहुत कम मदद मिली. या आम भारतीय को कोई फायदा हुआ.
मुंबई में हर कोई सोचता है कि मुंढे का मामला आखिर में कैसे खत्म होगा. कोई जज मुंढे की कार्रवाई पर कुछ नकारात्मक टिप्पणी करेगा और महाराष्ट्र सरकार इसका बहाना बनाकर उनका किसी दूसरे विभाग में ट्रांसफर कर देगी. उनकी जगह ऐसा अधिकारी आएगा जो आसानी से सरकार के हिसाब से चलेगा और विभाग में हर कोई (और ऊपर बैठे लोग भी) उन जगहों से रिश्वत लेकर खूब पैसा कमाएंगे, जिनके खिलाफ मुंढे ने कार्रवाई की है. रिश्वत देने के बाद इन लोगों को पहले की तरह अपना कारोबार चलाने की इज़ाज़त दे दी जाएगी.
यह सरकारों के काम करने के तरीके को लेकर एक निराशावादी, लेकिन ज्यादातर सही नज़रिया है. खुद मुंढे का अपने करियर में दो दर्जन से ज्यादा बार ट्रांसफर हो चुका है, इसलिए यह तरीका उनके लिए नया नहीं है.
लेकिन सोचिए, अगर मोदी सबसे पहले इस काम को शुरू कर देते तो सब कितना अलग हो सकता था? अगर उन्होंने हमारे खाने को ज़हरीला बनाने वाली चीज़ों के खिलाफ कार्रवाई की होती? यह भारत के लिए और इस सरकार के लिए भी एक और खोया हुआ मौका है.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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